पापा के दोस्त के साथ सुहागरात

सुबह की धूप कमरे में छनकर आ रही थी, और मैं अपनी बालकनी में खड़ी होकर कॉफी का कप थामे बाहर की हलचल देख रही थी। शहर की व्यस्त सड़कें अभी-अभी जाग रही थीं, लोग अपनी दिनचर्या में लगे हुए थे। मैं हर रोज इसी तरह शुरुआत करती हूँ, ऑफिस जाने से पहले थोड़ा शांत समय खुद के लिए निकालती हूँ। आज भी वही था, लेकिन मन में एक हल्की सी उथल-पुथल थी, क्योंकि कल रात से कुछ बदल गया था।

मेरा नाम प्रिया है, और मैं दिल्ली में एक छोटी सी आईटी कंपनी में काम करती हूँ। उम्र अभी बाईस साल की है, लेकिन घरवालों की नजर में मैं हमेशा से थोड़ी विद्रोही रही हूँ। पापा, राजेश अंकल, एक रिटायर्ड सरकारी अधिकारी हैं, और माँ घर संभालती हैं। हमारा परिवार साधारण मिडिल क्लास है, जहां शादियाँ अरेंज्ड होती हैं और रिश्ते पुरानी दोस्तियों पर टिके रहते हैं। विक्रम अंकल, पापा के कॉलेज के दिनों के दोस्त, हमारे घर में हमेशा से आते-जाते रहे हैं। वो मुंबई में बिजनेस करते हैं, उम्र पैंतालीस के आसपास, लेकिन हमेशा फिट और एनर्जेटिक दिखते हैं। बचपन से मैं उन्हें अंकल कहती आई हूँ, और वो मुझे बेटी की तरह ही मानते थे।

शादी की बात कैसे शुरू हुई, वो एक लंबी कहानी है। पिछले साल पापा की तबीयत खराब हुई थी, और विक्रम अंकल ने बहुत मदद की। अस्पताल के बिल से लेकर घर की देखभाल तक, वो हर कदम पर साथ खड़े रहे। उस दौरान मैंने पहली बार उनसे गहराई से बात की। पहले तो वो सिर्फ पापा के दोस्त थे, लेकिन धीरे-धीरे मैंने उनके व्यक्तित्व को समझा। वो विधुर हैं, उनकी पत्नी दस साल पहले गुजर गईं, और कोई बच्चा नहीं है। पापा ने एक दिन मुझसे कहा, "प्रिया, विक्रम तेरे लिए सही रहेगा। वो तुझे खुश रखेगा।" मैंने विरोध किया, क्योंकि उम्र का फर्क था, लेकिन परिवार का दबाव और पापा की इच्छा ने मुझे झुका दिया।

शादी की तैयारियाँ जल्दी-जल्दी हुईं। दिल्ली में ही एक छोटा सा फंक्शन रखा गया, जहां रिश्तेदार इकट्ठा हुए। मैंने सफेद साड़ी पहनी थी, और विक्रम अंकल शेरवानी में काफी आकर्षक लग रहे थे। लेकिन उस वक्त मेरे मन में घबराहट थी। क्या ये सही फैसला था? शादी के बाद हम मुंबई चले आए, उनके घर में। ये घर बड़ा और आधुनिक है, लेकिन अभी तक मुझे अपना नहीं लगता। पहले हफ्ते हमने ज्यादा बात नहीं की, बस रोजमर्रा की चीजें शेयर कीं। मैं अपना काम जारी रखना चाहती थी, और उन्होंने कभी रोका नहीं।

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रात को डिनर के बाद हम लिविंग रूम में बैठे थे। विक्रम अंकल ने टीवी ऑन किया, लेकिन उनका ध्यान कहीं और था। मैंने पूछा, "अंकल, आप ठीक हैं न?" उन्होंने मुस्कुराकर कहा, "अब मुझे अंकल मत बुलाओ, प्रिया। हम शादीशुदा हैं।" उनकी आवाज में एक नरमी थी, जो पहले नहीं सुनी थी। मैं चुप हो गई, क्योंकि ये बात मुझे असहज कर रही थी। वो मेरे करीब आए, सोफे पर बैठते हुए। "तुम्हें समय चाहिए, मैं समझता हूँ," उन्होंने कहा। लेकिन उनकी नजरें मेरी आँखों में टिकी रहीं, और मैंने महसूस किया कि वो इंतजार कर रहे थे।

उस रात बेडरूम में मैं तैयार हो रही थी। नाइट सूट पहनकर मैं बिस्तर पर बैठी, किताब पढ़ने की कोशिश कर रही थी। विक्रम अंकल बाथरूम से निकले, और कमरे की लाइट्स धीमी कर दीं। वो मेरे पास आए, बिस्तर के किनारे बैठे। "प्रिया, क्या तुम खुश हो इस शादी से?" उनकी आवाज गंभीर थी। मैंने सिर हिलाया, लेकिन मन में संदेह था। "पापा की वजह से ये सब हुआ, लेकिन अब हम साथ हैं," मैंने कहा। उन्होंने मेरे हाथ को छुआ, हल्के से। वो स्पर्श गर्म था, और मैंने खुद को पीछे नहीं हटाया।

धीरे-धीरे बातें बढ़ीं। उन्होंने अपनी पुरानी जिंदगी के बारे में बताया, कैसे उनकी पत्नी की मौत ने उन्हें अकेला कर दिया था। मैंने अपनी महत्वाकांक्षाओं के बारे में शेयर किया, कैसे मैं इंडिपेंडेंट रहना चाहती हूँ। वो सुनते रहे, बिना जज किए। फिर एक पल ऐसा आया जब चुप्पी छा गई। उनकी आँखों में एक अलग चमक थी, और मैंने महसूस किया कि माहौल बदल रहा है। वो करीब आए, मेरे कंधे पर हाथ रखा। "तुम खूबसूरत हो, प्रिया," उन्होंने फुसफुसाकर कहा। मेरे दिल की धड़कन तेज हो गई, लेकिन मैंने कुछ नहीं कहा।

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उस रात हमारी पहली सुहागरात थी, लेकिन ये कोई पारंपरिक रस्म नहीं थी। विक्रम अंकल ने मुझे अपनी बाहों में लिया, धीरे-धीरे। उनका स्पर्श नरम था, जैसे वो मुझे डराना नहीं चाहते थे। मैंने अपनी आँखें बंद कर लीं, और महसूस किया कि मेरा शरीर प्रतिक्रिया दे रहा है। उनके होंठ मेरे गाल पर छुए, फिर गर्दन पर। एक अजीब सी गर्मी फैलने लगी। "आराम से, प्रिया," उन्होंने कहा, और मैंने खुद को छोड़ दिया।

उनके हाथ मेरी कमर पर फिसले, और मैंने महसूस किया कि ये सब इतना अपरिचित लग रहा था। लेकिन उनकी आँखों में देखकर लगा कि वो सच्चे हैं। मैंने उनके सीने पर हाथ रखा, उनकी दिल की धड़कन सुनी। वो मुझे बिस्तर पर लिटा रहे थे, और मैंने विरोध नहीं किया। उनके चुंबन गहरे होते गए, और मेरे शरीर में एक नई उत्तेजना जागी। वो मेरे कपड़े उतार रहे थे, धीरे-धीरे, जैसे हर पल को जी रहे हों।

जब हम एक हुए, तो दर्द के साथ एक सुखद एहसास आया। विक्रम अंकल की साँसें मेरी साँसों से मिल रही थीं, और मैंने खुद को पूरी तरह समर्पित कर दिया। उनकी हर हरकत में एक अनुभव झलकता था, जो मुझे नई दुनिया दिखा रहा था। मैंने अपनी उंगलियाँ उनके बालों में फँसाईं, और वो मेरे कान में फुसफुसाए, "तुम मेरी हो अब।" वो पल इतना इंटेंस था कि समय रुक सा गया।

सुबह होने से पहले हमने कई बार एक-दूसरे को छुआ, हर बार कुछ नया महसूस करते हुए। कभी वो मेरी पीठ पर चुंबन करते, कभी मैं उनके कंधे पर सिर टिका देती। भावनाएँ उफान पर थीं – प्यार, डर, उत्साह सब मिले हुए। मैं सोच रही थी कि क्या ये सही है, लेकिन उस पल में सब सही लग रहा था।

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अगले दिन हमने ब्रेकफास्ट साथ किया। विक्रम अंकल की मुस्कान अलग थी, और मैं शरमा रही थी। "कल रात अच्छी थी," उन्होंने कहा, और मैंने सिर झुका लिया। लेकिन मन में एक कन्फ्लिक्ट था – पापा के दोस्त से ये रिश्ता, क्या ये सामान्य है? फिर भी, मैंने खुद को समझाया कि अब यही मेरी जिंदगी है।

दिन बीतते गए, और हमारा रिश्ता गहरा होता गया। शाम को घर लौटकर मैं उन्हें देखती, और वो मुझे गले लगाते। एक शाम हम बालकनी में खड़े थे, सूरज डूब रहा था। उनके हाथ मेरी कमर पर थे, और मैंने महसूस किया कि अब मैं उन्हें अंकल नहीं मानती। "विक्रम," मैंने पहली बार कहा, और वो मुस्कुराए।

उस रात फिर हम करीब आए। इस बार मैं ज्यादा कॉन्फिडेंट थी। मैंने उनके शर्ट के बटन खोले, और वो मुझे देखते रहे। हमारे बीच की टेंशन अब प्यार में बदल रही थी। उनके स्पर्श में एक नई कोमलता थी, और मैंने खुद को पूरी तरह खोल दिया। हर चुंबन में एक कहानी थी, हर आलिंगन में एक वादा।

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कभी-कभी मैं सोचती कि उम्र का फर्क हमें अलग कर देगा, लेकिन वो पल सब भुला देते। एक रात बारिश हो रही थी, और हम खिड़की के पास लेटे थे। बारिश की आवाज के बीच हमारी साँसें तेज थीं। विक्रम ने मुझे अपनी छाती से लगाया, और मैंने महसूस किया कि ये सुहागरात सिर्फ एक रात नहीं, बल्कि एक शुरुआत है।

समय के साथ मैंने उनके अतीत को समझा। उन्होंने बताया कैसे उनकी पहली शादी में दुख थे, और अब वो मुझे खुश रखना चाहते हैं। मैंने अपनी महत्वाकांक्षाएँ शेयर कीं, और वो हमेशा सपोर्ट करते। लेकिन अंतरंग पलों में हमारा रिश्ता सबसे मजबूत लगता। हर बार कुछ नया – कभी धीमा, कभी तेज, लेकिन हमेशा भावनात्मक।

एक शाम हम डिनर पर बाहर गए। रेस्तराँ में उनकी नजरें मुझ पर टिकी रहीं, और घर लौटते हुए कार में ही उन्होंने मेरा हाथ चूमा। घर पहुँचकर हम सीधे बेडरूम गए। इस बार मैंने पहल की, उनके होंठों पर अपने होंठ रखे। हमारा मिलन इतना पैशनेट था कि मैं भूल गई सब कुछ। उनकी उंगलियाँ मेरी त्वचा पर नाच रही थीं, और मैं कराह उठी।

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उस रात के बाद मैंने महसूस किया कि ये रिश्ता अब मेरा अपना है। पापा का दोस्त अब मेरा साथी था। लेकिन कभी-कभी मन में सवाल उठते – क्या समाज स्वीकार करेगा? फिर भी, उन पलों में सब फीका पड़ जाता।

अब हर रात एक नई सुहागरात लगती। विक्रम की बाहों में मैं खुद को सुरक्षित महसूस करती, और हमारे बीच की केमिस्ट्री बढ़ती जाती। एक रात वो मुझे सरप्राइज देने वाले थे, लेकिन मैंने उन्हें रोका और खुद करीब आई। हमारी साँसें मिलीं, शरीर एक हुए, और वो एहसास