परिवार की गहराइयाँ

सुबह की धूप कमरे में धीरे-धीरे फैल रही थी, और मैं अपनी किताब के पन्ने पलटते हुए बिस्तर पर बैठा था। बाहर से चिड़ियों की चहचहाहट आ रही थी, जो रोज की तरह मेरी दिनचर्या का हिस्सा थी। घर में सब कुछ सामान्य लग रहा था, माँ रसोई में चाय बना रही थीं, और बहन प्रिया ऊपर वाले कमरे में अपनी चीजें संभाल रही थी।

मैं राहुल हूँ, तेईस साल का, और हमारा परिवार दिल्ली के एक छोटे से फ्लैट में रहता है। पापा की मौत दो साल पहले हो गई थी, तब से माँ सरिता घर संभालती हैं, और मैं कॉलेज के बाद पार्ट-टाइम जॉब करता हूँ। प्रिया, जो मुझसे पाँच साल बड़ी है, उसकी शादी पिछले साल हुई थी, लेकिन इन दिनों वो घर पर ही है क्योंकि उसका पति विदेश गया हुआ है।

मैं उठकर रसोई की तरफ गया, जहाँ माँ चाय की केतली में पानी उबाल रही थीं। उनकी उम्र चालीस के आसपास है, लेकिन वो हमेशा इतनी फुर्तीली लगती हैं कि लगता है समय ने उन्हें छुआ ही नहीं। "राहुल, चाय तैयार है, ले जाओ," उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा, और मैंने कप उठा लिया।

प्रिया नीचे आई, उसके बाल बंधे हुए थे, और वो साड़ी में हमेशा की तरह सादगी से सजी हुई लग रही थी। "भाई, आज क्या प्लान है?" उसने पूछा, और मैंने बताया कि कॉलेज जाना है। हम तीनों साथ बैठकर नाश्ता करते हैं, ये हमारी रोज की आदत है, जो परिवार को जोड़े रखती है।

दिन बीतते हैं, और शाम को घर लौटकर मैं थकान महसूस करता हूँ। माँ अक्सर मेरे लिए कुछ स्पेशल बनाती हैं, जैसे आज उन्होंने आलू की सब्जी बनाई थी। हम डाइनिंग टेबल पर बैठे, प्रिया भी साथ थी, और बातें चल रही थीं उसके पति की नौकरी के बारे में।

रात को सोने से पहले मैं अपने कमरे में था, किताब पढ़ रहा था, जब माँ अंदर आईं। "राहुल, नींद नहीं आ रही?" उन्होंने पूछा, और बिस्तर के किनारे बैठ गईं। उनकी आवाज में एक कोमलता थी, जो हमेशा मुझे सुकून देती है। मैंने सिर हिलाया, और वो मेरे बालों में हाथ फेरने लगीं।

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उस पल में कुछ अलग सा लगा, लेकिन मैंने ध्यान नहीं दिया। प्रिया का कमरा बगल में है, और कभी-कभी वो भी देर रात तक जागती है। अगले दिन सुबह, जब मैं तैयार हो रहा था, प्रिया ने कहा, "भाई, आज शाम को बाजार चलें? कुछ खरीदना है।" मैंने हामी भरी, और हम साथ निकले।

बाजार में घूमते हुए प्रिया की हँसी मुझे अच्छी लग रही थी, वो पहले से ज्यादा खुलकर बात कर रही थी। घर लौटकर माँ ने डिनर तैयार किया, और हम सबने साथ खाया। रात गहराने लगी, और मैं अपने कमरे में लेटा सोच रहा था परिवार के बारे में।

कुछ दिनों बाद, एक शाम बारिश हो रही थी। घर में बिजली चली गई, और हम तीनों लिविंग रूम में बैठे थे। माँ ने मोमबत्ती जलाई, और उस रोशनी में सब कुछ शांत लग रहा था। प्रिया ने कहा, "माँ, याद है वो पुराने दिन जब पापा होते थे?" माँ की आँखें नम हो गईं।

मैंने माँ का हाथ पकड़ा, उन्हें सहारा देने के लिए। उनकी उँगलियाँ मेरी हथेली में कस गईं, और उस स्पर्श में एक गर्माहट थी जो मैंने पहले नहीं महसूस की। प्रिया भी करीब आ गई, और हम तीनों चुपचाप बैठे रहे।

उस रात सोते समय मेरे मन में उथल-पुथल थी। माँ के स्पर्श की याद आ रही थी, और प्रिया की मुस्कान। अगले दिन, जब प्रिया घर पर अकेली थी, मैं जल्दी लौटा। वो रसोई में थी, और मैंने मदद की पेशकश की।

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हम साथ खड़े थे, सब्जी काट रहे थे, जब उसकी कोहनी मेरी बाँह से टकराई। वो हँस पड़ी, लेकिन मेरे अंदर कुछ हलचल हुई। "प्रिया दी, तुम खुश हो न?" मैंने पूछा, और उसने सिर झुका लिया। "शादी के बाद सब बदल जाता है, भाई।"

शाम को माँ काम से थकी हुई लौटीं। मैंने उनके कंधे दबाए, जैसे बचपन में करता था। उनकी साँसें गहरी हो गईं, और वो बोलीं, "राहुल, तुम मेरी ताकत हो।" उस पल में हमारी नजरें मिलीं, और कुछ अनकहा सा लगा।

रात को मैं जागा रहा, सोचता रहा। प्रिया का कमरा खुला था, और मैं अंदर गया पानी लेने के बहाने। वो लेटी हुई थी, आँखें बंद। मैंने उसे देखा, और दिल में एक pull महसूस किया।

अगली सुबह, माँ ने मुझे जगाया। उनकी उँगलियाँ मेरे चेहरे पर फिर रही थीं, और मैंने आँखें खोलीं। "उठो, बेटा," वो बोलीं, लेकिन उनकी आवाज में एक नरमी थी। मैंने उनका हाथ पकड़ लिया, और हम दोनों चुप रहे।

दिन में प्रिया और मैं पार्क गए। वहाँ बैठकर वो अपने वैवाहिक जीवन की परेशानियाँ बता रही थी। "पति हमेशा व्यस्त रहता है, मैं अकेली महसूस करती हूँ।" मैंने उसका हाथ थामा, भाई की तरह, लेकिन अंदर कुछ और उमड़ रहा था।

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घर लौटकर माँ ने हमें देखा, और मुस्कुराई। रात का खाना खाने के बाद, हम टीवी देख रहे थे। माँ मेरे बगल में बैठीं, उनका सिर मेरे कंधे पर टिका। प्रिया दूसरी तरफ थी, और उसकी जांघ मेरी से छू रही थी।

उस रात, जब सब सो गए, मैं माँ के कमरे में गया। वो जाग रही थीं। "क्या हुआ, राहुल?" उन्होंने पूछा। मैंने कहा, "नींद नहीं आ रही।" वो उठीं, और मुझे गले लगा लिया। उनका शरीर मेरे खिलाफ दबा, और मैंने विरोध नहीं किया।

उनकी साँसें तेज हो गईं, और मैंने उनके होंठों पर अपने होंठ रख दिए। वो चौंकीं, लेकिन पीछे नहीं हटीं। हमारा चुंबन गहरा होता गया, और उनके हाथ मेरी कमर पर फिसलने लगे। मैंने उनकी साड़ी का पल्लू सरकाया, और उनके स्तनों को छुआ।

वो कराह उठीं, "राहुल, ये गलत है," लेकिन उनकी आँखों में इच्छा थी। मैंने उन्हें बिस्तर पर लिटाया, और उनके शरीर को चूमा। उनकी त्वचा गर्म थी, और मैंने उनके निप्पल्स को मुँह में लिया। वो मेरे बालों में उँगलियाँ फिरा रही थीं, सिसकियाँ लेती हुई।

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मैंने अपनी पैंट उतारी, और उनका हाथ मेरे लिंग पर रखा। वो उसे सहला रही थीं, और फिर मैं उनके अंदर प्रवेश कर गया। हमारी गतिविधि धीमी और भावुक थी, हर धक्के में प्यार और संघर्ष मिश्रित। वो चरम पर पहुँचीं, और मैं भी उनके साथ।

सुबह, सब सामान्य लग रहा था, लेकिन हमारे बीच एक रहस्य था। प्रिया को शक नहीं हुआ, लेकिन शाम को जब माँ बाहर गईं, प्रिया मेरे कमरे में आई। "भाई, तुम उदास लग रहे हो," उसने कहा, और मेरे पास बैठ गई।

मैंने उसकी आँखों में देखा, और अचानक उसे चूम लिया। वो स्तब्ध हुई, लेकिन जवाब दिया। "राहुल, क्या कर रहे हो?" उसने फुसफुसाया, लेकिन उसके हाथ मेरी शर्ट उतार रहे थे। मैंने उसकी साड़ी खोली, और उसके शरीर को सहलाया।

उसके स्तन भरे हुए थे, और मैंने उन्हें चूसा। वो मोअन कर रही थी, "भाई, ये पाप है," लेकिन उसकी टाँगें फैल गईं। मैंने उसके अंदर घुसा, और हमारा मिलन तीव्र था, जैसे सालों का दबा हुआ जुनून। वो मेरे ऊपर आई, और राइड करते हुए चरमोत्कर्ष पर पहुँची।

अगले दिन, माँ ने हमें साथ देखा, और समझ गई। शाम को, हम तीनों लिविंग रूम में थे। माँ ने कहा, "हमें बात करनी चाहिए।" लेकिन बातें इच्छा में बदल गईं। प्रिया और माँ एक-दूसरे को छूने लगीं, और मैं बीच में था।

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मैंने माँ को चूमा, जबकि प्रिया मेरे लिंग को मुँह में लिया। फिर मैंने प्रिया को लिटाया, और माँ उसके स्तनों को चूम रही थीं। हमारा त्रिकोणीय मिलन भावनाओं से भरा था, हर स्पर्श में प्रेम और वर्जना का मिश्रण। मैं बारी-बारी दोनों के अंदर गया, और हम सब एक साथ चरम पर पहुँचे।

उस रात, हम एक बिस्तर पर लेटे थे, साँसें मिली हुईं। माँ की उँगलियाँ मेरी पीठ पर फिर रही थीं, और प्रिया का सिर मेरी छाती पर। ये पल शांत था, लेकिन अंदर तूफान था।

कुछ दिन बाद, प्रिया का पति लौटने वाला था, लेकिन हमारे बीच का बंधन मजबूत हो गया था। एक शाम, बारिश में हम फिर करीब आए। माँ ने मुझे चूमा, प्रिया ने सहलाया, और हमारा मिलन और गहरा हुआ।

हर बार नया अनुभव था, कभी धीमा प्यार, कभी तीव्र जुनून। माँ की आँखों में संतुष्टि थी, प्रिया की मुस्कान में खुशी। हम जानते थे ये गुप्त रहेगा, लेकिन ये हमारा सच था।

रात गहराई, और हम लिपटे रहे