शादी के बाद की चाहत
सुबह की धूप खिड़की से छनकर कमरे में फैल रही थी। मैं रसोई में चाय की केतली चढ़ा रही थी, जबकि अक्षय अपना बैग उठाकर ऑफिस के लिए तैयार हो रहा था। हमारी शादी को दो साल हो चुके थे, और ये रोज़ की दिनचर्या अब आदत सी बन गई थी। बाहर गली में बच्चों की आवाज़ें आ रही थीं, और पड़ोस की आंटी अपनी बालकनी में कपड़े सुखा रही थीं। मैंने चाय का कप उसके हाथ में थमाया और मुस्कुराकर कहा, "जल्दी लौटना आज, शाम को माँ आने वाली हैं।"
अक्षय ने हँसते हुए सिर हिलाया और दरवाज़े की ओर बढ़ गया। मैंने उसे अलविदा कहा और फिर घर की सफाई में लग गई। हमारा छोटा सा फ्लैट दिल्ली की एक व्यस्त कॉलोनी में था, जहाँ हर दिन एक जैसा लगता था। मैं रिया हूँ, तीस साल की, और शादी से पहले एक छोटी सी कंपनी में जॉब करती थी। अब घर संभालती हूँ, कभी-कभी फ्रीलांस काम भी। अक्षय अच्छा इंसान है, प्यार करता है मुझसे, लेकिन जिंदगी की भागदौड़ में वो थोड़ा दूर सा हो गया है। मैंने सोफे पर बैठकर अखबार उठाया, लेकिन मन कहीं और था।
दोपहर होने को आई थी जब फोन की घंटी बजी। स्क्रीन पर विक्रम का नाम देखकर दिल थोड़ा तेज़ धड़का। विक्रम मेरा कॉलेज का दोस्त था, वही जिसके साथ वो पुराने दिन याद आते हैं। शादी के बाद हमारा संपर्क कम हो गया था, लेकिन कभी-कभी मैसेज आ जाते थे। मैंने कॉल उठाई, "हैलो, विक्रम? कैसा है तू?" उसकी आवाज़ में वही पुरानी गर्माहट थी, "रिया, मैं ठीक हूँ। तू सुन, आज शाम को मिल सकती है? बस यूं ही, कॉफी पर।"
मैं हिचकिचाई, लेकिन फिर हामी भर दी। शाम को माँ आने वाली थीं, लेकिन थोड़ा समय निकाल सकती थी। अक्षय को पता नहीं चलेगा, और ये तो बस एक पुराना दोस्त है। मैंने खुद को तैयार किया, एक साधारण साड़ी पहनी और घर से निकल गई। कैफे में विक्रम पहले से बैठा था, उसकी मुस्कान देखकर पुरानी यादें ताज़ा हो गईं। हमने कॉफी ऑर्डर की और बातें शुरू कीं। "तू अब भी वैसी ही है रिया, वही चमक आँखों में," उसने कहा। मैंने हँसकर टाल दिया, लेकिन अंदर से कुछ हलचल सी हुई।
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बातों में समय बीतता गया। विक्रम ने अपनी जॉब के बारे में बताया, कैसे वो अब मुंबई से दिल्ली शिफ्ट हो गया है। मैंने अपनी शादीशुदा जिंदगी के बारे में थोड़ा शेयर किया, कैसे सब कुछ नॉर्मल है लेकिन कभी-कभी खालीपन लगता है। उसकी नज़रें मेरी आँखों में टिकी रहीं, और मैंने महसूस किया कि वो पुराना आकर्षण अभी भी कहीं छिपा है। "रिया, याद है कॉलेज के वो दिन? जब हम रात भर बातें करते थे," उसने धीरे से कहा। मैंने सिर हिलाया, लेकिन मन में अक्षय का चेहरा आ गया। फिर भी, वो चुप्पी के पल में कुछ अनकहा सा था।
कैफे से निकलते हुए उसने कहा, "चल, थोड़ा घूमते हैं।" हम पार्क की ओर बढ़े, जहाँ शाम की हवा ठंडी लग रही थी। विक्रम ने मेरा हाथ छुआ, बस हल्का सा, लेकिन वो स्पर्श पुरानी यादें जगा गया। मैंने हाथ छुड़ाया नहीं, बस चुपचाप चलती रही। "तू खुश है न अक्षय के साथ?" उसने पूछा। मैंने कहा, "हाँ, लेकिन कभी-कभी लगता है कुछ मिसिंग है।" वो रुक गया और मेरी ओर देखा, उसकी आँखों में वही पुरानी चाहत थी।
घर लौटते हुए मन भारी था। माँ आईं, हमने डिनर किया, लेकिन मेरे दिमाग में विक्रम घूमता रहा। अक्षय देर रात लौटा, थका हुआ। मैंने उसे गले लगाया, लेकिन वो स्पर्श वैसा नहीं लगा। अगले दिन विक्रम का मैसेज आया, "कल मिलें?" मैंने हाँ कह दिया। इस बार हम उसके फ्लैट पर मिले, जो शहर के बाहर एक शांत इलाके में था। "आ, बैठ," उसने कहा और कॉफी बनाई। हम सोफे पर बैठे, बातें कीं, लेकिन हवा में कुछ तनाव था।
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विक्रम ने मेरे कंधे पर हाथ रखा, "रिया, मैं तुझे मिस करता हूँ।" मैंने कुछ नहीं कहा, बस उसकी ओर देखा। उसने मुझे अपनी ओर खींचा, और मैंने विरोध नहीं किया। उसके होंठ मेरे होंठों से मिले, वो चुंबन पुरानी आग को फिर से जला रहा था। मैंने आँखें बंद कर लीं, अक्षय का ख्याल आया लेकिन वो दूर होता गया। विक्रम के हाथ मेरी कमर पर फिसले, और मैंने खुद को उसके हवाले कर दिया।
हम बेडरूम में पहुँचे, जहाँ रोशनी मद्धम थी। विक्रम ने मेरी साड़ी की पिन खोली, धीरे-धीरे कपड़े उतारे। उसका स्पर्श गर्म था, जैसे वो हर इंच को जानता हो। मैंने उसके शर्ट के बटन खोले, उसकी छाती पर हाथ फेरा। "रिया, तू कितनी खूबसूरत है," उसने फुसफुसाया। मैंने उसे चूमा, हमारा शरीर एक दूसरे से लिपट गया। उसकी उंगलियाँ मेरी पीठ पर नाच रही थीं, और मैंने महसूस किया वो चाहत जो शादी के बाद कहीं दब गई थी।
विक्रम ने मुझे बिस्तर पर लिटाया, उसके होंठ मेरे गले पर, फिर नीचे सरकते गए। मैं सिहर उठी, वो सनसनी नई नहीं थी लेकिन इस बार अलग लग रही थी। उसने मेरे स्तनों को छुआ, धीरे से चूमा, और मैंने उसका नाम पुकारा। "विक्रम..." वो मुस्कुराया और आगे बढ़ा, उसके शरीर का वजन मेरे ऊपर। मैंने अपनी टाँगें फैलाईं, और वो अंदर आया, धीरे लेकिन गहराई से। वो लय कुछ पलों में तेज़ हुई, हमारी साँसें मिल गईं।
हर धक्के के साथ एक नई भावना उभर रही थी – अपराधबोध, उत्तेजना, और वो पुराना प्यार। विक्रम ने मेरे कान में कहा, "मैं तुझे कभी नहीं भूल पाया।" मैंने उसे कसकर पकड़ लिया, हमारा चरम एक साथ आया, जैसे लहरें टकरा रही हों। बाद में हम लेटे रहे, उसकी बाहों में। लेकिन मन में सवाल घूम रहे थे – ये सही है? अक्षय क्या सोचेगा? फिर भी, वो पल इतना जीवंत था कि मैं उसे रोक नहीं पाई।
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अगले कुछ दिन हम मिलते रहे। हर बार कुछ नया होता। एक शाम हमने पार्क में टहलते हुए बात की, फिर उसके फ्लैट पर गए। इस बार विक्रम ने तेल लिया, मेरी मालिश की। उसकी उंगलियाँ मेरी पीठ से नीचे सरकीं, और मैंने खुद को पूरी तरह खोल दिया। वो मेरे पीछे आया, उसका प्रवेश अलग एंगल से, जो पहले कभी नहीं हुआ था। मैं कराह उठी, वो सुख इतना गहरा था कि आँसू आ गए। "रिया, मैं तेरे बिना नहीं रह सकता," उसने कहा।
लेकिन घर पर अक्षय के साथ सब नॉर्मल रखना मुश्किल हो रहा था। एक रात वो मेरे पास आया, लेकिन मेरा मन विक्रम में था। मैंने बहाना बनाया, थकान का। विक्रम से मिलना अब आदत बन गई थी। एक दोपहर हम होटल में गए, जहाँ प्राइवेसी ज्यादा थी। विक्रम ने मुझे दीवार से सटाया, उसके चुंबन उग्र थे। मैंने उसके कंधों पर नाखून गड़ाए, वो दर्द मिश्रित सुख दे रहा था। उसने मुझे उठाया, टाँगें उसकी कमर पर लपेटीं, और हम खड़े-खड़े एक हुए। वो अनुभव तीव्र था, जैसे आग लगी हो।
हर मिलन में भावनाएँ बदल रही थीं। कभी प्यार, कभी सिर्फ शारीरिक भूख। विक्रम का शरीर अब मेरा जाना-पहचाना लगता था, उसकी मर्दानगी जो मुझे शादी के बाद मिली थी। एक शाम हमने शॉवर में ट्राई किया, पानी की बूँदें हमारे शरीर पर गिर रही थीं। उसने साबुन लगाया, फिसलन बढ़ी, और हम फिसलते हुए एक दूसरे में खो गए। वो पानी का शोर हमारी आवाज़ों को दबा रहा था।
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लेकिन ये सब कब तक? मन में कन्फ्लिक्ट बढ़ रहा था। विक्रम ने कहा, "रिया, अक्षय को छोड़ दे।" मैंने इनकार किया, लेकिन उसकी बाहों में लेटकर सोचती रही। एक रात हमने लंबी ड्राइव की, फिर कार में ही रुक गए। सीट पीछे की, उसने मुझे अपनी गोद में लिया। उसका स्पर्श अब हर बार नया लगता, जैसे वो मेरी आत्मा को छू रहा हो। हमारी साँसें तेज़, बाहर अंधेरा, और अंदर वो जुनून।
समय बीतता गया, और मैं खुद को दो दुनिया में बाँट रही थी। विक्रम के साथ वो मज़ा, वो उत्तेजना जो अक्षय कभी नहीं दे पाया। लेकिन अपराधबोध भी था। एक दिन विक्रम ने मुझे गिफ्ट दिया, एक नेकलेस, और कहा, "ये तेरे लिए।" मैंने पहना, और हम फिर से एक हुए। इस बार धीरे-धीरे, जैसे समय रुक गया हो। उसके हाथ मेरे शरीर पर घूमे, हर हिस्से को जगाया। मैंने उसका नाम लिया, और चरम पर पहुँचकर रो पड़ी।
अब ये मिलन रोज़ का हो गया था। घर पर झूठ बोलना, अक्षय से दूर होना। लेकिन विक्रम की वो मर्दानगी, वो ताकत जो मुझे狂 बना देती थी। एक शाम हमने रोल-प्ले ट्राई किया, मैं उसकी बॉस बनी, और वो मेरा सबॉर्डिनेट। खेल में वो सब कुछ हुआ जो कल्पना में था। उसने मुझे डेस्क पर झुकाया, पीछे से, और वो अनुभव अविस्मरणीय था।
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फिर एक दिन अक्षय को शक हुआ। "रिया, तू कहीं जा रही है रोज़?" मैंने झूठ बोला, लेकिन मन भारी था। विक्रम से मिली, और हमने बात की। "मैं नहीं छोड़ सकती अक्षय को," मैंने कहा। वो उदास हुआ, लेकिन फिर मुझे चूमा। उस रात हमारा मिलन भावुक था, जैसे आखिरी हो। उसके हाथ मेरी कमर पर, होंठ मेरे शरीर पर, और वो प्रवेश जो इतना गहरा था कि दर्द और सुख मिल गए।
हम लेटे रहे, उसकी छाती पर मेरा सिर। बाहर बारिश हो रही थी, और अंदर शांति। लेकिन मैं जानती थी ये खत्म नहीं होगा, वो चाहत हमेशा रहेगी।