शादी की रात की छिपी चाहत
सुबह की पहली किरण कमरे में घुसी ही थी कि मैंने आंखें खोलीं। बाहर से पक्षियों की चहचहाहट आ रही थी, और घर में शादी की तैयारियों का हल्का शोर सुनाई दे रहा था। आज हमारी चचेरी बहन रिया की शादी थी, और पूरा परिवार पिछले कई दिनों से इसी में लगा हुआ था। मैं बिस्तर से उठा, चेहरे पर पानी के छींटे मारे, और नीचे डाइनिंग टेबल पर पहुंचा जहां मां चाय बना रही थीं।
टेबल पर बैठते ही मां ने मुस्कुराकर कहा, "अक्षय, आज जल्दी उठ गया? अच्छा है, आज बहुत काम है। प्रिया को भी उठा दे, वो अभी तक सो रही होगी।" मैंने हामी भरी और चाय का घूंट लिया। प्रिया मेरी छोटी बहन थी, कॉलेज में पढ़ रही थी, और हम दोनों हमेशा से करीब थे। शादी के इस मौके पर पूरा परिवार एक साथ था, जो सालों बाद हो रहा था।
मैं ऊपर गया और प्रिया के कमरे का दरवाजा खटखटाया। "प्रिया, उठ जा, सुबह हो गई," मैंने कहा। अंदर से उसकी नींद भरी आवाज आई, "भाई, पांच मिनट और..." लेकिन फिर वो उठी और दरवाजा खोला। उसके बाल बिखरे हुए थे, और वो हल्के से मुस्कुराई। हम दोनों नीचे आए और ब्रेकफास्ट में शामिल हुए।
दिन भर की तैयारियां चलती रहीं। घर को फूलों से सजाया जा रहा था, मेहमानों की लिस्ट चेक की जा रही थी। मैं और प्रिया को जिम्मेदारी मिली थी कि हम सजावट का ध्यान रखें। हम दोनों साथ में काम कर रहे थे, कभी हंसते, कभी एक-दूसरे को चिढ़ाते। प्रिया ने कहा, "भाई, ये फूल यहां लगाओ, वरना मां डांटेंगी।" उसकी आवाज में वही पुरानी शरारत थी, जो बचपन से थी।
शाम होने को आई, और शादी का मंडप तैयार हो चुका था। रिया दुल्हन के जोड़े में बेहद खूबसूरत लग रही थी। परिवार के सभी लोग इकट्ठा थे, और हवा में खुशी की महक फैली हुई थी। मैं प्रिया के पास खड़ा था, जब वो मेरे कंधे पर हाथ रखकर बोली, "भाई, कितना अच्छा लग रहा है न? रिया दीदी इतनी खुश हैं।" मैंने सहमति में सिर हिलाया, लेकिन मन में कुछ अजीब सा लग रहा था।
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रात हुई, और बारात आ गई। संगीत और ढोल की थाप से पूरा घर गूंज उठा। मैं डांस फ्लोर पर था, परिवार के साथ झूम रहा था। प्रिया भी वहां थी, अपनी सहेलियों के साथ नाच रही थी। उसकी हंसी दूर से सुनाई दे रही थी, और मैं उसे देखता रहा। वो हमेशा से जीवंत थी, लेकिन आज कुछ अलग लग रही थी।
डांस के दौरान प्रिया मेरे पास आई और बोली, "भाई, मेरे साथ डांस करो न!" मैंने हंसकर हाथ पकड़ा और हम दोनों साथ नाचे। उसके हाथ मेरे हाथ में थे, और करीब आने से उसकी सांस की गर्माहट महसूस हुई। लेकिन वो पल बस एक पल था, और हम अलग हो गए। मन में एक हल्की सी हलचल हुई, लेकिन मैंने उसे दबा दिया।
शादी की रस्में चल रही थीं। रिया और उसके होने वाले पति फेरों के लिए तैयार थे। मैं और प्रिया एक तरफ खड़े थे, परिवार के साथ। प्रिया ने धीरे से कहा, "भाई, कभी-कभी लगता है कि जीवन कितना तेज चलता है। कल हम भी ऐसे ही होंगे।" उसकी आंखों में एक उदासी थी, जो मुझे छू गई। मैंने उसके कंधे पर हाथ रखा और कहा, "हां, लेकिन हम साथ हैं न।"
रात गहराने लगी, और मेहमान विदा होने लगे। घर में अब थोड़ी शांति थी, लेकिन उत्साह अभी बाकी था। मैं थका हुआ था, लेकिन प्रिया ने कहा, "भाई, चलो छत पर चलें, थोड़ी ताजी हवा लें।" हम ऊपर गए, जहां से शहर की लाइट्स दिख रही थीं। वो मेरे बगल में बैठी, और हम चुपचाप बैठे रहे।
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चुप्पी टूटते हुए प्रिया बोली, "भाई, तुम्हें याद है बचपन में हम कैसे खेलते थे? अब सब बदल गया है।" मैंने कहा, "हां, लेकिन हमारा रिश्ता वही है।" उसने मेरी तरफ देखा, और उसकी आंखों में कुछ ऐसा था जो मैंने पहले नहीं देखा। एक गहराई, एक चाहत। मैं असहज हो गया, लेकिन कुछ कह नहीं पाया।
नीचे से किसी ने पुकारा, और हम वापस आए। लेकिन वो पल मन में रह गया। रात को सोने से पहले प्रिया मेरे कमरे में आई, कुछ सामान लेने। वो झुकी, और उसकी खुशबू कमरे में फैल गई। मैंने खुद को रोका, लेकिन मन में विचार घूमने लगे। क्या ये गलत है? लेकिन वो मेरी बहन है।
अगली सुबह, शादी का दूसरा दिन था। विदाई की तैयारी चल रही थी। प्रिया उदास लग रही थी, रिया दीदी को जाते देख। मैं उसके पास गया और कहा, "चल, बाहर घूम आएं।" हम गार्डन में गए, जहां फूलों की महक थी। प्रिया ने मेरे हाथ पकड़ा और कहा, "भाई, मुझे डर लगता है अकेलेपन का।"
उसकी बातों में एक दर्द था, जो मुझे अपना लग रहा था। मैंने उसे गले लगाया, भाई-बहन की तरह। लेकिन वो गले लगना कुछ ज्यादा लंबा हो गया। उसकी सांस मेरे कंधे पर लगी, और मैंने महसूस किया कि मेरा शरीर प्रतिक्रिया दे रहा है। मैं पीछे हटा, लेकिन प्रिया ने मेरी आंखों में देखा।
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"भाई, क्या तुम भी महसूस करते हो वही जो मैं?" उसने धीरे से पूछा। मैं स्तब्ध था। क्या कहूं? मन में संघर्ष था, लेकिन शरीर की चाहत बढ़ रही थी। मैंने कहा, "प्रिया, ये गलत है।" लेकिन वो करीब आई, और उसके होंठ मेरे करीब आए।
उस पल सब कुछ बदल गया। हमारा पहला चुंबन, गार्डन की छाया में। वो नरम था, लेकिन गहरा। मैंने उसे कसकर पकड़ा, और हम दोनों के बीच की दीवार गिर गई। प्रिया ने फुसफुसाकर कहा, "भाई, मुझे तुम्हारी जरूरत है।" हम घर के एक कोने में चले गए, जहां कोई नहीं था।
मैंने उसके कपड़े उतारे, धीरे-धीरे। उसकी त्वचा नरम थी, और मैंने उसके शरीर को छुआ। प्रिया की सिसकियां कमरे में गूंजीं। मैंने उसके स्तनों को चूमा, और वो मेरे बालों में उंगलियां फिराने लगी। भावनाएं उफान पर थीं, प्यार और वासना का मिश्रण।
हम बिस्तर पर थे, और मैं उसके ऊपर। उसकी आंखों में डर और उत्साह दोनों थे। मैंने धीरे से प्रवेश किया, और वो दर्द से कराह उठी। लेकिन जल्द ही वो लय में आ गई, और हम एक हो गए। हर धक्के के साथ हमारा बंधन मजबूत होता गया। प्रिया ने कहा, "भाई, और तेज..."
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उस रात हमने कई बार एक-दूसरे को महसूस किया। कभी मैं उसके पीछे से, कभी वो मेरे ऊपर। हर बार एक नई संवेदना, एक नई गहराई। उसकी गांड को छूना, उसे चूमना, सब कुछ नया लग रहा था। भावनात्मक रूप से हम जुड़ चुके थे, लेकिन ये रहस्य था।
सुबह हुई, और हम अलग हो गए। लेकिन वो पल हमेशा याद रहेंगे। प्रिया ने मुस्कुराकर कहा, "भाई, ये हमारा राज है।" मैंने सहमति दी, मन में एक मीठा दर्द लिए।
दिन गुजरते गए, शादी की यादें बाकी रहीं। लेकिन हमारा रिश्ता अब बदल चुका था। कभी-कभी रात को हम चुपके से मिलते, और वही जुनून दोहराते। हर बार नई भावना, नया अनुभव।
एक शाम, घर खाली था। प्रिया ने मुझे अपने कमरे में बुलाया। वो नंगी थी, इंतजार में। मैंने उसे दीवार से सटाकर चूमा, उसके पूरे शरीर को। उसकी चूत गीली थी, और मैंने जीभ से उसे छुआ। वो कांप उठी, और चीखी।
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फिर मैंने उसे उल्टा किया, और पीछे से प्रवेश किया। उसकी गांड कसी हुई थी, लेकिन वो तैयार थी। दर्द और सुख का मिश्रण, हम दोनों के लिए। प्रिया ने कराहते हुए कहा, "भाई, मुझे ऐसे ही चाहिए।"
हमारी सांसें मिलीं, और हम चरम पर पहुंचे। वो पल शुद्ध था, भावनाओं से भरा। हम एक-दूसरे में खोए हुए थे, दुनिया से दूर।
समय बीतता गया, लेकिन वो चाहत कम नहीं हुई। हर मिलन में नई गहराई, नया प्यार। प्रिया मेरी थी, और मैं उसका।
एक रात, बारिश हो रही थी। हम छत पर थे, गीले होकर। मैंने उसे वहीं लिटाया, और हम एक हुए। उसकी चीखें बारिश में घुल गईं।
भावनाएं उमड़ रही थीं, कन्फ्लिक्ट भी। लेकिन वो प्यार था, जो हमें बांधे हुए था।