किराए के घर की छिपी चाहत
सुबह की पहली किरण कमरे में धीरे-धीरे फैल रही थी। मैंने आंखें खोलीं तो देखा कि घड़ी में अभी साढ़े छह बजे थे। बाहर से आती ट्रैफिक की आवाजें शहर की व्यस्तता की याद दिला रही थीं। रोज की तरह, मैं बिस्तर से उठा और किचन की ओर चला गया, जहां चाय बनाने की तैयारी की।
यह हमारा छोटा सा किराए का फ्लैट था, दिल्ली के एक व्यस्त इलाके में। मैं राहुल हूं, पच्चीस साल का, एक प्राइवेट कंपनी में जॉब करता हूं। मेरी बहन प्रिया, जो मुझसे दो साल छोटी है, यहां कॉलेज में पढ़ाई कर रही है। हम दोनों गांव से आए हैं, मां-बाप वहीं रहते हैं, खेतीबाड़ी संभालते हैं। शहर में रहना महंगा है, इसलिए हमने यह दो कमरों का फ्लैट लिया है, जहां हम साथ रहते हैं और खर्च बांटते हैं।
प्रिया अभी सो रही थी, उसके कमरे का दरवाजा बंद था। मैंने चाय की केतली चढ़ाई और ब्रेड टोस्ट करने लगा। रोजाना की दिनचर्या यही थी – सुबह उठो, नाश्ता बनाओ, फिर ऑफिस के लिए निकलो। शाम को लौटकर थकान उतारो और प्रिया के साथ कुछ बातें करो। वह कॉलेज से आती, अपनी पढ़ाई की बातें बताती, और हम हंसते-बोलते रात का खाना बनाते।
आज भी वैसा ही दिन था। चाय बनाकर मैंने प्रिया को आवाज दी, "प्रिया, उठ जा, चाय तैयार है।" वह धीरे से बाहर आई, बाल बिखरे हुए, आंखें मलते हुए। "भैया, थोड़ा और सोने दो न," उसने मुस्कुराते हुए कहा। लेकिन फिर भी बैठ गई और चाय का कप थाम लिया। हमने साथ नाश्ता किया, मौसम की बातें कीं, और मैं ऑफिस के लिए तैयार होने लगा।
शहर की जिंदगी ने हमें करीब ला दिया था। गांव में तो हम अलग-अलग कमरों में रहते थे, लेकिन यहां जगह कम होने से सब कुछ साझा था। प्रिया मेरी छोटी बहन थी, लेकिन अब वह बड़ी हो गई थी – कॉलेज की लड़की, अपनी दुनिया में व्यस्त। मैं उसकी देखभाल करता, उसके लिए चिंता करता, और वह मेरी। कभी-कभी शाम को हम साथ घूमने जाते, या घर पर ही टीवी देखते।
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ऑफिस से लौटते वक्त मैंने सोचा कि आज कुछ स्पेशल बनाऊंगा। बाजार से सब्जियां लीं और घर पहुंचा। प्रिया पहले से आई हुई थी, अपनी किताबें फैलाए पढ़ रही थी। "भैया, आज जल्दी आ गए?" उसने पूछा। मैंने हंसकर कहा, "हां, सोचा तेरे लिए पसंदीदा सब्जी बनाऊं।" हमने साथ मिलकर खाना बनाया, हंसी-मजाक किया। रात का खाना खाकर हम सोफे पर बैठे, कुछ देर टीवी देखा।
धीरे-धीरे दिन बीतते गए। हमारी जिंदगी में एक रूटीन बन गया था, लेकिन कभी-कभी मैं महसूस करता कि प्रिया की आंखों में कुछ अनकहा सा था। वह कॉलेज की दोस्तों की बातें करती, लेकिन घर पर चुप-चुप सी रहती। एक शाम, जब मैं थका हुआ लौटा, तो देखा वह किचन में खड़ी थी, कुछ सोच रही थी। "क्या हुआ, प्रिया?" मैंने पूछा। उसने मुस्कुराकर कहा, "कुछ नहीं भैया, बस थकान है।"
उस रात हम देर तक बातें करते रहे। प्रिया ने बताया कि कॉलेज में खर्च बढ़ गए हैं, किताबें महंगी हैं। मैंने कहा, "चिंता मत कर, मैं मैनेज कर लूंगा।" लेकिन अंदर से मैं जानता था कि मेरी सैलरी मुश्किल से चल रही थी। किराया, बिल, सब कुछ दबाव डाल रहा था। प्रिया ने मेरे कंधे पर हाथ रखा और कहा, "भैया, तुम हमेशा मेरी फिक्र करते हो।"
उस स्पर्श में कुछ अलग सा लगा। हम करीब बैठे थे, और मैंने महसूस किया कि हमारी जिंदगी कितनी एकाकी हो गई है। शहर में कोई अपना नहीं, सिर्फ हम दोनों। अगले दिन सुबह, जब मैं चाय बना रहा था, प्रिया आई और मेरे पास खड़ी हो गई। "भैया, आज कॉलेज नहीं जाना है," उसने कहा। मैंने पूछा क्यों, तो बोली बस ऐसे ही। हमने साथ समय बिताया, घर की सफाई की, और दोपहर में लंच बनाया।
शाम को बारिश होने लगी। बाहर की आवाजें कम हो गईं, और घर में एक शांति छा गई। प्रिया सोफे पर बैठी थी, मैं उसके बगल में। हम पुरानी यादें ताजा कर रहे थे – गांव के दिन, बचपन की शरारतें। अचानक उसने कहा, "भैया, क्या तुम कभी अकेला महसूस करते हो?" मैं चौंक गया, लेकिन सच बोल दिया, "हां, कभी-कभी।"
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उसकी आंखें मेरी आंखों में झांक रही थीं। हम चुप हो गए, बस एक-दूसरे को देखते रहे। मेरे मन में उथल-पुथल मच गई। वह मेरी बहन थी, लेकिन इस छोटे से फ्लैट में हमारी दुनिया इतनी सीमित थी कि भावनाएं उमड़ने लगीं। मैंने अपना हाथ उसके हाथ पर रखा, और वह नहीं हटी।
उस रात नींद नहीं आई। मैं सोचता रहा कि क्या हो रहा है। सुबह प्रिया सामान्य लग रही थी, लेकिन उसकी नजरें अलग थीं। दिन बीतते गए, और हमारी बातचीत में एक गहराई आ गई। एक शाम, जब मैं घर लौटा, तो देखा प्रिया ने नई ड्रेस पहनी थी – एक सिंपल साड़ी, जो उसे और खूबसूरत बना रही थी। "वाह, आज तो स्पेशल लग रही हो," मैंने मजाक में कहा। वह शरमा गई, "बस ऐसे ही, भैया।"
रात का खाना खाकर हम फिर सोफे पर बैठे। बारिश फिर शुरू हो गई। प्रिया ने अपना सिर मेरे कंधे पर रख दिया, और कहा, "भैया, यहां सब कितना मुश्किल है न।" मैंने उसके बालों में हाथ फेरा, और महसूस किया कि मेरा दिल तेज धड़क रहा है। हमारी सांसें मिलने लगीं, और अचानक सब कुछ बदल गया।
मैंने उसे अपनी बाहों में लिया, और वह विरोध नहीं किया। उसके होंठ मेरे करीब आए, और हमने एक-दूसरे को चूमा। वह पल इतना भावुक था कि आंसू आ गए। "प्रिया, यह गलत है," मैंने कहा, लेकिन वह बोली, "नहीं भैया, यहां सिर्फ हम हैं।" हमारी भावनाएं उफान पर थीं, और हम एक हो गए।
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उस रात हमने अपनी सीमाएं तोड़ीं। उसका शरीर मेरे स्पर्श से कांप रहा था, और मैंने उसे धीरे-धीरे महसूस किया। उसकी सांसें तेज थीं, और मैंने उसके हर हिस्से को प्यार से छुआ। वह मेरे कान में फुसफुसाई, "भैया, मुझे अच्छा लग रहा है।" हमारी दुनिया सिर्फ उस कमरे तक सिमट गई थी।
अगले दिन सुबह, हम दोनों चुप थे। लेकिन शाम को फिर वही हुआ। अब यह हमारी जिंदगी का हिस्सा बन गया था। लेकिन एक समस्या थी – पैसों की तंगी। किराया बढ़ गया था, और मेरी जॉब पर दबाव था। प्रिया ने कहा, "भैया, मैं कुछ करना चाहती हूं।" मैंने मना किया, लेकिन वह नहीं मानी।
एक दिन उसने बताया कि उसने एक दोस्त से बात की है, जो कहती है कि कुछ लड़कियां एक्स्ट्रा पैसे कमाती हैं। मैं चौंक गया, "क्या मतलब?" वह बोली, "बस, कुछ क्लाइंट्स के साथ समय बिताना।" मेरा दिल टूट गया, लेकिन तंगी ने मजबूर कर दिया। मैंने सोचा, अगर मैं ही उसका पहला हूं, तो शायद...।
मैंने फैसला किया कि मैं उसे तैयार करूंगा। शाम को मैंने कहा, "प्रिया, अगर करना है तो सही से करो।" उसने पूछा कैसे, तो मैंने उसे सिखाना शुरू किया। पहले तो भावनात्मक रूप से, फिर शारीरिक। हमने रोल-प्ले किया, जहां मैं क्लाइंट बना, और वह...। उसका शरीर मेरे सामने खुला, और मैंने उसे हर तरीके से सिखाया।
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पहली बार जब हमने ऐसा किया, तो वह घबराई हुई थी। मैंने उसके कपड़े उतारे, और कहा, "ऐसे करो।" उसकी त्वचा गर्म थी, और मैंने उसके स्तनों को छुआ, धीरे-धीरे। वह सिसकी, "भैया, यह अजीब लग रहा है।" लेकिन फिर वह बह गई। हमने अलग-अलग पोजीशंस ट्राई कीं, हर बार नई सेंसेशन के साथ।
धीरे-धीरे वह इसमें माहिर हो गई। लेकिन मेरे मन में जलन थी। एक रात, जब हम साथ थे, मैंने उसे कसकर पकड़ा और कहा, "तुम मेरी हो, किसी और की नहीं।" वह रोई, लेकिन फिर हमारी भावनाएं फिर उमड़ीं। उसका शरीर अब मेरे लिए एक रहस्य नहीं था, बल्कि एक जुनून।
किराए के घर में हमारी जिंदगी बदल गई। प्रिया ने असली क्लाइंट्स लेना शुरू किया, लेकिन हर बार लौटकर मेरे पास आती। मैं उसे साफ करता, उसके दर्द को सहलाता, और फिर हम एक हो जाते। एक शाम, जब वह थकी हुई लौटी, मैंने उसे बाथरूम में ले जाकर नहलाया। पानी की बूंदें उसके शरीर पर गिर रही थीं, और मैंने उसे फिर से महसूस किया।
उसकी आंखों में अब एक अलग चमक थी। "भैया, तुमने मुझे यह सब सिखाया," वह बोली। हम बिस्तर पर लेटे, और मैंने उसके पैरों से शुरू करके ऊपर तक चूमा। हर स्पर्श में नई उत्तेजना थी, कभी धीमा, कभी तेज। वह कराहती, और मैं उसके साथ बहता।
लेकिन अंदर से संघर्ष था। वह मेरी बहन थी, लेकिन अब कुछ और। एक रात, जब हम इंटीम थे, उसने कहा, "भैया, क्या हम हमेशा ऐसे रहेंगे?" मैंने जवाब नहीं दिया, बस उसे और कसकर पकड़ लिया। उसका शरीर मेरे नीचे कांप रहा था, और हमारी सांसें मिली हुई थीं।
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समय बीतता गया, और हमारी दुनिया इसी में सिमट गई। प्रिया अब आत्मविश्वास से भरी थी, लेकिन मेरे लिए वह वही छोटी बहन थी। एक दोपहर, जब घर खाली था, हमने फिर से शुरुआत की। इस बार मैंने उसे दीवार से सटाकर पकड़ा, उसके होंठ चूसे, और नीचे जाकर उसे खुश किया। उसकी चीखें कमरे में गूंजीं।
हर सीन अलग था – कभी रोमांटिक, कभी रफ। लेकिन भावनाएं हमेशा गहरी थीं। मैं सोचता कि यह कब तक चलेगा। प्रिया ने एक दिन कहा, "भैया, मैं तुम्हारे बिना नहीं रह सकती।" हम फिर एक हुए, इस बार लाइट्स बंद करके, सिर्फ स्पर्श और सांसों के सहारे।
उस रात बारिश हो रही थी, और हम बिस्तर पर लेटे थे। उसका हाथ मेरे सीने पर था, और मैं उसके बालों में उंगलियां फिरा रहा था। हमारी सांसें शांत हो गई थीं, लेकिन दिल में उथल-पुथल थी।