बड़ी बहन की आग

सुबह की धूप कमरे में धीरे-धीरे फैल रही थी, जब मैं अपनी किताब को टेबल पर रखकर उठा। घर में सब कुछ वैसा ही था जैसा हर रोज़ होता है—माँ रसोई में चाय बना रही थीं, और पापा अखबार पढ़ते हुए तैयार हो रहे थे। मैं राहुल, कॉलेज का आखिरी साल कर रहा हूँ, और रोज़ की तरह आज भी मुझे क्लास के लिए निकलना था। बाहर बारिश की बूँदें अभी-अभी थमी थीं, और हवा में ठंडक घुली हुई थी।

प्रिया दीदी, जो मुझसे तीन साल बड़ी हैं, ऊपर वाले कमरे में सो रही थीं। वो हाल ही में अपनी जॉब से छुट्टी लेकर घर आई थीं, क्योंकि उनकी कंपनी में कुछ प्रोजेक्ट पूरा हो गया था। मैंने सोचा कि शायद आज वो देर तक सोएंगी, लेकिन जैसे ही मैं सीढ़ियाँ चढ़ा, तो देखा कि उनका दरवाज़ा थोड़ा खुला हुआ है। मैंने झाँका नहीं, बस अपनी किताबें समेटने चला गया। घर छोटा सा है, दो मंजिला, और हम दोनों भाई-बहन ऊपर रहते हैं, जबकि माता-पिता नीचे।

नाश्ते की मेज़ पर सब इकट्ठा हुए। माँ ने परांठे परोसे, और पापा ने दिन की खबरों पर बात की। प्रिया दीदी नीचे आईं, उनके बाल बिखरे हुए थे, और वो मुस्कुराते हुए बोलीं, "भाई, आज कॉलेज जल्दी है क्या?" मैंने हाँ में सिर हिलाया, और हमने साथ में चाय पी। वो हमेशा की तरह हँस-हँसकर बातें करती रहीं, जैसे बचपन से करती आई हैं। काम पर जाने से पहले पापा ने कहा कि शाम को देर से आएँगे, और माँ भी किसी रिश्तेदार के घर जा रही थीं।

कॉलेज से लौटकर मैं घर पहुँचा तो शाम हो चुकी थी। दरवाज़ा खुला था, और अंदर से टीवी की आवाज़ आ रही थी। प्रिया दीदी सोफे पर बैठी हुई थीं, एक किताब पढ़ रही थीं। मैंने अपना बैग रखा और किचन में जाकर पानी पिया। "दीदी, क्या कर रही हो?" मैंने पूछा। वो बोलीं, "बस, कुछ पढ़ रही हूँ। तू थक गया होगा, आ, बैठ।" मैं उनके पास सोफे पर बैठ गया, और हमने टीवी पर कोई पुरानी फिल्म लगाई।

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फिल्म देखते-देखते बातें होने लगीं। प्रिया दीदी ने अपनी जॉब की परेशानियाँ बताईं, कैसे बॉस हमेशा दबाव डालता है। मैंने सुना, और अपनी कॉलेज की कहानियाँ शेयर कीं। बाहर अंधेरा घिर आया था, और घर में सिर्फ हम दोनों थे। माँ का फोन आया कि वो रात को ही लौटेंगी। दीदी ने हँसकर कहा, "अब हम दोनों को ही डिनर बनाना पड़ेगा।" हम साथ में किचन में गए, और मैंने सब्ज़ी काटी जबकि वो रोटियाँ सेंक रही थीं।

खाना खाते समय हमारी बातें गहराने लगीं। दीदी ने पूछा कि मेरी कोई गर्लफ्रेंड है या नहीं। मैंने शरमाते हुए ना कहा, और वो हँस पड़ीं। "तू इतना शर्मीला क्यों है, राहुल? मैं तेरी दीदी हूँ, मुझसे तो बता।" उनकी आँखों में एक अजीब सी चमक थी, लेकिन मैंने ज्यादा ध्यान नहीं दिया। खाने के बाद हम फिर सोफे पर बैठे, और फिल्म जारी रही। अब रात हो चुकी थी, और घर में सन्नाटा था।

फिल्म में एक सीन आया जहाँ हीरो और हीरोइन करीब आते हैं। दीदी ने अचानक कहा, "कितना रोमांटिक है ना? कभी तुझे ऐसा महसूस हुआ है?" मैं चुप रहा, लेकिन मेरे मन में कुछ उथल-पुथल हो रही थी। वो मेरे करीब सरक आईं, और उनका हाथ मेरे कंधे पर रखा। "राहुल, तू बड़ा हो गया है। याद है, बचपन में हम साथ खेलते थे?" उनकी आवाज़ नरम थी, और मैंने महसूस किया कि कमरे में गर्मी बढ़ रही है।

मैंने उनकी तरफ देखा। प्रिया दीदी की आँखें मेरी आँखों में झाँक रही थीं। कुछ पल चुप्पी रही, और फिर वो बोलीं, "कभी-कभी अकेलापन बहुत सताता है।" मेरा दिल तेज़ धड़कने लगा। मैं जानता था कि यह गलत है, लेकिन उनकी निकटता कुछ जगा रही थी। मैंने अपना हाथ उनके हाथ पर रखा, और हम दोनों चुपचाप बैठे रहे। बाहर बारिश फिर शुरू हो गई थी, और उसकी आवाज़ कमरे में गूँज रही थी।

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धीरे-धीरे, दीदी ने अपना सिर मेरे कंधे पर टिका दिया। मैंने कुछ नहीं कहा, बस महसूस किया कि उनका शरीर मेरे शरीर से सट रहा है। मेरे मन में संघर्ष था—वो मेरी बड़ी बहन हैं, लेकिन यह एहसास नया था, अनजाना। "दीदी, यह ठीक नहीं है," मैंने धीमी आवाज़ में कहा। वो बोलीं, "शशश, कुछ मत कह। बस यहीं रह।" उनकी साँसें मेरे गाल पर लग रही थीं, और कमरे की रोशनी मद्धम हो गई थी।

फिर अचानक, दीदी ने अपना चेहरा मेरी तरफ घुमाया और हमारे होंठ मिल गए। यह पहला चुंबन था, नरम और अनिश्चित। मैं पीछे हटना चाहता था, लेकिन नहीं हटा। उनकी उँगलियाँ मेरे बालों में फिरने लगीं, और मैंने भी उन्हें कसकर पकड़ लिया। हम दोनों के बीच की दूरी मिट गई, और वह पल अनंत लग रहा था। मन में अपराधबोध था, लेकिन इच्छा उससे ज्यादा मजबूत।

चुंबन गहरा होता गया। दीदी की साँसें तेज़ हो रही थीं, और उन्होंने मेरी शर्ट के बटन खोलने शुरू कर दिए। मैंने विरोध नहीं किया। हम सोफे से उठे और ऊपर वाले कमरे की तरफ चले गए, जहाँ उनका बिस्तर था। दरवाज़ा बंद करते हुए, दीदी ने मुझे दीवार से सटा लिया और फिर से吻 किया। मेरे हाथ उनके कमर पर चले गए, और मैंने महसूस किया कि उनका शरीर गर्म हो रहा है।

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कमरे में सिर्फ हमारी साँसों की आवाज़ थी। दीदी ने अपनी टी-शर्ट उतारी, और मैंने उनकी त्वचा को छुआ। वो नरम थी, गर्म। "राहुल, मुझे छू," उन्होंने फुसफुसाकर कहा। मैंने उनके स्तनों को सहलाया, धीरे-धीरे, और वो कराह उठीं। मेरा मन उलझा हुआ था—यह प्यार था या सिर्फ आकर्षण? लेकिन उस पल में, सब कुछ भूल गया। हम बिस्तर पर लेट गए, और मैंने उनके शरीर को चूमा, हर हिस्से को।

दीदी की आँखें बंद थीं, और उन्होंने मेरे कपड़े उतारे। हम नग्न हो गए, और पहली बार मैंने उनकी चूत को देखा। वो गर्म लग रही थी, तैयार। मैंने अपनी उँगलियाँ वहाँ फिराईं, धीरे-धीरे, और वो सिहर उठीं। "और कर," उन्होंने कहा। मैंने अपनी जीभ से उसे छुआ, चाटा, और उनकी कराहें बढ़ गईं। वो गीली हो रही थीं, और मेरा लंड कड़ा हो चुका था।

फिर मैंने अपना लंड उनकी चूत पर रगड़ा। वो बोलीं, "अंदर डाल, राहुल। मुझे गर्म कर।" मैंने धीरे से प्रवेश किया, और वो चीखीं। दर्द और सुख का मिश्रण था। मैं रुका, लेकिन वो बोलीं, "रुक मत।" मैंने धक्के लगाने शुरू किए, धीमे से, फिर तेज़। उनकी चूत इतनी गर्म थी कि लग रहा था जैसे आग लगी हो। हम दोनों पसीने से तर थे, और कमरा हमारी आवाज़ों से भर गया।

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कुछ देर बाद, दीदी ने मुझे पलटा और ऊपर आ गईं। वो मेरे लंड पर बैठीं, और खुद ऊपर-नीचे होने लगीं। उनके स्तन उछल रहे थे, और मैंने उन्हें पकड़कर दबाया। वो तेज़-तेज़ साँस ले रही थीं, और बोलीं, "यह कितना अच्छा लग रहा है।" मेरा क्लाइमैक्स करीब था, लेकिन मैं रुका, उन्हें और सुख देना चाहता था। हमारी बॉडीज़ एक rhythm में चल रही थीं, जैसे कोई पुराना गीत।

फिर हम साइड से लेट गए, और मैंने पीछे से प्रवेश किया। मेरी उँगलियाँ उनकी क्लिट पर खेल रही थीं, उन्हें और गर्म करते हुए। दीदी की कराहें अब चीखों में बदल गईं, और वो बोलीं, "मैं आ रही हूँ, राहुल!" उनका शरीर काँप उठा, और मैं भी नहीं रुक सका। हम दोनों एक साथ झड़ गए, और वह सुख अवर्णनीय था।

उसके बाद हम चुपचाप लेटे रहे, एक-दूसरे की बाहों में। दीदी की साँसें धीमी हो रही थीं, और उन्होंने मेरे सीने पर सिर रखा। "यह हमारा राज़ रहेगा," उन्होंने कहा। मैंने हाँ में सिर हिलाया, लेकिन मन में सवाल थे। क्या यह सिर्फ एक रात था, या कुछ और? बाहर बारिश जारी थी, और हमारी साँसें मिल रही थीं।

अगली सुबह, सब कुछ सामान्य लग रहा था। लेकिन शाम को फिर वही हुआ। दीदी ने मुझे अपने कमरे में बुलाया, और हम फिर करीब आए। इस बार, मैंने उन्हें और गर्म किया—उँगलियों से, जीभ से। उनकी चूत इतनी गीली थी कि फिसल रही थी। हमने अलग-अलग पोज़िशन ट्राई कीं, और हर बार नया एहसास था। दीदी की आँखों में अब शर्म नहीं, बल्कि चाहत थी।

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दिन बीतते गए, और हमारा रिश्ता बदलता गया। कभी किचन में, कभी बाथरूम में, हम चोरी-छिपे मिलते। हर बार, मैं उनकी चूत को गर्म करता, उन्हें तैयार करता, और फिर चोदता। लेकिन हर सीन में इमोशन्स थे—प्यार, अपराध, डर। एक रात, दीदी रो पड़ीं, बोलीं, "यह गलत है, लेकिन मैं रुक नहीं पा रही।" मैंने उन्हें चुप कराया, और फिर से प्यार किया।

अब हम दोनों जानते हैं कि यह रुकना मुश्किल है। हर रात, जब घर खाली होता है, हम मिलते हैं। उनकी गर्मी मेरी आग बन गई है, और हम उसमें जलते हैं। आज फिर, दीदी मेरे कमरे में आईं, और हम शुरू हो गए। मैंने उनकी चूत को सहलाया, गर्म किया, और