जीजू की छिपी आग

सुबह की धूप बालकनी से छनकर कमरे में आ रही थी, और मैं अपनी कॉफी का मग थामे सोफे पर बैठी थी। आज रविवार था, और घर में एक अजीब सा शांत माहौल था। मेरी बहन नेहा सुबह ही अपनी सहेली के साथ शॉपिंग के लिए निकल गई थी, कहकर कि शाम तक लौटेगी। मैं रिया, 25 साल की, हाल ही में अपनी जॉब से ब्रेक लेकर यहां आई थी, अपनी बहन के घर में कुछ दिन बिताने। जीजू अक्षय घर पर ही थे, अपना काम निपटा रहे थे।

किचन से चाय की खुशबू आ रही थी, और मैंने सोचा कि उठकर कुछ नाश्ता बना लूं। रोज की तरह, मैंने अपना लैपटॉप खोला और ईमेल चेक करने लगी। जिंदगी इन दिनों काफी साधारण लग रही थी – काम की भागदौड़ से दूर, परिवार के साथ समय बिताना। अक्षय जीजू लिविंग रूम में बैठे अखबार पढ़ रहे थे, उनकी उम्र 32 साल थी, और वो एक सॉफ्टवेयर कंपनी में मैनेजर थे। हमारा रिश्ता हमेशा दोस्ताना रहा था, कभी-कभी मजाक करते, लेकिन आज घर इतना खाली लग रहा था।

मैं उठी और किचन की तरफ गई, वहां कुछ फल काटने लगी। तभी जीजू की आवाज आई, "रिया, क्या बना रही हो? मुझे भी एक कप चाय मिल जाएगी?" मैंने मुस्कुराकर कहा, "हां जीजू, अभी बनाती हूं। नेहा दीदी तो निकल गईं, आप अकेले क्या कर रहे हैं?" वो हंसते हुए बोले, "बस, थोड़ा काम है, और शाम को मेरा दोस्त विक्रम आने वाला है। हम लोग मिलकर कुछ प्लान करेंगे।" विक्रम उनका पुराना दोस्त था, मैंने उसे एक-दो बार देखा था, 30 साल का, स्पोर्टी टाइप।

चाय बनाकर मैं लिविंग रूम में ले आई, और जीजू के पास बैठ गई। हमने थोड़ी देर बात की, मौसम की, नेहा दीदी की शॉपिंग की आदतों की। सब कुछ सामान्य था, लेकिन उनकी नजरें कभी-कभी मेरी तरफ रुक जातीं। मैंने इसे नजरअंदाज किया, सोचा शायद मेरी कल्पना है। दोपहर होने को आई, और मैंने लंच बनाने का सोचा। जीजू ने कहा, "रिया, तुम आराम करो, मैं ऑर्डर कर देता हूं। विक्रम भी आ रहा है, हम तीनों साथ खाएंगे।"

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विक्रम ठीक दो बजे आया, उसके हाथ में कुछ बीयर की बोतलें थीं। "हाय रिया, कैसी हो? अक्षय ने बताया तुम यहां हो," उसने मुस्कुराते हुए कहा। मैंने जवाब दिया, "ठीक हूं विक्रम भाई, आप बैठिए।" हम तीनों सोफे पर बैठे, लंच ऑर्डर किया। बातें शुरू हुईं – पुराने कॉलेज के दिनों की, मजाक की। विक्रम काफी हंसमुख था, और जीजू भी आज ज्यादा बातूनी लग रहे थे। नेहा दीदी की अनुपस्थिति में घर में एक अलग ही ऊर्जा थी।

लंच के बाद हम लोग टीवी पर कोई मूवी लगाकर बैठ गए। मैं बीच में थी, जीजू एक तरफ और विक्रम दूसरी तरफ। मूवी रोमांटिक कॉमेडी थी, लेकिन मेरे मन में कुछ अजीब सा चल रहा था। जीजू की उंगली कभी-कभी मेरे कंधे से छू जाती, और विक्रम की नजरें मेरी तरफ बार-बार जातीं। मैंने खुद को संभाला, सोचा ये सब संयोग है। लेकिन जैसे-जैसे शाम ढल रही थी, बातें ज्यादा पर्सनल होने लगीं। विक्रम ने पूछा, "रिया, तुम्हारी कोई स्पेशल फ्रेंड है?" मैं हंसकर बोली, "नहीं, अभी तो फोकस जॉब पर है।"

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जीजू ने चुपचाप कहा, "तुम्हारी उम्र में तो एंजॉय करना चाहिए। नेहा भी कहती है कि तुम थोड़ी सीरियस हो जाती हो।" उनकी आवाज में एक गहराई थी, जो मुझे असहज कर रही थी। मैंने टॉपिक बदलने की कोशिश की, लेकिन मन में एक कशमकश शुरू हो गई। क्या ये सब मेरी सोच है, या वाकई कुछ हो रहा है? विक्रम ने बीयर ऑफर की, मैंने मना कर दिया, लेकिन उन्होंने पीना शुरू किया। शाम के चार बज चुके थे, और नेहा दीदी का फोन आया कि वो लेट हो जाएंगी।

अब घर में सिर्फ हम तीन थे, और माहौल बदलने लगा। जीजू ने म्यूजिक ऑन किया, धीमी धुनें। विक्रम ने कहा, "चलो डांस करें?" मैं हिचकिचाई, लेकिन जीजू ने मेरा हाथ पकड़ लिया। हम तीनों डांस करने लगे, हंसते-खेलते। लेकिन जीजू का हाथ मेरी कमर पर सरक गया, और विक्रम पास आ गया। मेरे दिल की धड़कन तेज हो गई। क्या ये गलत है? नेहा दीदी के बारे में सोचा, लेकिन वो पल में सब भूल गई।

डांस के दौरान जीजू ने मेरे कान में फुसफुसाया, "रिया, तुम बहुत खूबसूरत हो।" विक्रम ने भी कहा, "हां, अक्षय सही कह रहा है।" मैं स्तब्ध थी, लेकिन शरीर में एक गर्माहट फैल रही थी। मैंने खुद को रोका नहीं, और जीजू ने मुझे अपनी तरफ खींच लिया। उनका चुंबन अप्रत्याशित था, गहरा और भावुक। विक्रम पीछे से मेरे कंधे पर हाथ रखे खड़ा था। मैंने विरोध नहीं किया, बल्कि खुद को बहने दिया।

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हम बेडरूम की तरफ बढ़े, जीजू मुझे गोद में उठाकर। विक्रम ने दरवाजा बंद किया। जीजू ने मेरे कपड़े उतारने शुरू किए, धीरे-धीरे, हर स्पर्श में एक चाहत। मैं नंगी हो गई, और他们的 शरीर मेरे चारों तरफ थे। जीजू सामने से मुझे चूम रहे थे, मेरे स्तनों को सहला रहे थे, जबकि विक्रम पीछे से मेरी पीठ पर किस कर रहा था। मेरी सांसें तेज थीं, शरीर में आग लगी हुई थी।

जीजू ने मुझे बेड पर लिटाया, और खुद मेरे ऊपर आ गए। उनका लिंग मेरे अंदर प्रवेश कर रहा था, धीरे लेकिन दृढ़ता से। मैं कराह उठी, दर्द और सुख का मिश्रण। विक्रम मेरे बगल में लेट गया, मेरे होंठ चूमते हुए। फिर उन्होंने पोजीशन बदली – अब विक्रम मेरे नीचे था, मुझे अपनी तरफ खींचकर। जीजू पीछे से आए, और दोनों एक साथ मेरे शरीर में समा गए। वो सैंडविच जैसा पल, जहां मैं बीच में फंसी थी, लेकिन वो फंसाव नहीं, मुक्ति लग रहा था।

हर धक्के में एक नई भावना थी – जीजू की ताकत, विक्रम की कोमलता। मैं चीख रही थी, सुख की लहरों में डूबती-उतरती। उनके हाथ मेरे शरीर पर घूम रहे थे, हर हिस्से को छूते, उत्तेजित करते। समय रुक सा गया था, सिर्फ हम तीनों की सांसें और कराहें गूंज रही थीं। जीजू ने कहा, "रिया, तुम हमारी हो," और विक्रम ने सहमति में सिर हिलाया।

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क्लाइमेक्स आया, तीव्र और भावुक। हम तीनों एक साथ झड़ गए, शरीर पसीने से भीगे। मैं लेटी रही, उनकी बाहों में, मन में एक मिश्रित भावना – अपराधबोध और संतुष्टि। लेकिन वो पल इतना जीवंत था कि सब कुछ सही लग रहा था।

रात होने लगी थी, और हम फिर से शुरू हुए। इस बार और धीरे, और ज्यादा इमोशनल। जीजू मेरे चेहरे को देखते हुए अंदर आए, विक्रम मेरी गर्दन चूमते हुए। हर बार कुछ नया – कभी तेज, कभी कोमल। मैंने खुद को पूरी तरह समर्पित कर दिया, उनकी चाहत में खोकर।

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फिर एक बार, सैंडविच पोजीशन में, लेकिन अब ज्यादा गहराई से। उनके शरीर मेरे साथ तालमेल में थे, जैसे एक रिदम। मैं महसूस कर रही थी हर स्पर्श, हर चुंबन। क्लाइमेक्स फिर आया, और हम थककर लेट गए। मन में शांति थी, लेकिन नेहा दीदी की याद भी।

सुबह होने से पहले, हम फिर जागे। इस बार विक्रम ने लीड लिया, जीजू सहयोग करते हुए। उनके बीच में होना, वो अनुभव अवर्णनीय था। सुख की ऊंचाइयों पर पहुंचकर, मैंने सोचा कि ये रात कभी न भूलूंगी।