पापा की छाया में खोई दीदी
सुबह के नौ बजे थे, और हमारा छोटा सा घर दिल्ली की उस पुरानी कॉलोनी में शांत पड़ा था। मैं, प्रिया, अपनी रोज की दिनचर्या में लगी हुई थी—किचन में चाय की केतली चढ़ाकर, ब्रेड को टोस्टर में डाल रही थी। बाहर गली में बच्चों की आवाजें आ रही थीं, और पापा अभी-अभी नहाकर तैयार होकर ऑफिस जाने की तैयारी कर रहे थे। दीदी, सीमा, ऊपर वाले कमरे में सो रही थी, शायद देर रात तक पढ़ाई करती रही होगी। मां की मौत के बाद से घर की जिम्मेदारी हम तीनों पर ही थी, और ये छोटे-छोटे पल ही हमें एक साथ बांधे रखते थे।
मैंने चाय की ट्रे बनाई और पापा को आवाज दी। वो लिविंग रूम में अखबार पढ़ते हुए बैठे थे, उनकी आंखें थोड़ी थकी हुई लग रही थीं। "पापा, चाय," मैंने मुस्कुराते हुए कहा। वो उठे और मेरे पास आकर ट्रे ले ली, उनकी उंगलियां हल्के से मेरी उंगलियों को छू गईं, लेकिन वो बस एक सामान्य स्पर्श था। "धन्यवाद, बेटी," उन्होंने कहा और सोफे पर बैठ गए। मैं भी उनके बगल में बैठ गई, चाय की चुस्की लेते हुए। घर में सब कुछ सामान्य था, बस वही पुरानी दिनचर्या—पापा का ऑफिस, मेरी कॉलेज की पढ़ाई, और दीदी की जॉब सर्च।
दीदी नीचे आईं, उनके बाल बिखरे हुए थे और आंखें नींद से भरी। वो 23 साल की थीं, मुझसे चार साल बड़ी, और हमेशा घर की जिम्मेदार बड़ी बहन। "गुड मॉर्निंग, सब," उन्होंने कहा और किचन की तरफ बढ़ गईं। पापा ने अखबार से नजरें उठाकर उन्हें देखा, एक पल के लिए रुके, फिर वापस पढ़ने लगे। मैंने नोटिस किया कि दीदी की चाल में थोड़ी सुस्ती थी, शायद रात को अच्छी नींद नहीं आई। हम तीनों ने साथ में नाश्ता किया, बातें कीं—पापा ने अपने ऑफिस की कोई फनी स्टोरी सुनाई, दीदी ने अपनी जॉब इंटरव्यू की तैयारी के बारे में बताया, और मैंने कॉलेज के असाइनमेंट का जिक्र किया। वो पल इतना साधारण था कि लगता था, जीवन बस ऐसे ही चलता रहेगा।
पापा 50 साल के थे, राजीव नाम, एक सरकारी ऑफिस में क्लर्क। मां की मौत कैंसर से दो साल पहले हुई थी, और तब से घर में एक खालीपन सा था। हम सबने मिलकर उसे भरने की कोशिश की—दीदी ने घर के कामों में हाथ बंटाना शुरू किया, मैंने पढ़ाई पर फोकस किया। पापा हमेशा मजबूत बने रहे, लेकिन कभी-कभी उनकी आंखों में वो उदासी दिखती थी। शाम को जब वो घर लौटते, तो हम साथ डिनर करते, टीवी देखते। वो दिन भी वैसा ही था; पापा ऑफिस चले गए, मैं कॉलेज गई, और दीदी घर पर रहीं, अपनी रिज्यूमे अपडेट करती हुईं।
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शाम को जब मैं लौटी, तो घर में एक अजीब सा सन्नाटा था। दीदी किचन में सब्जी काट रही थीं, लेकिन उनके चेहरे पर थकान थी। "क्या हुआ, दीदी? सब ठीक?" मैंने पूछा। वो मुस्कुराईं, लेकिन वो मुस्कान जबरदस्ती की लगी। "हां, बस थोड़ी सिरदर्द है," उन्होंने कहा। पापा थोड़ी देर बाद आए, उनके हाथ में कुछ किराने का सामान था। हमने साथ खाना बनाया, लेकिन बातें कम हो रही थीं। डिनर के बाद, पापा ने कहा, "सीमा, आज तुम्हारी तबीयत ठीक नहीं लग रही। जाकर आराम करो।" दीदी ने हामी भरी और ऊपर चली गईं। मैंने बर्तन साफ किए, और पापा टीवी देखने लगे।
रात के करीब दस बजे, मैं अपने कमरे में पढ़ रही थी जब मुझे ऊपर से कुछ आवाजें आईं। दीदी का कमरा मेरे ठीक ऊपर था, और पापा का बगल में। मैंने सोचा शायद दीदी की तबीयत खराब है, तो चेक करने ऊपर गई। दरवाजा हल्का सा खुला था, और अंदर से हल्की रोशनी आ रही थी। मैंने झांककर देखा—पापा दीदी के बिस्तर पर बैठे थे, उनका हाथ दीदी के कंधे पर था। "क्या हुआ, बेटी? बताओ न," पापा धीरे से कह रहे थे। दीदी की आंखें नम थीं, वो कुछ कह रही थीं, लेकिन आवाज धीमी थी। मैं वहां खड़ी रही, समझ नहीं पा रही थी कि क्या करूं।
फिर दीदी ने कहा, "पापा, मैं थक गई हूं। मां के जाने के बाद सब इतना मुश्किल लगता है। जॉब नहीं मिल रही, और घर की जिम्मेदारी..." पापा ने उन्हें गले लगा लिया, वो एक पिता का प्यार था, लेकिन उसमें कुछ गहराई थी। मैंने देखा कि दीदी ने अपना सिर पापा के सीने पर टिका दिया, और पापा उनके बालों में उंगलियां फेर रहे थे। मेरे मन में एक अजीब सा एहसास हुआ—जैसे ये सामान्य से ज्यादा करीब था। मैं चुपचाप नीचे आ गई, लेकिन नींद नहीं आ रही थी। वो रात मैं सोचती रही कि क्या ये सिर्फ मेरी कल्पना है, या घर में कुछ बदल रहा है।
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अगले कुछ दिनों में, मैंने नोटिस किया कि पापा और दीदी के बीच बातें बढ़ गईं। सुबह नाश्ते पर, पापा दीदी से उनकी जॉब के बारे में ज्यादा पूछते, और शाम को वो साथ बैठकर चाय पीते। एक शाम, मैं कॉलेज से देर से लौटी तो देखा पापा और दीदी लिविंग रूम में बैठे थे, दीदी का सिर पापा की गोद में था। पापा उनके माथे पर हाथ फेर रहे थे। "प्रिया, आ गई?" पापा ने मुस्कुराकर कहा, लेकिन उनकी आंखों में एक चमक थी। दीदी उठीं, थोड़ा शर्माकर, और किचन चली गईं। मैंने कुछ नहीं कहा, लेकिन मेरे मन में सवाल घूमने लगे। क्या ये सिर्फ पिता-बेटी का रिश्ता है, या कुछ और?
एक रात, बारिश हो रही थी। मैं सो नहीं पा रही थी, तो पानी पीने नीचे गई। ऊपर से फिर आवाजें आ रही थीं—इस बार हल्की सी हंसी। मैं चुपके से ऊपर गई, दीदी के कमरे का दरवाजा बंद था, लेकिन अंदर से बातें सुनाई दे रही थीं। "पापा, आप ऐसे मत करो," दीदी कह रही थीं, लेकिन उनकी आवाज में शर्म और खुशी मिक्स थी। पापा ने कुछ कहा, जो मुझे साफ नहीं सुना, लेकिन फिर चुप्पी छा गई। मेरे दिल की धड़कन तेज हो गई; मैं जानती थी कि कुछ गलत हो रहा है, लेकिन उत्सुकता रोक नहीं पा रही थी।
अगले दिन, दीदी का व्यवहार बदला हुआ था। वो ज्यादा मुस्कुरा रही थीं, लेकिन मेरी तरफ देखने से कतरा रही थीं। शाम को जब पापा घर आए, तो दीदी ने उन्हें गले लगाया—वो सामान्य से ज्यादा लंबा गले लगाना था। मैं किचन में थी, लेकिन सब देख रही थी। रात को डिनर के बाद, पापा ने कहा, "प्रिया, आज तुम जल्दी सो जाओ। कल कॉलेज है न?" मैंने हामी भरी और अपने कमरे में चली गई, लेकिन सो नहीं पाई। करीब आधी रात, मैंने फिर ऊपर जाने का फैसला किया।
दरवाजे के पास पहुंची तो अंदर से हल्की सी कराहटें आ रही थीं। मैंने दरवाजा हल्का सा धक्का दिया—वो लॉक नहीं था। अंदर, मद्धम लाइट में, पापा दीदी के ऊपर थे। दीदी की आंखें बंद थीं, उनके होंठों से सिसकियां निकल रही थीं। पापा उनके शरीर पर चुंबन कर रहे थे, उनके हाथ दीदी की कमर पर थे। मैं स्तब्ध खड़ी रही, मेरी सांस रुक सी गई। दीदी ने आंखें खोलीं और मुझे देखा, लेकिन कुछ नहीं कहा। पापा ने धीरे से दीदी की गर्दन पर吻 किया, और दीदी ने फिर आंखें बंद कर लीं।
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मैं चुपचाप नीचे आ गई, मेरे मन में उथल-पुथल मची थी। क्या ये प्यार है? या गलत? अगले दिन, दीदी ने मुझसे बात की। "प्रिया, तुमने कल देखा न? प्लीज किसी को मत बताना। पापा... वो बस अकेले हैं, और मैं भी।" उनकी आंखें नम थीं। मैंने कुछ नहीं कहा, लेकिन मेरे अंदर एक जलन सी थी—ईर्ष्या की, या कुछ और। शाम को, पापा घर आए और हम सब साथ बैठे। बातें सामान्य थीं, लेकिन हवा में टेंशन थी। रात को, मैं फिर ऊपर गई, इस बार जानबूझकर।
दरवाजा खुला था, और अंदर पापा दीदी को बाहों में लिए लेटे थे। दीदी नग्न थीं, उनकी त्वचा पर पसीने की बूंदें चमक रही थीं। पापा के हाथ उनके स्तनों पर थे, धीरे-धीरे मसल रहे थे। दीदी की सांसें तेज थीं, वो पापा के होंठों को चूम रही थीं। मैं वहां खड़ी देखती रही, मेरे शरीर में एक अजीब सी गर्मी फैल रही थी। पापा ने दीदी को पलटा, उनके पीछे से प्रवेश किया। दीदी ने कराहा, "पापा... आह..." उनकी आवाज में दर्द और सुख मिक्स था। पापा के धक्के तेज होते गए, दीदी का शरीर हिल रहा था।
मैंने खुद को रोक नहीं पाई और अंदर चली गई। "प्रिया!" दीदी चौंक गईं, लेकिन पापा रुके नहीं। वो दीदी को चोदते रहे, उनके धक्के गहरे और तेज। दीदी की चूत से आवाजें आ रही थीं, गीली और चिपचिपी। पापा ने दीदी को और जोर से पकड़ा, उनके कूल्हों पर थप्पड़ मारे। दीदी चिल्लाई, "हां, पापा... और जोर से..." उनका शरीर कांप रहा था, orgasm की लहरें उन्हें घेर रही थीं। पापा ने आखिरकार अपना वीर्य दीदी के अंदर छोड़ा, और दोनों हांफते हुए लेट गए।
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मैं उनके पास बैठ गई, मेरी आंखें नम थीं। "ये क्या है?" मैंने पूछा। पापा ने मुझे देखा, उनकी आंखों में कोई पछतावा नहीं था। "बेटी, ये हमारा राज है," उन्होंने कहा। दीदी ने मेरा हाथ पकड़ा, "प्रिया, शामिल हो जाओ।" मैं हिचकिचाई, लेकिन मेरे अंदर की आग बुझ नहीं रही थी। पापा ने मुझे खींचा, मेरे कपड़े उतारे। उनकी उंगलियां मेरी चूत पर फिरीं, गीली और गर्म। दीदी देख रही थीं, मुस्कुरा रही थीं।
पापा ने मुझे बिस्तर पर लिटाया, उनके होंठ मेरे स्तनों पर थे। मैं कराह उठी, पहली बार ऐसा एहसास। दीदी ने पापा के लंड को सहलाया, उसे फिर से तैयार किया। पापा ने मुझे चोदा, धीरे-धीरे, फिर तेज। मेरी चूत में दर्द हुआ, लेकिन सुख ज्यादा था। दीदी ने मेरे होंठ चूमे, हम तीनों एक हो गए। पापा के धक्के मुझे नए अनुभव दे रहे थे, हर थ्रस्ट में भावनाओं की लहर। दीदी की चूत अब भोसड़ा सी लग रही थी, पापा के बार-बार चोदने से फैली हुई।
रात भर हमने अलग-अलग तरीकों से एक-दूसरे को संतुष्ट किया। पापा ने दीदी को डॉगी स्टाइल में चोदा, जबकि मैं उनके नीचे थी। मेरी जीभ दीदी की क्लिट पर थी, उनका रस मेरे मुंह में। पापा का लंड दीदी की चूत में घुसता-निकालता, और मैं सब महसूस कर रही थी। फिर पापा ने मुझे उठाया, दीदी के ऊपर लिटाया। हम बहनों ने एक-दूसरे को चूमा, जबकि पापा हमें बारी-बारी चोदते रहे। हर सीन में नई भावना थी—पहले डर, फिर स्वीकृति, अब पूर्ण सुख।
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सुबह होने को थी, लेकिन हम रुके नहीं। पापा ने दीदी को फिर से चोदा, इस बार और जोर से, उनकी चूत को पूरी तरह खोलकर। दीदी चिल्ला रही थीं, "पापा, बनाओ इसे भोसड़ा..." पापा के धक्के इतने तेज थे कि बिस्तर हिल रहा था। मैं उनके बगल में लेटी, अपनी उंगलियों से खुद को छू रही थी। वो पल इतना इंटेंस था कि लगता था, समय रुक गया है।
फिर पापा ने मुझे लिया, उनके हाथ मेरी कमर पर कसकर। मैं उनकी गोद में थी, ऊपर-नीचे हो रही थी। दीदी ने पीछे से पापा के बॉल्स को सहलाया, हमें और उत्तेजित किया। हर मूवमेंट में नई सेंसेशन—त्वचा की रगड़, सांसों की गर्मी, दिल की धड़कन। हम तीनों एक रिदम में थे, खोए हुए उस पल में जहां दुनिया बाहर थी।