पड़ोस की नई भाभी

सुबह की धूप अभी-अभी खिड़की से झांक रही थी, और मैं अपनी बालकनी में खड़ा होकर चाय की चुस्की ले रहा था। रोज की तरह, मोहल्ले की सड़क पर हल्की-फुल्की हलचल शुरू हो चुकी थी – बच्चे स्कूल जाते हुए, दूधवाला अपनी साइकिल की घंटी बजाता हुआ, और पड़ोस की आंटियां अपनी छतों पर कपड़े सुखाती हुईं। मैं राहुल हूं, अट्ठाईस साल का, एक छोटी आईटी कंपनी में काम करता हूं, और घर पर मां-बाप के साथ रहता हूं। आज का दिन भी वैसा ही लग रहा था, जैसे बाकी दिन – ऑफिस जाने की तैयारी, नाश्ता, और शाम को लौटकर थकान उतारना।

तभी मैंने देखा कि हमारे बगल वाले खाली मकान में कुछ हलचल हो रही है। एक ट्रक खड़ा था, और कुछ मजदूर सामान उतार रहे थे। लगता है कोई नया परिवार आ रहा है। मैंने ज्यादा ध्यान नहीं दिया, क्योंकि ऐसे बदलाव मोहल्ले में कभी-कभी होते रहते हैं। मां ने अंदर से आवाज दी, "राहुल, नाश्ता तैयार है, जल्दी आ।" मैं चाय खत्म करके अंदर चला गया, और दिन की शुरुआत हो गई। शाम को जब मैं ऑफिस से लौटा, तो देखा कि नया परिवार बस चुका था। मां ने बताया कि वे हमारे पड़ोसी हैं – अजय भैया और उनकी पत्नी नेहा भाभी। अजय भैया किसी बैंक में काम करते हैं, और नेहा भाभी घर संभालती हैं।

अगले दिन सुबह, मैं बालकनी में खड़ा था, तभी नेहा भाभी अपनी छत पर कपड़े सुखाने आईं। उन्होंने मुझे देखा और मुस्कुराकर हाथ हिलाया। "नमस्ते, राहुल जी। मां जी ने बताया आपके बारे में। हम लोग नए-नए आए हैं यहां।" उनकी आवाज में एक मिठास थी, जो मोहल्ले की दूसरी औरतों से अलग लगी। मैंने भी जवाब दिया, "नमस्ते भाभी, स्वागत है। कोई जरूरत हो तो बताइएगा।" बस इतनी सी बात हुई, और मैं अपने काम में लग गया। लेकिन शाम को जब अजय भैया घर आए, तो उन्होंने मां को बुलाया और परिचय करवाया। हम सब बैठकर चाय पी, और बातें कीं। नेहा भाभी ने चाय बनाई थी, जो बेहद स्वादिष्ट थी।

धीरे-धीरे दिन बीतने लगे। मैं ऑफिस से लौटता, तो कभी-कभी नेहा भाभी छत पर दिख जातीं। हमारी बातें बढ़ने लगीं – मौसम की, मोहल्ले की खबरों की, या फिर कभी खाने-पीने की रेसिपी की। नेहा भाभी करीब पच्चीस-छब्बीस साल की होंगी, लंबे बाल, साड़ी में हमेशा सजी-संवरी। अजय भैया ज्यादातर काम में व्यस्त रहते, सुबह जाते और देर रात लौटते। एक दिन शाम को बारिश हो रही थी, मैं घर लौटा तो भीग गया। नेहा भाभी ने दरवाजे से देखा और कहा, "राहुल जी, भीग गए? आइए, चाय पी लीजिए।" मैं हिचकिचाया, लेकिन उनके घर चला गया।

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उनके घर में पहली बार गया था। साफ-सुथरा, दीवारों पर कुछ पेंटिंग्स लगी हुईं। नेहा भाभी ने चाय दी और बैठकर बात करने लगीं। "अजय तो आज लेट आएंगे, मीटिंग है। आप बताइए, आपका दिन कैसा गुजरा?" उनकी आंखों में एक सादगी थी, जो मुझे अच्छी लगी। हमने घंटे भर बात की – मेरी नौकरी की, उनके गांव की यादों की। बाहर बारिश की आवाज आ रही थी, और कमरे में हल्की रोशनी। मैंने महसूस किया कि नेहा भाभी थोड़ी अकेली लगती हैं, नए शहर में। जब मैं जाने लगा, तो उन्होंने कहा, "फिर आइएगा, अच्छा लगा बात करके।"

उस शाम के बाद हमारी मुलाकातें बढ़ गईं। कभी मैं सब्जी लाता, तो वे लेने आ जातीं। कभी वे मां से मिलने आतीं, और मैं भी शामिल हो जाता। एक दिन दोपहर को मां बाजार गई थीं, और मैं घर पर अकेला था। दरवाजे पर दस्तक हुई, नेहा भाभी थीं। "राहुल जी, थोड़ा नमक चाहिए, खत्म हो गया।" मैंने दिया, और वे अंदर आईं। हम रसोई में खड़े बात करने लगे। उनकी साड़ी का पल्लू थोड़ा सरक गया था, लेकिन मैंने नजरें फेर लीं। फिर भी, दिल में एक अजीब सी हलचल हुई। नेहा भाभी ने पूछा, "आप कभी अकेले महसूस करते हैं?" मैंने कहा, "हां, कभी-कभी। लेकिन परिवार है न।"

उस बात ने कुछ बदल दिया। अगले दिनों में हमारी बातें गहरी होने लगीं। नेहा भाभी बतातीं कि अजय भैया हमेशा व्यस्त रहते हैं, और वे घर में अकेली पड़ जाती हैं। मैं उन्हें अपनी किताबें देता, या फिर फिल्मों की बात करता। एक शाम, अजय भैया शहर से बाहर गए थे। नेहा भाभी ने मुझे फोन किया, "राहुल, शाम को आना, डिनर साथ करेंगे।" मैं गया। हमने साथ खाना खाया, और बातें कीं। रात गहराने लगी, और नेहा भाभी की आंखों में एक उदासी थी। "कभी-कभी लगता है, जिंदगी में कुछ कमी है," उन्होंने कहा। मैंने उनका हाथ पकड़ा, सांत्वना देने के लिए।

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उस स्पर्श ने सब बदल दिया। नेहा भाभी ने मेरी तरफ देखा, और हमारी नजरें मिलीं। दिल की धड़कन तेज हो गई। मैंने उन्हें गले लगा लिया, और वे भी मेरे सीने से लग गईं। हमारी सांसें मिलने लगीं। मैंने उनके होंठों पर अपने होंठ रख दिए, और एक लंबा चुंबन हुआ। नेहा भाभी की आंखें बंद थीं, और उनके हाथ मेरी कमर पर थे। हम सोफे पर बैठ गए, और मैंने उनकी साड़ी का पल्लू सरकाया। उनका ब्लाउज दिखा, और मैंने उसे खोलना शुरू किया। नेहा भाभी ने विरोध नहीं किया, बल्कि मेरी शर्ट उतार दी।

उस रात हम एक-दूसरे में खो गए। नेहा भाभी का शरीर गर्म था, और उनकी सांसें मेरे कान में गूंज रही थीं। मैंने उनके स्तनों को छुआ, और वे सिहर उठीं। हम बेडरूम में चले गए, जहां मैंने उन्हें बिस्तर पर लिटाया। नेहा भाभी ने मेरी पैंट उतारी, और हम पूरी तरह नग्न हो गए। मैं उनके ऊपर आया, और धीरे-धीरे प्रवेश किया। नेहा भाभी की आह निकली, लेकिन वह आनंद की थी। हमारा मिलन लंबा चला, जिसमें कभी तेजी आई, कभी धीमापन। नेहा भाभी ने कहा, "राहुल, ऐसा लग रहा है जैसे सालों की प्यास बुझ रही है।"

उसके बाद हमारी मुलाकातें और गुप्त हो गईं। अजय भैया जब घर पर नहीं होते, हम मिलते। एक दोपहर, मां बाहर गई थीं, नेहा भाभी मेरे घर आईं। हमने दरवाजा बंद किया, और सीधे बेडरूम में गए। इस बार नेहा भाभी ज्यादा आक्रामक थीं। उन्होंने मुझे दीवार से सटाया, और मेरे शरीर को चूमना शुरू किया। मैंने उनकी साड़ी उतारी, और हम फर्श पर ही लेट गए। नेहा भाभी मेरे ऊपर आईं, और खुद को नियंत्रित करते हुए मुझमें समा गईं। हमारी सांसें तेज थीं, और पसीना बह रहा था। नेहा भाभी की आंखों में एक जुनून था, जो मुझे पागल कर रहा था।

लेकिन हर मिलन के बाद एक अपराधबोध आता। नेहा भाभी कहतीं, "ये गलत है, लेकिन रोक नहीं पाती।" मैं भी सोचता कि अजय भैया को पता चला तो क्या होगा। फिर भी, हमारी इच्छा रुक नहीं रही थी। एक शाम, बारिश में हम उनकी छत पर मिले। पानी हमें भिगो रहा था, और हमने वहीं प्यार किया। नेहा भाभी की गीली साड़ी उनके शरीर से चिपकी हुई थी, जो और आकर्षक लग रही थी। मैंने उन्हें दीवार से सटाया, और हमारा मिलन बारिश की बूंदों के साथ हुआ। नेहा भाभी की कराहें बारिश की आवाज में घुल गईं।

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समय बीतता गया, और हमारी भावनाएं गहरी होती गईं। नेहा भाभी अब सिर्फ शारीरिक सुख नहीं, बल्कि भावनात्मक साथ चाहती थीं। एक रात, अजय भैया बाहर थे, हमने पूरी रात साथ बिताई। नेहा भाभी ने मुझे अपने बचपन की कहानियां सुनाईं, और मैंने अपनी महत्वाकांक्षाओं के बारे में बताया। फिर हमने प्यार किया, इस बार धीरे और प्यार से। मैंने उनके हर हिस्से को चूमा, और वे मेरे शरीर को सहलाती रहीं। हमारा क्लाइमेक्स एक साथ आया, और हम थककर सो गए।

लेकिन एक दिन, अजय भैया को शक हो गया। उन्होंने नेहा भाभी से पूछा, और वह रो पड़ीं। हमने फैसला किया कि ये रुकना चाहिए। लेकिन आखिरी बार मिले, तो नेहा भाभी ने कहा, "राहुल, ये यादें हमेशा रहेंगी।" हमने एक आखिरी मिलन किया, जिसमें सारी भावनाएं उमड़ पड़ीं। नेहा भाभी मेरे सीने पर सिर रखकर रोईं, और मैंने उन्हें चुप कराया।

उस रात के बाद, हमारी मुलाकातें कम हो गईं। लेकिन दिल में वो एहसास बाकी था। नेहा भाभी अब भी मुस्कुराती हैं जब मिलती हैं, और मैं भी। जीवन चलता रहा, लेकिन वो पल हमेशा जीवित रहेंगे। एक शाम, जब मैं बालकनी में खड़ा था, नेहा भाभी छत पर आईं। हमारी नजरें मिलीं, और एक चुप्पी में सब कुछ कहा गया।

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अब भी कभी-कभी रातों में उनकी याद आती है, और मैं सोचता हूं कि क्या वो भी मेरी याद करती होंगी। हमारा रिश्ता अब सामान्य पड़ोसियों जैसा है, लेकिन अंदर से कुछ टूटा हुआ सा लगता है। नेहा भाभी की मुस्कान अब भी वैसी ही है, लेकिन आंखों में एक कहानी छिपी है।

एक दिन, अजय भैया ने मुझे बताया कि वे शहर बदल रहे हैं। नेहा भाभी ने अलविदा कहा, और हमारी आखिरी मुलाकात हुई। हमने गले लगाया, और आंसू बहाए। "राहुल, भूलना मत," उन्होंने कहा। मैंने वादा किया।

वे चले गए, लेकिन मेरे दिल में वो जगह खाली रह गई। अब मोहल्ला वैसा ही है, लेकिन नेहा भाभी की कमी खलती है। कभी-कभी बालकनी में खड़े होकर उस खाली मकान को देखता हूं, और यादें ताजा हो जाती हैं।

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जीवन आगे बढ़ता है, लेकिन कुछ पल हमेशा साथ रहते हैं। नेहा भाभी अब दूर हैं, लेकिन उनकी यादें मेरे साथ हैं। एक रात, मैंने सपने में उन्हें देखा, और हम फिर से एक हो गए। जागने पर एहसास हुआ कि वो सिर्फ याद है।

अब मैं अपनी जिंदगी में व्यस्त हूं, लेकिन वो एहसास कभी नहीं जाता। नेहा भाभी, जहां भी हो, खुश रहो।

सुबह की धूप फिर से बालकनी पर पड़ रही है, और मैं चाय पी रहा हूं। मोहल्ला वैसा ही है, लेकिन दिल में एक कहानी बसी हुई है।