ननद की शादी में छिपी चाहतें
सुबह की पहली किरण कमरे में धीरे-धीरे फैल रही थी, जब मैंने आँखें खोलीं। बाहर से पक्षियों की चहचहाहट आ रही थी, और घर में शादी की तैयारियों की हल्की-हल्की सरगोशियाँ सुनाई दे रही थीं। मैं बिस्तर पर लेटी हुई थी, और रोज़ की तरह सबसे पहले अपने फोन पर समय देखा—साढ़े छह बज रहे थे। आज प्रिया की शादी का दिन था, मेरी ननद की, और पूरा घर उत्सव के रंग में रंगा हुआ लग रहा था।
मैं उठकर बाथरूम की ओर चली, चेहरे पर ठंडा पानी डाला और खुद को आईने में देखा। नेहा, तू तैयार हो जा, आज का दिन लंबा होने वाला है, मैंने मन ही मन सोचा। राहुल, मेरा पति, अभी भी सो रहा था, उसकी साँसें नियमित रूप से चल रही थीं। हमारी शादी को पाँच साल हो चुके थे, और प्रिया की शादी हमारे परिवार के लिए एक बड़ा मौका थी। मैंने जल्दी से नहाया और अपनी साड़ी चुन ली—एक हल्की हरी साड़ी, जो शादी के माहौल में फिट बैठती।
नीचे रसोई में माँ जी पहले से ही चाय बना रही थीं। "बहू, आ गईं? आज प्रिया की विदाई है, सब कुछ परफेक्ट होना चाहिए," उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा। मैंने हामी भरी और चाय का कप थामा। प्रिया ऊपर अपने कमरे में तैयार हो रही थी, और घर में रिश्तेदारों की भीड़ लगी हुई थी। राहुल का परिवार बड़ा था, और शादी दिल्ली के एक बड़े बैंक्वेट हॉल में होनी थी। मैंने सोचा, कितना अच्छा लगता है जब परिवार इकट्ठा होता है, सारी पुरानी यादें ताज़ा हो जाती हैं।
नाश्ता करते हुए मैंने प्रिया को फोन किया। "दीदी, सब ठीक है न? मैं इतनी नर्वस हूँ," उसकी आवाज़ में उत्साह और घबराहट दोनों थे। मैंने हँसकर कहा, "सब बढ़िया है, तू बस खुश रह। हम सब तेरे साथ हैं।" प्रिया मेरी ननद थी, लेकिन हमारी दोस्ती बहनों जैसी थी। वह 25 साल की थी, और उसकी शादी अमित से हो रही थी, जो एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर था। अमित का परिवार भी अच्छा था, और उनका भाई विक्रम कल रात ही आया था। विक्रम को मैं पहली बार मिली थी, लेकिन उसकी बातों से लगता था कि वह काफी मिलनसार है।
घर से निकलते वक्त राहुल ने मुझे गले लगाया। "तुम आज बहुत सुंदर लग रही हो, नेहा," उसने कहा। मैंने मुस्कुरा दिया, लेकिन मन में एक हल्की सी उदासी थी। हमारी शादी के बाद जीवन रूटीन में बँध गया था—राहुल की नौकरी, मेरा अपना छोटा सा बुटीक, और घर की जिम्मेदारियाँ। कभी-कभी लगता था कि वो शुरुआती जुनून कहीं खो गया है। लेकिन आज का दिन खुशी का था, मैंने खुद को झिड़का और कार में बैठ गई।
इसे भी पढ़ें: ननद की शादी में छिपी आग
बैंक्वेट हॉल पहुँचते ही हलचल बढ़ गई। सजावट देखकर मन प्रसन्न हो गया—फूलों की मालाएँ, रंग-बिरंगी लाइटें, और मंडप की चमक। प्रिया की सहेलियाँ उसे घेरे हुए थीं, और अमित के परिवार वाले स्वागत कर रहे थे। मैंने विक्रम को देखा, वह अमित के पास खड़ा हँस रहा था। विक्रम लंबा-चौड़ा था, उसकी आँखों में एक चमक थी जो ध्यान खींचती थी। "हैलो भाभी, मैं विक्रम, अमित का छोटा भाई," उसने हाथ मिलाते हुए कहा। मैंने मुस्कुराकर जवाब दिया, "हैलो, प्रिया ने तुम्हारे बारे में बताया था।"
शादी की रस्में शुरू हुईं। मैं प्रिया के पास बैठी थी, उसकी मदद कर रही थी। राहुल व्यस्त था, मेहमानों से मिल रहा था। बीच-बीच में मेरी नज़र विक्रम पर पड़ती, वह कभी अमित को चिढ़ाता, कभी कैमरा संभालता। दोपहर का खाना परोसा गया, और हम सब एक टेबल पर बैठे। विक्रम मेरे बगल में आ गया। "भाभी, दिल्ली में रहती हो? मैं मुंबई से हूँ, लेकिन अब यहाँ शिफ्ट होने वाला हूँ," उसने बात शुरू की। मैंने बताया कि हाँ, मैं अपना बुटीक चलाती हूँ। बातें चलती रहीं, और मुझे लगा कि वह काफी दिलचस्प है—उसकी कहानियाँ, उसका हास्य।
शाम ढलने लगी, और जयमाला की रस्म हो रही थी। प्रिया और अमित एक-दूसरे को माला पहना रहे थे, और सब तालियाँ बजा रहे थे। मैं भी खुश थी, लेकिन अंदर एक अजीब सी बैचेनी थी। राहुल फोन पर व्यस्त था, कोई काम का कॉल आ गया था। विक्रम पास आया, "भाभी, डांस फ्लोर पर चलें? प्रिया ने कहा है कि सबको जोइन करना है।" मैंने हिचकिचाते हुए हाँ कहा। संगीत बज रहा था, और हम डांस करने लगे। उसकी मौजूदगी में कुछ अलग सा लग रहा था, जैसे कोई पुरानी याद जाग रही हो।
इसे भी पढ़ें: शादी के बाद की चाहत
डांस के दौरान विक्रम का हाथ मेरी कमर पर छुआ, लेकिन वह गलती से लगा। मैंने पीछे हटने की कोशिश की, लेकिन भीड़ में हम करीब आ गए। उसकी आँखों में एक गहराई थी, जो मुझे असहज कर रही थी। "सॉरी, भाभी," उसने कहा, लेकिन उसकी मुस्कान में कुछ और था। मैंने मन में सोचा, यह क्या हो रहा है? मैं शादीशुदा हूँ, राहुल मेरा पति है। लेकिन वो पल, वो स्पर्श, मुझे कुछ याद दिला रहा था—शादी से पहले की वो आज़ादी, वो उत्साह।
रात गहराने लगी, और विदाई की रस्म हो रही थी। प्रिया रो रही थी, माँ जी उसे गले लगा रही थीं। मैं भी भावुक हो गई, उसकी विदाई देखकर। राहुल कार की चाबी ढूँढ रहा था, और विक्रम अमित की मदद कर रहा था। विदाई के बाद हम होटल की ओर चले, जहाँ कुछ रिश्तेदार रुके हुए थे। मैं थक गई थी, लेकिन नींद नहीं आ रही थी। कमरे में राहुल सो गया, लेकिन मैं बालकनी में खड़ी बाहर देख रही थी। तभी दरवाजे पर हल्की सी दस्तक हुई।
मैंने दरवाजा खोला, विक्रम खड़ा था। "भाभी, अमित ने कुछ सामान भेजा है, प्रिया का," उसने कहा। मैंने उसे अंदर बुलाया, और वह सामान रखने लगा। कमरे में अकेले हम दोनों थे, राहुल गहरी नींद में था। विक्रम की नज़र मुझ पर टिकी थी, और मैंने महसूस किया कि मेरी साँसें तेज़ हो रही थीं। "तुम ठीक हो, भाभी?" उसने पूछा। मैंने हामी भरी, लेकिन मेरे मन में संघर्ष चल रहा था। यह गलत है, लेकिन यह एहसास इतना मजबूत क्यों लग रहा है?
विक्रम करीब आया, और उसने मेरी आँखों में देखा। "नेहा, मैं जानता हूँ यह अजीब है, लेकिन कल से ही मैं तुम्हें देख रहा हूँ। तुममें कुछ है जो मुझे खींच रहा है," उसने धीरे से कहा। मैं स्तब्ध थी, मेरे होंठ काँप रहे थे। "विक्रम, यह नहीं हो सकता। मैं शादीशुदा हूँ," मैंने कहा, लेकिन मेरी आवाज़ कमज़ोर थी। उसने मेरा हाथ पकड़ा, और उस स्पर्श में बिजली सी दौड़ गई। मैंने खुद को रोका, लेकिन शरीर साथ नहीं दे रहा था।
इसे भी पढ़ें: शादी के बाद की चाहत
हम बालकनी में चले गए, जहाँ हवा ठंडी थी। विक्रम ने मुझे दीवार से सटा लिया, और उसके होंठ मेरे करीब आए। मैंने विरोध किया, लेकिन अंदर की आग भड़क रही थी। उसका चुंबन गहरा था, जैसे सालों की प्यास बुझ रही हो। मेरी साड़ी का पल्लू सरक गया, और उसके हाथ मेरी कमर पर फिसलने लगे। मैंने सोचा, राहुल सो रहा है, क्या वह जाग जाएगा? लेकिन वो पल इतना तीव्र था कि सब भूल गई।
विक्रम ने मुझे गोद में उठाया और कमरे के एक कोने में ले गया, जहाँ एक सोफा था। उसने मेरी साड़ी उतारनी शुरू की, धीरे-धीरे, जैसे हर पल को जी रहा हो। मेरी त्वचा पर उसकी उँगलियाँ ठंडी लग रही थीं, लेकिन अंदर गर्मी फैल रही थी। "नेहा, तुम कितनी खूबसूरत हो," उसने फुसफुसाया। मैंने अपनी आँखें बंद कर लीं, और उसके शरीर की गर्मी महसूस की। हमारा मिलन धीमा था, भावनाओं से भरा—हर स्पर्श में एक कहानी, हर साँस में एक रहस्य।
उस रात हमने कई बार एक-दूसरे को छुआ, हर बार नया एहसास लेकर। कभी वह मेरे बालों में उँगलियाँ फेरता, कभी मैं उसके सीने पर सिर रखती। डर था, लेकिन उत्साह ज्यादा था। सुबह होने से पहले विक्रम चला गया, और मैं बिस्तर पर लेट गई। राहुल अभी भी सो रहा था, अनजान। मन में अपराध बोध था, लेकिन एक नई ऊर्जा भी।
अगले दिन सब सामान्य लग रहा था। प्रिया और अमित हनीमून पर चले गए, और विक्रम भी मुंबई लौटने वाला था। एयरपोर्ट पर विदाई के समय उसकी नज़र मुझसे मिली, और हम दोनों ने चुपचाप मुस्कुराया। "अलविदा, नेहा," उसने कहा। मैंने कुछ नहीं कहा, बस मन में सोचा कि यह एक रात थी, लेकिन इसने मुझे खुद से मिलवाया।
इसे भी पढ़ें: शादी की रात की छिपी चाहत
घर लौटकर मैंने राहुल से बात की, सामान्य बातें। लेकिन अंदर कुछ बदल गया था। शाम को मैं बालकनी में खड़ी थी, हवा मेरे चेहरे को छू रही थी। विक्रम का मैसेज आया, "याद आ रही हो।" मैंने जवाब नहीं दिया, लेकिन मुस्कुरा दी। जीवन में कभी-कभी ऐसे पल आते हैं जो सब कुछ बदल देते हैं, और मैं अभी उस बदलाव को महसूस कर रही थी।
कुछ दिन बाद विक्रम दिल्ली आया, काम के सिलसिले में। उसने मुझे फोन किया, और हम मिले एक कैफे में। बातें फिर वहीँ पहुँच गईं, और हम एक होटल में चले गए। इस बार कोई हिचक नहीं थी, बस शुद्ध जुनून। उसके हाथ मेरे शरीर पर घूमते, और मैं हर पल को जी रही थी। "नेहा, यह गलत है, लेकिन सही लगता है," उसने कहा। मैंने सहमति में सिर हिलाया, और हम फिर एक हो गए।
हर मिलन में नई गहराई आती। कभी हम बातें करते, अपनी ज़िंदगियों के बारे में, कभी बस चुपचाप एक-दूसरे को देखते। राहुल को शक नहीं हुआ, वह व्यस्त रहता। लेकिन मेरे मन में संघर्ष बढ़ता गया—यह प्यार है या सिर्फ आकर्षण? विक्रम ने कहा, "मैं तुम्हें छोड़ नहीं सकता।" मैंने सोचा, क्या मैं अपनी शादी तोड़ दूँ?
इसे भी पढ़ें: बहन और ननद की छुपी चाहतें
एक रात हम पार्क में मिले, और बारिश होने लगी। भीगते हुए हमने एक-दूसरे को गले लगाया। उसका स्पर्श अब परिचित था, लेकिन हर बार नया लगता। हम घर लौटे, और रात भर प्यार किया। सुबह मैंने फैसला किया कि यह आखिरी बार है। लेकिन विक्रम की आँखों में दर्द देखकर मैं पिघल गई।
समय बीतता गया, और हमारी मुलाकातें जारी रहीं। हर बार इमोशन्स नए होते—कभी गुस्सा, कभी पछतावा, कभी शुद्ध खुशी। मैं जानती थी कि यह लंबा नहीं चलेगा, लेकिन अभी के लिए, यह मेरा रहस्य था, मेरी चाहत।
आज रात फिर विक्रम आया है, और हम कमरे में हैं। उसकी बाहें मुझे घेरे हुए हैं, और मैं अपनी आँखें बंद करके इस पल में खो गई हूँ।