पड़ोस की वो अनकही कहानी
मैं राहुल हूँ, दिल्ली की एक व्यस्त कॉलोनी में रहता हूँ। हर सुबह की तरह आज भी मैं अपने छोटे से अपार्टमेंट की बालकनी में खड़ा होकर चाय की चुस्की ले रहा था। सूरज अभी-अभी उगा था, और सड़क पर लोग अपनी दिनचर्या में लगे हुए थे—कुछ बच्चे स्कूल जाते हुए, कुछ लोग काम पर निकलते हुए। मेरी ज़िंदगी भी ऐसी ही थी, एक सॉफ्टवेयर कंपनी में नौकरी, शाम को घर लौटना, और वीकेंड पर दोस्तों से मिलना।
पिछले दो साल से मैं इस अपार्टमेंट में रह रहा हूँ। मेरे पड़ोस में नेहा भाभी रहती हैं, जिनके पति की मौत एक एक्सीडेंट में हो गई थी। वो अकेली ही अपने पाँच साल के बेटे रोहन को संभालती हैं। मैं उन्हें कभी-कभी देखता था, लेकिन बातचीत ज्यादा नहीं होती थी। बस, कभी लिफ्ट में मिल जाते तो स्माइल दे देते या हालचाल पूछ लेते।
एक दिन शाम को काम से लौटते हुए मैंने देखा कि नेहा भाभी अपनी बालकनी में कपड़े सुखा रही थीं। रोहन नीचे खेल रहा था, और वो उसे आवाज़ दे रही थीं। मैंने सोचा, क्यों न मदद कर दूँ। मैं उनके फ्लैट के पास गया और बोला, "भाभी, रोहन को ऊपर बुला लूँ?" उन्होंने मुस्कुराकर कहा, "नहीं राहुल, ठीक है, वो खुद आ जाएगा।"
उस दिन से हमारी बातचीत थोड़ी बढ़ गई। कभी मैं ग्रॉसरी लेकर आता तो वो पूछतीं, "कुछ चाहिए तो बता देना।" मैं भी कभी उनके लिए दूध या सब्ज़ी ले आता। नेहा भाभी की उम्र लगभग तीस के आसपास थी, लेकिन उनके चेहरे पर एक उदासी हमेशा छाई रहती थी। उनके पति की मौत के बाद वो घर से ज्यादा बाहर नहीं निकलती थीं, बस रोहन की देखभाल और घर का काम।
मेरी ज़िंदगी में भी कोई खास उतार-चढ़ाव नहीं था। मैं अकेला रहता था, माँ-पापा गाँव में थे। शाम को अक्सर मैं बालकनी में बैठकर किताब पढ़ता या फोन पर बात करता। एक शाम बारिश हो रही थी, और मैंने देखा नेहा भाभी अपनी बालकनी में खड़ी होकर बारिश को निहार रही थीं। उनके चेहरे पर एक अजीब सी शांति थी, लेकिन आँखों में कुछ कमी सी लग रही थी।
मैंने हिम्मत करके आवाज़ दी, "भाभी, चाय पीएंगी? बारिश में अच्छी लगती है।" उन्होंने चौंककर मेरी तरफ देखा, फिर हल्के से मुस्कुराईं और बोलीं, "ठीक है, आ जाती हूँ।" वो रोहन को सुलाकर मेरे फ्लैट में आईं। हमने चाय पीते हुए बातें कीं—मौसम की, शहर की भागदौड़ की, और थोड़ा उनके रोहन के बारे में।
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उस शाम के बाद हमारी मुलाकातें बढ़ने लगीं। कभी वो मुझे खाना दे जातीं, कभी मैं उन्हें कॉफी पर बुलाता। नेहा भाभी की बातों से लगता था कि वो अकेलेपन से जूझ रही थीं। एक बार उन्होंने बताया, "राहुल, पति के जाने के बाद सब कुछ बदल गया। रोहन के लिए जी रही हूँ, लेकिन कभी-कभी मन उदास हो जाता है।" मैंने कहा, "भाभी, आप अकेली नहीं हैं। मैं हूँ ना, कभी बात करनी हो तो बता देना।"
धीरे-धीरे हमारी दोस्ती गहरी होने लगी। मैं उनके साथ समय बिताने लगा, रोहन को खेलने ले जाता, या शाम को साथ बैठकर टीवी देखते। नेहा भाभी की आँखों में अब वो उदासी कम लगती थी। लेकिन मेरे मन में कुछ और ही उथल-पुथल मच रही थी। मैं उन्हें पसंद करने लगा था, लेकिन कह नहीं पा रहा था। वो विधवा थीं, समाज की नज़रें, और मेरी अपनी हिचकिचाहट।
एक रात बारिश ज़ोरों से हो रही थी। रोहन सो चुका था, और नेहा भाभी ने मुझे मैसेज किया, "राहुल, नींद नहीं आ रही। क्या बात कर सकते हो?" मैं उनके फ्लैट में गया। हम सोफे पर बैठे, और बातें करने लगे। उन्होंने अपने पति की यादें साझा कीं, आँखें नम हो गईं। मैंने उनका हाथ पकड़ा और कहा, "भाभी, सब ठीक हो जाएगा। आप मज़बूत हैं।"
उस पल हमारी नज़रें मिलीं, और कुछ अनकहा सा हुआ। नेहा भाभी ने अपना सिर मेरे कंधे पर रख दिया। मैंने उन्हें गले लगाया, और वो रोने लगीं। मैंने उन्हें चुप कराया, उनके बालों में हाथ फेरा। धीरे-धीरे वो शांत हुईं, और हम एक-दूसरे को देखते रहे। मेरे मन में एक तूफान था—ये सही है या नहीं? लेकिन उनकी आँखों में जो विश्वास था, वो सब भुला दे रहा था।
उस रात हमने ज्यादा कुछ नहीं किया, बस एक-दूसरे के पास बैठे रहे। लेकिन अगले दिन से चीजें बदलने लगीं। नेहा भाभी अब मुझे अलग नज़र से देखतीं। एक शाम वो मेरे फ्लैट में आईं, रोहन को पड़ोसी के घर छोड़कर। हमने डिनर किया, और बातें करते-करते वो मेरे करीब आ गईं। मैंने पूछा, "भाभी, क्या आप ठीक हैं?" उन्होंने कहा, "राहुल, मुझे तुम्हारी ज़रूरत है। इतने दिनों से अकेली हूँ।"
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मैंने उन्हें बाहों में लिया, और हमारा पहला चुंबन हुआ। वो पल इतना कोमल था, जैसे लंबे समय की प्यास बुझ रही हो। नेहा भाभी की साँसें तेज़ थीं, और मैं उनके होंठों को चूमता रहा। हम बेडरूम में गए, और धीरे-धीरे उनके कपड़े उतारे। उनकी त्वचा इतनी मुलायम थी, और मैं हर स्पर्श में उनकी भावनाओं को महसूस कर रहा था।
हमने प्यार किया, लेकिन वो सिर्फ शारीरिक नहीं था। नेहा भाभी की आँखों में आंसू थे, खुशी के। मैंने उनके शरीर को सहलाया, उनके स्तनों को चूमा, और वो मेरे नाम का उच्चारण करती रहीं। वो पल इतना गहरा था कि मैं भूल गया था सब कुछ। हम एक-दूसरे में खो गए, साँसें मिलीं, शरीर एक हुए।
उस रात के बाद हमारा रिश्ता और गहरा हो गया। लेकिन मन में एक डर था—समाज क्या कहेगा? नेहा भाभी भी कभी-कभी चिंतित हो जातीं। एक दिन उन्होंने कहा, "राहुल, रोहन के लिए ये सही नहीं। लेकिन मैं तुम्हारे बिना नहीं रह सकती।" मैंने उन्हें आश्वासन दिया, "हम साथ हैं, भाभी। सब संभाल लेंगे।"
हमारी मुलाकातें अब छुप-छुपकर होने लगीं। एक दोपहर रोहन स्कूल में था, नेहा भाभी मेरे फ्लैट में आईं। हमने दरवाज़ा बंद किया, और एक-दूसरे को बाहों में भर लिया। इस बार हमारी अंतरंगता और तीव्र थी। मैंने उनके गले को चूमा, उनके कानों में फुसफुसाया, "तुम बहुत खूबसूरत हो।" वो मुस्कुराईं और मेरे कपड़े उतारने लगीं।
हम बिस्तर पर लेटे, और मैं उनके शरीर के हर हिस्से को एक्सप्लोर करने लगा। उनकी कमर, उनकी जांघें, सब कुछ इतना आकर्षक था। नेहा भाभी ने मेरे सीने पर हाथ फेरा, और हम एक लय में खो गए। वो ऊपर आईं, और हमारा मिलन इतना भावुक था कि समय रुक सा गया। उनकी सिसकियाँ, मेरी साँसें, सब मिश्रित हो गए।
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लेकिन हर बार के बाद एक कन्फ्लिक्ट होता। नेहा भाभी कहतीं, "राहुल, क्या ये गलत है? मैं विधवा हूँ।" मैं कहता, "नहीं भाभी, प्यार कभी गलत नहीं होता।" हमारी बातें अब गहरी हो गईं थीं—भविष्य की, सपनों की। मैं सोचता कि शायद हम साथ रह सकते हैं, लेकिन रास्ते मुश्किल थे।
एक शाम हम पार्क में घूम रहे थे, रोहन साथ था। नेहा भाभी ने मेरे हाथ को छुआ, और कहा, "तुमने मेरी ज़िंदगी में रंग भरे हैं।" मैंने मुस्कुराकर कहा, "और तुमने मेरी।" लेकिन अंदर से मैं जानता था कि ये रिश्ता आसान नहीं है। समाज की नज़रें, परिवार की उम्मीदें।
फिर एक रात, बारिश फिर से हो रही थी। नेहा भाभी मेरे पास आईं, और हमने फिर से प्यार किया। इस बार ये और भी गहरा था। मैंने उनके शरीर को हर तरह से महसूस किया—उनकी गर्माहट, उनकी नमी, सब कुछ। वो मेरे ऊपर थीं, और हमारी लय तेज़ होती गई। उनकी आहें कमरे में गूंज रही थीं, और मैं उनके नाम का जाप कर रहा था।
उस पल में हम भूल गए थे सब कुछ—दुनिया, नियम, डर। नेहा भाभी की आँखें बंद थीं, और वो मेरे साथ बह रही थीं। हमारा क्लाइमेक्स एक साथ आया, और हम थककर एक-दूसरे की बाहों में लेट गए। साँसें अभी भी तेज़ थीं, दिल की धड़कनें मिल रही थीं।
सुबह होने से पहले नेहा भाभी ने कहा, "राहुल, मैं तुमसे प्यार करती हूँ।" मैंने उन्हें चूमा और कहा, "मैं भी।" लेकिन वो पल इतना नाजुक था कि लगता था, कभी भी टूट सकता है। हम जानते थे कि आगे क्या होगा, लेकिन अभी के लिए ये काफी था।
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दिन बीतते गए, और हमारा रिश्ता छुपा रहा। कभी-कभी नेहा भाभी उदास हो जातीं, सोचतीं कि रोहन बड़ा होगा तो क्या कहेगा। मैं उन्हें समझाता, "हम मिलकर सब ठीक कर लेंगे।" हमारी अंतरंग पल अब और विविध हो गए थे—कभी सुबह की कोमलता, कभी रात की जुनून।
एक बार हमने किचन में ही शुरुआत की। नेहा भाभी चाय बना रही थीं, और मैंने उन्हें पीछे से गले लगाया। वो मुड़ीं, और हमारा चुंबन गहरा होता गया। हम फर्श पर बैठ गए, और प्यार किया। उनकी त्वचा पर मेरे हाथ फिसल रहे थे, और वो मेरी पीठ को नाखूनों से खरोंच रही थीं। वो अनुभव नया था, रोमांचक।
लेकिन हर बार के बाद एक सवाल रहता—क्या ये हमेशा रहेगा? नेहा भाभी की विधवा होने की वजह से समाज का दबाव था। मैंने सोचा, शायद मैं उन्हें प्रपोज़ कर दूँ। लेकिन हिम्मत नहीं हुई। हमारी बातें अब भविष्य पर केंद्रित होने लगीं।
फिर एक दिन, नेहा भाभी ने बताया कि उनके ससुराल वाले आ रहे हैं। वो चिंतित थीं। मैंने कहा, "चिंता मत करो, मैं हूँ ना।" लेकिन अंदर से डर था। उस रात हमने आखिरी बार प्यार किया, जैसे कल न हो। हमारी अंतरंगता इतनी तीव्र थी कि सब कुछ भूल गए।
उनके ससुराल वाले आए, और बातें हुईं। नेहा भाभी ने मुझे मैसेज किया, "राहुल, वो मुझे गाँव ले जाना चाहते हैं।" मेरा दिल बैठ गया। मैंने उनसे मिलने की कोशिश की, लेकिन मौका नहीं मिला। रात को वो चुपके से मेरे फ्लैट में आईं।
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हमने बात की, रोए, और फिर एक-दूसरे को बाहों में लिया। वो पल दर्द और प्यार से भरा था। मैंने उनके शरीर को चूमा, उनकी आँखों में देखा, और हम मिले। उनकी सिसकियाँ अब दर्द की थीं, लेकिन प्यार की भी। हमारा मिलन धीमा था, भावुक।
सुबह वो चली गईं, लेकिन वादा किया कि लौटेंगी। मैं इंतज़ार करता रहा, हर दिन उनकी याद में। हम फोन पर बात करते, लेकिन मिलना मुश्किल था। फिर एक दिन उन्होंने कहा, "राहुल, मैं वापस आ रही हूँ। ससुराल वाले मान गए।"
वो लौटीं, और हमारा रिश्ता फिर से शुरू हुआ। अब हम ज्यादा सतर्क थे, लेकिन प्यार वही था। एक शाम हम बालकनी में खड़े थे, हाथ में हाथ डाले। नेहा भाभी ने कहा, "तुमने मुझे जीना सिखाया।" मैंने उन्हें चूमा, और हम अंदर गए।
उस रात हमने फिर से प्यार किया, लेकिन इस बार खुशी से भरा। मैंने उनके हर हिस्से को महसूस किया, उनकी खुशी को अपनी बनाया। हमारी लय परफेक्ट थी, और क्लाइमेक्स के बाद हम हँसे, बातें कीं। वो पल हमेशा के लिए था।