बहन की गहराई
शाम का समय था, जब मैं घर लौटा। बाहर की भागदौड़ के बाद, हमारा छोटा सा अपार्टमेंट हमेशा एक शांत जगह लगता था। मैं रोज की तरह अपनी किताबों का बैग सोफे पर रखकर किचन की तरफ बढ़ा, जहां माँ चाय बना रही थीं। नेहा, मेरी छोटी बहन, डाइनिंग टेबल पर बैठी अपनी कॉलेज की नोट्स देख रही थी।
हमारा परिवार साधारण था। पापा एक छोटी दुकान चलाते थे, और माँ घर संभालतीं। मैं, रोहन, 24 साल का, एक आईटी कंपनी में काम करता था। नेहा 21 की थी, कॉलेज में पढ़ रही थी। हम दोनों भाई-बहन हमेशा से करीब थे, लेकिन जीवन की रफ्तार में ज्यादा बातें नहीं होती थीं।
उस शाम, मैंने चाय का कप उठाया और नेहा के पास बैठ गया। "कैसा रहा आज का दिन?" मैंने पूछा, बिना किसी खास उम्मीद के। वो मुस्कुराई और बोली, "बस ठीक-ठाक, भैया। तुम्हारा?" हमारी बातें ऐसी ही साधारण होती थीं, लेकिन आज उसकी आँखों में कुछ अलग सा था।
रात को डिनर के बाद, मैं अपने कमरे में लैपटॉप पर काम कर रहा था। नेहा अक्सर मेरे कमरे में आती थी, कोई किताब लेने या बस बात करने। आज भी वो आई, दरवाजा खोलकर अंदर झांकी। "भैया, नींद नहीं आ रही। थोड़ी देर बैठूं?" उसने कहा, और मैंने हामी भर दी।
वो मेरे बेड पर बैठ गई, अपने पैरों को मोड़कर। हमने पुरानी यादों की बात की – स्कूल के दिन, बचपन की शरारतें। नेहा हमेशा से संवेदनशील थी, छोटी-छोटी बातों पर भावुक हो जाती। मैंने देखा कि आज वो थोड़ी उदास लग रही थी।
"क्या बात है, नेहा? कुछ परेशान लग रही हो," मैंने पूछा। वो चुप रही कुछ देर, फिर बोली, "भैया, जीवन इतना अकेला क्यों लगता है कभी-कभी? कॉलेज में सब दोस्त हैं, लेकिन असली साथ तो परिवार का ही है।" उसकी आवाज में एक गहराई थी जो मुझे छू गई।
हमारी बातें लंबी होती गईं। मैंने उसे अपनी नौकरी की मुश्किलों के बारे में बताया, कैसे तनाव हर वक्त साथ रहता है। नेहा सुनती रही, उसकी आँखें मेरी ओर टिकी हुईं। धीरे-धीरे, वो मेरे करीब सरक आई, जैसे कोई सहारा ढूंढ रही हो।
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रात गहराने लगी थी। घर में सब सो चुके थे। नेहा ने अपना हाथ मेरे हाथ पर रखा, और कहा, "भैया, तुम हमेशा मेरे लिए मजबूत बने रहते हो। लेकिन मैं भी तुम्हारे लिए कुछ करना चाहती हूं।" उसकी उंगलियां मेरी उंगलियों से खेल रही थीं, एक अजीब सी गर्माहट फैल रही थी।
मैं असमंजस में था। हमारा रिश्ता हमेशा से पवित्र था, लेकिन आज की रात कुछ अलग महसूस हो रही थी। नेहा की सांसें तेज हो रही थीं, और वो मेरे और करीब आ गई। "नेहा, ये क्या कर रही हो?" मैंने धीमी आवाज में पूछा, लेकिन मेरी आवाज में विरोध कम था।
वो मुस्कुराई, उसकी आँखों में एक चमक थी। "भैया, मैं जानती हूं कि तुम अकेले हो। मैं तुम्हें खुश देखना चाहती हूं।" उसने अपना चेहरा मेरे कंधे पर टिका दिया, और मैंने महसूस किया कि मेरा दिल तेज धड़क रहा था।
उस रात, हमारी बातें भावनाओं में बदल गईं। नेहा ने मुझे गले लगाया, और मैंने उसे रोकने की कोशिश नहीं की। उसकी गर्माहट मेरे शरीर में एक नई ऊर्जा भर रही थी। हम दोनों चुप थे, लेकिन हमारी सांसें सब कह रही थीं।
धीरे-धीरे, नेहा ने अपना हाथ मेरे सीने पर रखा। "भैया, मुझे पता है तुम क्या महसूस करते हो। मैं तुम्हारी बहन हूं, लेकिन मैं तुम्हारी दोस्त भी हूं।" उसकी उंगलियां नीचे सरक रही थीं, और मैं सिहर उठा।
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मैंने उसे देखा, उसकी आँखों में कोई डर नहीं था, बस एक गहरा प्यार। "नेहा, ये गलत है," मैंने कहा, लेकिन मेरी आवाज कमजोर थी। वो बोली, "गलत क्या है, भैया? हम दोनों व्यस्क हैं, और ये हमारा फैसला है।"
उसने मुझे किस किया, धीरे से मेरे होंठों पर। वो पल इतना नरम था कि मैं खुद को रोक नहीं पाया। हमारी किस गहरी होती गई, और नेहा की उंगलियां मेरे शरीर को छू रही थीं।
मैंने उसे अपनी बाहों में लिया, और हम बेड पर लेट गए। नेहा ने मेरी शर्ट उतारी, उसकी उंगलियां मेरे सीने पर घूम रही थीं। "भैया, तुम कितने मजबूत हो," उसने कहा, और मैंने महसूस किया कि मेरा शरीर प्रतिक्रिया दे रहा था।
उसने अपना टॉप उतारा, और उसकी त्वचा की गर्माहट मुझे छू गई। हम एक-दूसरे को छू रहे थे, धीरे-धीरे, जैसे कोई नई दुनिया खोज रहे हों। नेहा की सांसें तेज थीं, और वो मेरे शरीर के हर हिस्से को प्यार से सहला रही थी।
फिर वो नीचे झुकी, उसकी आँखें मेरी ओर देख रही थीं। "भैया, मैं तुम्हें सुख देना चाहती हूं," उसने कहा, और उसने मेरे लिंग को अपने हाथ में लिया। वो धीरे-धीरे उसे सहला रही थी, और मैं आनंद से भर उठा।
नेहा ने अपना मुँह नीचे किया, और उसे चूसना शुरू किया। उसकी जीभ की गर्माहट अवर्णनीय थी। मैंने उसके बालों में उंगलियां फंसाईं, और वो और गहराई से कर रही थी। हर चूसने के साथ, एक नई लहर उठ रही थी।
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"नेहा, ये... इतना अच्छा लग रहा है," मैंने कराहते हुए कहा। वो मुस्कुराई, बिना रुके। उसकी गति बढ़ रही थी, और मैं खुद को खोता जा रहा था। वो वैरायटी से कर रही थी – कभी धीरे, कभी तेज, कभी जीभ से खेलते हुए।
मैंने उसे ऊपर खींचा, और हम फिर किस करने लगे। नेहा ने अपने बाकी कपड़े उतारे, और मैंने भी। हम नंगे थे, एक-दूसरे की गर्माहट में लिपटे। "भैया, अब मुझे अपना बनाओ," उसने कहा, उसकी आँखों में इच्छा थी।
मैंने उसे नीचे लिटाया, और धीरे से उसके अंदर प्रवेश किया। नेहा ने एक आह भरी, लेकिन उसकी मुस्कान बता रही थी कि वो खुश थी। हमारी गतिविधि धीमी थी, हर धक्के के साथ हमारी भावनाएं जुड़ रही थीं।
"भैया, और तेज," उसने कहा, और मैंने गति बढ़ाई। उसका शरीर मेरे साथ ताल मिला रहा था, हम दोनों पसीने से तर थे। हर पल में एक नई सनसनी थी – कभी मैं ऊपर, कभी वो, वैरायटी से भरा।
हमारा क्लाइमैक्स एक साथ आया, एक विस्फोट की तरह। नेहा ने मुझे कसकर गले लगाया, और हम हांफते हुए लेटे रहे। "भैया, ये हमारा राज रहेगा," उसने कहा, और मैंने हामी भरी।
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अगले दिन, सब कुछ सामान्य लग रहा था, लेकिन हमारी नजरें मिलतीं तो एक मुस्कान छिप जाती। शाम को, नेहा फिर मेरे कमरे में आई। "भैया, कल की रात भूल नहीं पा रही," उसने कहा, और हम फिर करीब आ गए।
इस बार, हमने ज्यादा समय लिया। नेहा ने मुझे चूसा, लेकिन अब और गहराई से, जैसे वो हर पल को जी रही हो। मैंने उसके शरीर को चूमा, हर हिस्से को। हमारी चुदाई और भावनात्मक थी, कन्फ्लिक्ट के साथ – हम जानते थे ये गलत है, लेकिन रोक नहीं पा रहे थे।
रातें ऐसी ही गुजरने लगीं। नेहा की हर हरकत में एक नई भावना होती – कभी प्यार, कभी जुनून। हम बातें करते, हंसते, और फिर एक-दूसरे में खो जाते।
एक रात, नेहा ने कहा, "भैया, मैं तुम्हें कभी छोड़ना नहीं चाहती।" हमारी चुदाई उस रात और गहरी थी, हर स्ट्रोक में हमारा बंधन मजबूत हो रहा था।
समय बीतता गया, लेकिन हमारा रिश्ता छिपा रहा। नेहा की मुस्कान अब मेरी जिंदगी का हिस्सा थी, और मैं उसकी।
फिर एक शाम, जब घर खाली था, नेहा ने मुझे किचन में खींचा। "भैया, अब इंतजार नहीं होता," उसने कहा, और हम वहीं शुरू हो गए। उसने मुझे चूसा, खड़े-खड़े, और फिर हम फर्श पर। वो पल जंगली था, भावनाओं से भरा।
हम दोनों जानते थे कि ये रिश्ता समाज की नजरों में गलत है, लेकिन हमारे दिल में सही था। नेहा की हर छुअन में प्यार था, और मैं उसमें डूबता जा रहा था।
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एक रात, हम बेड पर लेटे थे, नेहा मेरे सीने पर सिर रखकर। "भैया, क्या हम हमेशा ऐसे रह सकते हैं?" उसने पूछा। मैंने कुछ नहीं कहा, बस उसे चूमा।
हमारी अगली मुलाकात और इंटेंस थी। नेहा ने नई चीजें ट्राई कीं – कभी ऊपर से, कभी पीछे से। हर बार, एक नई भावना जुड़ती, हमारा बंधन गहराता।
अब ये हमारी दिनचर्या का हिस्सा था। नेहा की चूसने की कला मुझे हमेशा आश्चर्यचकित करती, और चुदाई का सुख अनंत लगता।
लेकिन अंदर ही अंदर, एक कन्फ्लिक्ट था। क्या ये सही है? नेहा बोली, "भैया, प्यार में कुछ गलत नहीं।" और मैं मान गया।
एक रात, हम बाहर घूमने गए, और वापस आकर फिर एक-दूसरे में खो गए। नेहा की आहें कमरे में गूंज रही थीं, हमारा आनंद चरम पर था।
वो पल, जब नेहा ने मुझे फिर चूसा, और फिर हमने चुदाई की, वो हमारी जिंदगी का सबसे खूबसूरत हिस्सा था। हम हांफते हुए लेटे थे, एक-दूसरे की बाहों में।