किराए के घर की मालकिन
सुबह के सात बजे थे, जब मैं अपनी छोटी-सी बालकनी में खड़ा होकर चाय की चुस्की ले रहा था। दिल्ली की इस पुरानी कॉलोनी में, जहां हर घर की दीवारें एक-दूसरे से सटी हुई लगती थीं, मेरा किराए का कमरा ऊपरी मंजिल पर था। रोज की तरह, नीचे सड़क पर सब्जी वाले की आवाज गूंज रही थी, और पड़ोस के बच्चे स्कूल की तैयारी में लगे थे। मैं, राहुल, यहां पिछले छह महीने से रह रहा था, अपनी नौकरी की वजह से। दिनचर्या वही थी – सुबह उठना, तैयार होना, और ऑफिस के लिए निकलना।
नीचे वाले हिस्से में मकान मालकिन रिया दीदी रहती थीं। वे अकेली थीं, उनके पति की मौत को दो साल हो चुके थे। मैं उन्हें दीदी ही कहता था, क्योंकि वे मुझसे उम्र में बड़ी थीं – शायद पैंतीस के आसपास। वे घर का किराया वक्त पर लेती थीं, और कभी-कभी शाम को चाय के लिए बुला लेती थीं। लेकिन हमारी बातचीत ज्यादा नहीं होती थी। आज सुबह, मैं बालकनी से नीचे देखा तो वे अपने छोटे से आंगन में कपड़े सुखा रही थीं। उनकी साड़ी हल्की हवा में लहरा रही थी, लेकिन मेरे मन में कोई खास विचार नहीं था। बस, सोच रहा था कि आज ऑफिस में मीटिंग है, जल्दी निकलना पड़ेगा।
किराए का यह घर मेरे लिए एक आश्रय था। मैं गांव से आया था, दिल्ली में ग्राफिक डिजाइनर की नौकरी मिली थी। शुरुआत में अकेलापन लगता था, लेकिन अब आदत हो गई थी। रिया दीदी का घर साफ-सुथरा था, और वे खुद एक स्कूल टीचर थीं। शाम को लौटते वक्त, कभी-कभी उनकी क्लास की आवाज ऊपर तक आती थी – बच्चे पढ़ते हुए। मैं अपना काम निपटा कर, किताब पढ़ता या फोन पर परिवार से बात करता। जीवन इतना ही साधारण था।
एक दिन, बारिश हो रही थी। मैं ऑफिस से लौटा तो भीग चुका था। सीढ़ियां चढ़ते हुए, मैंने देखा कि रिया दीदी का दरवाजा खुला था। वे अंदर बैठी कुछ पढ़ रही थीं। "राहुल, भीग गए हो? अंदर आओ, चाय बना दूं," उन्होंने आवाज दी। मैं हिचकिचाया, लेकिन ठंड लग रही थी, तो अंदर चला गया। उनका लिविंग रूम छोटा था, दीवारों पर कुछ पुरानी तस्वीरें टंगी थीं। हमने चाय पीते हुए बात की – मौसम के बारे में, शहर की भीड़ के बारे में। उनकी आवाज में एक उदासी थी, जो मैंने पहले नहीं महसूस की थी।
उस शाम के बाद, हमारी बातचीत थोड़ी बढ़ गई। कभी किराया देते वक्त, कभी कोई छोटी-मोटी मदद मांगते हुए। रिया दीदी बतातीं कि उनके पति एक इंजीनियर थे, और उनकी मौत ने सब बदल दिया। मैं अपनी नौकरी की परेशानियां शेयर करता। धीरे-धीरे, मैं महसूस करने लगा कि उनका अकेलापन मेरे अकेलेपन से मिलता-जुलता था। लेकिन यह सब सतही था, कोई गहरा कनेक्शन नहीं। मैं खुद को याद दिलाता कि मैं यहां सिर्फ किराएदार हूं।
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एक रात, बिजली चली गई। पूरा मोहल्ला अंधेरे में डूबा था। मैं अपने कमरे में मोमबत्ती जला कर बैठा था, जब नीचे से आवाज आई – "राहुल, क्या तुम्हारे पास टॉर्च है?" मैं नीचे गया। रिया दीदी डरी हुई लग रही थीं। हम साथ बैठे, मोमबत्ती की रोशनी में। बातों-बातों में, उन्होंने अपनी जिंदगी के बारे में और बताया। कैसे वे अब अकेले सब संभालती हैं, कैसे रातें लंबी लगती हैं। मैंने सुना, और पहली बार महसूस किया कि उनकी आंखों में एक गहराई है।
उस रात के बाद, हमारी मुलाकातें बढ़ गईं। कभी शाम को चाय, कभी कोई किताब शेयर करना। मैं देखता कि वे घर में अकेली कितनी मजबूत बनी रहती हैं, लेकिन अंदर से टूट रही हैं। मेरे मन में उनके लिए सम्मान था, और शायद थोड़ी-सी सहानुभूति। एक दिन, मैं बीमार पड़ गया। बुखार था। रिया दीदी ऊपर आईं, दवा दीं, सूप बनाया। उनकी देखभाल में एक ममता थी, जो मुझे घर की याद दिलाती थी। मैंने शुक्रिया कहा, और वे मुस्कुराईं।
समय बीतता गया। अब मैं शाम को उनके साथ ज्यादा वक्त बिताने लगा। हम फिल्में देखते, या बस बातें करते। उनकी हंसी में एक नई रंगत आ गई थी। मैं खुद को रोकता, सोचता कि यह सही नहीं है। मैं किराएदार हूं, वे मकान मालकिन। लेकिन उनके स्पर्श में, जब वे चाय का कप देतीं, एक हल्की-सी गर्माहट महसूस होती। एक शाम, हम बालकनी में खड़े थे। बारिश हो रही थी। उन्होंने कहा, "राहुल, तुम्हारी वजह से यह घर अब कम खाली लगता है।" मैंने उनकी ओर देखा, और पहली बार महसूस किया कि मेरे मन में कुछ बदल रहा है।
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उस शाम, बातें गहरी हो गईं। उन्होंने अपने पति की यादें शेयर कीं, आंसू बहाए। मैंने उन्हें गले लगाया, सांत्वना दी। वह पल अनजाने में लंबा खिंच गया। उनकी सांसें मेरे कंधे पर महसूस हो रही थीं। मैंने खुद को पीछे हटाया, लेकिन उनकी आंखों में एक सवाल था। "राहुल, क्या यह गलत है?" उन्होंने पूछा। मैं चुप रहा, लेकिन मेरा दिल तेज धड़क रहा था।
अगले दिन, सब सामान्य लग रहा था, लेकिन अंदर एक तनाव था। मैं ऑफिस गया, लेकिन मन वहां नहीं था। शाम को लौटा तो रिया दीदी ने दरवाजा खोला। वे एक साधारण साड़ी में थीं, लेकिन उनकी आंखें कुछ कह रही थीं। हम अंदर बैठे, बातें कीं। धीरे-धीरे, हम करीब आए। मैंने उनकी कमर पर हाथ रखा, और वे नहीं हटीं। वह पल इतना स्वाभाविक लगा, जैसे सालों का अकेलापन खत्म हो रहा हो।
हमारे होंठ मिले, पहली बार। उनकी सांसें गर्म थीं, और मेरे हाथ उनके बालों में उलझ गए। हम सोफे पर बैठे, और मैंने उन्हें अपनी बाहों में लिया। रिया दीदी की आंखें बंद थीं, जैसे वे इस पल को जी रही हों। मैंने उनकी गर्दन पर吻 किया, और उन्होंने एक हल्की-सी सिसकी ली। हमारा स्पर्श धीमा था, भावनाओं से भरा। मैं महसूस कर रहा था उनकी त्वचा की नरमी, उनकी साड़ी की सिलवटें।
उस रात, हम उनके बेडरूम में गए। रोशनी कम थी, सिर्फ एक लैंप जल रहा था। मैंने उनकी साड़ी उतारी, धीरे-धीरे। उनका शरीर सुंदर था, लेकिन उससे ज्यादा उनकी आंखों में वह विश्वास। हम एक-दूसरे को छूते गए, हर स्पर्श में एक नई भावना। उनकी उंगलियां मेरी पीठ पर फिसलीं, और मैंने उनके स्तनों को सहलाया। हमारा मिलन गहरा था, जैसे दो आत्माएं जुड़ रही हों।
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सुबह हुई, तो हम साथ लेटे थे। रिया दीदी मेरे सीने पर सिर रख कर सो रही थीं। मैंने उन्हें देखा, और महसूस किया कि यह सिर्फ शारीरिक नहीं था। लेकिन मन में एक डर था – क्या यह सही है? समाज क्या कहेगा? फिर भी, वह पल इतना शांत था। हमने नाश्ता साथ किया, बातें कीं। अब हमारा रिश्ता बदल चुका था।
दिन बीतते गए, और हमारी निकटता बढ़ती गई। कभी शाम को, जब घर खाली होता, हम एक-दूसरे की बाहों में खो जाते। हर बार, कुछ नया लगता। एक रात, हमने संगीत लगाया, और नाचते हुए करीब आए। उनकी हंसी, उनका स्पर्श – सब कुछ जीवंत था। मैं उनकी कमर पकड़ता, और वे मेरे कंधे पर सिर टिकातीं। हमारा प्यार अब सिर्फ शारीरिक नहीं रहा, भावनात्मक गहराई आ गई थी।
लेकिन कन्फ्लिक्ट भी था। मैं सोचता कि अगर किसी को पता चला तो? रिया दीदी भी डरतीं, लेकिन कहतीं, "राहुल, यह हमारा पल है।" एक दिन, पड़ोसी ने कुछ संदेह जताया, लेकिन हमने इग्नोर किया। हमारी मुलाकातें अब गुप्त हो गईं, लेकिन उतनी ही तीव्र।
एक शाम, बारिश फिर हो रही थी। हम बालकनी में खड़े थे, जब उन्होंने कहा, "राहुल, मैं तुम्हें खोना नहीं चाहती।" मैंने उन्हें चूमा, और हम अंदर चले गए। उस रात, हमारा मिलन और भी भावुक था। मैंने उनके हर हिस्से को छुआ, जैसे पहली बार। उनकी सिसकियां, मेरी धड़कनें – सब मिलकर एक संगीत बना रहे थे।
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समय के साथ, हमने फैसला किया कि यह रिश्ता जारी रखेंगे। मेरा मन अब उनके बिना अधूरा लगता। हम साथ रहते, बातें करते, और रातें एक-दूसरे की बाहों में बिताते। हर स्पर्श में नई भावना, हर चुंबन में नया स्वाद।
एक रात, हम लेटे हुए थे। रिया दीदी ने कहा, "राहुल, तुमने मेरी जिंदगी में रंग भरे हैं।" मैंने उन्हें गले लगाया, और हम फिर से एक हो गए। उनका शरीर मेरे साथ ताल मिला रहा था, हर गति में एक लय। मैं महसूस कर रहा था उनकी गर्माहट, उनकी नमी। हम चरम पर पहुंचे, साथ में।
उस पल, सब कुछ परफेक्ट लग रहा था। लेकिन जीवन में उतार-चढ़ाव आते हैं। फिर भी, हमारा बंधन मजबूत था। हम आगे की सोचते, लेकिन अभी तो यह पल जी रहे थे।
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धीरे-धीरे, हमारी दिनचर्या में यह रिश्ता घुल गया। सुबह उठते, साथ चाय पीते, और शाम को मिलते। हर मिलन में variety थी – कभी धीमा, कभी तेज। भावनाएं हमेशा नई लगतीं।
एक दिन, मैंने सोचा कि शायद हमें यह रिश्ता आगे बढ़ाना चाहिए। लेकिन अभी, हम बस एक-दूसरे में खोए हुए थे। रिया दीदी की आंखें चमकतीं, और मैं उनके स्पर्श में सुकून पाता।
रात गहरी हो रही थी। हम बिस्तर पर लेटे, उनकी उंगलियां मेरे बालों में। मैंने उन्हें चूमा, और हम फिर से उस दुनिया में खो गए जहां सिर्फ हम थे। उनका शरीर मेरे नीचे था, और मैं धीरे-धीरे आगे बढ़ा। उनकी सांसें तेज हुईं, और हम एक हो गए।