बहन की अनजानी चाहत

सुबह की धूप खिड़की से झांक रही थी, और मैं रोज की तरह अपने कमरे में बैठकर कॉफी का कप थामे अखबार पढ़ रहा था। घर में सब कुछ सामान्य था – मां रसोई में चाय बना रही थीं, पापा बाहर बरामदे में बैठे अपने फोन पर खबरें देख रहे थे। प्रिया, मेरी छोटी बहन, अभी-अभी कॉलेज से लौटी थी और ऊपर अपने कमरे में थी। हमारा घर दिल्ली के एक शांत इलाके में था, जहां दिनचर्या हमेशा एक जैसी लगती थी – सुबह उठना, नाश्ता करना, और फिर अपने-अपने कामों में लग जाना।

मैं रोहन हूं, पच्चीस साल का, एक छोटी आईटी कंपनी में काम करता हूं। घर से ही ज्यादातर काम होता है, इसलिए दिन भर कंप्यूटर के सामने बैठा रहता हूं। प्रिया बाईस की है, एमए कर रही है और घर में ही रहती है। हम दोनों बचपन से ही काफी करीब हैं, लेकिन बड़े होने के बाद जिंदगी की भागदौड़ में वो closeness थोड़ी कम हो गई थी। फिर भी, शाम को साथ बैठकर टीवी देखना या कभी-कभी बाहर घूमने जाना, ये सब अब भी चलता था। आज भी वैसा ही दिन था – कोई खास बात नहीं, बस रूटीन।

नाश्ते की मेज पर हम सब इकट्ठे हुए। मां ने परांठे बनाए थे, और पापा अपनी आदत के मुताबिक राजनीति पर चर्चा शुरू कर दी। "देखो रोहन, ये सरकार क्या कर रही है," उन्होंने कहा। मैंने हंसकर जवाब दिया, "पापा, आप तो रोज यही कहते हो।" प्रिया चुपचाप बैठी थी, अपना परांठा खा रही थी। वो थोड़ी उदास लग रही थी, लेकिन मैंने ज्यादा ध्यान नहीं दिया। शायद कॉलेज में कुछ हुआ होगा। नाश्ते के बाद मैं अपने कमरे में चला गया, काम शुरू करने के लिए।

दोपहर हुई तो प्रिया मेरे कमरे में आई। "भैया, तुम्हारा लैपटॉप फ्री है क्या? मेरा असाइनमेंट जमा करना है," उसने पूछा। मैंने मुस्कुराकर कहा, "हां, ले ले। लेकिन जल्दी कर, मुझे मीटिंग है।" वो मेरे बगल में बैठ गई, और मैं अपना काम करता रहा। उसकी मौजूदगी में एक अजीब सा आराम था, जैसे पुराने दिनों की याद। हम दोनों चुप थे, बस कीबोर्ड की आवाजें कमरे में गूंज रही थीं। थोड़ी देर बाद उसने सिर उठाकर कहा, "भैया, तुम्हें याद है वो ट्रिप जब हम गोवा गए थे? कितना मजा आया था।" मैंने हंसकर जवाब दिया, "हां, याद है। तू तो समंदर में कूदने को तैयार थी।"

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शाम को पापा-मां किसी रिश्तेदार के यहां गए थे, और घर में सिर्फ हम दोनों थे। मैं किचन में खाना गर्म कर रहा था जब प्रिया आई। "भैया, आज कुछ स्पेशल बनाते हैं न?" उसने कहा। हमने साथ मिलकर पास्ता बनाया, हंसते-बोलते। वो थोड़ी ज्यादा बातूनी लग रही थी, जैसे कुछ कहना चाहती हो लेकिन कह नहीं पा रही। रात के खाने के बाद हम सोफे पर बैठे टीवी देखने लगे। कोई पुरानी फिल्म चल रही थी, लेकिन मेरा ध्यान उस पर नहीं था। प्रिया मेरे कंधे पर सिर टिका कर बैठी थी, जैसे बचपन में करती थी।

रात गहराने लगी थी। "भैया, मुझे नींद नहीं आ रही," उसने अचानक कहा। मैंने पूछा, "क्यों? कुछ परेशानी है?" वो चुप रही, फिर बोली, "बस ऐसे ही। क्या हम बातें करें?" हमने बातें शुरू कीं – कॉलेज की, मेरी जॉब की, पुरानी यादों की। उसकी आंखों में एक अजीब सी चमक थी, जैसे वो कुछ छुपा रही हो। मैंने महसूस किया कि वो मेरे करीब आ रही थी, लेकिन मैंने इसे भाई-बहन का प्यार समझा। फिर वो बोली, "भैया, तुम हमेशा मेरे लिए हो न?" मैंने हां में सिर हिलाया।

उस रात मैं अपने कमरे में लेटा था जब दरवाजा खुला। प्रिया अंदर आई, "भैया, मुझे डर लग रहा है। क्या मैं यहां सो जाऊं?" मैं चौंका, लेकिन कहा, "ठीक है, आ जा।" वो मेरे बगल में लेट गई। अंधेरे में उसकी सांसें साफ सुनाई दे रही थीं। थोड़ी देर बाद उसने अपना हाथ मेरे सीने पर रखा। "प्रिया, क्या हुआ?" मैंने पूछा। वो बोली, "कुछ नहीं, बस ऐसे ही।" लेकिन उसका स्पर्श अलग था, जैसे कोई अनकही चाहत। मैं असमंजस में था, दिल की धड़कन तेज हो गई थी।

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धीरे-धीरे उसका हाथ नीचे सरका। मैंने उसे रोका, "प्रिया, ये क्या कर रही है?" वो चुप रही, लेकिन उसकी आंखें सब कह रही थीं। "भैया, मुझे पता नहीं क्या हो रहा है, लेकिन तुम्हारे बिना मैं नहीं रह सकती," उसने फुसफुसाकर कहा। उस पल में सब कुछ बदल गया। मैंने उसे अपनी बाहों में लिया, और हमारी दुनिया उलट गई। वो पहली बार था जब हमने सीमाएं लांघीं। उसकी त्वचा की गर्माहट, उसकी सांसों की रिदम, सब कुछ नया और डरावना था। लेकिन वो भावना इतनी गहरी थी कि रोकना मुश्किल हो गया।

उस रात के बाद प्रिया बदल गई। अगले दिन वो सामान्य लग रही थी, लेकिन उसकी नजरें मुझ पर टिकी रहतीं। शाम को जब पापा-मां सो गए, वो फिर मेरे कमरे में आई। "भैया, वो कल रात... मुझे फिर वैसा ही लग रहा है," उसने कहा। मैंने विरोध किया, "प्रिया, ये गलत है। हम भाई-बहन हैं।" लेकिन उसकी आंखों में वो भूख थी, जो मुझे भी खींच रही थी। हम फिर एक हो गए, इस बार ज्यादा गहराई से। उसकी बॉडी की हर हरकत में एक लय थी, जैसे वो इसमें डूब चुकी हो। मैंने महसूस किया कि ये सिर्फ शारीरिक नहीं, भावनात्मक भी था।

दिन बीतते गए, और ये सिलसिला बढ़ता गया। प्रिया को जैसे आदत लग गई थी। वो दिन में भी संकेत देती, "भैया, आज रात?" मैं डरता था, लेकिन उसकी चाहत मुझे रोक नहीं पाती। एक दोपहर जब घर खाली था, उसने मुझे किचन में पकड़ा। "प्रिया, कोई आ जाएगा," मैंने कहा। लेकिन वो नहीं मानी। उस बार सब कुछ तेज और उत्तेजक था – उसकी उंगलियां मेरी पीठ पर, उसकी सांसें मेरे कान में। हर बार नया अनुभव, जैसे वो और ज्यादा जानना चाहती हो।

मुझे लगने लगा कि ये लत है। प्रिया बिना इसके रह नहीं पाती थी। एक रात वो रो पड़ी, "भैया, अगर तुम नहीं करोगे तो मैं पागल हो जाऊंगी।" मैंने उसे गले लगाया, और हम फिर उस दुनिया में खो गए। उसकी बॉडी अब मेरे लिए जानी-पहचानी थी, लेकिन हर बार कोई नई भावना जुड़ती – कभी प्यार, कभी अपराधबोध। हम दोनों जानते थे ये गलत है, लेकिन रुकना नामुमकिन लगता।

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एक शाम हम पार्क में घूम रहे थे। प्रिया ने मेरा हाथ पकड़ा, "भैया, तुम्हारे बिना सब सूना लगता है।" मैंने कहा, "प्रिया, हमें रुकना चाहिए।" लेकिन घर लौटते ही वो फिर मेरे करीब आई। उस रात हमने धीरे-धीरे सब किया – चुंबन से शुरू, फिर हर स्पर्श में गहराई। उसकी आहें, उसकी बॉडी का कंपन, सब कुछ मुझे बांधे हुए था।

समय के साथ ये और गहरा होता गया। प्रिया अब हर मौके पर चाहती थी। एक सुबह जब मां बाहर गईं, उसने मुझे बाथरूम में खींचा। "प्रिया, ये क्या?" मैंने कहा, लेकिन उसकी आंखों में वो जलन थी। पानी की धार के नीचे हम एक हुए, सब कुछ गीला और सेंसरी। हर बार वैरायटी – कभी तेज, कभी धीमा। लेकिन अंदर से मैं टूट रहा था।

फिर एक रात प्रिया आई, "भैया, मुझे डर लग रहा है। क्या ये कभी रुकेगा?" मैंने कहा, "नहीं जानता।" हम फिर साथ लेटे, उसकी बॉडी मेरी बॉडी से सटी। उस बार भावनाएं उफान पर थीं – प्यार, डर, चाहत सब मिलकर।

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अब ये रोज की बात हो गई थी। प्रिया की लत इतनी गहरी थी कि वो बिना इसके सो नहीं पाती। मैं भी उसी जाल में फंस चुका था। एक दोपहर हम छत पर थे, हवा चल रही थी। उसने मुझे देखा और कहा, "भैया, अब मैं तुम्हारे बिना नहीं जी सकती।" हम वहां ही खो गए, हवा की ठंडक और उसकी गर्माहट के बीच। हर सेंसेशन नया, हर पल इमोशनल।

मुझे लगता था ये कभी न रुकेगा। प्रिया की आंखों में वो भूख हमेशा रहती। रात को जब सब सो जाते, वो चुपके से आती, और हम अपनी दुनिया में डूब जाते। उसकी उंगलियां मेरी त्वचा पर, उसकी सांसें मेरी सांसों से मिली हुईं।

एक रात बारिश हो रही थी। प्रिया मेरे कमरे में आई, गीली और कांपती हुई। "भैया, मुझे गले लगा लो," उसने कहा। मैंने उसे बाहों में लिया, और हम बारिश की आवाज में खो गए। उसकी बॉडी की हर वक्र, हर स्पर्श में एक नई कहानी थी। भावनाएं उमड़ रही थीं – प्यार की, अपराध की, लेकिन रोकना मुश्किल।

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अब तो ये आदत बन चुकी थी। प्रिया बिना इसके अधूरी लगती। मैं भी उसी में उलझा था। हर बार नई वैरायटी – कभी रोमांटिक, कभी वाइल्ड। लेकिन अंदर से एक संघर्ष था।

फिर एक शाम प्रिया ने कहा, "भैया, क्या हम हमेशा ऐसे रहेंगे?" मैं चुप रहा। रात हुई, और वो फिर आई। हम साथ लेटे, उसकी बॉडी मेरी से सटी।