बंजारे की छाया

सुबह की धूप अभी-अभी घर की दीवारों पर फैलनी शुरू हुई थी। मैं रिया, अपने छोटे से गांव के घर में चाय की केतली चढ़ा रही थी, जबकि बाहर से मुर्गियों की आवाजें आ रही थीं। रोज की तरह, पापा खेत पर चले गए थे और मां बाजार से सब्जियां लाने गई थीं। मैंने खिड़की से बाहर झांका, जहां दूर तक फैले खेतों में हलकी हवा चल रही थी, और सोचा कि आज का दिन भी वैसा ही शांत गुजरेगा जैसा हमेशा होता है।

मैं पच्चीस साल की हूं, और इस गांव में ही पली-बढ़ी हूं। स्कूल की पढ़ाई के बाद शहर जाना चाहती थी, लेकिन घर की जिम्मेदारियां ने रोक लिया। अब दिनभर घर संभालती हूं, कभी-कभी पड़ोस की औरतों से बातें करती हूं, और शाम को किताबें पढ़ती हूं। आज सुबह मैंने ब्रेकफास्ट तैयार किया, फिर आंगन में झाड़ू लगाने लगी। हवा में मिट्टी की महक थी, और दूर से कोई गाड़ी की आवाज आई, शायद कोई ट्रक गुजर रहा था।

दोपहर होने को आई, जब मैंने घर के बाहर एक टेंट जैसी चीज देखी। हमारे गांव के किनारे पर कुछ बंजारे लोग रुके थे, जो हर साल इस मौसम में आते हैं। वे घुमक्कड़ होते हैं, अपने जानवरों और सामान के साथ। मैंने सुना था कि वे हस्तशिल्प बेचते हैं और थोड़े दिन रुककर चले जाते हैं। आज मैं बाजार जाने के लिए निकली, तो रास्ते में उनकी झुंड नजर आई। मैंने ज्यादा ध्यान नहीं दिया, बस अपनी टोकरी संभालकर आगे बढ़ गई।

बाजार से लौटते वक्त, सूरज ढलने लगा था। रास्ता सुनसान था, और मैं जल्दी-जल्दी चल रही थी। तभी एक लड़का सामने से आता दिखा, उसके कंधे पर एक बोरी थी और चेहरे पर धूल जमी हुई। वह बंजारों में से लग रहा था, क्योंकि उसकी कमीज रंग-बिरंगी थी और गले में कोई ताबीज लटक रहा था। मैंने नजरें झुका लीं और साइड से निकलने लगी, लेकिन उसने रुककर मुस्कुराते हुए कहा, "बहन, ये रास्ता कहां जाता है?"

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मैं रुक गई, क्योंकि उसकी आवाज में एक अजीब सी मिठास थी। मैंने बताया कि ये गांव की मुख्य सड़क है, और आगे शहर की तरफ जाती है। उसने शुक्रिया कहा और बोला कि उसका नाम विजय है, वह बंजारों के साथ यात्रा कर रहा है। मैंने अपना नाम बताया और आगे बढ़ गई, लेकिन मन में उसकी मुस्कान घूमती रही। घर पहुंचकर मैंने सोचा कि ऐसे लोग तो आते-जाते रहते हैं, इसमें क्या खास है। शाम को मां से बात की, उन्होंने कहा कि बंजारे अच्छे लोग होते हैं, बस अपनी दुनिया में रहते हैं।

अगले दिन सुबह, मैं खेत पर पानी देने गई थी। वहां विजय फिर मिला, वह अपने घोड़े को नहला रहा था। उसने मुझे देखकर हाथ हिलाया, और मैंने जवाब दिया। हम थोड़ी बात करने लगे, उसने बताया कि वह राजस्थान से है, और सालभर घूमता रहता है। उसकी जिंदगी की कहानियां सुनकर मुझे अच्छा लगा, क्योंकि मेरी जिंदगी तो एक ही जगह ठहरी हुई है। मैंने पूछा कि क्या कभी थकान नहीं होती, तो उसने हंसकर कहा कि सड़क ही उसका घर है।

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धीरे-धीरे, मैं रोज उससे मिलने लगी। कभी खेत पर, कभी रास्ते में। विजय की आंखों में एक जंगली चमक थी, जो मुझे अंदर तक छूती थी। लेकिन मैं खुद को रोकती थी, क्योंकि वह तो कुछ दिनों का मेहमान था। एक शाम, जब मैं नदी किनारे बैठी थी, वह आया और मेरे पास बैठ गया। हम चुपचाप पानी की लहरें देखते रहे, और उसकी मौजूदगी से मेरे दिल की धड़कन तेज हो गई। उसने धीरे से कहा, "तुम्हारी आंखों में कुछ उदासी है, रिया।"

मैंने चौंककर उसकी तरफ देखा। सच में, मेरी जिंदगी में एक खालीपन था, शादी की बातें चल रही थीं लेकिन मन नहीं मानता था। विजय ने अपनी कहानी सुनाई, कैसे वह कभी किसी जगह नहीं रुकता, लेकिन मेरे साथ बात करके उसे अच्छा लगता है। उस रात घर लौटकर मैं सो नहीं पाई, उसके शब्द मेरे मन में गूंजते रहे। क्या यह सिर्फ दोस्ती थी, या कुछ और? मैं खुद से लड़ रही थी, क्योंकि गांव की लड़की हूं, ऐसे रिश्ते आसान नहीं होते।

कुछ दिन बाद, बारिश का मौसम आ गया। एक दोपहर भारी बारिश हुई, और मैं घर में अकेली थी। विजय अचानक दरवाजे पर आया, भीगा हुआ। उसने कहा कि उसका टेंट बह गया है, क्या थोड़ी देर रुक सकता है। मैंने हिचकिचाते हुए अंदर बुलाया, और उसे तौलिया दिया। हम चाय पीते हुए बात करने लगे, और बाहर की बारिश की आवाज से कमरा और भी करीब लग रहा था। उसकी नजरें मेरी तरफ उठीं, और मैंने महसूस किया कि मेरे अंदर एक आग सुलग रही है।

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विजय ने धीरे से मेरा हाथ पकड़ा, और मैंने विरोध नहीं किया। उसकी उंगलियां गर्म थीं, और मेरे शरीर में एक कंपकंपी दौड़ गई। हम एक-दूसरे की आंखों में देखते रहे, और फिर वह करीब आया। उसका स्पर्श इतना नया था, जैसे कोई सपना। मैंने खुद को रोकने की कोशिश की, लेकिन मन नहीं माना। उस रात, बारिश की धुन में, हम एक हो गए, और मेरी दुनिया बदल गई।

उसके होंठ मेरे होंठों पर थे, नरम और मांगते हुए। मैंने अपनी आंखें बंद कर लीं, और उसके शरीर की गर्माहट महसूस की। विजय ने मुझे धीरे से बाहों में लिया, और मैंने उसके सीने पर सिर टिका दिया। उसकी सांसें तेज थीं, और मेरी भी। हम बिस्तर पर लेट गए, और उसने मेरी साड़ी की साड़ियां खोलनी शुरू कीं। हर स्पर्श में एक नई संवेदना थी, जैसे बिजली का झटका। मैंने उसके बालों में उंगलियां फेर दीं, और वह मेरे गले पर चुंबन करने लगा।

मेरे शरीर में एक मीठा दर्द उभर रहा था, और विजय की आंखों में वासना के साथ प्यार था। उसने मुझे पूरी तरह नग्न किया, और मैं शरमा गई, लेकिन उसकी नजरों ने मुझे सहज कर दिया। उसका शरीर मजबूत था, बंजारे जीवन की मेहनत से तराशा हुआ। मैंने उसके सीने को छुआ, और वह कराह उठा। हम एक-दूसरे में खो गए, हर गति में नई ऊंचाई छूते हुए। बारिश बाहर तेज हो गई, लेकिन हमारे बीच की आग और तेज जल रही थी।

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उस रात के बाद, हमारी मुलाकातें गुप्त हो गईं। कभी नदी किनारे, कभी खेतों में। विजय मुझे अपनी दुनिया दिखाता, और मैं उसे अपनी उदासी बताती। लेकिन मन में डर था, क्योंकि वह तो चला जाएगा। एक शाम, हम फिर मिले, और इस बार हमारी अंतरंगता और गहरी थी। उसने मुझे पीठ पर लिटाया, और मेरे शरीर के हर हिस्से को प्यार किया। मैंने महसूस किया कि यह सिर्फ शारीरिक नहीं, बल्कि भावनात्मक बंधन था।

विजय की उंगलियां मेरी कमर पर फिसल रही थीं, और मैं उसके नाम का उच्चारण कर रही थी। उसने मुझे ऊपर उठाया, और हम एक नए तरीके से जुड़े। हर पल में नई संवेदनाएं थीं, कभी नरमी, कभी तीव्रता। मैंने उसके कंधे पर नाखून गड़ा दिए, और वह और जोर से आया। हमारा मिलन लंबा चला, पसीने से तर और सांसों से भरा। बाद में, हम एक-दूसरे की बाहों में लेटे रहे, और मैंने सोचा कि यह पल हमेशा याद रहेगा।

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कुछ हफ्ते ऐसे ही गुजरे, लेकिन विजय ने बताया कि अब जाना पड़ेगा। मन टूट गया, लेकिन मैंने कुछ नहीं कहा। आखिरी रात, हम फिर मिले, और इस बार हमारी चुदाई और भावुक थी। उसने मुझे कसकर पकड़ा, और मैंने उसके शरीर को महसूस किया। हर धक्के में विदाई का दर्द था, लेकिन सुख भी। हम चरम पर पहुंचे, और मैं रो पड़ी। विजय ने मुझे चुप कराया, लेकिन मैं जानती थी कि वह चला जाएगा।

सुबह वह गया, और मैं अकेली रह गई। लेकिन उसके स्पर्श की यादें मेरे साथ हैं। कभी-कभी रात में, मैं उसकी छाया महसूस करती हूं, और मुस्कुरा उठती हूं।