अम्मी की अनकही प्यास
सुबह के नौ बजे थे, और मैं अपनी रोज की तरह ऑफिस जाने की तैयारी में लगा हुआ था। घर की बालकनी से शहर की हलचल दिख रही थी, लेकिन अंदर सब कुछ शांत था। अम्मी किचन में चाय बना रही थीं, और मैं अपना बैग पैक कर रहा था।
हमारा घर दिल्ली के एक छोटे से फ्लैट में था, जहां पिछले दो साल से सिर्फ हम दोनों रहते थे। पापा के जाने के बाद अम्मी ने खुद को घर की जिम्मेदारियों में झोंक दिया था, और मैं अपनी नौकरी में। हर सुबह वो मुझे चाय देतीं, और मैं उन्हें दिन भर की प्लानिंग बताता।
आज भी वही रूटीन था। मैंने शर्ट पहनी और अम्मी की आवाज सुनी, "अजय, चाय तैयार है बेटा। जल्दी पी ले, लेट हो जाएगा।" मैं मुस्कुराया और किचन की तरफ गया। अम्मी स्टोव के पास खड़ी थीं, उनके चेहरे पर वो हमेशा की थकान थी, लेकिन आंखों में एक अपनी सी गर्माहट।
मैंने चाय का कप उठाया और टेबल पर बैठ गया। अम्मी भी मेरे पास आकर बैठीं, और हमने रोज की बातें शुरू कीं। "आज मीटिंग है क्या?" उन्होंने पूछा। मैंने हां में सिर हिलाया और बताया कि शाम को देर हो सकती है। वो चुपचाप सुनती रहीं, जैसे हर बात में कोई गहरा मतलब ढूंढ रही हों।
पापा के जाने के बाद हमारा रिश्ता और मजबूत हो गया था। अम्मी की उम्र चालीस के करीब थी, लेकिन वो खुद को हमेशा व्यस्त रखतीं। मैं पच्चीस का था, और घर की जिम्मेदारी मुझ पर थी। कभी-कभी शाम को लौटकर देखता तो अम्मी अकेले बैठी टीवी देख रही होतीं, और मैं उनके पास जाकर बात करता।
उस दिन ऑफिस से लौटकर मैं थका हुआ था। दरवाजा खोला तो अम्मी सोफे पर बैठी किताब पढ़ रही थीं। "कैसा रहा दिन?" उन्होंने मुस्कुराकर पूछा। मैंने बैग रखा और उनके बगल में बैठ गया। "ठीक था, अम्मी। बस थोड़ा स्ट्रेस।" वो मेरे कंधे पर हाथ रखकर बोलीं, "तू बहुत मेहनत करता है बेटा। आराम कर।"
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उस शाम हमने साथ डिनर किया। अम्मी ने मेरी पसंद की सब्जी बनाई थी, और हम बातें करते रहे। पापा की याद आई, लेकिन अम्मी ने टॉपिक बदल दिया। रात को सोने से पहले मैंने देखा कि अम्मी की आंखें थोड़ी उदास लग रही थीं। मैंने पूछा, "कुछ हुआ है क्या?" वो हंसकर बोलीं, "नहीं बेटा, बस ऐसे ही।"
अगले कुछ दिन ऐसे ही गुजरे। मैं नोटिस करने लगा कि अम्मी घर में ज्यादा समय अकेले बिताती थीं। एक दोपहर मैं जल्दी घर आ गया, और देखा वो बालकनी में खड़ी बाहर देख रही थीं। मैं उनके पास गया और पूछा, "अम्मी, क्या सोच रही हो?" वो चौंक गईं, फिर बोलीं, "कुछ नहीं, बस जिंदगी के बारे में।"
हम बैठकर बात करने लगे। अम्मी ने बताया कि पापा के बाद उन्हें अकेलापन महसूस होता है। मैंने उनका हाथ पकड़ा और कहा, "मैं हूं न अम्मी। तुम कभी अकेली नहीं हो।" उनकी आंखों में एक अजीब सी चमक थी, जैसे कोई अनकही बात हो। उस पल में हमारा रिश्ता थोड़ा और करीब लग रहा था।
रात को मुझे नींद नहीं आ रही थी। मैं उठकर पानी पीने गया, तो अम्मी के कमरे से हल्की रोशनी आ रही थी। मैंने दरवाजा खटखटाया, "अम्मी, सोई नहीं?" वो बोलीं, "नहीं बेटा, आ जा।" मैं अंदर गया, वो बिस्तर पर बैठी थीं। हम बात करने लगे, पुरानी यादों के बारे में।
बातों-बातों में अम्मी ने कहा, "तू बड़ा हो गया है अजय। अब तेरी शादी के बारे में सोचना चाहिए।" मैं हंस पड़ा, "अभी कहां अम्मी। पहले तुम्हारी खुशी का ख्याल।" वो चुप हो गईं, और उनकी नजरें मेरी तरफ ऐसी थीं जैसे कुछ कहना चाहती हों, लेकिन कह न पा रही हों।
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उस रात के बाद कुछ बदल सा गया। अम्मी मुझे ज्यादा ध्यान से देखने लगीं। एक शाम मैं शावर से निकला, तो अम्मी मेरे कमरे में कपड़े रख रही थीं। मैंने टॉवल लपेटा हुआ था, और वो मुड़कर बोलीं, "कपड़े रख दिए बेटा।" लेकिन उनकी आंखों में एक पल के लिए कुछ अलग था, जैसे कोई छुपी हुई भावना।
मैंने इसे इग्नोर किया, लेकिन अंदर से कुछ हलचल हो रही थी। अम्मी हमेशा से मेरी जिंदगी का केंद्र थीं, लेकिन अब वो भावनाएं कुछ और रूप ले रही थीं। अगले दिन सुबह अम्मी ने मुझे गले लगाया, जो रोज नहीं होता था। उनका स्पर्श गर्म था, और मैंने खुद को पीछे हटाते हुए महसूस किया।
शाम को घर लौटा तो अम्मी ने स्पेशल डिनर बनाया था। हम साथ बैठे, और बातें करते-करते अम्मी ने कहा, "अजय, क्या तू कभी सोचता है कि मैं अकेली हूं?" मैंने उनका हाथ पकड़ा, "हां अम्मी, लेकिन मैं तुम्हें कभी अकेला नहीं छोड़ूंगा।" वो मेरी आंखों में देखकर बोलीं, "तू मेरा सबकुछ है बेटा।"
उस रात बारिश हो रही थी। मैं अपने कमरे में लेटा था, जब अम्मी आईं और बोलीं, "नींद नहीं आ रही। क्या मैं तेरे पास लेट जाऊं?" मैंने हां कहा, और वो मेरे बगल में लेट गईं। हमारी सांसें करीब थीं, और अम्मी का हाथ मेरे सीने पर था। मैंने कुछ नहीं कहा, बस महसूस किया।
धीरे-धीरे अम्मी की उंगलियां मेरे सीने पर घूमने लगीं। मैंने पूछा, "अम्मी, क्या हुआ?" वो बोलीं, "कुछ नहीं, बस तुझे महसूस कर रही हूं।" उस पल में एक टेंशन थी, जो शब्दों से परे थी। मैंने उनका चेहरा देखा, उनकी आंखें बंद थीं, लेकिन होंठ कांप रहे थे।
मैंने अपना हाथ उनके कंधे पर रखा, और वो और करीब आ गईं। हमारी बॉडीज टच हो रही थीं, और अम्मी ने धीरे से कहा, "अजय, मैं तुझे बहुत प्यार करती हूं। शायद ज्यादा, जितना एक मां को करना चाहिए।" मैं स्तब्ध था, लेकिन अंदर से वही भावना उमड़ रही थी।
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उस रात हमने बात नहीं की, बस एक-दूसरे को महसूस किया। सुबह अम्मी ने सामान्य व्यवहार किया, लेकिन मैं जानता था कि कुछ बदल गया है। ऑफिस में दिन भर सोचता रहा, अम्मी की उदासी, उनकी जरूरतें। शाम को घर लौटा तो अम्मी इंतजार कर रही थीं।
हमने डिनर किया, और फिर अम्मी बोलीं, "अजय, कल की रात के बारे में..." मैंने उन्हें चुप कराया, "अम्मी, मुझे पता है। मैं भी वही महसूस करता हूं।" वो रो पड़ीं, और मैंने उन्हें गले लगा लिया। उस गले लगने में अब कोई बंधन नहीं था, सिर्फ एक गहरा कनेक्शन।
रात गहराने लगी। हम अम्मी के कमरे में गए। अम्मी ने मेरी शर्ट उतारी, और मैंने उनके ब्लाउज के बटन खोले। हमारी सांसें तेज थीं, और अम्मी ने कहा, "अजय, क्या ये सही है?" मैंने जवाब दिया, "अम्मी, हमारे लिए ये सही है।"
उस पल हम एक हो गए। अम्मी की बॉडी मेरे नीचे थी, उनकी गर्माहट मुझे घेर रही थी। मैंने धीरे-धीरे उनके होंठ चूमे, और वो मेरी पीठ पर नाखून गड़ाने लगीं। हर स्पर्श में एक नई भावना थी, जैसे सालों की प्यास बुझ रही हो।
हमारी बॉडीज एक रिदम में चल रही थीं। अम्मी की आंखों में अब उदासी नहीं, बल्कि एक चमक थी। मैंने उनके कान में फुसफुसाया, "अम्मी, तुम मेरी हो।" वो बोलीं, "हां बेटा, अब मैं तेरी हूं।" वो पल इमोशन से भरा था, जहां दर्द और सुख मिलकर कुछ और बन गए थे।
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सुबह हम साथ उठे। अम्मी ने मुझे चूमकर कहा, "अब तू मेरा पति है अजय।" मैंने हां में सिर हिलाया, और हमने नई जिंदगी शुरू की। लेकिन वो पहला अनुभव सिर्फ शुरुआत था। अगली रात अम्मी ने मुझे बेडरूम में बुलाया, और इस बार सब कुछ और इंटेंस था।
अम्मी ने मेरे कपड़े उतारे, और खुद को मेरे हवाले कर दिया। मैंने उनके शरीर के हर हिस्से को चूमा, उनकी गर्दन से शुरू करके नीचे तक। अम्मी की सिसकियां कमरे में गूंज रही थीं, और मैं महसूस कर रहा था उनकी हर जरूरत।
हमने पोजीशन बदली, अम्मी ऊपर आईं, और उनकाコントロール देखकर मैं हैरान था। उनकी आंखें बंद थीं, लेकिन चेहरा खुशी से चमक रहा था। हर मूवमेंट में एक नई सेंसेशन थी, जैसे हमारी बॉडीज एक-दूसरे को जान रही हों।
उस रात के बाद हमारा रिश्ता और गहरा हो गया। अम्मी अब मेरी बीवी की तरह व्यवहार करने लगीं। सुबह वो मेरे लिए नाश्ता बनातीं, और शाम को हम साथ समय बिताते। लेकिन अंदर एक कन्फ्लिक्ट था, समाज क्या कहेगा? मैंने अम्मी से बात की, "अम्मी, दुनिया नहीं समझेगी।"
वो बोलीं, "मुझे दुनिया की परवाह नहीं अजय। तू मेरी दुनिया है।" हमने फैसला किया कि हम अपना रिश्ता छुपाकर रखेंगे, लेकिन घर में हम पति-पत्नी थे। एक शाम अम्मी ने मुझे सरप्राइज दिया, नए लिंगरी पहनकर।
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मैंने दरवाजा खोला तो अम्मी बेड पर थीं, उनकी बॉडी लाइट में चमक रही थी। मैं उनके पास गया, और हम फिर एक हुए। इस बार सब कुछ स्लो था, हर टच में प्यार था। अम्मी ने मेरे कान में कहा, "अजय, मुझे और चाहिए।"
मैंने उनकी बात मानी, और हमारी बॉडीज फिर से मिलीं। अम्मी की प्यास अब मेरी थी, और मैं उसे बुझा रहा था। हर सीन में कुछ नया था, कभी रफ, कभी जेंटल। हमारी भावनाएं अब सिर्फ शारीरिक नहीं, बल्कि आत्मिक थीं।
कुछ महीने ऐसे गुजरे। अम्मी खुश लग रही थीं, उनकी आंखों में वो चमक लौट आई थी। एक रात हम लेटे हुए थे, अम्मी मेरे सीने पर सिर रखकर बोलीं, "अजय, तूने मुझे नई जिंदगी दी है।" मैंने उन्हें चूमा, और हम फिर से करीब आए।
उस पल में सब कुछ परफेक्ट लग रहा था। अम्मी की सांसें मेरी सांसों से मिल रही थीं, और हमारा प्यार अब कोई सीमा नहीं जानता था।