अम्मी की आस्था का छल

सुबह की पहली किरण घर की खिड़की से अंदर झांक रही थी। मैं उठा और रोज की तरह चाय बनाने के लिए रसोई की ओर चला। अम्मी पहले से ही वहां थीं, सब्जियां काट रही थीं। बाहर गली में बच्चों की आवाजें आ रही थीं, और दूर मस्जिद से अजान की आवाज गूंज रही थी। हमारा छोटा सा घर दिल्ली की एक पुरानी बस्ती में था, जहां हर दिन एक जैसा लगता था – काम, नमाज और परिवार की छोटी-मोटी बातें।

मैं अहमद हूं, बीस साल का। अम्मी फातिमा हैं, चालीस की उम्र में भी उनकी आंखों में वो चमक बनी हुई है जो मुझे बचपन से याद है। अब्बू तीन साल पहले गुजर गए थे, हार्ट अटैक से। उसके बाद से अम्मी ने घर संभाला, सिलाई का काम करके हमें पाला। मैं कॉलेज जाता हूं और पार्ट-टाइम एक दुकान पर काम करता हूं। जीवन सामान्य था, लेकिन अम्मी की चिंता मुझे हमेशा सताती थी। वे अकेली पड़ गई थीं, और कभी-कभी रात को उनकी सिसकियां सुनाई देती थीं।

उस दिन अम्मी ने चाय बनाई और मेरे सामने रख दी। "बेटा, आज कॉलेज जल्दी जाना है न?" उन्होंने पूछा, उनकी आवाज में वो पुरानी ममता थी। मैंने हां में सिर हिलाया और चाय पीते हुए बाहर की खबरें देखीं। अम्मी ने बताया कि पड़ोस की आंटी ने किसी बाबा का जिक्र किया था, जो लोगों की समस्याएं हल करते हैं। "कभी-कभी लगता है, अल्लाह की मेहरबानी से कोई रास्ता मिल जाए," उन्होंने धीरे से कहा। मैंने ज्यादा ध्यान नहीं दिया, सोचा बस यूं ही बात है।

दिन बीतते गए। अम्मी की दिनचर्या में कोई बदलाव नहीं था – सुबह उठना, नमाज पढ़ना, सिलाई करना और शाम को मेरे लिए खाना बनाना। लेकिन एक शाम जब मैं घर लौटा, तो अम्मी थोड़ी उदास लग रही थीं। "क्या हुआ अम्मी?" मैंने पूछा। उन्होंने बताया कि सिर दर्द बहुत हो रहा है, डॉक्टर की दवा से भी फायदा नहीं। पड़ोस की शबाना आंटी ने फिर उस बाबा का नाम लिया – बाबा रामदास, जो शहर के बाहर एक आश्रम में रहते हैं। "शायद एक बार मिल लूं," अम्मी ने कहा। मैंने मना किया, कहा कि ये सब ढोंग है, लेकिन अम्मी ने कहा कि कोशिश करके देखने में क्या हर्ज है।

अगले हफ्ते अम्मी बाबा रामदास से मिलने गईं। मैं काम पर था, शाम को लौटा तो अम्मी खुश लग रही थीं। "बाबा ने कहा है कि मेरी समस्या का हल है, बस थोड़ा वक्त लगेगा," उन्होंने बताया। बाबा ने कोई जड़ी-बूटी दी थी और कुछ मंत्र पढ़े थे। मैंने सोचा शायद प्लेसिबो इफेक्ट है, लेकिन अम्मी की आंखों में उम्मीद देखकर खुश हुआ। धीरे-धीरे अम्मी आश्रम जाना शुरू कर दीं। हर रविवार को जातीं, और लौटकर बतातीं कि बाबा कितने दयालु हैं, कैसे वे लोगों की मदद करते हैं।

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मुझे थोड़ा अजीब लगने लगा। अम्मी पहले इतनी धार्मिक नहीं थीं, लेकिन अब्बू के जाने के बाद शायद उन्हें कोई सहारा चाहिए था। एक दिन मैंने साथ जाने की पेशकश की, लेकिन अम्मी ने मना कर दिया। "तू व्यस्त रहता है बेटा, मैं अकेली चली जाती हूं," उन्होंने कहा। उनकी आवाज में एक नई नरमी थी, जैसे कोई राज छुपा हो। मैंने ज्यादा नहीं सोचा, लेकिन रात को सोते समय अम्मी की मुस्कान याद आती, और मन में एक अजीब सी बैचेनी होती।

कुछ दिनों बाद, अम्मी ने बताया कि बाबा ने उन्हें विशेष पूजा के लिए बुलाया है। "ये पूजा रात को होगी, क्योंकि ग्रहों की स्थिति ऐसी है," उन्होंने कहा। मैं चिंतित हुआ। "अम्मी, रात को अकेले जाना ठीक नहीं। मैं साथ चलूं?" लेकिन अम्मी ने हंसकर कहा, "बाबा के आश्रम में सब सुरक्षित है, तू फिक्र मत कर।" उस रात अम्मी गईं, और मैं घर पर अकेला था। घड़ी की सुइयां धीरे-धीरे घूम रही थीं, लेकिन अम्मी नहीं लौटीं। सुबह हुई तो वे घर आईं, थकी हुई लेकिन संतुष्ट। "पूजा अच्छी हुई, बाबा ने बहुत प्रार्थना की," उन्होंने कहा। उनकी आंखों में एक चमक थी, जो मुझे असहज कर रही थी।

मैंने छुपकर अम्मी की डायरी देखी, जो वे कभी-कभी लिखती थीं। उसमें बाबा के बारे में लिखा था – कैसे वे दयालु हैं, कैसे उनकी बातें दिल को छूती हैं। लेकिन कुछ लाइनें पढ़कर मैं स्तब्ध रह गया। अम्मी ने लिखा था कि बाबा की नजरें उन्हें विशेष लगती हैं, जैसे वे उनकी आत्मा को पढ़ रहे हों। मन में शक का बीज बोया गया। क्या ये सिर्फ आस्था है, या कुछ और?

एक शाम मैं जल्दी घर लौटा और अम्मी को फोन पर बात करते सुना। "हां बाबा जी, मैं आऊंगी। आपकी बात मानूंगी," उनकी आवाज नरम थी, लगभग कांपती हुई। मैंने दरवाजे से झांककर देखा, अम्मी का चेहरा लाल था, जैसे शर्म से। फोन रखते ही वे चौंकीं। "अहमद, तू कब आया?" मैंने पूछा कि किससे बात कर रही थीं। "बाबा जी से, वे पूजा की तैयारी के लिए बुला रहे थे," उन्होंने जवाब दिया। लेकिन उनकी आंखें मुझसे मिलाने से बच रही थीं।

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मैंने फैसला किया कि खुद आश्रम जाऊंगा। अगले रविवार को अम्मी गईं, और मैं पीछे-पीछे। आश्रम शहर से बाहर एक सुनसान जगह पर था, चारों ओर जंगल। मैं छुपकर अंदर घुसा। वहां भक्तों की भीड़ थी, लेकिन अम्मी को बाबा के निजी कक्ष की ओर जाते देखा। बाबा रामदास लंबे, दाढ़ी वाले आदमी थे, सफेद वस्त्र में। वे अम्मी को देखकर मुस्कुराए, और हाथ पकड़कर अंदर ले गए।

मैं दीवार के पीछे छुपा रहा। अंदर से आवाजें आ रही थीं – बाबा की गहरी आवाज और अम्मी की धीमी हंसी। दिल जोर से धड़क रहा था। मैंने दरार से झांका। अम्मी बाबा के सामने बैठी थीं, बाबा उनका हाथ थामे कुछ मंत्र पढ़ रहे थे। लेकिन उनकी नजरें अम्मी के चेहरे पर टिकी थीं, एक ऐसी नजर जो आस्था से ज्यादा लग रही थी। अम्मी की सांसें तेज थीं, जैसे वे घबराई हुई हों।

धीरे-धीरे टेंशन बढ़ने लगी। बाबा ने अम्मी के कंधे पर हाथ रखा, और कहा, "फातिमा, तुम्हारी आत्मा में दर्द है, मैं उसे दूर करूंगा।" अम्मी ने सिर झुका लिया। मेरे मन में उथल-पुथल मची थी। क्या ये छल है? मैं बाहर इंतजार करता रहा। जब अम्मी लौटीं, उनकी चाल में एक नई लय थी, लेकिन चेहरे पर थकान। घर पहुंचकर मैंने पूछा, लेकिन उन्होंने टाल दिया।

रात को नींद नहीं आई। मैं सोचता रहा कि अम्मी क्यों बदल रही हैं। अगले दिन अम्मी फिर आश्रम गईं। इस बार मैं और सावधानी से पीछा किया। अंदर जाकर देखा, बाबा अम्मी को गले लगा रहे थे, जैसे सांत्वना दे रहे हों। लेकिन वो गले लगाना लंबा था, अम्मी की आंखें बंद थीं। बाबा की हाथ अम्मी की कमर पर सरक रहे थे। मेरी सांस रुक गई। अम्मी ने विरोध नहीं किया, बल्कि他们的 몸 कांप रहा था।

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मैं वहां से भागा, मन में गुस्सा और दर्द। घर पर अम्मी से बात करने का फैसला किया। शाम को जब वे लौटीं, मैंने कहा, "अम्मी, ये सब क्या है? बाबा के साथ?" अम्मी चौंकीं, फिर रोने लगीं। "बेटा, तू नहीं समझेगा। अब्बू के जाने के बाद मैं अकेली थी, बाबा ने सहारा दिया। लेकिन अब... अब ये आस्था से आगे बढ़ गया है।" उनकी आवाज में पछतावा था।

अम्मी ने सब बता दिया। शुरू में बाबा ने मदद की, लेकिन धीरे-धीरे उन्होंने अम्मी को अपनी बातों में फंसाया। विशेष पूजा के नाम पर करीब लाया, और एक रात... अम्मी की आंखें भर आईं। "मैं कमजोर पड़ गई, बेटा। उनकी छुअन ने मुझे वो महसूस कराया जो सालों से नहीं हुआ।" मैं स्तब्ध था, गुस्से से कांप रहा था। लेकिन अम्मी की आंखों में वो दर्द देखकर चुप रहा।

फिर भी अम्मी जाना बंद नहीं कर पाईं। जैसे कोई जादू हो। एक रात मैं फिर आश्रम गया। इस बार अंदर घुसा। बाबा और अम्मी अकेले थे। बाबा अम्मी के कपड़े उतार रहे थे, धीरे-धीरे। अम्मी की सांसें तेज थीं, शरीर कांप रहा था। बाबा की उंगलियां अम्मी की त्वचा पर फिसल रही थीं, जैसे कोई पूजा कर रहे हों। अम्मी ने आंखें बंद कर लीं, और एक आह निकली।

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मैं देखता रहा, मन में तूफान। बाबा ने अम्मी को बिस्तर पर लिटाया, उनके होंठ अम्मी के गले पर। अम्मी की उंगलियां बाबा के बालों में घूम रही थीं, जैसे सालों का अकेलापन निकाल रही हों। बाबा की हरकतें तेज हुईं, अम्मी की सिसकियां कमरे में गूंजीं। वो पल इतना इंटेंस था कि मैं हिल नहीं पाया। अम्मी का शरीर बाबा के नीचे तड़प रहा था, हर धक्के के साथ एक नई भावना उभर रही थी – दर्द, सुख, पछतावा।

बाबा ने अम्मी के स्तनों को चूमा, उनकी जीभ अम्मी की त्वचा पर घूमी। अम्मी ने कराहते हुए कहा, "बाबा जी, ये गलत है... लेकिन रुकिए मत।" बाबा हंसे, और गहराई में उतर गए। अम्मी की आंखों से आंसू बह रहे थे, लेकिन शरीर ने सरेंडर कर दिया। वो रात लंबी थी, हर मिनट में नई सेंसेशन – गर्मी, पसीना, स्पर्श की बिजली।

अगली बार जब अम्मी गईं, तो मैंने रोकने की कोशिश की। लेकिन अम्मी ने कहा, "बेटा, ये मेरी कमजोरी है। बाबा ने मुझे वो दिया जो मैं भूल चुकी थी।" मैंने बाबा से बात की, लेकिन उन्होंने मुझे धमकाया। अम्मी की लत बढ़ती गई। एक शाम आश्रम में, बाबा ने अम्मी को नए तरीके से छुआ – पीछे से, धीरे-धीरे घुसते हुए। अम्मी की चीख निकली, लेकिन फिर वो सुख में डूब गईं। हर बार कुछ नया – कभी बंधन, कभी अलग पोजीशन, लेकिन हमेशा इमोशनल गहराई। अम्मी का चेहरा बदलता, जैसे वो खुद को खो रही हों।

मैंने अम्मी को समझाया, लेकिन वो फंस चुकी थीं। एक रात, बाबा ने अम्मी को पूरी तरह अपना बना लिया। उनके शरीर एक हो गए, पसीने से लथपथ। अम्मी की आहें, बाबा की सांसें, सब मिक्स हो गया। अम्मी ने बाद में मुझसे कहा, "बेटा, मैं जानती हूं ये छल है, लेकिन ये एहसास... वो मुझे जीवित महसूस कराता है।" मेरे मन में कन्फ्लिक्ट था – गुस्सा, दया, और एक अजीब सी समझ।

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समय बीतता गया। अम्मी की मुलाकातें जारी रहीं, हर बार नई भावना के साथ। कभी गुस्से में, कभी प्यार से। बाबा की छुअन अम्मी को बदल रही थी, लेकिन अंदर से तोड़ भी रही थी। एक शाम, अम्मी बाबा के साथ थीं, उनके हाथ अम्मी की जांघों पर। अम्मी ने आंखें बंद कीं, और वो पल फिर शुरू हुआ – सेंसरी वेव्स, शरीर की गर्मी, दिल की धड़कन।

मैं बाहर खड़ा था, सुनता हुआ। अम्मी की आवाज में अब पछतावा कम था, सुख ज्यादा। बाबा ने अम्मी को ऊपर लिया, अम्मी की हरकतें तेज। वो चरम पर पहुंचे, अम्मी की कराह कमरे में गूंजी। लेकिन उस पल में अम्मी की आंखें खुलीं, और उन्होंने मुझे देखा। शॉक, लेकिन कोई शब्द नहीं।

घर लौटकर अम्मी रोईं। "बेटा, मुझे माफ कर दे। ये सब... मैं रोक नहीं पाई।" मैंने उन्हें गले लगाया, मन में दर्द। लेकिन वो रिश्ता अब बदल चुका था। अम्मी ने बाबा से दूर होने की कोशिश की, लेकिन एक आखिरी मुलाकात हुई। उस रात, सब कुछ इंटेंस था – बाबा की उंगलियां अम्मी के हर हिस्से पर, अम्मी का शरीर जवाब देता हुआ। चरम पर पहुंचकर अम्मी ने कहा, "बस, अब खत्म।"

लेकिन वो खत्म नहीं हुआ। अम्मी की आंखों में वो चमक बनी रही, और एक शाम फिर आश्रम की ओर जाते हुए