भांजी की छिपी आग

सुबह की धूप बालकनी में फैली हुई थी, और मैं अपनी कॉफी का कप थामे अखबार पढ़ रहा था। दिल्ली की इस व्यस्त कॉलोनी में हर रोज की तरह ट्रैफिक की आवाजें दूर से आ रही थीं। नेहा, मेरी बहन की बेटी, जो पिछले कुछ महीनों से मेरे साथ रह रही थी, अभी-अभी उठी थी और किचन में चाय बना रही थी। उसकी नौकरी की तलाश में वह यहां आई थी, और मैंने उसे अपने फ्लैट में जगह दे दी थी। दिनचर्या सामान्य थी – मैं ऑफिस जाता, वो इंटरव्यूज अटेंड करती, और शाम को हम साथ डिनर करते।

नेहा अब 25 साल की हो चुकी थी, कॉलेज खत्म करके दिल्ली में सेटल होने की कोशिश कर रही थी। मेरी बहन ने उसे मेरे पास भेजा था क्योंकि मैं अकेला रहता था, और शहर में उसका कोई जानकार नहीं था। मैं 40 का था, एक सॉफ्टवेयर कंपनी में मैनेजर, और जीवन की भागदौड़ में व्यस्त। सुबह-सुबह हमारी बातें साधारण होतीं – मौसम, खबरें, या उसकी जॉब सर्च के बारे में। आज भी वैसा ही था। नेहा ने चाय का कप मेरे सामने रखा और मुस्कुराकर कहा, "मामा, आज एक इंटरव्यू है, विश मी लक।"

मैंने अखबार से नजर उठाकर उसे देखा। "बिल्कुल, नेहा। तुम अच्छा करोगी। कुछ खा लो पहले।" वह हंसती हुई वापस किचन में चली गई। हमारा रिश्ता हमेशा से करीबी रहा था। जब वह छोटी थी, मैं उसे घुमाने ले जाता था, लेकिन अब वह बड़ी हो गई थी, अपनी जिंदगी संवार रही थी। मैंने कभी उसे किसी और नजर से नहीं देखा था – वह मेरी भांजी थी, परिवार का हिस्सा। लेकिन पिछले कुछ दिनों से घर में एक अजीब सा शांत माहौल था, शायद इसलिए कि हम दोनों अकेले थे।

शाम को जब मैं ऑफिस से लौटा, नेहा सोफे पर बैठी टीवी देख रही थी। उसका इंटरव्यू अच्छा गया था, लेकिन अभी कॉल का इंतजार था। हमने साथ डिनर किया – साधारण दाल-चावल, जो उसने बनाया था। बातों में उसने अपनी पुरानी यादें शेयर कीं, कैसे बचपन में मैं उसे पार्क ले जाता था। मैंने हंसकर कहा, "अब तुम बड़ी हो गई हो, नेहा। अपनी जिंदगी खुद संभाल रही हो।" वह चुप हो गई, बस मुस्कुराती रही। रात को मैं अपने कमरे में चला गया, किताब पढ़ने लगा।

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कुछ दिनों बाद, नेहा को जॉब मिल गई। खुशी में हमने बाहर डिनर प्लान किया। लेकिन उस रात बारिश हो गई, और हम घर पर ही रहे। नेहा ने कहा, "मामा, चलो कोई मूवी देखते हैं।" हमने नेटफ्लिक्स पर एक रोमांटिक फिल्म लगाई। फिल्म देखते-देखते वह मेरे करीब आकर बैठ गई, शायद ठंड लग रही थी। मैंने कुछ नहीं कहा, बस फिल्म पर ध्यान दिया। लेकिन उसकी सांसें मेरे कंधे के पास महसूस हो रही थीं। फिल्म खत्म हुई तो वह बोली, "मामा, जिंदगी में प्यार कितना जरूरी है न?" मैंने सहमति में सिर हिलाया, लेकिन अंदर एक अजीब सी बैचेनी थी।

अगले हफ्ते, नेहा का जन्मदिन था। मैंने उसे सरप्राइज देने के लिए एक होटल बुक किया – दिल्ली से बाहर, एक रिसॉर्ट जैसा। "चलो, नेहा, वीकेंड ट्रिप। तुम्हारी जॉब की खुशी में।" वह बहुत उत्साहित हो गई। हम कार से निकले, रास्ते में गाने सुनते हुए। होटल पहुंचे तो शाम हो चुकी थी। रूम अच्छा था, दो बेड वाला। नेहा ने कहा, "वाह मामा, कितना सुंदर है यहां। थैंक यू!" हमने डिनर किया, और फिर पूल साइड पर बैठे। रात गहराती जा रही थी, और हवा में एक ठंडक थी।

रूम में लौटकर नेहा ने शॉवर लिया। मैं बालकनी में खड़ा बाहर देख रहा था। जब वह बाहर आई, तो टॉवल में लिपटी हुई थी। "मामा, पानी गर्म नहीं हो रहा।" मैंने चेक किया, लेकिन कुछ नहीं हुआ। वह मेरे पास आकर खड़ी हो गई, और अचानक उसकी आंखों में कुछ अलग था। मैंने पूछा, "क्या हुआ, नेहा?" वह चुप रही, बस मुझे देखती रही। मेरे मन में उथल-पुथल मच गई – वह मेरी भांजी थी, लेकिन उसकी नजरें कुछ कह रही थीं।

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धीरे-धीरे, नेहा ने अपना हाथ मेरे हाथ पर रखा। "मामा, मैं अकेली महसूस करती हूं। तुम हमेशा मेरे लिए थे।" उसकी आवाज में एक कंपकंपी थी। मैं स्तब्ध था, लेकिन मेरे शरीर में एक गर्माहट फैल रही थी। मैंने उसे रोकने की कोशिश की, "नेहा, ये गलत है। हम परिवार हैं।" लेकिन वह और करीब आ गई, उसके होंठ मेरे कान के पास। "कौन देख रहा है, मामा? बस हम हैं।" मेरे मन में संघर्ष था – नैतिकता, रिश्ता, लेकिन उसकी गर्म सांसें सब भुला रही थीं।

मैंने उसे अपनी बाहों में खींच लिया। उसके होंठों पर मेरे होंठ रख दिए। वह तुरंत प्रतिक्रिया दे रही थी, जैसे सालों की भूख हो। हमारा चुंबन गहरा होता गया, उसके हाथ मेरी कमीज उतारने लगे। मैंने उसका टॉवल खींचा, और उसका नग्न शरीर मेरे सामने था। उसकी त्वचा मुलायम थी, जैसे रेशम। मैंने उसे बेड पर लिटाया, उसके स्तनों को चूमा। नेहा की सिसकियां कमरे में गूंज रही थीं। "मामा, और... और करो।" मेरे हाथ उसके शरीर पर घूम रहे थे, हर स्पर्श में एक नई उत्तेजना।

मैंने अपना शरीर उसके ऊपर रखा, धीरे-धीरे प्रवेश किया। नेहा की आंखें बंद हो गईं, उसके नाखून मेरी पीठ में गड़ रहे थे। हमारा मिलन तीव्र था, लेकिन भावनाओं से भरा। वह मेरे कान में फुसफुसा रही थी, "मैं तुम्हारी हूं, मामा।" हर धक्के के साथ हमारा बंधन मजबूत होता जा रहा था। पसीना我们的 शरीरों को चिपका रहा था, और कमरे में सिर्फ हमारी सांसों की आवाज थी।

कुछ देर बाद, हम अलग हुए, लेकिन नेहा फिर से मेरे करीब आई। इस बार वह ऊपर थी, अपनी कमर हिलाती हुई। उसके बाल मेरे चेहरे पर गिर रहे थे, और मैं उसके कूल्हों को थामे हुए था। भावनाएं उफान पर थीं – अपराधबोध, लेकिन उससे ज्यादा प्यार और वासना। नेहा की आंखों में आंसू थे, "मामा, ये कभी मत भूलना।" हम फिर से चरम पर पहुंचे, एक साथ।

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रात भर हम ऐसे ही रहे, कभी बातें करते, कभी एक-दूसरे को छूते। सुबह होने से पहले नेहा ने कहा, "मामा, ये हमारा राज है।" मैंने सहमति दी, लेकिन अंदर डर था। होटल की बालकनी से सूरज उग रहा था, और हम फिर से एक हो गए। उसकी गर्मी मेरे शरीर में समा रही थी, जैसे कोई सपना। नेहा की मुस्कान में शांति थी, और मैं उसके बालों में उंगलियां फिरा रहा था।

दोपहर को हमने चेकआउट किया, लेकिन रास्ते में नेहा मेरे हाथ थामे रही। घर पहुंचकर सब सामान्य लग रहा था, लेकिन हमारे बीच कुछ बदल गया था। शाम को नेहा ने डिनर बनाया, और हम सोफे पर बैठे। वह मेरे कंधे पर सिर रखकर बोली, "मामा, क्या हम फिर जाएंगे?" मैंने हंसकर कहा, "शायद, नेहा।" लेकिन मन में उलझन थी – ये रिश्ता अब क्या था?

कुछ दिन बाद, नेहा का ट्रांसफर दूसरे शहर में हो गया। विदाई की रात, हम फिर से करीब आए। इस बार ज्यादा कोमलता से, जैसे अलविदा कह रहे हों। उसके शरीर की हर रेखा मुझे याद थी, और मैंने उसे धीरे-धीरे प्यार किया। नेहा की आहें कमरे में फैल रही थीं, "मामा, मैं तुम्हें मिस करूंगी।" हमारा मिलन लंबा चला, हर पल में भावनाएं उमड़ रही थीं।

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अगली सुबह वह चली गई। घर खाली लग रहा था। मैं बालकनी में खड़ा सोच रहा था, उसकी यादें मन में घूम रही थीं। शाम को फोन आया, नेहा का। "मामा, सब ठीक है?" मैंने कहा, "हां, नेहा। तुम्हारा ख्याल रखना।" लेकिन रात को अकेले में, मैं उसके बारे में सोचता रहा।

महीनों बाद, नेहा वापस आई, एक विजिट के लिए। हम फिर से होटल गए, वही पुराना। इस बार कोई हिचक नहीं थी। नेहा ने दरवाजा बंद करते ही मुझे चूमा। "मामा, मैं इंतजार कर रही थी।" हम बेड पर गिरे, उसके कपड़े उतारते हुए। उसकी त्वचा अब भी वैसी ही गर्म थी, लेकिन इस बार ज्यादा आत्मविश्वास से भरी। मैंने उसके पैरों से शुरू किया, चूमते हुए ऊपर आया। नेहा की कराहें तेज हो गईं, "मामा, हां... ऐसे ही।"

हमने अलग-अलग तरीके आजमाए – कभी वह मेरे ऊपर, कभी मैं उसके पीछे। हर स्पर्श में नई उत्तेजना थी, जैसे पहली बार। नेहा के स्तन मेरे मुंह में थे, और मैं उन्हें चूस रहा था। उसकी आंखें बंद, शरीर कांप रहा था। हम चरम पर पहुंचे, पसीने से लथपथ। फिर शांत होकर लेटे रहे, एक-दूसरे की सांसें महसूस करते।

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रात गहराई, और नेहा ने कहा, "मामा, ये वासना नहीं, प्यार है।" मैंने उसे गले लगाया, उसके बालों को सहलाया। हम फिर से शुरू हुए, इस बार धीरे-धीरे, हर पल को जीते हुए। उसके कूल्हे मेरे हाथों में थे, और मैं गहराई में जा रहा था। नेहा की मुस्कान, उसकी आहें – सब कुछ परफेक्ट लग रहा था।

सुबह हमने ब्रेकफास्ट किया, लेकिन नेहा की नजरें फिर से आमंत्रित कर रही थीं। हम रूम में लौटे, और एक आखिरी बार एक हुए। उसकी गर्मी मेरे चारों ओर थी, और मैं उसके अंदर खोया हुआ था। नेहा फुसफुसाई, "मामा, और गहरा..."