किरायेदारनी की अनकही चाहत

मैं राजेश हूँ, दिल्ली के एक छोटे से फ्लैट में रहता हूँ। हर सुबह की तरह आज भी मैं बालकनी में खड़ा होकर चाय की चुस्की ले रहा था। बाहर सड़क पर स्कूल जाते बच्चे हँसते-खेलते नजर आ रहे थे, और दूर से मंदिर की घंटियाँ की आवाज़ आ रही थी। मेरी उम्र अब 35 की हो चुकी है, और पिछले दो साल से मैं अकेला ही हूँ, जब से मेरी पत्नी की बीमारी से मौत हो गई। घर बड़ा लगता है, इसलिए मैंने एक कमरा किराए पर दे दिया है।

प्रिया उस कमरे में रहती है। वह 22 साल की है, पास के कॉलेज में पढ़ाई करती है और शाम को एक छोटी सी नौकरी भी। वह गाँव से आई है, शहर में अकेली रहने की कोशिश कर रही है। मैंने उसे किराया कम रखा है, क्योंकि वह ईमानदार लगती है और घर को साफ-सुथरा रखती है। सुबह जब मैं चाय बना रहा था, तो वह किचन में आई और बोली, "अंकल, क्या मैं भी एक कप ले सकती हूँ?" मैंने मुस्कुराकर हाँ कहा और हम दोनों बालकनी में बैठ गए।

हमारी बातें सामान्य होती हैं। वह अपने कॉलेज की कहानियाँ सुनाती है, कैसे प्रोफेसर सख्त हैं और दोस्त कितने मज़ेदार। मैं अपनी पुरानी नौकरी के बारे में बताता हूँ, जो अब घर से ही करता हूँ। आज उसने बताया कि उसका गाँव कितना हरा-भरा है, और शहर की भीड़ उसे कभी-कभी डराती है। मैंने कहा, "यहाँ सब ठीक हो जाएगा, समय लगता है।" हमारी ये छोटी-छोटी बातें घर को कम खाली बनाती हैं।

शाम को जब मैं काम से थककर लौटा, तो प्रिया दरवाजे पर खड़ी थी। उसने कहा, "अंकल, आज मैंने डिनर बनाया है, अगर आप चाहें तो साथ खा लीजिए।" मैं हैरान हुआ, लेकिन मना नहीं कर सका। हम डाइनिंग टेबल पर बैठे, और उसने दाल-चावल परोसा। खाने के दौरान उसने अपनी फैमिली के बारे में बताया। उसके पिता किसान हैं, और वह यहाँ पढ़ाई करके कुछ बनना चाहती है। मैंने अपनी पत्नी की यादें साझा कीं, कैसे हम साथ घूमते थे। उसकी आँखों में सहानुभूति थी।

रात को सोने से पहले मैं सोच रहा था कि प्रिया कितनी मेहनती है। वह सुबह जल्दी उठती है, पढ़ाई करती है और घर के काम भी संभालती है। कभी-कभी मैं उसे देखता हूँ जब वह बालकनी में खड़ी होकर फोन पर बात करती है। उसकी हँसी घर में एक नई ऊर्जा लाती है। लेकिन मैं खुद को याद दिलाता हूँ कि वह सिर्फ किरायेदार है, और मैं उससे ज्यादा उम्र का हूँ।

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अगले कुछ दिन ऐसे ही बीते। एक शाम बारिश हो रही थी, और बिजली चली गई। मैं लिविंग रूम में कैंडल जलाकर बैठा था। प्रिया अपने कमरे से निकली और बोली, "अंकल, डर लग रहा है अँधेरे में। क्या मैं यहाँ बैठ सकती हूँ?" मैंने हाँ कहा, और हम बातें करने लगे। उसने बताया कि गाँव में बारिश कितनी सुंदर लगती है, लेकिन यहाँ अकेलापन महसूस होता है। मैंने कहा, "तुम अकेली नहीं हो, मैं हूँ ना।" उसकी आँखें चमक उठीं।

धीरे-धीरे हमारी बातें गहरी होने लगीं। एक दिन उसने मुझसे पूछा, "अंकल, शादी के बाद जीवन कैसा होता है?" मैंने बताया कि यह साथ का सफर है, लेकिन कभी-कभी दर्द भी देता है। वह चुपचाप सुनती रही। मैं महसूस कर रहा था कि उसके अंदर कुछ उथल-पुथल है, शायद घर की याद या भविष्य की चिंता। मैं उसे सांत्वना देता, लेकिन खुद भी अकेलेपन से जूझ रहा था।

एक रात मैं सो नहीं पा रहा था। बाहर तेज़ हवा चल रही थी। अचानक दरवाजे पर दस्तक हुई। प्रिया थी, उसने कहा, "अंकल, मुझे नींद नहीं आ रही। क्या हम बात कर सकते हैं?" मैंने उसे अंदर बुलाया, और हम बेड पर बैठ गए। वह अपनी जिंदगी की मुश्किलों के बारे में बताने लगी। कैसे उसके पिता चाहते हैं कि वह जल्दी शादी कर ले, लेकिन वह पढ़ना चाहती है। मैंने उसका हाथ थामा और कहा, "तुम सही कर रही हो।" उस पल हमारी नजरें मिलीं, और कुछ अनकहा सा महसूस हुआ।

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उस रात हम देर तक बातें करते रहे। प्रिया ने अपनी आँखों में आँसू भरकर कहा, "अंकल, आप जैसे कोई नहीं मिला मुझे। आप समझते हैं।" मैंने उसे गले लगाया, सांत्वना देने के लिए। लेकिन वह पल कुछ और बन गया। उसकी साँसें मेरे कंधे पर महसूस हो रही थीं, और मेरा दिल तेज़ धड़क रहा था। मैंने खुद को पीछे खींचा, लेकिन वह करीब आ गई।

धीरे-धीरे हमारी बातें इमोशन्स में बदलने लगीं। प्रिया ने कहा, "मैं कभी किसी के इतने करीब नहीं आई।" मैंने पूछा, "क्या तुम्हें डर लगता है?" वह बोली, "नहीं, आपके साथ नहीं।" हमारी उँगलियाँ आपस में जुड़ गईं, और मैंने उसके गाल पर हाथ फेरा। उसकी त्वचा नरम थी, और उसकी आँखें बंद हो गईं।

उस रात हमने ज्यादा कुछ नहीं किया, सिर्फ एक-दूसरे को महसूस किया। लेकिन अगले दिन से कुछ बदल गया। शाम को जब मैं घर लौटा, प्रिया ने मुझे गले लगाया। उसने कहा, "अंकल, मैं आपसे प्यार करने लगी हूँ।" मैं स्तब्ध था, लेकिन मेरे अंदर भी वही भावनाएँ थीं। मैंने उसे चूमा, पहली बार। उसके होंठ नरम और मीठे थे।

हमारी निकटता बढ़ती गई। एक शाम हम लिविंग रूम में बैठे थे, और प्रिया मेरे कंधे पर सिर रखकर लेट गई। मैंने उसके बालों में उँगलियाँ फिराईं। वह बोली, "मुझे अच्छा लगता है आपके साथ।" मैंने उसे अपनी बाहों में लिया, और हम चुंबन करने लगे। उसकी साँसें तेज़ हो गईं, और मेरा शरीर गर्म होने लगा।

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धीरे-धीरे मैंने उसके कपड़े उतारे। उसकी त्वचा गोरी और मुलायम थी। वह शरमा रही थी, लेकिन रुकना नहीं चाहती थी। मैंने उसके शरीर को सहलाया, और वह सिहर उठी। उसने कहा, "अंकल, यह पहली बार है।" मैंने धीरे से कहा, "मैं सावधानी रखूँगा।" हम बेड पर लेट गए, और मैंने उसे प्यार से छुआ।

उस पल में भावनाएँ उफान पर थीं। प्रिया की आँखें बंद थीं, और वह मेरे नाम का उच्चारण कर रही थी। मैंने धीरे से उसके अंदर प्रवेश किया, और वह दर्द से कराह उठी। लेकिन जल्द ही दर्द सुख में बदल गया। हमारी साँसें एक हो गईं, और शरीर एक लय में चलने लगे। उसकी उँगलियाँ मेरी पीठ में गड़ीं, और मैंने महसूस किया कि वह पूरी तरह मेरी हो गई है।

उस रात के बाद हमारी जिंदगी बदल गई। हर शाम हम साथ बिताते, बातें करते और प्यार करते। प्रिया अब और आत्मविश्वासी लगती थी। एक दिन उसने कहा, "आपने मुझे नई जिंदगी दी है।" मैंने उसे गले लगाया, और हम फिर से एक हो गए। उसकी चूत अब मेरी थी, और हर बार नया अनुभव होता। कभी धीरे, कभी तेज़, लेकिन हमेशा भावनाओं से भरा।

एक शाम बारिश फिर से आई। हम बालकनी में खड़े थे, गीले हो रहे थे। प्रिया ने मुझे खींचा और चूमा। हम कमरे में गए, और इस बार वह ऊपर थी। उसने मेरे शरीर को छुआ, और मैंने उसके स्तनों को सहलाया। हमारी लय तेज़ हुई, और सुख की लहरें आईं। वह चिल्लाई, "राजेश, मैं तुम्हारी हूँ।"

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समय बीतता गया, लेकिन हमारी चाहत कम नहीं हुई। हर रात नई थी। कभी मैं उसे पीछे से पकड़ता, कभी वह मेरे ऊपर। उसकी सील टूटने के बाद वह और खुल गई, और हमारे बीच का कनेक्शन गहरा हो गया। मैं सोचता कि यह सब कैसे शुरू हुआ, लेकिन अब यह हमारी जिंदगी थी।

एक रात हम देर तक लेटे रहे। प्रिया ने मेरे सीने पर सिर रखा और कहा, "मैं कभी अलग नहीं होना चाहती।" मैंने उसके बाल सहलाए, और हम फिर से मिलन में खो गए। उसकी गर्माहट, उसकी खुशबू, सब कुछ मेरे लिए नया था। हम धीरे-धीरे चरम पर पहुँचे, और सुख की नींद में सो गए।

अगली सुबह सूरज की किरणें कमरे में आईं। प्रिया मेरे बगल में सो रही थी, उसकी साँसें शांत। मैंने उसे देखा, और दिल भर आया। हमारी कहानी अब सिर्फ किरायेदार और मालिक की नहीं थी, बल्कि प्यार की थी। शाम को फिर वही पल आया, जब हम एक-दूसरे में खो गए।

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प्रिया की आँखों में अब डर नहीं, बल्कि विश्वास था। वह बोली, "तुमने मुझे पूरा किया।" मैंने उसे चूमा, और हमारी बॉडीज फिर से जुड़ गईं। इस बार यह और इंटेंस था, भावनाओं का तूफान। हम चरम पर पहुँचे, और वह मेरे नाम से पुकारती रही।

रात गहराती गई, और हम बातें करते रहे। प्रिया ने अपनी चाहतें बताईं, और मैंने अपनी। हम हँसे, रोए, और फिर प्यार किया। उसकी चूत अब परिचित थी, लेकिन हर बार नई संवेदनाएँ देती। मैंने उसे नए तरीके से छुआ, और वह सिहर उठी।

सुबह होने से पहले हम थककर सो गए, लेकिन दिल संतुष्ट था। प्रिया मेरी बाहों में थी, और दुनिया बाहर थी। हमारा यह सफर जारी था, अनकही चाहतों के साथ।