नए फ्लैट में अनकही चाहत

मैं राहुल हूँ, और उस दिन सुबह की धूप मेरे कमरे की खिड़की से छनकर आ रही थी। कॉलेज का नया सेमेस्टर शुरू होने वाला था, इसलिए मैंने शहर में एक छोटा सा फ्लैट किराए पर लिया था। सामान अभी पूरी तरह अनपैक्ड नहीं हुआ था, और मैं कॉफी का मग हाथ में लेकर बालकनी में खड़ा सोच रहा था कि आज का दिन कैसे बीतेगा।

अजय मेरा पुराना दोस्त है, स्कूल के दिनों से। वो भी इसी शहर में जॉब करता है, और जब मैंने फ्लैट लिया तो उसने कहा कि वो मदद करने आएगा। दोपहर को उसकी कॉल आई, "भाई, मैं आ रहा हूँ, मम्मी को भी साथ ले आया हूँ। वो कह रही थीं कि नया घर है, थोड़ी सफाई और सेटिंग कर देंगी।" मैंने हंसकर हामी भरी, क्योंकि अकेले सब संभालना मुश्किल था।

दरवाजे की घंटी बजी, और मैंने खोला तो अजय मुस्कुराता हुआ खड़ा था। उसके पीछे शीला आंटी थीं, हाथ में कुछ थैलियाँ लिए। "बेटा, नमस्ते। अजय ने बताया कि तू अकेला है यहाँ, सोचा थोड़ा खाना-पीना लेकर आऊँ," उन्होंने कहा। मैंने उन्हें अंदर बुलाया और सोफे पर बैठाया। फ्लैट छोटा था, दो कमरे, एक किचन और बालकनी।

अजय ने सामान उठाना शुरू किया। "राहुल, ये बॉक्स कहाँ रखें? और वो किताबें?" मैंने बताया, और हम दोनों लग गए काम में। शीला आंटी किचन में चली गईं, वहाँ से आवाज आई, "बेटा, यहाँ तो कुछ भी नहीं है। मैं थोड़ी सफाई कर दूँ?" उनकी आवाज में घरेलू गर्माहट थी, जो मुझे अच्छी लगी। मैंने कहा, "आंटी, आप आराम से बैठिए, मैं कर लूँगा।"

लेकिन वो नहीं मानीं। उन्होंने एप्रन जैसा कुछ बाँधा और झाड़ू-पोछा शुरू कर दिया। अजय और मैं बाहर के कमरे में थे, फर्नीचर सेट कर रहे थे। शाम होने लगी थी, और अजय को एक कॉल आई। "भाई, ऑफिस से इमरजेंसी है, मुझे जाना पड़ेगा। मम्मी को मैं बाद में पिक कर लूँगा," उसने कहा। मैंने सहमति दी, और वो चला गया।

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अब फ्लैट में सिर्फ मैं और शीला आंटी थे। उन्होंने किचन से आवाज दी, "राहुल, चाय पिएगा?" मैं अंदर गया, देखा वो स्टोव पर केतली चढ़ा रही थीं। उनकी उम्र करीब चालीस के आसपास होगी, लेकिन चेहरे पर एक ताजगी थी। बाल खुले थे, और साड़ी में वो घरेलू लग रही थीं। मैंने कहा, "हाँ आंटी, बनाइए।"

हम सोफे पर बैठे चाय पी रहे थे। बातें शुरू हुईं, पहले कॉलेज की, फिर अजय की शरारतों की। "तू जानता है, अजय बचपन में कितना शैतान था," उन्होंने हंसते हुए कहा। मैंने भी कुछ किस्से सुनाए। बाहर बारिश शुरू हो गई थी, और कमरे में हल्की ठंडक फैलने लगी। मैंने खिड़की बंद की, और वापस बैठा।

रात का खाना भी आंटी ने बनाया। साधारण दाल-चावल, लेकिन स्वाद घर जैसा था। हम डाइनिंग टेबल पर बैठे खा रहे थे। "राहुल, तू यहाँ अकेला कैसे मैनेज करेगा? कभी घर आ जाया कर," उन्होंने कहा। उनकी आँखों में ममता थी, जो मुझे छू गई। मैंने मुस्कुराकर कहा, "जरूर आंटी, आपका खाना याद आएगा।"

खाने के बाद वो बर्तन धो रही थीं, मैं मदद करने लगा। किचन छोटा था, इसलिए हम पास-पास खड़े थे। उनकी साड़ी का पल्लू थोड़ा सरक गया था, लेकिन मैंने ध्यान नहीं दिया। बातें जारी थीं, परिवार की, जीवन की। अजय की कॉल आई कि वो लेट होगा, बारिश की वजह से। आंटी ने कहा, "कोई बात नहीं, मैं यहाँ रुक जाऊँगी आज।"

रात गहराने लगी। मैंने गेस्ट रूम तैयार किया, लेकिन फ्लैट छोटा होने से एक ही बेडरूम था। "आंटी, आप मेरे कमरे में सो जाइए, मैं सोफे पर," मैंने कहा। वो हिचकिचाईं, लेकिन मानीं। मैं सोफे पर लेटा, लेकिन नींद नहीं आ रही थी। बारिश की आवाज और आंटी की मौजूदगी अजीब लग रही थी।

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कुछ देर बाद आंटी की आवाज आई, "राहुल, नींद नहीं आ रही क्या?" मैं उठा, देखा वो दरवाजे पर खड़ी थीं। "हाँ आंटी, शायद नई जगह की वजह से।" वो अंदर आईं, बैठीं। "मुझे भी, अकेले में आदत नहीं। थोड़ी बातें करें?" हम बातें करने लगे, पुरानी यादों की, जीवन के संघर्षों की।

बातों में पता चला कि आंटी का पति सालों पहले गुजर चुका था। "अजय को बड़ा किया, लेकिन कभी अकेलापन महसूस होता है," उन्होंने धीरे से कहा। उनकी आँखें नम थीं। मैंने हाथ बढ़ाकर उनका कंधा थपथपाया, सांत्वना दी। वो मेरे करीब सरक आईं, और अचानक हमारी नजरें मिलीं।

उस पल में कुछ बदला। उनकी साँसें तेज थीं, और मैं महसूस कर रहा था एक अनजानी引き। "राहुल, तू बहुत अच्छा लड़का है," उन्होंने कहा, और उनका हाथ मेरे हाथ पर रखा। मैंने कुछ नहीं कहा, बस उन्हें देखता रहा। धीरे से मैंने उन्हें गले लगाया, और वो भी मेरे सीने से लग गईं।

बारिश बाहर तेज हो गई थी। हमारी साँसें मिल रही थीं। मैंने उनके चेहरे को ऊपर किया, और होंठ उनके होंठों से छुआए। वो पीछे नहीं हटीं, बल्कि जवाब दिया।吻 गहरा होता गया, और हाथों ने एक-दूसरे को छूना शुरू किया। उनकी साड़ी का पल्लू सरक गया, और मैंने उनकी गर्दन पर吻 किया।

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हम बेड पर सरक गए। उनकी त्वचा नरम थी, और मैं धीरे-धीरे उनकी साड़ी उतार रहा था। "राहुल, ये सही है?" उन्होंने पूछा, लेकिन उनकी आँखों में चाहत थी। मैंने कहा, "आंटी, ये हमारा पल है।" मेरे हाथ उनके शरीर पर घूम रहे थे, हर स्पर्श में एक नई संवेदना।

उनकी साँसें तेज थीं, और मैंने उनके स्तनों को छुआ। वो कराह उठीं, "ओह राहुल..." मैंने उन्हें पूरी तरह नग्न किया, और खुद भी कपड़े उतारे। हमारा मिलन शुरू हुआ, धीमा और भावुक। उनकी आँखों में आंसू थे, शायद खुशी के, शायद पुराने दर्द के।

हर गति में एक गहराई थी। मैं उनके शरीर के हर हिस्से को महसूस कर रहा था, जैसे कोई खोई हुई दुनिया। वो मेरे बालों में उँगलियाँ फेर रही थीं, और हमारी बॉडीज एक हो रही थीं। वो चरम पर पहुँची, और मैं भी। हम थककर लेट गए, एक-दूसरे से लिपटे।

सुबह हुई, अजय की कॉल आई। आंटी उठीं, तैयार हुईं। लेकिन हमारी नजरें मिलीं, और एक मुस्कान थी। "राहुल, कल रात..." उन्होंने कहा, लेकिन मैंने चुप कराया। वो चली गईं, लेकिन वो पल हमेशा याद रहेगा।

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कुछ दिन बाद अजय फिर आया, लेकिन आंटी नहीं। मैंने पूछा, "मम्मी कैसी हैं?" उसने कहा, "ठीक हैं, बस व्यस्त।" लेकिन मुझे पता था, हमारे बीच कुछ बदल गया था। शाम को आंटी का मैसेज आया, "राहुल, मिलना है?" मैंने हाँ कहा।

वो आईं, अकेले। फ्लैट में घुसीं, और दरवाजा बंद होते ही हम एक-दूसरे में खो गए। इस बार ज्यादा जोश था, ज्यादा चाहत। मैंने उन्हें दीवार से सटाया,吻 किया। उनकी साड़ी जल्दी उतरी, और हम फर्श पर ही।

उनकी कराहें कमरे में गूँज रही थीं। मैंने उनके शरीर को नए तरीके से छुआ, हर बार कुछ नया। वो मेरे ऊपर आईं, और हमारा मिलन तेज हुआ। चरम पर पहुँचकर हम हाँफते रहे। "राहुल, तू मुझे जीना सिखा रहा है," उन्होंने कहा।

ऐसे कई पल आए। कभी रात को, कभी दोपहर। हर बार भावनाएँ अलग थीं – कभी कोमल, कभी उग्र। लेकिन अंदर एक डर था, अजय को पता चलेगा तो? आंटी कहतीं, "चिंता मत कर, ये हमारा राज है।"

एक शाम हम बालकनी में थे, सूरज डूब रहा था। वो मेरे कंधे पर सिर रखकर बैठी थीं। "राहुल, जीवन में इतनी खुशी नहीं मिली," उन्होंने कहा। मैंने उन्हें चूमा, और हम अंदर चले गए। उस रात मिलन और गहरा था, जैसे आत्माएँ जुड़ रही हों।

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समय बीतता गया। अजय को शक नहीं हुआ, लेकिन हम सावधान रहते। हर मुलाकात में नई संवेदनाएँ, नई भावनाएँ। कभी मैं उन्हें मालिश देता, कभी वो मुझे। हमारे रिश्ते में अब सिर्फ शारीरिक नहीं, भावनात्मक गहराई थी।

एक दिन आंटी आईं, उदास। "राहुल, अजय की शादी की बात चल रही है।" मैं स्तब्ध था। लेकिन हमने वो शाम साथ बिताई, जैसे आखिरी हो। मिलन में दर्द था, लेकिन प्यार भी।

फिर भी हम मिलते रहे, चोरी-छिपे। हर बार लगता, ये आखिरी है, लेकिन नहीं होता। उस रात हम लेटे थे, उनकी साँसें मेरे सीने पर। "राहुल, तू हमेशा मेरे दिल में रहेगा," उन्होंने कहा। मैंने उन्हें कसकर पकड़ा, और हम फिर एक हो गए।

बाहर हवा चल रही थी, और हमारी दुनिया सिर्फ हमारी थी।