ससुर की गुप्त चाहत
सुबह की हल्की धूप मेरे कमरे की खिड़की से अंदर आ रही थी। मैं बिस्तर पर बैठा अखबार पढ़ रहा था, जबकि घर में हल्की-हल्की आवाजें आ रही थीं। रोज की तरह, मैंने चाय का कप उठाया और बाहर बरामदे में आ गया, जहां से हमारे छोटे से बगीचे का नजारा दिखता था। आज का दिन कुछ खास नहीं था, बस शादी की तैयारियों की वजह से घर में थोड़ी चहल-पहल ज्यादा थी।
मेरा नाम राजेश है, और मैं पचास साल का हो चुका हूं। मेरी पत्नी का देहांत हुए दस साल हो गए, और तब से मैं अकेला ही इस घर को संभाल रहा हूं। मेरा बेटा अजय अब पच्चीस का है, और उसकी शादी तय हो चुकी है। प्रिया नाम की लड़की से, जो हमारे पड़ोस के शहर से है। शादी अभी एक हफ्ते बाद है, लेकिन रिवाज के मुताबिक प्रिया कुछ दिन पहले ही हमारे घर आ गई है, ताकि परिवार के साथ घुल-मिल सके।
अजय काम पर चला गया था, और मैं घर पर अकेला था। प्रिया रसोई में कुछ काम कर रही थी। मैंने सोचा कि उसे थोड़ी मदद कर दूं, क्योंकि वो अभी नई है। मैं रसोई में गया तो देखा वो सब्जियां काट रही थी। "प्रिया, क्या मदद करूं?" मैंने पूछा। वो मुस्कुराई और बोली, "नहीं अंकल, मैं कर लूंगी। आप आराम कीजिए।"
मैं वहीं खड़ा रहा, और हम बातें करने लगे। प्रिया ने बताया कि वो कॉलेज में पढ़ती है, और शादी के बाद भी पढ़ाई जारी रखना चाहती है। उसकी बातों में एक मासूमियत थी, जो मुझे अच्छी लगी। मैंने उसे अपने पुराने दिनों की कहानियां सुनाईं, जब मैं और मेरी पत्नी ने ये घर बनवाया था। वो ध्यान से सुन रही थी, और बीच-बीच में हंसती थी।
शाम को अजय घर आया, और हम सब साथ में डिनर किया। प्रिया ने खाना बनाया था, जो बहुत स्वादिष्ट था। अजय उसे छेड़ रहा था, और प्रिया शरमा रही थी। मैं चुपचाप देख रहा था, और मन में सोच रहा था कि कितना अच्छा परिवार बन रहा है। रात को सोने से पहले मैंने प्रिया से कहा, "बेटी, अगर कुछ जरूरत हो तो बताना।" वो बोली, "जी अंकल, धन्यवाद।"
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अगले दिन सुबह मैं जल्दी उठ गया। घर में सन्नाटा था, सिर्फ पक्षियों की आवाजें आ रही थीं। मैं बगीचे में टहल रहा था, जब प्रिया बाहर आई। वो बोली, "अंकल, क्या मैं आपके साथ टहल सकती हूं?" मैंने हामी भरी, और हम साथ चलने लगे। वो告诉我 अपनी जिंदगी के बारे में, कैसे उसके माता-पिता ने उसकी शादी तय की, और वो थोड़ी नर्वस है।
हमारी बातें अब रोज होने लगीं। प्रिया घर के कामों में हाथ बंटाती, और मैं उसे सलाह देता। एक दिन दोपहर में अजय बाहर गया था, और घर में सिर्फ हम दोनों थे। प्रिया मेरे कमरे में आई, कुछ किताबें मांगने। मैंने उसे दीं, और वो बैठकर पढ़ने लगी। मैं उसके पास बैठा, और हम किताब पर चर्चा करने लगे।
उसकी आंखों में एक चमक थी, जो मुझे अजीब सा लग रही थी। मैंने खुद को संभाला, लेकिन मन में एक अजीब सी उथल-पुथल हो रही थी। प्रिया इतनी मासूम और सुंदर थी, लेकिन मैं उसके ससुर बनने वाला था। फिर भी, उसकी मौजूदगी घर को जीवंत बना रही थी। शाम को जब अजय आया, तो सब कुछ सामान्य लग रहा था।
रात को मुझे नींद नहीं आ रही थी। मैं बिस्तर पर करवटें बदल रहा था, और प्रिया की बातें याद आ रही थीं। वो कितनी सरल है, और जीवन को कितने उत्साह से देखती है। अगले दिन मैंने फैसला किया कि मैं उसे शहर घुमाऊंगा, ताकि वो थोड़ा रिलैक्स हो सके। मैंने अजय से कहा, लेकिन वो व्यस्त था, तो मैं ही प्रिया को ले गया।
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शहर में घूमते हुए हमने आइसक्रीम खाई, और पार्क में बैठे। प्रिया बोली, "अंकल, आप बहुत अच्छे हैं। अजय को आप जैसा पिता मिला है।" मैंने मुस्कुराकर कहा, "तुम भी बहुत अच्छी हो, प्रिया।" उस पल में हमारी नजरें मिलीं, और एक अजीब सी चुप्पी छा गई। मैंने नजरें हटा लीं, लेकिन मन में कुछ हलचल हो रही थी।
घर लौटकर मैंने सोचा कि ये सब गलत है। मैं उसका ससुर हूं, और अजय का बाप। लेकिन प्रिया की मासूमियत मुझे खींच रही थी। अगले दिन सुबह जब वो रसोई में थी, मैं वहां गया। वो चाय बना रही थी, और मैंने उससे बात की। "प्रिया, शादी के बाद क्या प्लान है?" वो बोली, "अंकल, मैं घर संभालूंगी, और पढ़ाई भी।"
बातों-बातों में हम करीब आ गए। एक दिन शाम को बारिश हो रही थी, और घर में बिजली चली गई। अजय बाहर फंस गया था। प्रिया डर रही थी, तो मैंने उसे अपने कमरे में बुलाया। हम मोमबत्ती की रोशनी में बैठे, और बातें करने लगे। उसकी आंखों में डर था, लेकिन मेरी मौजूदगी से वो शांत हो गई।
मैंने उसका हाथ पकड़ा, सांत्वना देने के लिए। लेकिन वो स्पर्श कुछ अलग था। प्रिया ने मेरी ओर देखा, और हमारी सांसें तेज हो गईं। मैंने खुद को रोका, लेकिन मन नहीं माना। "प्रिया, तुम बहुत खास हो," मैंने धीरे से कहा। वो शरमा गई, लेकिन हाथ नहीं छुड़ाया।
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उस रात हमारी बातें गहरी हो गईं। प्रिया ने बताया कि वो कभी किसी के इतने करीब नहीं आई। मैंने उसे गले लगाया, और वो मेरे सीने से लग गई। मेरे मन में संघर्ष था, लेकिन उसकी गर्माहट मुझे पागल कर रही थी। धीरे-धीरे मैंने उसके होंठों को छुआ, और वो सिहर उठी।
हम बिस्तर पर लेट गए। मैंने उसके कपड़े उतारे, धीरे-धीरे, हर स्पर्श में प्यार भरकर। प्रिया की सांसें तेज थीं, और वो बोली, "अंकल, ये गलत है।" लेकिन मैंने कहा, "ये हमारी चाहत है, प्रिया।" मैंने उसके शरीर को सहलाया, और वो कराह उठी।
मेरा हाथ उसके स्तनों पर गया, और मैंने उन्हें दबाया। प्रिया की आंखें बंद हो गईं, और वो मेरे नाम पुकारने लगी। मैंने उसके गुप्तांग को छुआ, और वो गीली हो चुकी थी। धीरे से मैंने अपना लिंग उसके अंदर डाला, लेकिन वो दर्द से चीखी। "धीरे, अंकल," वो बोली। मैं रुका, और फिर धीरे-धीरे अंदर गया।
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उसकी सील टूट गई, और थोड़ा खून निकला। प्रिया रो रही थी, लेकिन मैंने उसे चूमा, और कहा, "ये पहली बार है, अब मजा आएगा।" मैंने धक्के लगाने शुरू किए, धीमे से, और वो अब आनंद लेने लगी। उसकी कराहें कमरे में गूंज रही थीं।
हमारी चुदाई तेज हो गई। मैंने उसे विभिन्न पोजीशन में लिया, कभी ऊपर, कभी नीचे। प्रिया अब पूरी तरह खुल गई थी, और वो मेरे साथ ताल मिला रही थी। उसकी चूत टाइट थी, और हर धक्के में मुझे स्वर्ग का अनुभव हो रहा था।
कुछ देर बाद मैं झड़ गया, उसके अंदर। प्रिया मेरे सीने पर लेट गई, और हम दोनों पसीने से तर थे। वो बोली, "अंकल, ये अद्भुत था।" मैंने उसे चूमा, और हम फिर से शुरू हो गए। इस बार ज्यादा जोश से, ज्यादा गहराई से।
रात भर हम एक-दूसरे में खोए रहे। प्रिया की मासूमियत अब एक जुनून में बदल चुकी थी। मैंने उसे हर तरह से संतुष्ट किया, और वो मेरी हो गई। सुबह होने वाली थी, लेकिन हमारा मिलन जारी था।
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प्रिया ने मेरे लिंग को मुंह में लिया, और चूसने लगी। मैं सिहर उठा, और फिर से उसे चोदा। उसकी चूत अब सूज गई थी, लेकिन वो रुकना नहीं चाहती थी। हम दोनों के शरीर एक हो गए थे, और भावनाएं उफान पर थीं।
अब प्रिया मेरे ऊपर आ गई, और खुद धक्के लगाने लगी। उसकी आंखों में एक नई चमक थी, जैसे वो पहली बार आजाद हुई हो। मैंने उसके नितंब दबाए, और हम दोनों चरम पर पहुंच गए।
हम थककर लेटे रहे, एक-दूसरे को देखते हुए। प्रिया की सांसें अभी भी तेज थीं, और वो मेरे बालों में उंगलियां फिरा रही थी।