अम्मी की अनकही प्यास
सुबह की पहली किरण खिड़की से झांक रही थी, जब मैं बिस्तर से उठा। हमारा छोटा सा घर दिल्ली की एक पुरानी कॉलोनी में बसा था, जहां हर दिन की शुरुआत एक जैसी लगती थी। मैं अजय हूं, कॉलेज का आखिरी साल चल रहा था, और रोज की तरह आज भी मुझे क्लास के लिए तैयार होना था। अम्मी किचन में चाय बना रही थीं, उनकी आवाज़ हल्की सी गुनगुनाहट के साथ आ रही थी।
मैंने अपना बैग उठाया और किचन की तरफ बढ़ा। अम्मी ने मुस्कुराकर कहा, "बेटा, चाय पी लो, बाहर ठंड है।" मैंने हां में सिर हिलाया और कुर्सी पर बैठ गया। हमारा परिवार बस हम दोनों ही थे, अब्बू दो साल पहले गुजर चुके थे, और अम्मी ने घर और मेरी पढ़ाई को संभाल लिया था। वो चालीस की उम्र में भी घर के काम में इतनी व्यस्त रहतीं कि कभी थकान नहीं दिखातीं।
चाय पीते हुए मैंने अम्मी से पूछा, "आज बाजार जाना है क्या? शाम को आते हुए कुछ ले आऊं?" वो हंसकर बोलीं, "नहीं बेटा, सब है। तू अपनी पढ़ाई पर ध्यान दे।" हमारी बातें हमेशा ऐसी ही साधारण होतीं, लेकिन अब्बू के जाने के बाद अम्मी की आंखों में एक खालीपन सा नजर आता था। मैं कोशिश करता कि उन्हें अकेला न महसूस हो, शाम को साथ बैठकर टीवी देखते या पुरानी यादें साझा करते।
कॉलेज से लौटते हुए मैंने सोचा कि आज अम्मी के लिए कुछ स्पेशल करूं। रास्ते में फूलों की दुकान से गुलाब का एक गुच्छा ले लिया। घर पहुंचा तो अम्मी दरवाजे पर ही खड़ी थीं, जैसे मेरा इंतजार कर रही हों। "क्या बात है अम्मी, आज इतनी जल्दी?" मैंने पूछा। वो बोलीं, "बस ऐसे ही, आज मन नहीं लग रहा था।" उनकी आवाज में एक उदासी थी, जो मुझे चुभ गई।
शाम को हम साथ बैठे, अम्मी ने खाना बनाया था। खाते हुए मैंने देखा कि वो बार-बार मुझे देख रही थीं। "कुछ हुआ है क्या?" मैंने पूछा। अम्मी ने सिर झुका लिया, "नहीं बेटा, बस अब्बू की याद आ रही थी। तू बड़ा हो गया है, लेकिन घर सूना लगता है।" मैंने उनका हाथ पकड़ा, "मैं हूं न अम्मी, आपको कभी अकेला नहीं छोड़ूंगा।" वो मुस्कुराईं, लेकिन उनकी आंखें नम थीं।
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रात को मैं अपने कमरे में लेटा था, लेकिन नींद नहीं आ रही थी। अम्मी का चेहरा बार-बार आंखों के सामने घूम रहा था। वो कितनी मजबूत थीं, लेकिन अंदर से टूट रही थीं। अगले दिन सुबह मैंने फैसला किया कि अम्मी को बाहर घुमाने ले जाऊं। "चलो अम्मी, आज पार्क चलते हैं," मैंने कहा। वो हैरान हुईं, लेकिन तैयार हो गईं। पार्क में घूमते हुए हमने बहुत बातें कीं, पुराने दिनों की, मेरे बचपन की।
घर लौटकर अम्मी ने कहा, "बहुत अच्छा लगा बेटा, शुक्रिया।" उनकी मुस्कान में एक नई चमक थी। शाम को जब मैं पढ़ाई कर रहा था, अम्मी मेरे कमरे में आईं, "कुछ चाहिए?" मैंने नजर उठाई, और पहली बार महसूस किया कि अम्मी कितनी खूबसूरत हैं। लेकिन मैंने खुद को झिड़का, ये क्या सोच रहा हूं। वो बैठ गईं और बातें करने लगीं, उनकी हंसी कमरे में गूंज रही थी।
दिन बीतते गए, और हमारी निकटता बढ़ती गई। अम्मी अब ज्यादा समय मेरे साथ बितातीं, कभी मेरी शर्ट इस्त्री करतीं, कभी मेरे लिए स्पेशल डिश बनातीं। एक शाम बारिश हो रही थी, हम दोनों बालकनी में खड़े थे। अम्मी की साड़ी भीग गई थी, और वो ठंड से कांप रही थीं। मैंने अपना शॉल उन्हें ओढ़ाया, "अम्मी, अंदर चलो।" लेकिन वो वहीं खड़ी रहीं, मेरी तरफ देखते हुए।
उस रात अम्मी मेरे कमरे में आईं, "नींद नहीं आ रही बेटा।" मैंने उन्हें बिस्तर पर बैठने को कहा। हम बातें करने लगे, और अचानक अम्मी की आंखों में आंसू आ गए। "मैं अकेली हूं अजय, अब्बू के बाद सब बदल गया।" मैंने उन्हें गले लगा लिया, "मैं हूं न।" वो मेरे सीने से लगी रहीं, उनकी सांसें मेरी त्वचा पर महसूस हो रही थीं।
उस पल में कुछ बदल गया। अम्मी ने मेरी तरफ देखा, उनकी आंखों में एक अनकही भावना थी। मैंने अपना हाथ उनके चेहरे पर रखा, और धीरे से उनके होंठों को छुआ। वो पीछे नहीं हटीं, बल्कि मेरी तरफ झुक गईं। हमारा पहला चुंबन इतना कोमल था, जैसे सालों की प्यास एक साथ बुझ रही हो। मैंने उन्हें बाहों में भरा, और हम बिस्तर पर लेट गए।
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अम्मी की साड़ी धीरे-धीरे उतर रही थी, उनकी त्वचा गर्म और मुलायम थी। मैंने उनके शरीर को सहलाया, हर स्पर्श में प्यार था। वो कराह उठीं, "अजय, ये सही है?" मैंने कहा, "अम्मी, अब आप मेरी हैं।" हम एक हो गए, उस रात की अंतरंगता में सब कुछ भूल गए। उनकी सांसें तेज थीं, मेरा शरीर उनके साथ तालमेल बिठा रहा था।
सुबह उठकर अम्मी ने मुझे देखा, उनकी आंखों में शर्म और खुशी का मिश्रण था। "बेटा, अब क्या?" मैंने कहा, "अम्मी, आप अब मेरी बीवी हैं।" वो हंस पड़ीं, और हम फिर से एक दूसरे में खो गए। दिनचर्या बदल गई, अब हम पति-पत्नी की तरह रहते। शाम को अम्मी मेरे लिए तैयार होतीं, और रातें हमारी प्यास बुझातीं।
एक दिन अम्मी ने कहा, "अजय, मुझे डर लगता है, समाज क्या कहेगा?" मैंने उन्हें चुप कराया, "हमारा प्यार काफी है।" हमारी अंतरंगता बढ़ती गई, हर बार नई थी। कभी मैं उन्हें पीछे से पकड़ता, उनकी कमर पर吻 करता, कभी वो मेरे ऊपर आ जातीं, अपनी इच्छाओं को खुलकर व्यक्त करतीं।
रात को अम्मी की बाहों में लेटा मैं सोचता, ये सब कैसे हुआ। लेकिन अब ये हमारी सच्चाई थी। अम्मी की प्यास अब मेरी थी, और मैं उन्हें हर पल खुश रखता। हमारा घर अब प्यार से भरा था, कोई खालीपन नहीं। अम्मी ने मेरे कान में फुसफुसाया, "अजय, और करीब आओ।"
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मैंने उन्हें अपनी तरफ खींचा, हमारी सांसें मिल रही थीं। अम्मी की उंगलियां मेरे बालों में घूम रही थीं, और मैं उनके शरीर को सहला रहा था। वो कराह उठीं, उनकी आंखें बंद थीं। हम धीरे-धीरे एक ритम में बहने लगे, हर गति में गहराई बढ़ती जा रही थी। अम्मी ने मेरे कंधे पर अपना सिर रखा, और मैंने उनकी कमर को मजबूती से पकड़ा।
उस पल में समय रुक सा गया था, हमारी दुनिया बस हम दोनों की थी। अम्मी की सिसकियां कमरे में गूंज रही थीं, और मैं उनकी हर इच्छा को पूरा कर रहा था। वो मेरे ऊपर आईं, अपनी गति को तेज किया, उनकी आंखों में एक जंगली प्यास थी। मैंने उनके स्तनों को छुआ, धीरे से दबाया, और वो और जोर से कराह उठीं।
हमारी अंतरंगता अब रोज की आदत बन गई थी, लेकिन हर बार नई लगती। अम्मी अब खुलकर अपनी भावनाओं को व्यक्त करतीं, कभी मुझे किस करतीं, कभी मेरे शरीर पर अपनी उंगलियां चलातीं। एक शाम हम किचन में थे, अम्मी खाना बना रही थीं। मैंने पीछे से उन्हें पकड़ा, उनकी गर्दन पर吻 किया। वो मुड़ीं और बोलीं, "अजय, रुको न।" लेकिन उनकी आंखें कुछ और कह रही थीं।
हम किचन काउंटर पर ही एक हो गए, जल्दबाजी में लेकिन गहराई से। अम्मी की साड़ी ऊपर उठी, और मैंने उन्हें वहां स्पर्श किया जहां उनकी प्यास सबसे ज्यादा थी। वो मेरे कंधे पर झुकीं, उनकी सांसें तेज थीं। हमारा मिलन छोटा लेकिन तीव्र था, जैसे आग की लपटें। उसके बाद अम्मी ने मुझे गले लगाया, "तू मेरी जान है।"
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रातें अब लंबी लगतीं, हम बातें करते, हंसते, और फिर प्यार में डूब जाते। अम्मी की उम्र का कोई असर नहीं था, वो युवा लगतीं मेरी बाहों में। एक रात हमने लाइट्स बंद कीं, सिर्फ चांदनी में एक दूसरे को देखा। मैंने उनके पूरे शरीर को吻 किया, हर हिस्से को प्यार से छुआ। अम्मी की कराहें अब संगीत लगतीं।
वो मेरे ऊपर आईं, अपनी कमर को हिलाती हुईं। मैंने उनके कूल्हों को पकड़ा, गति को मैच किया। हमारी पसीने से भीगी त्वचा एक दूसरे से चिपक रही थी। अम्मी ने मेरे होंठों को काटा, उनकी इच्छा अब बेकाबू थी। हम चरम पर पहुंचे, साथ में, एक दूसरे की आंखों में देखते हुए।
सुबह अम्मी मेरे बगल में लेटी थीं, उनकी सांसें शांत थीं। मैंने उन्हें देखा, और सोचा कि ये प्यार कितना गहरा है। दिन में हम सामान्य रहते, लेकिन रातें हमारी होतीं। अम्मी अब ज्यादा मुस्कुरातीं, उनकी उदासी गायब थी। हमारा रिश्ता अब अम्मी-बेटे से आगे बढ़ चुका था।
एक शाम हम पार्क गए, हाथ में हाथ डाले। अम्मी ने कहा, "अजय, मैं खुश हूं।" मैंने उन्हें चूमा, वहां सबके सामने नहीं, लेकिन दिल से। घर लौटकर हम फिर से एक हुए, इस बार धीमे और भावुक तरीके से। अम्मी की उंगलियां मेरी पीठ पर निशान बना रही थीं, और मैं उनकी गहराइयों में खोया था।
हमारी प्यास कभी न बुझने वाली थी, हर बार नई लगती। अम्मी ने मेरे कान में कहा, "और जोर से, अजय।" मैंने उनकी बात मानी, हमारी गति तेज हुई। कमरा हमारी सिसकियों से भर गया, और हम फिर से चरम पर पहुंचे। अम्मी मेरे सीने पर लेटीं, उनकी दिल की धड़कन मेरी से मिल रही थी।
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ये सब अब हमारी जिंदगी का हिस्सा था, कोई पछतावा नहीं। अम्मी अब मेरी बीवी थीं, हर मायने में। हम साथ सोते, उठते, और प्यार करते। एक रात अम्मी ने मुझे जगाया, "अजय, मुझे चाहिए तुम।" मैंने उन्हें बाहों में लिया, और हम फिर से शुरू हो गए। उनकी त्वचा पर मेरे होंठ घूम रहे थे, वो कांप रही थीं।
हमारी अंतरंगता में अब कोई बंधन नहीं था, खुलकर सब कुछ। अम्मी की आंखें बंद थीं, वो मेरे नाम का जाप कर रही थीं। मैंने उनकी कमर को उठाया, गहराई तक पहुंचा। हमारा मिलन लंबा चला, हर पल में नई संवेदनाएं। अम्मी ने मेरे बाल खींचे, उनकी कराह ऊंची हो गई।
चरम के बाद हम लेटे रहे, एक दूसरे से चिपके। अम्मी की सांसें धीमी हो रही थीं, लेकिन उनकी उंगलियां अभी भी मेरे शरीर पर घूम रही थीं। मैंने उन्हें देखा, और महसूस किया कि ये प्यार अनंत है।