शादीशुदा होकर भी भाई की पत्नी
सुबह की धूप मेरे कमरे की खिड़की से छनकर आ रही थी, और मैं बिस्तर पर बैठी हुई चाय की चुस्की ले रही थी। आज का दिन बिल्कुल आम था, घर की दिनचर्या वैसी ही चल रही थी जैसी रोज चलती है। रसोई से सासू माँ की आवाज़ आ रही थी, वो नाश्ता तैयार कर रही थीं, और बाहर आँगन में अजय, मेरा पति, अपने भाई रोहन के साथ कुछ बातें कर रहा था। मैंने घड़ी देखी, अभी आठ बज रहे थे, और मुझे लग रहा था कि आज का दिन भी शांत गुजर जाएगा।
मैं सीमा हूँ, छब्बीस साल की, और अजय से मेरी शादी को दो साल हो चुके हैं। हमारा घर दिल्ली के एक छोटे से मोहल्ले में है, जहाँ परिवार साथ रहता है। अजय एक छोटी कंपनी में काम करता है, और रोहन, उसका छोटा भाई, अभी कॉलेज खत्म करके नौकरी की तलाश में है। सासू माँ और ससुर जी रिटायर्ड हैं, और घर की ज़िम्मेदारी हम सब पर बँटी हुई है। मैं घर संभालती हूँ, कभी-कभी पार्ट-टाइम ऑनलाइन काम भी करती हूँ। जीवन इतना साधारण है कि कभी-कभी लगता है जैसे कोई लहर नहीं है, बस एक सीधी रेखा।
नाश्ते की मेज पर हम सब बैठे। अजय ने अपना अखबार खोला और पढ़ने लगा, जबकि रोहन अपने फोन में कुछ देख रहा था। सासू माँ ने परांठे परोसे, और मैंने सबके लिए चाय डाली। "सीमा, आज बाज़ार जाना है क्या?" सासू माँ ने पूछा। मैंने हाँ में सिर हिलाया, "हाँ माँ जी, कुछ सब्ज़ियाँ लानी हैं।" रोहन ने नज़र उठाकर मुझे देखा, लेकिन कुछ कहा नहीं। वो हमेशा चुपचाप रहता है, लेकिन उसकी आँखों में एक अलग सी शांति है। अजय ने कहा, "रोहन, आज मेरे साथ ऑफिस चल, शायद कोई जॉब का कनेक्शन मिल जाए।" रोहन ने सहमति में सिर हिलाया।
दिन गुजरता गया। अजय और रोहन बाहर चले गए, और मैं घर के कामों में लग गई। दोपहर को मैंने खाना बनाया, सासू माँ को दवाई दी, और थोड़ी देर आराम किया। शाम को जब वो दोनों लौटे, तो अजय थका हुआ लग रहा था। "कैसा रहा दिन?" मैंने पूछा। "बस वही, काम का प्रेशर," उसने जवाब दिया। रोहन कमरे में चला गया, और मैंने सोचा कि वो अकेला कितना महसूस करता होगा। उसकी उम्र में लड़के दोस्तों के साथ घूमते हैं, लेकिन वो घर पर ही रहता है।
रात का खाना हमने साथ खाया। बातें घर की, मौसम की, और पड़ोस की हो रही थीं। रोहन ने अचानक कहा, "भाभी, कल मैं बाज़ार जा रहा हूँ, अगर कुछ चाहिए तो बता दो।" मैंने मुस्कुराकर कहा, "ठीक है, लिस्ट बना दूँगी।" अजय ने हँसते हुए कहा, "देख रोहन, तेरी भाभी को शॉपिंग बहुत पसंद है।" वो पल सामान्य था, लेकिन रोहन की नज़र में कुछ था जो मुझे छू गया। शायद वो अकेलापन, या कुछ और। खाने के बाद मैं बर्तन साफ करने लगी, और रोहन ने मदद की पेशकश की। "रहने दो, मैं कर लूँगी," मैंने कहा, लेकिन वो रुका नहीं।
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उस रात अजय जल्दी सो गया। मैं बिस्तर पर लेटी हुई सोच रही थी कि जीवन कितना रूटीन हो गया है। शादी के बाद सब कुछ बदल गया, लेकिन वो उत्साह कहीं खो गया। रोहन का कमरा बगल में है, और कभी-कभी रात को उसकी आवाज़ें आती हैं, जैसे वो किताब पढ़ता हो या फोन पर बात करता हो। मैंने खुद को टोका, क्यों सोच रही हूँ उसके बारे में? लेकिन वो विचार आता रहा। अगले दिन सुबह, जब अजय ऑफिस चला गया, रोहन घर पर था। मैं रसोई में थी, और वो आया, "भाभी, चाय मिलेगी?" मैंने बनाई और दी। हम बैठकर बात करने लगे, घर की छोटी-छोटी बातें।
धीरे-धीरे दिन ऐसे ही गुजरने लगे। रोहन की कंपनी अच्छी लगने लगी। वो मुझे अपनी पढ़ाई की बातें बताता, अपनी महत्वाकांक्षाएँ। अजय हमेशा व्यस्त रहता, और रोहन के साथ वो समय भर जाता। एक दिन शाम को, बारिश हो रही थी। अजय लेट आया, और रोहन छत पर था। मैं ऊपर गई ताकि कपड़े उतार लूँ। वो वहाँ खड़ा बारिश देख रहा था। "भीग जाओगे," मैंने कहा। वो मुड़ा, "भाभी, बारिश अच्छी लगती है।" हम साथ खड़े रहे, चुपचाप। उसकी मौजूदगी में एक अजीब सा आराम था।
उस रात मेरे मन में उथल-पुथल थी। मैं सोच रही थी कि क्या गलत है? अजय मेरा पति है, लेकिन रोहन के साथ वो जुड़ाव अलग है। वो मेरा देवर है, परिवार का हिस्सा, लेकिन मेरे दिल में कुछ हलचल हो रही थी। अगले हफ्ते, घर में एक छोटा सा फंक्शन था, रिश्तेदार आए। सब हँसी-मज़ाक में लगे थे। रोहन मेरी मदद कर रहा था, और एक पल में हमारी उँगलियाँ छू गईं। वो स्पर्श सामान्य था, लेकिन मेरे अंदर कुछ जागा। मैंने खुद को संभाला, लेकिन वो एहसास नहीं गया।
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समय बीतता गया, और वो छोटे-छोटे पल बढ़ने लगे। एक दिन अजय बाहर गया था, दो दिन के लिए। घर में सासू माँ, ससुर जी, रोहन और मैं। शाम को रोहन ने कहा, "भाभी, चलो कोई फिल्म देखें।" हम बैठे, लेकिन फिल्म से ज्यादा हमारी बातें हो रही थीं। वो मेरे करीब बैठा था, और मैंने महसूस किया उसकी साँसें। रात गहराई, और जब सब सो गए, मैं अपने कमरे में थी। रोहन का दरवाज़ा खुला था, वो जाग रहा था। मैं पानी पीने गई, और वो बाहर आया। "नींद नहीं आ रही?" उसने पूछा। मैंने ना में सिर हिलाया।
हम हॉल में बैठे, बातें करने लगे। वो अपनी ज़िंदगी के बारे में बता रहा था, कैसे वो अकेला महसूस करता है। मैंने कहा, "तुम्हारा समय आएगा, अच्छी लड़की मिलेगी।" लेकिन मेरे शब्द खोखले लगे। उसने मेरी आँखों में देखा, "भाभी, आप जैसी कोई नहीं।" वो पल तनाव से भरा था। मैं उठने लगी, लेकिन उसने मेरा हाथ पकड़ा। "रहने दो," मैंने धीरे से कहा, लेकिन नहीं छोड़ा। उसकी आँखों में वो भाव था जो मैंने पहले नहीं देखा। हम चुप थे, लेकिन हवा में कुछ था।
उस रात कुछ नहीं हुआ, लेकिन अगली सुबह सब बदल गया लगता था। अजय लौटा, लेकिन मेरे मन में रोहन था। दिन के कामों में मैं खोई रहती, उसकी याद आती। एक शाम, जब घर खाली था, सासू माँ मंदिर गईं, ससुर जी बाहर, अजय ऑफिस। रोहन घर पर था। मैं कमरे में थी, और वो आया, "भाभी, बात करनी है।" मैंने देखा, उसकी आँखें गंभीर थीं। "क्या हुआ?" मैंने पूछा। उसने कहा, "मैं आपको पसंद करता हूँ, भाभी। ज्यादा, जितना चाहिए।" मेरे दिल की धड़कन तेज हो गई।
मैंने कहा, "ये गलत है, रोहन। मैं तुम्हारी भाभी हूँ, अजय की पत्नी।" लेकिन मेरी आवाज़ कमज़ोर थी। उसने करीब आकर कहा, "जानता हूँ, लेकिन रोक नहीं पा रहा।" उसने मेरा चेहरा अपने हाथों में लिया, और मैंने विरोध नहीं किया। उसका स्पर्श गर्म था, और मैं पिघल रही थी। हमारी नज़रें मिलीं, और फिर उसके होंठ मेरे होंठों पर। वो चुंबन धीमा था, भावनाओं से भरा। मैंने खुद को रोका नहीं, बल्कि जवाब दिया। वो पल जैसे समय रुक गया।
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उसके बाद हम अलग हुए, लेकिन मन नहीं माना। रात को जब अजय सो रहा था, मैं चुपके से रोहन के कमरे में गई। वो जाग रहा था, इंतज़ार में। "सीमा," उसने धीरे से कहा। मैं उसके बिस्तर पर बैठी, और हम बात करने लगे। लेकिन बातें कम, स्पर्श ज्यादा। उसने मुझे अपनी बाहों में लिया, और मैंने महसूस किया उसकी गर्मी। उसके हाथ मेरे शरीर पर फिसले, धीरे-धीरे। मैंने अपनी साड़ी ढीली की, और वो मेरे ब्लाउज के बटन खोलने लगा। हर स्पर्श में एक नई उत्तेजना थी, जैसे पहली बार।
उसकी उँगलियाँ मेरी त्वचा पर नाच रही थीं, और मैं सिहर उठी। "रोहन," मैंने फुसफुसाया, "ये सही नहीं।" लेकिन वो रुका नहीं, और मैं भी नहीं चाहती थी। उसने मुझे बिस्तर पर लिटाया, और अपने कपड़े उतारे। उसका शरीर मजबूत था, युवा। मैंने उसे छुआ, उसकी छाती, उसकी पीठ। हम एक हो गए, धीरे-धीरे, भावनाओं की लहर में। वो हर गति में सावधान था, जैसे मुझे दर्द न हो। मेरे अंदर एक आग जल रही थी, जो सालों से दबी थी। वो चरम पर पहुँचा, और मैं उसके साथ।
उस रात के बाद, हमारा रिश्ता बदल गया। मैं शादीशुदा थी, लेकिन रोहन की हो गई थी। दिन में हम सामान्य रहते, लेकिन रातें हमारी होतीं। एक बार अजय बाहर था, और हम पूरे घर में थे। रोहन ने मुझे रसोई में पकड़ा, और वहीं शुरू हो गया। उसके हाथ मेरी कमर पर, और मैंने विरोध नहीं किया। हम कमरे में गए, और इस बार ज्यादा जुनून था। उसने मुझे दीवार से सटाया, मेरे कपड़े उतारे, और मेरे शरीर के हर हिस्से को चूमा। मैंने उसके बाल खींचे, उसके कंधे पर नाखून गड़ाए। वो दर्द और सुख का मिश्रण था।
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हर बार कुछ नया होता। एक रात हम छत पर थे, तारों के नीचे। बारिश की बूँदें गिर रही थीं, और हम भीग रहे थे। रोहन ने मुझे वहाँ लिटाया, ठंडी हवा में। उसकी जीभ मेरे शरीर पर घूमी, नई जगहों पर। मैं चिल्ला नहीं सकती थी, लेकिन मेरी सिसकियाँ निकल रही थीं। वो मेरे अंदर आया, तेज़, और हम दोनों एक लय में थे। वो भावना अलग थी, जैसे आजादी। लेकिन अंदर एक अपराध बोध भी था, अजय के लिए, परिवार के लिए।
समय गुजरता गया, और हमारा बंधन गहरा होता गया। मैं खुद को रोहन की पत्नी मानने लगी, भले शादीशुदा थी। एक दिन, जब अजय घर पर था, रोहन ने मुझे आँखों से इशारा किया। रात को मैं उसके पास गई, चुपके से। इस बार वो नरम था, प्यार से भरा। उसने मुझे गले लगाया, मेरे बालों में उँगलियाँ फिराईं। "मैं तुम्हें खोना नहीं चाहता," उसने कहा। मैंने चुपचाप सहमति दी। हम धीरे-धीरे एक हुए, हर पल को जीते हुए। उसकी साँसें मेरी गर्दन पर, और मैं उसके सीने पर सिर रखकर लेटी रही।
लेकिन ये छिपा नहीं रह सकता था। एक शाम, सासू माँ ने कुछ शक किया। "सीमा, रोहन के साथ ज्यादा समय बिता रही हो," उन्होंने कहा। मैंने झूठ बोला, लेकिन मन डर गया। रोहन ने कहा, "हमें सावधान रहना होगा।" लेकिन इच्छा रुक नहीं रही थी। एक रात, जब सब सोए थे, हम फिर मिले। इस बार जुनून चरम पर था। रोहन ने मुझे बाहों में उठाया, बिस्तर पर पटका। उसके हाथ मेरे स्तनों पर, दबाव से। मैंने उसके होंठ काटे, खून का स्वाद आया। हम पसीने से तर, एक दूसरे में खोए। वो चरम अलग था, जैसे विस्फोट।
अगले दिन, अजय ने कुछ नोटिस किया। "तुम ठीक हो?" उसने पूछा। मैंने हाँ कहा, लेकिन अंदर तूफान था। रोहन के साथ होना अब ज़रूरत था। शाम को हम अकेले थे, और फिर वही। इस बार सोफे पर, जल्दबाज़ी में। उसके हाथ मेरी जाँघों पर, और मैंने उसे निर्देशित किया। नई स्थिति, नई उत्तेजना। मेरी साँसें तेज़, और वो मेरे कान में फुसफुसाया, "तुम मेरी हो।" मैंने महसूस किया, हाँ, शादीशुदा होकर भी मैं उसकी पत्नी बन गई हूँ।
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ये सिलसिला चलता रहा। हर मिलन में नई भावना, कभी कोमल, कभी उग्र। एक बार हम बाहर गए, पार्क में, रात के अंधेरे में। पेड़ के नीचे, खतरे के साथ। उसकी उँगलियाँ मेरे अंदर, और मैं दबी हुई कराह। वो अनुभव रोमांचक था, डर और सुख का। घर लौटकर, मैं अजय के बगल में लेटी, लेकिन मन रोहन के पास।
अब ये जीवन की सच्चाई बन गई है। मैं सीमा, अजय की पत्नी, लेकिन रोहन की छाया में। हर रात, जब घर शांत होता है, मैं उसके पास जाती हूँ। आज फिर, अजय सो रहा है, और मैं दरवाज़ा खोल रही हूँ। रोहन इंतज़ार कर रहा है, उसकी आँखें चमक रही हैं। हम एक बार फिर एक होंगे, भावनाओं की गहराई में।