ननद की शादी में छिपी आग

सुबह की धूप कमरे में धीरे-धीरे फैल रही थी, और मैं अपनी अलमारी से साड़ियां निकालकर बिस्तर पर फैला रही थी। आज घर में हलचल थी, लेकिन अभी सब कुछ शांत लग रहा था। मैं रिया हूं, अमित की पत्नी, और हमारी छोटी सी फैमिली में प्रिया की शादी की तैयारियां जोरों पर थीं। प्रिया मेरी ननद है, अमित की छोटी बहन, और उसकी शादी का दिन बस कुछ ही हफ्तों दूर था। मैं रोज की तरह चाय बनाकर अमित को जगाने वाली थी, लेकिन आज वो खुद ही जल्दी उठ गया था, काम पर जाने की जल्दी में।

घर दिल्ली के एक व्यस्त इलाके में है, जहां सुबह-सुबह गलियों में सब्जी वाले की आवाजें गूंजती हैं। मैंने किचन में जाकर गैस जलाई और चाय की केतली चढ़ा दी। प्रिया अभी सो रही थी, शायद रात देर तक दोस्तों से बातें करती रही होगी। अमित का छोटा भाई विक्रम भी कल रात ही आया था, गांव से, शादी की मदद करने। वो हमेशा से ही घर का चहेता रहा है, लेकिन मैंने कभी उस पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया। आज का दिन सामान्य था, बस शादी के लिए कुछ खरीदारी करनी थी।

नाश्ता बनाते हुए मैंने सोचा कि कितना अच्छा लगता है ये पारिवारिक माहौल। अमित और मैं पिछले पांच साल से शादीशुदा हैं, और प्रिया हमेशा मेरी छोटी बहन जैसी रही है। वो कॉलेज में पढ़ती है, और उसका होने वाला पति राहुल एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर है। शादी का फंक्शन हमारे घर से थोड़ी दूर एक बड़े हॉल में होना था। मैंने चाय की ट्रे उठाई और लिविंग रूम में रख दी, जहां अमित अखबार पढ़ रहा था। "चाय पी लो, अमित," मैंने कहा, और वो मुस्कुराकर बोला, "धन्यवाद, रिया। आज प्रिया को जगाओ, वो लेट हो रही है।"

प्रिया को जगाने मैं उसके कमरे में गई। वो बिस्तर पर लेटी हुई थी, और उसके चेहरे पर शादी की उत्सुकता साफ झलक रही थी। "उठो, प्रिया। आज हमें बाजार जाना है, तेरी साड़ियां देखनी हैं," मैंने हल्के से उसका कंधा हिलाते हुए कहा। वो आंखें मलते हुए उठी और बोली, "दीदी, बस पांच मिनट और। विक्रम भैया आए हैं न? उनसे कहो न मदद करें।" मैं हंस पड़ी। विक्रम नीचे सोफे पर बैठा था, अपना फोन देखते हुए। वो 26 साल का है, अमित से दो साल छोटा, और गांव में अपनी छोटी सी दुकान चलाता है।

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दिन भर हम शादी की तैयारियों में लगे रहे। शाम को विक्रम ने कहा कि वो मुझे और प्रिया को बाजार ले जाएगा। अमित ऑफिस से लेट आता था, तो मैंने हामी भर दी। कार में बैठते हुए विक्रम ने पूछा, "भाभी, आपको क्या-क्या चाहिए?" मैंने कहा, "बस प्रिया की चीजें, और थोड़ी सजावट का सामान।" बाजार में घूमते हुए प्रिया आगे-आगे चल रही थी, और विक्रम मेरे साथ। वो कभी-कभी मेरी तरफ देखता, लेकिन मैंने इसे सामान्य समझा।

रात को डिनर के बाद सब थककर सोने चले गए। मैं और अमित अपने कमरे में थे। अमित जल्दी सो गया, लेकिन मुझे नींद नहीं आ रही थी। मैं बालकनी में खड़ी होकर बाहर की रोशनी देख रही थी। तभी विक्रम नीचे से आया, शायद पानी पीने। "भाभी, सोई नहीं?" उसने पूछा। मैंने कहा, "नहीं, बस ऐसे ही। तू जा सो जा।" लेकिन वो रुक गया, और हम थोड़ी देर बातें करने लगे। शादी की तैयारियों के बारे में, पुरानी यादों के बारे में। उसकी आवाज में एक अजीब सी गर्माहट थी, लेकिन मैंने अनदेखा कर दिया।

अगले कुछ दिन ऐसे ही बीते। शादी का दिन करीब आ रहा था, और घर में मेहमान आने लगे। विक्रम अब ज्यादा समय मेरे आसपास रहता था। एक दिन किचन में मैं खाना बना रही थी, और वो मदद करने आया। उसका हाथ मेरे हाथ से छू गया, अनजाने में। मैं चौंक गई, लेकिन कुछ नहीं कहा। मेरे मन में एक अजीब सी हलचल हुई, लेकिन मैंने खुद को समझाया कि ये सिर्फ थकान है। अमित व्यस्त था, और हमारा रिश्ता हमेशा की तरह सामान्य था।

शादी से एक दिन पहले, शाम को घर में संगीत का प्रोग्राम था। सब नाच रहे थे, गा रहे थे। मैं प्रिया के साथ डांस कर रही थी, जब विक्रम ने मुझे जॉइन किया। उसकी नजरें मेरी आंखों में थीं, और मैंने महसूस किया कि वो कुछ कहना चाहता है। रात देर तक पार्टी चली, और सब थककर सो गए। मैं अपने कमरे में थी, अमित सो चुका था। तभी दरवाजे पर हल्की सी खटखट हुई। मैंने खोला तो विक्रम खड़ा था। "भाभी, बात करनी है," उसने धीरे से कहा।

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मैं बाहर आई, और हम बालकनी में खड़े हो गए। वो बोला, "भाभी, मैं लंबे समय से तुम्हें पसंद करता हूं। अमित भैया अच्छे हैं, लेकिन मैं खुद को रोक नहीं पा रहा।" मेरे दिल की धड़कन तेज हो गई। मैंने कहा, "विक्रम, ये गलत है। मैं तेरी भाभी हूं।" लेकिन उसकी आंखों में एक दर्द था, एक चाहत। मैंने खुद को रोका, लेकिन मेरे मन में भी कुछ हलचल थी। अमित के साथ सब ठीक था, लेकिन विक्रम की ये बातें मुझे अंदर से हिला रही थीं।

शादी का दिन आ गया। सुबह से हलचल थी। प्रिया तैयार हो रही थी, और मैं उसकी मदद कर रही थी। विक्रम भी इधर-उधर भाग रहा था। हॉल में फंक्शन शुरू हुआ। मैंने लाल साड़ी पहनी थी, और अमित ने तारीफ की। लेकिन विक्रम की नजरें मुझ पर टिकी हुई थीं। शाम को जब फेरे हो रहे थे, मैं एक कोने में खड़ी थी। विक्रम पास आया और बोला, "भाभी, मिलना है। पीछे के कमरे में।" मैंने मना किया, लेकिन मेरे पैर खुद-ब-खुद चल पड़े।

पीछे का कमरा अंधेरा था, सिर्फ बाहर की रोशनी आ रही थी। विक्रम ने दरवाजा बंद किया और मुझे दीवार से सटा लिया। "विक्रम, नहीं," मैंने कहा, लेकिन मेरी आवाज कमजोर थी। उसने मेरे होंठों पर अपने होंठ रख दिए। वो चुंबन इतना गहरा था कि मैं खुद को रोक नहीं पाई। मेरे शरीर में एक आग सी लग गई। उसकी उंगलियां मेरी कमर पर फिसल रही थीं, और मैंने अपनी आंखें बंद कर लीं। बाहर शादी की आवाजें आ रही थीं, लेकिन यहां सब कुछ रुक सा गया था।

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विक्रम ने मेरी साड़ी का पल्लू सरका दिया, और उसके हाथ मेरे ब्लाउज पर पहुंचे। मैंने विरोध किया, लेकिन मेरे मन में एक संघर्ष था। अमित का चेहरा आया, लेकिन विक्रम की गर्म सांसें मुझे पिघला रही थीं। उसने मुझे बिस्तर पर लिटा दिया, और धीरे-धीरे मेरे कपड़े उतारने लगा। मेरी सांसें तेज थीं, और मैंने खुद को उसके हवाले कर दिया। उसका स्पर्श नया था, उत्तेजक। वो मेरे शरीर पर चुंबन कर रहा था, हर हिस्से को छूते हुए।

मैंने महसूस किया कि ये पल कितना गलत है, लेकिन कितना जीवंत। विक्रम की आंखों में प्यार था, या शायद सिर्फ वासना। उसने मेरे पैर फैलाए और खुद को मेरे ऊपर रखा। वो पल जब वो मेरे अंदर आया, मैं दर्द और सुख के बीच झूल रही थी। मेरी आह निकली, लेकिन बाहर की आवाजों ने उसे दबा दिया। हम दोनों का शरीर एक लय में चल रहा था, पसीने से भीगे हुए। मैंने अपनी उंगलियां उसकी पीठ में गड़ा दीं, और वो और तेज हो गया।

कुछ देर बाद हम अलग हुए, सांसें फूल रही थीं। लेकिन विक्रम रुका नहीं। उसने मुझे घुमाया और पीछे से पकड़ लिया। ये अनुभव अलग था, ज्यादा गहरा। मैंने अपनी आंखें बंद कीं और खुद को बहने दिया। मेरे मन में अपराधबोध था, लेकिन वो सुख उसे दबा रहा था। विक्रम की हर हरकत में एक नई भावना थी, जैसे वो मुझे पहली बार जान रहा हो।

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बाहर प्रिया के फेरे खत्म हो चुके थे, और लोग तालियां बजा रहे थे। हम जल्दी से कपड़े ठीक करके बाहर आए। मैंने अमित को देखा, वो खुश था। लेकिन मेरे अंदर एक तूफान था। रात को विदाई हुई, और प्रिया चली गई। घर लौटते हुए विक्रम मेरे पास बैठा था, लेकिन हम कुछ नहीं बोले।

अगली रात, अमित सो गया था। विक्रम फिर आया। इस बार कोई बात नहीं हुई, बस हम एक-दूसरे में खो गए। उसने मुझे बिस्तर पर लिटाया और मेरे शरीर को फिर से खोजा। हर स्पर्श में नयापन था, जैसे पहली बार नहीं बल्कि एक नई कहानी। मैंने खुद को रोका नहीं, बस महसूस किया। वो पल जब हम चरम पर पहुंचे, मैंने अपनी आह दबाई।

सुबह हुई, और विक्रम गांव लौटने वाला था। हमने अलविदा कहा, लेकिन आंखों में वो राज था। मैं अमित के साथ सामान्य जीवन में लौट आई, लेकिन वो पल मेरे अंदर जिंदा थे।

कुछ महीने बाद, एक दिन विक्रम फिर आया। अमित घर पर नहीं था। हमने बात की, और फिर वही हुआ। इस बार ज्यादा भावनात्मक था, जैसे हम दोनों जानते थे कि ये गलत है लेकिन रोक नहीं पा रहे। उसकी उंगलियां मेरी त्वचा पर नाच रही थीं, और मैंने खुद को पूरी तरह सौंप दिया।

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वो शाम हम बालकनी में खड़े थे, और विक्रम ने मुझे गले लगाया। उसका स्पर्श अब परिचित था, लेकिन हर बार नया लगता था। हम कमरे में गए, और इस बार धीरे-धीरे सब हुआ। मैंने उसके शरीर को छुआ, और वो मेरे। सुख की लहरें आईं, और हम खो गए।

अब ये हमारा राज था। शादी के बाद भी, वो पल हमें बांधे हुए थे। मैं जानती हूं कि ये गलत है, लेकिन वो आग अभी भी जल रही है।