शादी के बाद की चाहत
सुबह की धूप कमरे में हल्की-हल्की झांक रही थी, जब मैं बिस्तर से उठी। घड़ी में सात बज रहे थे, और अमित पहले ही नहा-धोकर किचन में चाय बना रहा था। मैंने अपनी रोज की तरह साड़ी पहनी, बाल संवारे, और नीचे उतर आई। घर छोटा सा था, दिल्ली के एक व्यस्त इलाके में, जहां हर सुबह की शुरुआत एक जैसी लगती थी—चाय की चुस्कियां और अखबार की खबरें।
अमित ने मुस्कुराकर कहा, "रिया, आज ऑफिस जल्दी जाना है? मैंने ब्रेकफास्ट बना लिया है।" मैंने हां में सिर हिलाया और टेबल पर बैठ गई। हमारी शादी को दो साल हो चुके थे, और जीवन एक रूटीन में बंध गया था। अमित एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर था, हमेशा व्यस्त, लेकिन प्यार से भरा। मैं खुद एक स्कूल टीचर थी, बच्चों को पढ़ाना मेरी दुनिया थी।
नाश्ते के बाद अमित ऑफिस चला गया, और मैंने घर संभाला। बच्चे नहीं थे अभी, सो दिन आराम से कटता था। दोपहर में स्कूल जाना, शाम को वापस आना, और रात में अमित के साथ डिनर। सब कुछ सामान्य था, लेकिन कभी-कभी मन में एक खालीपन सा महसूस होता था। कॉलेज के दिनों की यादें, जब जीवन इतना सरल नहीं था।
उस दिन स्कूल से लौटते वक्त बाजार में रुकना पड़ा। कुछ सब्जियां खरीदनी थीं। भीड़ में घूमते हुए अचानक एक परिचित चेहरा नजर आया। विक्रम। कॉलेज का पुराना दोस्त, वही विक्रम जो कभी मेरे दिल के करीब था। मैं रुक गई, और उसने मुझे देखकर मुस्कुराया। "रिया? इतने साल बाद!" उसकी आवाज में वही पुरानी गर्माहट थी।
हम एक कॉफी शॉप में बैठ गए। विक्रम अब एक बिजनेसमैन था, मुंबई से दिल्ली आया हुआ था। बातें शुरू हुईं—कॉलेज की यादें, दोस्तों के बारे में। मैंने अमित और अपनी शादी का जिक्र किया, और उसने अपनी जिंदगी की कहानी सुनाई। समय कैसे उड़ गया, पता ही नहीं चला। विदा होने से पहले उसने मेरा नंबर लिया, "कभी बात करते रहें।"
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घर लौटकर मैंने अमित को बताया नहीं। क्यों, खुद नहीं जानती थी। रात में बिस्तर पर लेटे हुए विक्रम की याद आई। कॉलेज में हम कितने करीब थे, लेकिन शादी से पहले सब खत्म हो गया। अमित एक अच्छा इंसान था, लेकिन विक्रम में कुछ अलग था—एक जुनून, एक आग।
अगले दिन विक्रम का मैसेज आया, "कॉफी पर मिलें?" मैंने हां कह दिया। स्कूल के बाद हम फिर मिले। इस बार बातें गहरी हुईं। उसने पूछा, "खुश हो ना रिया? अमित के साथ?" मैंने मुस्कुराकर कहा, "हां, सब ठीक है।" लेकिन अंदर से कुछ हिल रहा था। उसकी नजरें, वही पुरानी नजरें, जो मुझे छूती हुई लगती थीं।
मिलने का सिलसिला बढ़ता गया। कभी पार्क में, कभी किसी कैफे में। अमित को शक नहीं हुआ, क्योंकि मैं हमेशा समय पर घर लौटती थी। लेकिन मेरे मन में उथल-पुथल थी। विक्रम की बातें, उसका हंसना, सब कुछ पुरानी यादें ताजा कर रहा था। एक शाम उसने कहा, "रिया, तुम्हें देखकर लगता है कुछ कमी है तुम्हारी जिंदगी में।"
मैं चुप रही। सच था, अमित के साथ सब कुछ सही था, लेकिन वो जुनून गायब था। विक्रम ने मेरा हाथ पकड़ा, और मैंने छुड़ाया नहीं। उस पल में एक करंट सा दौड़ा। हम उठे और बाहर निकले। उसने मुझे अपने अपार्टमेंट पर चलने को कहा, "बस थोड़ी देर, बातें करेंगे।"
मैं गई। अपार्टमेंट खाली था, सिर्फ हम दोनों। बैठते ही उसने मुझे गले लगा लिया। "रिया, मैं तुम्हें कभी भूल नहीं पाया।" मैंने विरोध नहीं किया। उसकी बाहों में पुरानी यादें लौट आईं। हम बातें करते रहे, लेकिन हवा में कुछ अलग था—एक तनाव, एक चाहत।
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धीरे-धीरे उसकी उंगलियां मेरे बालों में फिसलीं। मैंने आंखें बंद कर लीं। उसका स्पर्श, इतने साल बाद, जैसे आग लगा रहा था। हम सोफे पर बैठे थे, और उसने मुझे चूम लिया। होंठों पर होंठ, नरम और गर्म। मैं पिघल रही थी। अमित का चेहरा दिमाग में आया, लेकिन मैं रुक नहीं सकी।
उस रात हमने कुछ नहीं किया, सिर्फ बातें और चुम्बन। लेकिन अगली मुलाकात में सब बदल गया। विक्रम ने मुझे अपने घर बुलाया, और इस बार मैं तैयार थी। दरवाजा बंद होते ही उसने मुझे दीवार से सटा लिया। उसकी सांसें मेरे गले पर, हाथ मेरी कमर पर। "रिया, तुम मेरी हो," उसने फुसफुसाया।
मैंने अपनी साड़ी उतारी, धीरे-धीरे। उसकी आंखों में वही भूख थी। हम बेडरूम में गए। उसने मुझे बिस्तर पर लिटाया, और मेरे शरीर पर हाथ फेरने लगा। हर स्पर्श में बिजली सी दौड़ रही थी। मैंने उसकी शर्ट उतारी, उसकी छाती पर हाथ रखा। मजबूत, गर्म।
विक्रम ने मेरे स्तनों को छुआ, नरमी से। मैं सिहर उठी। उसकी जीभ मेरे निप्पल्स पर घूमी, और मैं कराह उठी। "विक्रम..." मेरा स्वर कांप रहा था। उसने नीचे सरकते हुए मेरी जांघों को चूमा। उसकी उंगलियां मेरी योनि पर, गीली और तैयार। मैंने अपनी आंखें बंद कर लीं, सारी दुनिया भूल गई।
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फिर वो मेरे ऊपर आया। उसका लिंग, कड़ा और बड़ा, मेरे खिलाफ रगड़ रहा था। मैंने उसे छुआ, महसूस किया। इतने साल बाद, वो एहसास। उसने धीरे से प्रवेश किया, और मैं चीख पड़ी—दर्द और सुख का मिश्रण। हमारी लय मिल गई, तेज और गहरी। हर धक्के में एक नई दुनिया।
मैंने अपनी कमर उठाई, उसे और गहरा लिया। उसकी सांसें तेज, मेरी कराहें कमरे में गूंज रही थीं। "रिया, तुम कितनी खूबसूरत हो," उसने कहा। मैंने उसके कंधों पर नाखून गड़ाए, सुख की लहरों में डूबती हुई। चरम पर पहुंचते हुए हम दोनों एक साथ झर गए, पसीने से लथपथ।
उसके बाद हम लेटे रहे, सांसें संभालते हुए। लेकिन ये सिर्फ शुरुआत थी। अगली बार हम होटल में मिले। वहां ज्यादा आजादी थी। विक्रम ने मुझे शॉवर में ले जाकर नहलाया, पानी की बौछारों के नीचे हमारा प्यार फिर जागा। उसकी उंगलियां मेरे शरीर पर साबुन से फिसल रही थीं, और मैंने उसे घुटनों पर बैठाकर उसके लिंग को मुंह में लिया।
उसका स्वाद, नमकीन और उत्तेजक। मैंने जीभ घुमाई, ऊपर-नीचे किया। विक्रम कराह रहा था, "रिया, तुम जादू हो।" फिर उसने मुझे उठाया और बिस्तर पर पटक दिया। इस बार पीछे से, डॉगी स्टाइल में। उसका प्रवेश गहरा था, मेरी कमर पकड़कर धक्के मारते हुए। मैं चादर पकड़कर चिल्ला रही थी, सुख से पागल।
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हर मिलन में कुछ नया था। कभी धीमा और रोमांटिक, कभी तेज और जंगली। अमित के साथ सेक्स रूटीन था, लेकिन विक्रम के साथ ये आग थी। एक बार हम पार्क में मिले, रात के अंधेरे में। वहां सिर्फ चुंबन और स्पर्श, लेकिन वो रोमांच अलग था। मैं घर लौटती, अमित से झूठ बोलती, लेकिन अंदर से जीवित महसूस करती।
एक शाम विक्रम ने कहा, "रिया, क्या हम ऐसे ही चलते रहेंगे?" मैंने चुप्पी में सिर हिलाया। लेकिन कन्फ्लिक्ट था। अमित को धोखा देना गलत लगता था, लेकिन विक्रम की चाहत रोक नहीं पाती थी। अगली मुलाकात में हमने फिर प्यार किया। इस बार मैं ऊपर थी, उसकी कमर पर सवार। उसके लिंग को अंदर लेते हुए मैं अपनी लय में हिल रही थी, स्तन उछलते हुए।
उसने मेरे नितंबों को दबाया, मुझे तेज किया। सुख की लहरें फिर आईं, और हम थककर लेट गए। लेकिन ये सिलसिला बढ़ता गया। एक दिन अमित बाहर गया था, तो विक्रम घर आया। मेरे बेड पर, जहां अमित सोता था, हमने प्यार किया। वो दोषी एहसास, लेकिन उत्तेजना दोगुनी।
विक्रम ने मुझे दीवार से सटाकर उठाया, पैरों को अपनी कमर पर लपेटा। खड़े-खड़े प्रवेश, गहरा और तीव्र। मैं उसके कंधे पर सिर रखकर कराह रही थी। फिर बिस्तर पर, मिशनरी में। उसकी आंखों में देखते हुए, मैंने महसूस किया—ये सिर्फ शारीरिक नहीं, भावनात्मक था। पुराना प्यार लौट आया था।
समय बीतता गया, और हमारी मुलाकातें गहरी होती गईं। हर बार एक नई भावना—कभी ईर्ष्या अमित पर, कभी डर पकड़े जाने का, लेकिन सुख हमेशा जीतता। एक रात होटल के कमरे में, हमने शैंपेन पी, और फिर प्यार किया। विक्रम ने मेरे पूरे शरीर को चूमा, हर इंच को। मैंने उसे पीठ पर लिटाया और मालिश की, फिर उसके लिंग पर बैठ गई।
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धीमी लय में, हम बातें करते रहे। "रिया, मैं तुम्हें कभी नहीं छोड़ूंगा," उसने कहा। मैंने जवाब नहीं दिया, बस सुख में डूबी रही। चरम पर पहुंचते हुए, हमारी कराहें मिल गईं। उसके बाद हम नंगे लेटे रहे, सिगरेट पीते हुए। लेकिन अंदर से एक सवाल था—ये कब तक चलेगा?
फिर एक दिन, विक्रम ने मुझे पार्क में बुलाया। वहां उसने कहा, "रिया, मैं मुंबई वापस जा रहा हूं। लेकिन तुम्हारे बिना नहीं रह सकता।" मैं रो पड़ी। अमित के साथ जीवन स्थिर था, लेकिन विक्रम जीवन था। हमने आखिरी बार प्यार किया, उसके अपार्टमेंट में। इस बार भावुक, धीमा।
उसने मुझे बाहों में लिया, होंठों पर होंठ रखे। धीरे-धीरे कपड़े उतरे। उसकी उंगलियां मेरी योनि में, नरम स्पर्श। मैंने उसके लिंग को सहलाया, महसूस किया हर नस। फिर प्रवेश, धीमा और गहरा। हमारी सांसें एक, दिल की धड़कनें मिली हुईं। सुख की लहर आई, लेकिन इस बार आंसू भी थे।
हम लेटे रहे, एक-दूसरे को देखते हुए। विक्रम की उंगलियां मेरे बालों में