भाई की पत्नी बनकर

सुबह की धूप खिड़की से छनकर कमरे में फैल रही थी, और मैं अपनी रसोई में चाय की केतली चढ़ा रही थी। रोज की तरह, आज भी दिन की शुरुआत वही थी – अजय ऑफिस के लिए तैयार हो रहा था, और मैं उसके लिए नाश्ता बना रही थी। बाहर गली में बच्चे स्कूल जाते हुए शोर मचा रहे थे, और पड़ोस की आंटी अपनी बालकनी से कपड़े झाड़ रही थी। यह सब इतना सामान्य लगता था कि कभी-कभी लगता, जैसे जीवन एक ही लय में बहता चला जा रहा है।

अजय और मैंने शादी को पांच साल हो चुके थे। हमारा घर दिल्ली की एक व्यस्त कॉलोनी में था, जहां हर कोई अपनी-अपनी जिंदगी में व्यस्त रहता। अजय एक सॉफ्टवेयर कंपनी में काम करता था, और मैं घर संभालती थी, कभी-कभी फ्रीलांस ग्राफिक डिजाइन का काम करके। हमारे बीच सब ठीक था, लेकिन वो गहराई वाली खुशी नहीं थी जो शुरुआती दिनों में महसूस होती थी। फिर भी, हम साथ थे, और यही काफी लगता।

पिछले महीने से घर में एक नई हलचल थी। अजय का बड़ा भाई विक्रम हमारे साथ रहने आया था। विक्रम की पत्नी का दो साल पहले देहांत हो गया था, और वह अकेला रहते-रहते थक चुका था। अजय ने उसे बुलाया था कि कुछ दिन हमारे साथ रहे, शायद मन बहले। विक्रम चुपचाप रहता, ज्यादा बात नहीं करता, लेकिन उसकी मौजूदगी घर को भरा-भरा सा बना देती थी।

उस सुबह, मैं चाय लेकर लिविंग रूम में आई तो विक्रम सोफे पर अखबार पढ़ रहा था। अजय अभी बाथरूम में था। "भैया, चाय," मैंने मुस्कुराकर कहा और कप उसके सामने रख दिया। वह उठकर बैठा, "धन्यवाद, भाभी।" उसकी आवाज में हमेशा एक थकान होती थी, जैसे जिंदगी ने उसे बहुत कुछ छीन लिया हो। मैंने बस सिर हिलाया और वापस रसोई में चली गई।

दिन बीतते गए, और विक्रम की मौजूदगी धीरे-धीरे आदत बन गई। वह शाम को घर लौटता, अजय के साथ बैठकर बातें करता, और मैं खाना परोसती। कभी-कभी रात को जब अजय सो जाता, विक्रम बालकनी में खड़ा सिगरेट पीता रहता। एक रात, मैं पानी पीने उठी तो उसे वहां देखा। "भैया, सोए नहीं?" मैंने पूछा। वह मुड़ा, "नींद नहीं आ रही, भाभी। तुम जाओ सो जाओ।" लेकिन मैं रुक गई, उसके चेहरे पर वो उदासी देखकर।

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हमने बातें शुरू कीं। विक्रम ने अपनी पत्नी के बारे में बताया – कैसे वह कैंसर से लड़ती रही, और आखिर में हार गई। उसकी आंखें गीली हो गईं, और मैंने पहली बार महसूस किया कि वह कितना अकेला है। "तुम्हें अजय जैसा भाई मिला, अच्छा है," उसने कहा। मैंने कुछ नहीं कहा, बस सुनती रही। उस रात के बाद, हमारी बातें बढ़ने लगीं। कभी रसोई में, कभी शाम की चाय पर।

अजय को इन बातों से कोई फर्क नहीं पड़ता था। वह अपने काम में इतना व्यस्त रहता कि घर की इन छोटी-छोटी चीजों पर ध्यान नहीं देता। लेकिन मेरे लिए, विक्रम की मौजूदगी कुछ अलग थी। वह सुनता था, मेरी छोटी-छोटी बातों पर ध्यान देता था। एक दिन, मैंने उसे बताया कि मुझे पेंटिंग का शौक है, लेकिन वक्त नहीं मिलता। उसने कहा, "क्यों नहीं ट्राई करतीं? मैं मदद करूंगा।" उसकी वो सादगी मुझे छू गई।

धीरे-धीरे, मैं खुद को उसके करीब महसूस करने लगी। यह कोई आकर्षण नहीं था, बस एक भावनात्मक जुड़ाव। लेकिन एक शाम, जब अजय बाहर गया था, विक्रम और मैं अकेले थे। वह किचन में मेरी मदद कर रहा था, सब्जियां काटते हुए। उसका हाथ मेरे हाथ से छुआ, और मैं सिहर गई। "सॉरी," उसने कहा, लेकिन मैंने देखा उसकी आंखों में कुछ था – एक झिझक, एक चाहत।

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उस रात, नींद नहीं आई। मैं सोचती रही कि क्या हो रहा है। अजय मेरे बगल में सो रहा था, लेकिन मेरा मन विक्रम के पास था। क्या यह गलत है? वह मेरा देवर है, परिवार का हिस्सा। लेकिन उसकी उदासी, उसकी देखभाल, सब कुछ मुझे खींच रहा था। अगले दिन, मैंने खुद को रोकने की कोशिश की, लेकिन शाम को फिर वही हुआ। हम बालकनी में खड़े थे, और उसने कहा, "भाभी, तुम्हारी वजह से घर घर लगता है।"

मेरा दिल तेज धड़का। "भैया, आप भी तो परिवार हो," मैंने कहा, लेकिन मेरी आवाज कांप रही थी। वह करीब आया, और पहली बार उसने मेरा हाथ पकड़ा। "रिया, मैं जानता हूं यह गलत है, लेकिन मैं रोक नहीं पा रहा।" उसने मेरा नाम लिया, भाभी नहीं। मैं स्तब्ध थी, लेकिन पीछे नहीं हटी। उस पल में, सब कुछ बदल गया।

उसके बाद, हमारे बीच एक चुप्पी का रिश्ता बन गया। अजय के सामने सब सामान्य, लेकिन अकेले में नजरें मिलतीं, बातें होतीं। एक दिन, अजय को ऑफिस टूर पर जाना पड़ा। घर में सिर्फ हम दोनों थे। शाम को, विक्रम ने कहा, "रिया, क्या हम बात कर सकते हैं?" मैंने हां कहा, और हम लिविंग रूम में बैठे। उसने अपनी भावनाएं बताईं – कैसे वह मुझे देखकर अपनी पत्नी को याद करता है, लेकिन अब यह उससे ज्यादा है।

मैंने भी खुलकर कहा, "मैं अजय से प्यार करती हूं, लेकिन तुम्हारे साथ जो महसूस होता है, वो अलग है।" हम करीब आए, और पहली बार उसने मुझे गले लगाया। उसकी बाहों में एक गर्माहट थी, जो मुझे सालों से नहीं मिली थी। हमने बातें कीं, रोए, हंसे। रात गहराती गई, और भावनाएं उफान पर थीं।

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फिर, वह पल आया जब सब कुछ बदल गया। हम कमरे में थे, और विक्रम ने मेरे होंठों पर अपने होंठ रख दिए। यह कोमल था, लेकिन जल्दी ही जोश में बदल गया। मैंने विरोध नहीं किया; मेरी अपनी इच्छाएं जाग चुकी थीं। उसके हाथ मेरे शरीर पर फिसले, और मैंने महसूस किया उसकी उंगलियां मेरी कमर पर। "रिया," उसने फुसफुसाया, और मैंने उसे और करीब खींच लिया।

हम बिस्तर पर थे, कपड़े उतरते गए। उसकी छुअन हर जगह फैल रही थी – मेरे गले पर, छाती पर, जांघों पर। मैं सिहर रही थी, हर स्पर्श नया अनुभव दे रहा था। विक्रम कोमल था, लेकिन उसमें एक तीव्रता थी। उसने मेरे स्तनों को चूमा, जीभ से सहलाया, और मैं कराह उठी। "तुम कितनी खूबसूरत हो," उसने कहा, और मैंने उसके शरीर को छुआ, उसकी मांसपेशियां महसूस कीं।

जब हम एक हुए, तो वह दर्द और सुख का मिश्रण था। उसकी गति धीमी थी पहले, फिर तेज होती गई। मैंने अपनी टांगें उसके चारों ओर लपेट लीं, और हर धक्के के साथ एक नई लहर उठती। हमारी सांसें मिलीं, पसीना बहा, और भावनाएं उमड़ पड़ीं। यह सिर्फ शारीरिक नहीं था; इसमें अपनापन था, एक गहरा जुड़ाव।

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उस रात के बाद, हमारे रिश्ते में नयापन आया। लेकिन अपराधबोध भी था। अजय लौटा, और सब सामान्य दिखाने की कोशिश की। लेकिन विक्रम और मेरे बीच वो चोरी-छिपे पल जारी रहे। एक दोपहर, जब अजय काम पर था, विक्रम ने मुझे रसोई में पकड़ लिया। "रिया, मैं तुम्हें चाहता हूं," उसने कहा, और हम फिर एक हो गए – इस बार खड़े-खड़े, दीवार के सहारे। उसकी ताकत, उसकी चाहत, सब कुछ उत्तेजक था।

मैंने महसूस किया कि यह रिश्ता मुझे बदल रहा है। विक्रम के साथ हर बार नई भावना जुड़ती – कभी कोमलता, कभी जुनून। एक शाम, हमने बाहर घूमने का बहाना बनाया। पार्क में, एकांत में, उसने मुझे चूमा, और फिर घर लौटकर हमने घंटों साथ बिताए। उस बार, वह मेरे पूरे शरीर को चूमता रहा, हर हिस्से को सहलाता, और मैंने पहली बार इतना खुलकर प्रतिक्रिया दी।

लेकिन कन्फ्लिक्ट बढ़ता गया। मैं सोचती कि यह कहां ले जाएगा। विक्रम ने कहा, "रिया, मैं तुम्हें कभी नहीं छोड़ सकता। तुम मेरी पत्नी जैसी हो गई हो।" उसके शब्दों में सच्चाई थी, लेकिन मैं शादीशुदा थी। फिर भी, उसकी बाहों में मैं खुद को भूल जाती।

एक रात, अजय देर से आया। हम तीनों डिनर कर रहे थे, लेकिन मेरी नजर विक्रम पर थी। खाने के बाद, अजय सो गया, और विक्रम मेरे कमरे में आया। "रिया," उसने फुसफुसाया, और हम फिर मिले – इस बार चुपचाप, डरते हुए। उसकी हर हरकत में नई वैरायटी थी; कभी ऊपर से, कभी पीछे से। मैंने अपनी इच्छाएं खुलकर व्यक्त कीं, और वह उन्हें पूरा करता गया।

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समय बीतता गया, और यह रिश्ता गहराता गया। विक्रम ने फैसला किया कि वह अलग घर लेगा, लेकिन हमारे बीच का बंधन टूटने वाला नहीं था। एक दोपहर, जब हम अकेले थे, उसने मुझे बाहों में लिया। "तुम मेरी हो, रिया," उसने कहा, और हम फिर एक हुए – इस बार धीमे, भावुक तरीके से, जैसे आखिरी बार हो। लेकिन यह आखिरी नहीं था; यह तो शुरुआत थी।

उसके स्पर्श में अब परिचित गर्माहट थी, लेकिन हर बार नई उत्तेजना। मैंने उसके कंधों पर सिर रखा, और हम लेटे रहे, सांसें मिलाती हुईं।