शादी के बाद की आग
सुबह की धूप बालकनी में फैली हुई थी, और मैं अपनी चाय की प्याली थामे बैठी थी। आज का दिन बिल्कुल सामान्य लग रहा था, जैसे हर रोज की तरह। अमित ऑफिस के लिए तैयार हो चुका था, और मैंने उसे अलविदा कहते हुए दरवाजा बंद किया। घर की दिनचर्या शुरू हो गई थी—रसोई साफ करना, थोड़ी देर किताब पढ़ना, और शाम को अमित के आने का इंतजार।
मैं प्रिया हूं, अट्ठाईस साल की, और अमित से शादी को दो साल हो चुके हैं। हमारी शादी परिवार की पसंद से हुई थी, लेकिन समय के साथ हम एक-दूसरे के आदी हो गए। अमित एक अच्छा इंसान है, सॉफ्टवेयर इंजीनियर, जो हमेशा मेरी छोटी-छोटी खुशियों का ख्याल रखता है। हम दिल्ली के एक छोटे से अपार्टमेंट में रहते हैं, जहां हर शाम हम साथ में डिनर करते हैं और फिल्में देखते हैं।
मेरा बैकग्राउंड ज्यादा जटिल नहीं है। कॉलेज में मैंने कॉमर्स की पढ़ाई की, और अब घर से ही फ्रीलांस ग्राफिक डिजाइन का काम करती हूं। परिवार मुंबई में है, लेकिन शादी के बाद दिल्ली आ गई। जीवन स्थिर लगता है, लेकिन कभी-कभी पुरानी यादें मन को छू जाती हैं। आज भी, चाय पीते हुए, मैंने फोन उठाया और सोशल मीडिया स्क्रॉल करने लगी।
अचानक एक नोटिफिकेशन आया—राहुल ने मुझे मैसेज किया था। राहुल, मेरा कॉलेज का दोस्त, वही जिसके साथ वो दिन गुजारे थे जब सब कुछ नया और रोमांचक लगता था। हमने कभी रिश्ता नहीं बनाया, लेकिन वो करीबी दोस्त था। मैसेज में लिखा था, "कैसी हो प्रिया? लंबे समय बाद। दिल्ली में हूं, मिल सकती हो?" मैंने हिचकिचाते हुए रिप्लाई किया, "हां, ठीक हूं। कब?"
अगले दिन हम एक कैफे में मिले। राहुल वैसा ही लग रहा था—लंबा, मुस्कुराता हुआ, लेकिन अब थोड़ा मैच्योर। हमने कॉलेज की यादें ताजा कीं, हंसे, और समय कैसे बीत गया पता नहीं चला। अमित के बारे में मैंने बताया, और उसने अपनी जॉब के बारे में। मिलकर अच्छा लगा, लेकिन घर लौटते हुए मन में एक अजीब सी बैचेनी थी। क्या ये सिर्फ दोस्ती थी?
कुछ दिन बाद राहुल का फिर मैसेज आया। वो दिल्ली में कुछ महीनों के लिए आया था, प्रोजेक्ट पर। हम फिर मिले, इस बार पार्क में। बातें करते-करते उसने कहा, "प्रिया, तुम वैसी ही हो। शादी ने तुम्हें नहीं बदला।" मैंने मुस्कुराकर टाल दिया, लेकिन उसकी नजरों में कुछ था जो मुझे असहज कर रहा था। अमित घर पर था, लेकिन मेरे मन में राहुल की बातें घूम रही थीं।
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शादी के बाद जीवन में सब कुछ सेटल लगता है, लेकिन कभी-कभी पुरानी भावनाएं जाग जाती हैं। अमित के साथ रातें अच्छी होती हैं, लेकिन राहुल के साथ वो कॉलेज के दिन याद आते हैं जब सब कुछ बिना जिम्मेदारियों के था। मैं खुद से लड़ रही थी—क्यों ये विचार आ रहे हैं? लेकिन राहुल से बात करना बंद नहीं कर पाई।
एक शाम अमित ऑफिस ट्रिप पर गया था। राहुल ने कॉल किया, "अकेली हो? आऊं?" मैंने हां कह दिया। वो घर आया, और हम सोफे पर बैठकर बातें करने लगे। उसकी आंखों में वो पुरानी चमक थी। मैंने कहा, "राहुल, अब मैं शादीशुदा हूं।" उसने जवाब दिया, "जानता हूं, लेकिन क्या तुम खुश हो?" उसका सवाल मुझे चुभ गया।
बातों के बीच उसने मेरा हाथ थामा। मैंने छुड़ाया नहीं। मन में संघर्ष था—अमित के प्रति वफादारी, लेकिन राहुल के प्रति वो पुरानी 끌ाव। धीरे-धीरे वो पास आया, और मैंने विरोध नहीं किया। उसकी सांसें मेरे चेहरे पर महसूस हो रही थीं। मैंने सोचा, क्या ये गलत है? लेकिन शरीर ने जवाब दे दिया।
हम बेडरूम में पहुंचे। राहुल ने मुझे धीरे से बाहों में लिया, और मैंने अपनी आंखें बंद कर लीं। उसके होंठ मेरे होंठों पर थे, नरम और परिचित। मैंने महसूस किया कि ये वो एहसास है जो सालों से दबा हुआ था। उसके हाथ मेरे शरीर पर घूम रहे थे, और मैं खुद को रोक नहीं पाई।
उस रात हमने वो सब किया जो कभी सोचा नहीं था। राहुल का स्पर्श अलग था—उतावला, लेकिन भावुक। मैंने उसके शरीर को छुआ, और मन में एक नई ऊर्जा महसूस की। अमित के साथ सब कुछ रूटीन था, लेकिन यहां हर पल नया लग रहा था। हम एक-दूसरे में खो गए, और समय थम सा गया।
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सुबह होने पर राहुल चला गया। मैं बिस्तर पर लेटी सोच रही थी—क्या ये सिर्फ एक रात थी? लेकिन मन में अपराधबोध था। अमित को कॉल किया, उसकी आवाज सुनकर सब सामान्य लगने लगा। लेकिन राहुल का मैसेज आया, "कल फिर?" मैंने हां कह दिया। अब ये छुपा हुआ रिश्ता बन गया था।
अगली मुलाकात में हम और करीब आए। राहुल ने कहा, "प्रिया, मैं तुम्हें कभी भूल नहीं पाया।" मैंने जवाब दिया, "मैं भी नहीं, लेकिन अमित..." वो चुप करा दिया। उसके चुंबन गहरे थे, और मैंने खुद को पूरी तरह सौंप दिया। उसके शरीर की गर्मी, वो ताकत—सब कुछ मुझे狂 बना रहा था।
हर मिलन में नई भावनाएं जुड़ती गईं। एक बार हमने पार्क के पास एक होटल में समय बिताया। वहां राहुल ने मुझे धीरे-धीरे कपड़े उतारते हुए देखा, और मैंने शर्म से आंखें झुका लीं। लेकिन उसके स्पर्श ने सब भुला दिया। मैंने उसके लिंग को छुआ, और वो एहसास अवर्णनीय था—कठोर, लेकिन मेरे लिए बना हुआ।
उस रात हमने घंटों एक-दूसरे को एक्सप्लोर किया। राहुल ने मेरे शरीर के हर हिस्से को चूमा, और मैंने उसके साथ वो सब ट्राई किया जो अमित के साथ कभी नहीं किया। मन में कन्फ्लिक्ट था, लेकिन शरीर की चाहत जीत रही थी। मैं खुद से कहती, ये आखिरी बार है, लेकिन हर बार लौट आती।
एक शाम अमित घर जल्दी आ गया। मैं राहुल के साथ थी, लेकिन किसी तरह मैनेज किया। दिल धड़क रहा था। राहुल ने कहा, "प्रिया, हमें रुकना चाहिए।" लेकिन मैंने मना कर दिया। अब ये आदत बन गई थी—उसकी बाहों में सुकून मिलता था। उसके साथ हर पल भावनात्मक था, जैसे पुरानी आग फिर जल उठी हो।
फिर एक दिन हमने प्लान बनाया—अमित के ट्रिप के दौरान पूरा वीकेंड साथ। राहुल घर आया, और हमने दरवाजा बंद कर लिया। शुरुआत बातों से हुई, लेकिन जल्दी ही हम बिस्तर पर थे। उसके हाथ मेरे स्तनों पर थे, नरम लेकिन दबाव भरे। मैंने कराहते हुए कहा, "राहुल, और..."
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उसने मुझे उल्टा किया, और पीछे से प्रवेश किया। वो दर्द और सुख का मिश्रण था। मैंने महसूस किया उसके लिंग की पूरी लंबाई, वो ताकत जो मुझे भर रही थी। हमारा पसीना मिल रहा था, और सांसें तेज। हर धक्के के साथ मैं चरम पर पहुंच रही थी। राहुल ने फुसफुसाते हुए कहा, "तुम मेरी हो, प्रिया।"
उस रात हमने कई बार प्यार किया। कभी धीरे, कभी तेज। उसके मुंह से मेरे शरीर के हर हिस्से को चूसते हुए, मैंने खुद को पूरी तरह खो दिया। मन में अमित की छवि आती, लेकिन राहुल की गर्मी सब धुंधला कर देती। ये नशा था, जो मुझे बार-बार खींचता।
सुबह हम नाश्ता करते हुए बातें कर रहे थे। राहुल ने कहा, "क्या हम ये जारी रख सकते हैं?" मैंने जवाब नहीं दिया, लेकिन मन जानता था हां। शाम को फिर हम एक हो गए। इस बार मैं ऊपर थी, उसके लिंग पर सवार। वो एहसास—नियंत्रण, शक्ति—मुझे और उत्तेजित कर रहा था।
हमारी सांसें मिलीं, और मैंने महसूस किया वो चरम—गहरा, भावुक। राहुल के हाथ मेरी कमर पर थे, और मैं तेजी से हिल रही थी। हर पल में नई संवेदना, जैसे शरीर की भाषा बोल रही हो।
अब ये रिश्ता गहरा हो गया था। अमित के साथ जीवन सामान्य चल रहा था, लेकिन राहुल के साथ वो छुपी दुनिया थी। एक और मिलन में हमने शावर में ट्राई किया। पानी की बूंदें हमारे शरीर पर गिर रही थीं, और राहुल ने मुझे दीवार से सटा लिया। उसका लिंग मेरे अंदर था, गीला और फिसलन भरा।
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मैंने कराहा, "राहुल, मत रुको।" वो और तेज हुआ, और हम दोनों एक साथ चरम पर पहुंचे। वो पानी, वो गर्मी—सब कुछ अविस्मरणीय था। मन में डर था कि कब तक ये चलेगा, लेकिन अभी तो ये सुख ही सब कुछ था।
फिर एक रात अमित देर से आया। मैं राहुल को विदा कर चुकी थी। लेकिन उसके जाने के बाद भी उसकी खुशबू कमरे में थी। मैं बिस्तर पर लेटी सोच रही थी—क्या ये प्यार है या सिर्फ चाहत? लेकिन जवाब मिलना मुश्किल था।
अगली मुलाकात अप्रत्याशित थी। राहुल ने मुझे उसके अपार्टमेंट में बुलाया। वहां हमने पूरे दिन साथ बिताया। दोपहर में हम फिर करीब आए। इस बार राहुल ने मुझे बांधा, हल्के से, और मैंने खुद को उसके हवाले कर दिया। उसके चुंबन मेरे गर्दन पर, फिर नीचे।
जब उसने मेरे अंदर प्रवेश किया, वो धीमा था, लेकिन गहरा। मैंने महसूस किया हर इंच, वो मोटाई जो मुझे भर रही थी। हमारा मिलन लंबा चला, भावनाओं से भरा। राहुल ने कहा, "प्रिया, मैं तुम्हें खोना नहीं चाहता।"
उस रात हम सोए नहीं। बार-बार एक-दूसरे को छुआ, प्यार किया। कभी मिशनरी, कभी साइड से। हर बार नया अनुभव—कभी दर्द, कभी शुद्ध सुख। मेरे मन में अब अमित से दूरी बढ़ रही थी, लेकिन राहुल की निकटता सब कुछ सही लग रही थी।
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समय बीतता गया, और हमारा रिश्ता और गहरा होता गया। एक शाम हम ड्राइव पर गए, और कार में ही हम करीब आए। राहुल ने सीट पीछे की, और मैं उसके ऊपर बैठ गई। उसका लिंग मेरे अंदर फिसला, और हम हिलते रहे। बाहर की दुनिया से दूर, सिर्फ हम।
वो चरम इतना तीव्र था कि मैं चीख पड़ी। राहुल ने मुझे चुप कराया, लेकिन वो मुस्कान बता रही थी सब। घर लौटकर मैंने अमित से झूठ बोला, लेकिन अपराधबोध कम हो रहा था। अब राहुल ही मेरी दुनिया था।
अंतिम मिलन यादगार था। अमित फिर ट्रिप पर था। राहुल आया, और हमने पूरी रात साथ बिताई। शुरुआत चुंबनों से, फिर धीरे-धीरे सब। उसके हाथ मेरे शरीर पर नाच रहे थे, और मैंने उसके लिंग को मुंह में लिया। वो स्वाद, वो गर्मी—मैं और उत्तेजित हो गई।
फिर वो मेरे अंदर आया, तेज और जोरदार। हमारा मिलन जैसे आग की तरह जल रहा था। हर धक्के के साथ मैं महसूस कर रही थी वो मज़ा, वो सुख जो शादी के बाद मिला था। राहुल की सांसें मेरी सांसों में मिलीं, और हम एक हो गए।