पड़ोस की नेहा

शाम का समय था, जब मैं अपनी बालकनी में खड़ा होकर चाय की चुस्की ले रहा था। सूरज धीरे-धीरे ढल रहा था, और मोहल्ले की सड़क पर बच्चे खेलते हुए दिखाई दे रहे थे। रोज की तरह, मैं काम से थककर लौटा था और इस शांत पल में कुछ सुकून ढूंढ रहा था।

मेरा नाम राजेश है, और मैं इस छोटे से शहर में पिछले पांच साल से रह रहा हूं। मेरी उम्र तैंतीस साल है, और मैं एक स्थानीय बैंक में मैनेजर हूं। घर में मैं अकेला रहता हूं, क्योंकि मेरी पत्नी दो साल पहले गुजर गई थी। पड़ोस में शर्मा अंकल रहते हैं, जो रिटायर्ड टीचर हैं, और उनकी पत्नी घर संभालती हैं।

उनकी बेटी नेहा हाल ही में कॉलेज से लौटी थी। वो दिल्ली में पढ़ाई कर रही थी, लेकिन अब घर पर ही कुछ ऑनलाइन कोर्स कर रही थी। मैं उसे बचपन से जानता था, लेकिन अब वो बड़ी हो गई थी, एक जवान लड़की। कभी-कभी हमारी बातचीत होती थी, जैसे पड़ोसियों की तरह।

उस शाम, मैं बालकनी में खड़ा था तभी नेहा अपने घर की छत पर आई। वो कपड़े सुखा रही थी, और उसने मुझे देखकर मुस्कुराकर हाथ हिलाया। मैंने भी जवाब में सिर हिलाया। वो नीचे उतरी और मेरे घर की तरफ आई, शायद कुछ काम से।

"राजेश अंकल, क्या आप घर पर हैं?" उसने दरवाजे पर दस्तक दी। मैंने दरवाजा खोला और उसे अंदर बुलाया। "हां नेहा, आओ बैठो। क्या बात है?" मैंने पूछा। वो सोफे पर बैठ गई और बोली, "अंकल, मेरे फोन में कुछ प्रॉब्लम है, क्या आप देख सकते हैं?"

मैंने उसका फोन लिया और देखने लगा। वो मेरे बगल में बैठी थी, और हमारी बातचीत शुरू हो गई। नेहा ने बताया कि कॉलेज लाइफ कितनी बोरिंग लग रही है अब घर पर। मैंने हंसकर कहा, "घर की याद तो आती होगी दिल्ली में?" वो मुस्कुराई और बोली, "हां, लेकिन अब यहां भी अच्छा लगता है।"

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उस दिन के बाद, हमारी मुलाकातें बढ़ने लगीं। कभी वो किताब मांगने आती, कभी मैं उनके घर जाता। शर्मा अंकल को कोई दिक्कत नहीं थी, क्योंकि मैं पड़ोसी था और भरोसेमंद। नेहा की उम्र बाईस साल थी, और वो बहुत बातूनी थी।

एक दोपहर, जब मैं घर पर था, नेहा आई। उसके माता-पिता शहर से बाहर गए थे, और वो अकेली थी। "अंकल, मैं बोर हो रही हूं, क्या हम कोई मूवी देखें?" उसने पूछा। मैंने हामी भरी, और हम साथ बैठकर टीवी ऑन किया। फिल्म चल रही थी, लेकिन मेरी नजर कभी-कभी नेहा पर जाती।

वो आराम से सोफे पर बैठी थी, और उसकी हंसी कमरे में गूंज रही थी। मैंने महसूस किया कि उसके साथ समय बिताना मुझे अच्छा लगता है। वो मेरी जिंदगी की उदासी को थोड़ा कम कर देती थी। लेकिन मैं खुद को रोकता था, क्योंकि वो पड़ोसी की बेटी थी।

फिल्म के दौरान, नेहा ने अपना सिर मेरे कंधे पर रख दिया। मैं स्तब्ध रह गया, लेकिन कुछ नहीं कहा। उसकी सांसें मेरे करीब महसूस हो रही थीं। "अंकल, आप बहुत अच्छे हैं," उसने धीरे से कहा। मैंने बस मुस्कुरा दिया।

उस पल में कुछ बदल गया। हमारी नजरें मिलीं, और एक चुप्पी छा गई। नेहा की आंखों में कुछ था, शायद उत्सुकता या कुछ और। मैंने अपना हाथ उसके हाथ पर रखा, और वो नहीं हटी। धीरे-धीरे, हम करीब आए।

अगले दिन, नेहा फिर आई। इस बार उसके माता-पिता घर पर थे, लेकिन वो बहाना बनाकर मेरे घर आई। हम रसोई में बात कर रहे थे, जब अचानक उसने मेरी तरफ देखा और कहा, "राजेश, मैं आपको पसंद करती हूं।" मैं हैरान था।

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मैंने कहा, "नेहा, ये ठीक नहीं है। मैं तुम्हारे पापा से ज्यादा उम्र का हूं।" लेकिन वो नहीं मानी। उसकी आंखों में दृढ़ता थी। हमारी बातचीत लंबी हुई, और मैंने अपनी उदासी के बारे में बताया। नेहा ने मेरी बात सुनी और कहा, "मैं समझती हूं।"

धीरे-धीरे, हमारी मुलाकातें गहरी होने लगीं। एक शाम, जब सब सो चुके थे, नेहा चुपके से मेरे घर आई। हम बालकनी में खड़े थे, और चांदनी रात थी। नेहा ने मेरे हाथ पकड़े और कहा, "राजेश, मुझे डर लगता है, लेकिन मैं चाहती हूं कि हम साथ हों।"

मैंने उसे गले लगाया। उसका शरीर मेरे खिलाफ दबा, और मैंने महसूस किया कि कितना समय हो गया था किसी के इतने करीब होने को। नेहा की सांसें तेज थीं, और मैंने उसके होंठों पर अपने होंठ रख दिए। वो पहला चुंबन था, मीठा और भावुक।

हम अंदर कमरे में गए। नेहा थोड़ी नर्वस लग रही थी, लेकिन उसकी आंखों में विश्वास था। मैंने धीरे से उसके कपड़े उतारे, और वो मेरे सामने थी। उसकी त्वचा मुलायम थी, और मैंने उसे सहलाया। नेहा ने मेरी कमीज खोली और मेरे सीने पर हाथ फेरा।

हम बिस्तर पर लेट गए। मैंने नेहा को चूमा, उसके गले से लेकर पेट तक। वो सिहर उठी, और उसकी सिसकियां कमरे में गूंजीं। "राजेश, धीरे," उसने कहा। मैंने उसकी बात मानी, और धीरे-धीरे हम एक हुए। नेहा की पहली बार थी, और मैंने सावधानी बरती।

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दर्द के साथ खुशी का मिश्रण था। नेहा की आंखों में आंसू थे, लेकिन वो मुस्कुरा रही थी। मैंने उसे कसकर पकड़ा, और हमारा मिलन गहरा होता गया। हर स्पर्श में भावनाएं थीं, जैसे सालों की उदासी निकल रही हो।

उस रात के बाद, हमारी जिंदगी बदल गई। नेहा अक्सर आती, और हम चुपके-चुपके मिलते। एक दिन, हम पार्क में घूम रहे थे, जब नेहा ने कहा, "राजेश, मैं तुम्हारे बिना नहीं रह सकती।" मैंने उसे गले लगाया, लेकिन मन में डर था कि कहीं ये रिश्ता टूट न जाए।

फिर एक शाम, नेहा मेरे घर आई। उसके चेहरे पर उदासी थी। "पापा को शक हो गया है," उसने कहा। मैंने उसे शांत किया, और हमने फैसला किया कि सावधानी बरतेंगे। लेकिन उस रात, हम फिर करीब आए।

मैंने नेहा को बिस्तर पर लिटाया और उसके शरीर को चूमा। इस बार, वो ज्यादा खुल गई थी। उसने मेरे शरीर पर हाथ फेरा, और हमारा मिलन पहले से ज्यादा तीव्र था। नेहा की सिसकियां तेज हुईं, और मैंने महसूस किया कि वो पूरी तरह मेरी हो गई थी।

हम घंटों साथ रहे। नेहा ने मेरे कान में फुसफुसाया, "राजेश, ये पल हमेशा याद रहेंगे।" मैंने उसे चूमा, और हमारी सांसें एक हो गईं। उसकी गर्माहट मुझे घेर रही थी, और मैं खो सा गया था।

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अगले दिनों में, हमारी मुलाकातें जारी रहीं। नेहा की मुस्कान मेरी जिंदगी की रोशनी बन गई थी। एक दोपहर, जब हम अकेले थे, नेहा ने कहा, "राजेश, मैं तुम्हें सब कुछ देना चाहती हूं।" मैंने उसे प्यार से देखा।

हम फिर बिस्तर पर थे। इस बार, मैंने नेहा को ऊपर लिया, और वो मेरे ऊपर थी। उसकी हरकतें मुझे पागल कर रही थीं। नेहा की आंखें बंद थीं, और वो मेरे नाम पुकार रही थी। हमारा क्लाइमेक्स एक साथ आया, जैसे लहरें आपस में मिल गई हों।

उस पल में, सब कुछ परफेक्ट लग रहा था। नेहा मेरे सीने पर सिर रखकर लेटी थी, और मैं उसके बालों में उंगलियां फेर रहा था। हमारी सांसें धीमी हो गई थीं, लेकिन दिल की धड़कनें अभी भी तेज थीं।

फिर एक रात, नेहा चुपके से आई। उसके माता-पिता सो चुके थे। हम बालकनी में खड़े थे, और नेहा ने मुझे कसकर गले लगाया। "राजेश, आज कुछ स्पेशल करना है," उसने कहा। मैंने मुस्कुराकर हामी भरी।

कमरे में, मैंने नेहा को दीवार के सहारे खड़ा किया। उसके कपड़े उतारे, और उसके शरीर को सहलाया। नेहा की सिसकियां बढ़ गईं, और मैंने उसे उठाकर बिस्तर पर लिटाया। हमारा मिलन इस बार जंगली था, जैसे सारी बाधाएं टूट गई हों।

नेहा ने मेरे कंधे पर नाखून गड़ा दिए, और मैंने उसके होंठ चूमे। हर थ्रस्ट में नई ऊर्जा थी, और नेहा की आंखों में आंसू और खुशी दोनों थे। हम एक दूसरे में खो गए, जैसे दुनिया खत्म हो गई हो।

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सुबह होने से पहले, नेहा चली गई। लेकिन उसकी खुशबू कमरे में बसी रही। मैं बिस्तर पर लेटा सोच रहा था कि ये रिश्ता कितना गहरा हो गया है। नेहा मेरी जिंदगी का हिस्सा बन चुकी थी।

कुछ दिनों बाद, नेहा फिर आई। इस बार वो खुश थी। "राजेश, पापा को अब शक नहीं है," उसने कहा। हमने जश्न मनाया, और फिर से करीब आए। नेहा की त्वचा पर मेरे हाथ फिसल रहे थे, और वो मेरे स्पर्श से सिहर रही थी।

हम बिस्तर पर थे, और नेहा ने मेरे ऊपर आकर मुझे चूमा। उसकी हरकतें मुझे उत्तेजित कर रही थीं। मैंने उसे पलटा, और हमारा मिलन फिर शुरू हुआ। नेहा की सिसकियां, मेरी सांसें, सब मिलकर एक संगीत बना रहे थे।

उस पल में, मैंने महसूस किया कि नेहा मेरे लिए सब कुछ है। हमारी बॉडीज एक हो गईं, और क्लाइमेक्स के बाद हम शांत लेटे रहे। नेहा मेरे सीने पर सिर रखे सो रही थी, और मैं उसकी सांसें महसूस कर रहा था।