बुआ की अनकही प्यास

उस सुबह की शुरुआत हमेशा की तरह शांत और सामान्य थी। मैं रोहन, अपने छोटे से अपार्टमेंट में उठा, जहां सूरज की पहली किरण खिड़की से झांक रही थी। घड़ी पर नजर पड़ी तो सात बज रहे थे, और मैंने सोचा कि आज ऑफिस के लिए तैयार होना है, लेकिन पहले चाय बनानी चाहिए।

हमारा परिवार दिल्ली के एक व्यस्त इलाके में रहता है, जहां रोज की भागदौड़ में सब कुछ तयशुदा लगता है। मैं इंजीनियर हूं, तेईस साल का, और पिछले दो साल से नौकरी कर रहा हूं। घर में मां-पापा हैं, और कभी-कभी रिश्तेदार आते-जाते रहते हैं।

उस दिन बुआ का आना तय था। रेखा बुआ, पापा की छोटी बहन, जो लखनऊ से आ रही थीं। वो विधवा हैं, पिछले पांच साल से अकेली रहती हैं, और अक्सर हमारे घर आती हैं कुछ दिन बिताने। मैं उन्हें बचपन से जानता हूं, हमेशा हंसमुख और देखभाल करने वाली।

स्टेशन से उन्हें लेने मैं ही गया। ट्रेन थोड़ी लेट थी, लेकिन जब वो प्लेटफॉर्म पर उतरीं, तो उनका चेहरा थकान से भरा लग रहा था। "रोहन बेटा, कितना बड़ा हो गया तू," उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा, और मैंने उनका बैग उठा लिया।

घर पहुंचकर मां ने उनका स्वागत किया। बुआ ने अपनी यात्रा की बातें बताईं, कैसे लखनऊ में मौसम बदल रहा है, और वो यहां कुछ दिन आराम करने आई हैं। मैंने सोचा कि शाम को ऑफिस से लौटकर उनसे बात करूंगा, क्योंकि बचपन में वो मुझे कहानियां सुनाती थीं।

दोपहर का खाना साथ में खाया। बुआ ने अपनी रोजमर्रा की बातें साझा कीं, कैसे वो घर संभालती हैं, और कभी-कभी अकेलापन महसूस होता है। मैंने ध्यान से सुना, क्योंकि वो मेरी पसंदीदा रिश्तेदार हैं, हमेशा सलाह देने वाली।

शाम को ऑफिस से लौटा तो घर में हल्की सी हलचल थी। बुआ किचन में मां की मदद कर रही थीं, और मैंने जाकर उनसे पूछा कि यात्रा कैसी रही। उन्होंने बताया कि ट्रेन में नींद नहीं आई, लेकिन अब ठीक हैं।

रात का डिनर टेबल पर था। हम सब बैठे, और बातें चलती रहीं। बुआ ने मेरी नौकरी के बारे में पूछा, और मैंने बताया कि काम ठीक चल रहा है, लेकिन कभी-कभी तनाव होता है। वो मुस्कुराईं और बोलीं, "बेटा, जीवन में सब संतुलन की बात है।"

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उस रात सोने से पहले मैं अपने कमरे में था, किताब पढ़ रहा था। बुआ का कमरा मेरे बगल में था, और मैंने सोचा कि कल सुबह उनसे और बात करूंगा। घर में सब कुछ सामान्य लग रहा था, जैसे हमेशा।

अगले दिन सुबह उठा तो बुआ पहले से उठ चुकी थीं। वो बालकनी में खड़ी चाय पी रही थीं। मैं भी वहां गया और बोला, "गुड मॉर्निंग बुआ।" उन्होंने मुस्कुराकर जवाब दिया, और हमने मौसम की बात की।

दिन बीतते गए। बुआ घर में रहतीं, मां के साथ समय बितातीं, और शाम को मैं लौटता तो हम बातें करते। एक शाम वो थोड़ी उदास लगीं। मैंने पूछा, "क्या हुआ बुआ? सब ठीक है न?"

उन्होंने हल्के से सिर हिलाया और बोलीं, "हां बेटा, बस कभी-कभी पुरानी यादें आ जाती हैं। तुम्हारे चाचा के जाने के बाद जीवन थोड़ा खाली सा लगता है।" मैंने उनकी बात सुनी, और दिल से महसूस किया कि वो अकेली हैं।

उस रात मैं सोचता रहा। बुआ की उम्र चालीस के आसपास है, लेकिन वो अब भी इतनी जीवंत हैं। मैंने कभी उन्हें इस नजर से नहीं देखा था, लेकिन उनकी उदासी मुझे छू गई। अगले दिन मैंने फैसला किया कि उन्हें खुश रखने की कोशिश करूंगा।

एक दोपहर ऑफिस से छुट्टी लेकर मैं घर लौटा। बुआ अकेली थीं, मां बाजार गई थीं। वो सोफे पर बैठी किताब पढ़ रही थीं। मैं उनके पास बैठा और पूछा, "बुआ, क्या मैं आपकी कोई मदद कर सकता हूं?"

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उन्होंने किताब बंद की और मेरी ओर देखा। उनकी आंखों में एक अजीब सी चमक थी, जैसे कोई अनकही बात। "रोहन, तुम बहुत अच्छे हो। बस कभी-कभी लगता है कि जीवन में कुछ कमी है," उन्होंने धीरे से कहा।

मैंने उनका हाथ थामा, सिर्फ सांत्वना देने के लिए। लेकिन वो स्पर्श कुछ अलग था। मेरे मन में एक हलचल हुई, लेकिन मैंने खुद को रोका। हम चुपचाप बैठे रहे, और वो पल लंबा खिंचता गया।

शाम को जब मां लौटीं, सब कुछ सामान्य हो गया। लेकिन रात में मुझे नींद नहीं आ रही थी। बुआ की उदासी, उनका स्पर्श, सब कुछ दिमाग में घूम रहा था। मैंने सोचा कि शायद मैं ज्यादा सोच रहा हूं।

अगली सुबह बुआ ने मुझे कॉफी दी। उनकी उंगलियां मेरी उंगलियों से छू गईं, और मैंने महसूस किया कि वो जानबूझकर किया था। मैं चौंक गया, लेकिन कुछ नहीं कहा। दिन भर ऑफिस में वो पल याद आता रहा।

घर लौटकर मैंने देखा कि बुआ बालकनी में अकेली खड़ी थीं। मैं उनके पास गया और बोला, "बुआ, आप ठीक हैं?" उन्होंने मुड़कर देखा, और उनकी आंखों में आंसू थे। "रोहन, मैं बहुत अकेली हूं," उन्होंने फुसफुसाते हुए कहा।

मैंने उन्हें गले लगा लिया, सांत्वना देने के लिए। लेकिन वो गले लगकर रोने लगीं। मेरा दिल तेज धड़क रहा था, और मैंने महसूस किया कि हमारा रिश्ता कुछ बदल रहा है। वो पल भावनाओं से भरा था।

उस रात घर में सब सो चुके थे। मैं अपने कमरे में था, लेकिन नींद नहीं आ रही थी। अचानक दरवाजे पर हल्की सी खटखट हुई। मैंने खोला तो बुआ खड़ी थीं, रात के कपड़ों में। "रोहन, बात करनी है," उन्होंने कहा।

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मैंने उन्हें अंदर बुलाया। वो बिस्तर पर बैठीं और बोलीं, "तुम्हें पता है, मैं कितने सालों से अकेली हूं। कोई साथ नहीं, कोई स्पर्श नहीं।" उनकी बातें सुनकर मेरा मन भर आया।

मैं उनके पास बैठा और बोला, "बुआ, मैं हूं न आपके साथ।" उन्होंने मेरी आंखों में देखा, और फिर धीरे से मेरे होंठों पर अपने होंठ रख दिए। वो चुंबन अप्रत्याशित था, लेकिन इतना भावुक कि मैं रोक नहीं पाया।

हमारे बीच की दूरी मिट गई। मैंने उन्हें अपनी बाहों में लिया, और वो मेरे सीने से लग गईं। वो पल इतना नाजुक था कि लग रहा था समय रुक गया है। हमारी सांसें मिल रही थीं।

धीरे-धीरे मैंने उनके कपड़े उतारे। उनकी त्वचा इतनी मुलायम थी, जैसे रेशम। मैंने उनके शरीर को छुआ, और वो सिहर उठीं। "रोहन, इतने सालों बाद ये एहसास," उन्होंने फुसफुसाया।

मैंने उनके स्तनों को सहलाया, धीरे-धीरे, और वो मेरे नाम का उच्चारण करती रहीं। हमारा मिलन इतना गहरा था कि हर स्पर्श में भावनाएं उमड़ रही थीं। मैंने महसूस किया उनकी प्यास कितनी गहरी है।

उस रात हम एक हो गए। मेरा शरीर उनका हो गया, और उनका मेरा। हर गति में एक नई संवेदना थी, जैसे लहरें उठ रही हों। वो कराह रही थीं, और मैं उनके साथ बह रहा था।

सुबह होने से पहले हम अलग हुए, लेकिन वो पल हमेशा के लिए जुड़ गया। अगले दिन सब सामान्य लग रहा था, लेकिन हमारी नजरें मिलतीं तो एक रहस्य छिपा रहता।

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कुछ दिन बाद एक शाम हम फिर अकेले थे। बुआ ने मुझे अपने कमरे में बुलाया। "रोहन, वो रात भूल नहीं पा रही हूं," उन्होंने कहा। मैंने उन्हें फिर से अपनी बाहों में लिया।

इस बार हमारा मिलन और गहरा था। मैंने उनके शरीर के हर हिस्से को छुआ, जैसे कोई खजाना ढूंढ रहा हूं। उनकी आहें कमरे में गूंज रही थीं, और मैंने महसूस किया कि ये सिर्फ शारीरिक नहीं, भावनात्मक भी है।

हमने अलग-अलग तरीकों से एक-दूसरे को संतुष्ट किया। कभी मैं ऊपर, कभी वो। हर बार एक नई भावना जुड़ती, जैसे प्यास बुझ रही हो लेकिन और बढ़ रही हो।

एक रात बारिश हो रही थी। हम बालकनी में खड़े थे, और अचानक उन्होंने मुझे किस किया। हम अंदर आए, और वो मिलन बारिश की तरह तीव्र था। उनकी त्वचा गीली हो गई थी, और मैंने उसे चाटा, जैसे मीठा अमृत।

समय बीतता गया, लेकिन हमारा रिश्ता गहराता रहा। हर मिलन में नई गहराई आती, नई संवेदनाएं। बुआ की प्यास अब मेरी भी हो गई थी, और हम एक-दूसरे में खोए रहते।

एक दोपहर हम घर में अकेले थे। बुआ ने मुझे बिस्तर पर खींचा। "रोहन, आज कुछ नया करें," उन्होंने कहा। मैंने उनकी बात मानी, और हमने नई मुद्राएं आजमाईं, हर एक में आनंद की नई ऊंचाई।

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उनकी कराहें, मेरी सांसें, सब मिलकर एक संगीत बना रहे थे। मैंने महसूस किया कि ये रिश्ता अब सिर्फ प्यास नहीं, प्यार भी बन गया है। हम अलग नहीं होना चाहते थे।

रातें अब हमारी हो गई थीं। हर बार जब हम मिलते, वो पल अनोखा होता। कभी धीमा, कभी तेज। बुआ की आंखों में संतुष्टि देखकर मुझे खुशी मिलती।

एक शाम हम बात कर रहे थे। "रोहन, तुमने मेरी जिंदगी बदल दी," उन्होंने कहा। मैंने उन्हें गले लगाया, और फिर से हम एक हो गए। वो मिलन इतना भावुक था कि आंसू आ गए।

हमारे बीच की केमिस्ट्री अब परफेक्ट थी। हर स्पर्श, हर चुंबन, सब कुछ नैचुरल लगता। मैं उनकी हर इच्छा पूरी करता, और वो मेरी।

समय गुजरता रहा, लेकिन वो प्यास कभी पूरी तरह नहीं बुझी। हर मिलन में नया स्वाद आता, नई गहराई। हम जानते थे कि ये गुप्त है, लेकिन हमारा है।

एक रात हम देर तक जगे रहे। बुआ मेरे सीने पर सिर रखकर लेटी थीं। "रोहन, ये एहसास अमूल्य है," उन्होंने कहा। मैंने उन्हें चूमा, और फिर से हमारी दुनिया शुरू हो गई।