पड़ोस की नेहा भाभी
सुबह के नौ बजे थे, और मैं अपनी बालकनी में खड़ा होकर कॉफी की चुस्की ले रहा था। शहर की हल्की-फुल्की हवा चल रही थी, और सामने वाली गली में बच्चे स्कूल जाते हुए दिख रहे थे। मेरा नाम राहुल है, मैं पच्चीस साल का हूँ और एक छोटी आईटी कंपनी में काम करता हूँ, घर से ही ज्यादातर। रोज की तरह आज भी मैंने ब्रेकफास्ट किया और काम शुरू करने से पहले थोड़ा वक्त बाहर बिताने का सोचा।
पड़ोस में रहने वाली नेहा भाभी की बालकनी ठीक मेरी वाली से सटी हुई है। वे अक्सर सुबह के वक्त कपड़े सुखाती हुई नजर आती हैं, लेकिन आज वे बस खड़ी होकर गली को देख रही थीं। नेहा भाभी तीस साल की हैं, उनके पति अमित भैया एक बैंक में काम करते हैं और अक्सर बाहर रहते हैं। मैंने उन्हें हमेशा एक शांत और मिलनसार महिला के रूप में देखा है, जो पड़ोस की छोटी-मोटी मदद में आगे रहती हैं।
मैंने कॉफी का आखिरी घूंट लिया और अंदर जाने लगा, तभी नेहा भाभी की आवाज आई, "राहुल, क्या तुम थोड़ी देर रुक सकते हो? मुझे कुछ बात करनी है।" उनकी आवाज में एक हल्की सी थकान थी, जो मैंने पहले कभी नहीं सुनी थी। मैं रुक गया और मुस्कुराकर बोला, "हाँ भाभी, बताइए क्या हुआ?" वे अपनी बालकनी से मेरी तरफ झुकीं और कहा, "अमित बाहर गए हैं, और घर में कुछ सामान उठाना है। क्या तुम मदद कर सकते हो?"
मैंने हामी भरी और उनके घर चला गया। नेहा भाभी का घर साफ-सुथरा था, दीवारों पर परिवार की तस्वीरें लगी हुई थीं। वे मुझे ड्रॉइंग रूम में ले गईं और एक पुराना बॉक्स दिखाया, जो अलमारी के ऊपर रखा था। "ये नीचे उतारना है, मैं अकेली नहीं कर पा रही," उन्होंने कहा। मैंने बॉक्स उतारा और जमीन पर रख दिया। काम खत्म होने के बाद उन्होंने मुझे चाय ऑफर की, और हम सोफे पर बैठकर बातें करने लगे।
बातों-बातों में नेहा भाभी ने बताया कि अमित भैया पिछले दो महीनों से दिल्ली में हैं, और घर अकेला लगता है। उनकी आँखों में एक उदासी थी, जो उन्होंने छिपाने की कोशिश की लेकिन मैंने नोटिस कर लिया। मैंने कहा, "भाभी, अगर कोई मदद चाहिए तो बताना, मैं यहीं हूँ।" वे मुस्कुराईं और बोलीं, "तुम अच्छे हो राहुल, कभी-कभी अकेलापन बहुत सताता है।" उस पल में हमारी बातचीत थोड़ी गहरी हो गई, जैसे कोई अनकही भावना हवा में तैर रही हो।
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अगले कुछ दिनों में मैं नेहा भाभी से ज्यादा मिलने लगा। कभी शाम को बाजार से सामान लाने में मदद करता, तो कभी उनके घर जाकर टीवी देखते हुए समय बिताता। नेहा भाभी की हँसी अब ज्यादा खुलकर आने लगी थी, और उनकी बातों में एक गर्माहट महसूस होती थी। एक शाम, जब मैं उनके घर गया, तो वे किचन में खाना बना रही थीं। मैंने पूछा, "भाभी, आज क्या स्पेशल है?" उन्होंने हँसकर कहा, "तुम्हारे लिए कुछ भी स्पेशल बना दूँगी, बस साथ बैठो।"
हम डिनर टेबल पर बैठे, और बातें चलती रहीं। नेहा भाभी ने अपनी शादी के बारे में बताया, कैसे अमित भैया की जॉब की वजह से वे अकेली रह जाती हैं। उनकी आवाज में एक दर्द था, जो मुझे छू गया। मैंने कहा, "भाभी, आप इतनी मजबूत हैं, फिर भी कभी-कभी किसी का साथ चाहिए होता है।" वे चुप हो गईं, और हमारी नजरें मिलीं। उस चुप्पी में कुछ ऐसा था जो शब्दों से ज्यादा बोल रहा था।
धीरे-धीरे, हमारे बीच का रिश्ता बदलने लगा। एक दोपहर, जब मैं काम से ब्रेक ले रहा था, नेहा भाभी ने मुझे फोन किया। "राहुल, क्या तुम आ सकते हो? मुझे कुछ बात करनी है।" मैं उनके घर पहुँचा, तो वे सोफे पर बैठी थीं, उनके चेहरे पर एक अजीब सी बेचैनी थी। मैंने पूछा, "क्या हुआ भाभी?" उन्होंने हिचकिचाते हुए कहा, "अमित बहुत दिनों से नहीं आए, और मैं... मैं खुद को बहुत अकेला महसूस कर रही हूँ।"
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मैं उनके पास बैठ गया, और उन्होंने अपना हाथ मेरे हाथ पर रख दिया। उस स्पर्श में एक गर्मी थी, जो मेरे अंदर कुछ जगा रही थी। मैंने कहा, "भाभी, मैं हूँ ना आपके साथ।" वे मेरी तरफ मुड़ीं, और हमारी नजरें फिर मिलीं। इस बार चुप्पी टूट गई, जब उन्होंने धीरे से कहा, "राहुल, क्या तुम समझते हो मेरी जरूरत?" उनकी आँखों में एक सवाल था, जो मुझे झकझोर गया।
उस पल से हमारे बीच की दूरी कम होने लगी। नेहा भाभी की उदासी अब एक गहरी इच्छा में बदल रही थी, और मैं खुद को रोक नहीं पा रहा था। एक रात, जब बारिश हो रही थी, मैं उनके घर गया। वे गीले कपड़ों में खड़ी थीं, और मैंने उन्हें तौलिए से सुखाया। उनकी साँसें तेज थीं, और मैंने महसूस किया कि हम दोनों एक ही भावना से गुजर रहे हैं।
नेहा भाभी ने मुझे अपनी बाहों में खींच लिया, और हमारा पहला चुंबन हुआ। वह चुंबन लंबा और गहरा था, जैसे सालों का अकेलापन उसमें समा गया हो। मैंने उनके होंठों को चूमा, और वे मेरे गले लग गईं। हम बेडरूम की तरफ बढ़े, जहां नेहा भाभी ने अपनी साड़ी उतार दी। उनका शरीर नरम और आकर्षक था, लेकिन उस पल में सबसे ज्यादा उनकी आँखों की भावना ने मुझे छुआ।
मैंने धीरे से उनके शरीर को स्पर्श किया, उनकी कमर पर हाथ फेरा। नेहा भाभी की सिसकियाँ कमरे में गूँज रही थीं, और उन्होंने कहा, "राहुल, मुझे तुम्हारी जरूरत है।" मैंने उन्हें बिस्तर पर लिटाया और उनके ऊपर झुक गया। हमारी बॉडीज एक-दूसरे से सटीं, और मैंने महसूस किया उनकी गर्माहट। वह रात हमारी पहली अंतरंग रात थी, जहां हर स्पर्श में भावनाएँ उमड़ रही थीं।
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अगले दिनों में हमारा रिश्ता और गहरा होता गया। नेहा भाभी अब ज्यादा खुश लगती थीं, लेकिन अंदर ही अंदर एक कन्फ्लिक्ट था। एक शाम, जब हम साथ थे, उन्होंने कहा, "राहुल, ये गलत है, लेकिन मैं रोक नहीं पा रही।" मैंने उन्हें गले लगाया और कहा, "भाभी, ये हमारी भावनाएँ हैं, इन्हें दबाना मुश्किल है।" हम फिर से एक-दूसरे में खो गए, इस बार ज्यादा पैशन से।
मैंने उनके स्तनों को चूमा, और वे मेरे बालों में उँगलियाँ फिराने लगीं। हमारा मिलन अब ज्यादा सेंसरी हो गया था, हर बार नया अनुभव। नेहा भाभी की त्वचा पर मेरे होंठ घूम रहे थे, और उनकी साँसें मेरे कानों में संगीत की तरह बज रही थीं। हम दोनों ने एक-दूसरे को पूरी तरह समर्पित कर दिया, जैसे ये पल हमेशा के लिए हों।
समय बीतता गया, और हमारे बीच की टेंशन अब एक गहरे बंधन में बदल चुकी थी। नेहा भाभी की जरूरत सिर्फ शारीरिक नहीं थी, बल्कि भावनात्मक भी। एक दोपहर, जब अमित भैया की वापसी की खबर आई, हम दोनों उदास हो गए। लेकिन उस आखिरी रात, हमने सब कुछ भुलाकर एक-दूसरे को महसूस किया।
मैंने नेहा भाभी को अपनी बाहों में लिया, और हम धीरे-धीरे एक-दूसरे के कपड़े उतारने लगे। उनकी आँखें बंद थीं, और मैंने उनके कान में फुसफुसाया, "भाभी, तुम हमेशा मेरी हो।" हमारा मिलन उस रात सबसे इंटेंस था, हर मूवमेंट में वैरायटी, कभी धीमा तो कभी तेज। नेहा भाभी की सिसकियाँ अब चीखों में बदल गईं, और मैंने महसूस किया उनकी बॉडी का हर हिस्सा मेरे स्पर्श पर प्रतिक्रिया दे रहा है।
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हम बिस्तर पर लेटे रहे, एक-दूसरे से चिपके हुए। नेहा भाभी ने मेरे सीने पर सिर रखा, और उनकी उँगलियाँ मेरी पीठ पर घूम रही थीं। उस पल में सब कुछ शांत था, लेकिन अंदर की भावनाएँ उफान पर थीं। मैंने सोचा कि ये रिश्ता कितना जटिल है, लेकिन कितना सच्चा भी।
अगली सुबह, अमित भैया लौट आए, लेकिन हमारे बीच की यादें बनी रहीं। नेहा भाभी से मिलना अब कम हो गया, लेकिन जब भी नजरें मिलतीं, वो पुरानी गर्माहट लौट आती। एक शाम, जब मैं बालकनी में था, उन्होंने मुझे देखा और मुस्कुराईं। मैं जानता था कि हमारी कहानी अभी खत्म नहीं हुई है।
फिर एक दिन, अमित भैया फिर बाहर चले गए। नेहा भाभी ने मुझे मैसेज किया, "राहुल, आ जाओ।" मैं उनके घर पहुँचा, और दरवाजा खोलते ही उन्होंने मुझे गले लगा लिया। हम सीधे बेडरूम में गए, जहां सब कुछ वैसा ही था। इस बार, नेहा भाभी ज्यादा बोल्ड थीं, उन्होंने मुझे धकेलकर बिस्तर पर गिराया और मेरे ऊपर आ गईं।
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उनकी बॉडी मेरी बॉडी पर रगड़ रही थी, और मैंने उनके कूल्हों को पकड़ा। हमारा मिलन अब एक रूटीन नहीं था, हर बार नई भावना जुड़ती। नेहा भाभी ने कहा, "राहुल, मुझे तुम्हारी वो ताकत चाहिए।" मैंने उन्हें पलटा और गहराई से प्रवेश किया, उनकी सिसकियाँ कमरे को भर रही थीं। हम दोनों पसीने से तर थे, लेकिन वो आनंद अवर्णनीय था।
उस रात के बाद, हमने अपने रिश्ते को और एक्सप्लोर किया। कभी किचन में, कभी बालकनी पर, लेकिन हमेशा भावनाओं के साथ। नेहा भाभी की जरूरत अब मेरी जरूरत बन चुकी थी, और हम दोनों इसमें खोए रहते। एक बार, बारिश में हम बाहर निकले और गीले होकर वापस आए, जहां हमने एक-दूसरे को सुखाया और फिर से मिलन किया।
हर सीन में नई वैरायटी थी – कभी धीमा प्यार, कभी वाइल्ड पैशन। नेहा भाभी की आँखों में अब एक संतुष्टि थी, लेकिन साथ ही एक डर भी। मैंने उन्हें आश्वासन दिया, "भाभी, ये हमारा राज रहेगा।" हम लेटे रहे, एक-दूसरे की साँसें महसूस करते हुए, और वो पल अनंत लग रहा था।