पड़ोसी की बेटी की चाहत
मैं राहुल हूं, और पिछले दो साल से इस छोटे से अपार्टमेंट में अकेला रहता हूं। हर सुबह की तरह आज भी मैं बालकनी में खड़ा होकर चाय की चुस्की ले रहा था। बाहर हल्की धूप निकल रही थी, और मोहल्ले की सड़क पर लोग अपनी दिनचर्या में लगे हुए थे।
मेरा काम घर से ही चलता है, ग्राफिक डिजाइन का, तो दिन भर कंप्यूटर के सामने बैठा रहता हूं। पड़ोस में शर्मा अंकल का परिवार रहता है, वे रिटायर्ड हैं और उनकी पत्नी आंटी घर संभालती हैं। उनकी बेटी नेहा कॉलेज जाती है, लेकिन मैंने कभी ज्यादा ध्यान नहीं दिया।
उस दिन दोपहर को दरवाजे पर दस्तक हुई। मैंने खोला तो नेहा खड़ी थी, हाथ में एक किताब लिए। उसने मुस्कुराकर कहा, "अंकल, क्या आप कंप्यूटर में कुछ मदद कर सकते हैं? मेरा असाइनमेंट अटक गया है।" मैंने हंसकर कहा, "अरे, अंकल मत कहो, राहुल भैया बोलो। आओ अंदर।"
वह अंदर आई और मेरे कंप्यूटर के पास बैठ गई। मैंने उसकी समस्या देखी, कुछ सॉफ्टवेयर का इशू था। हल करते हुए हम बातें करने लगे। नेहा ने बताया कि वह ग्राफिक्स डिजाइन में इंटरेस्टेड है, और कॉलेज में उसी कोर्स में है। मैंने अपने कुछ काम दिखाए, और वह उत्साहित हो गई।
उसके बाद नेहा अक्सर आने लगी। कभी असाइनमेंट की मदद, कभी बस यूं ही बात करने। शर्मा अंकल और आंटी को कोई ऐतराज नहीं था, वे मुझे भरोसेमंद समझते थे। मैं भी नेहा को छोटी बहन जैसा मानता था, लेकिन धीरे-धीरे उसकी मौजूदगी में एक अलग सा आराम महसूस होने लगा।
एक शाम बारिश हो रही थी। नेहा दौड़कर मेरे दरवाजे पर आई, भीग चुकी थी। "राहुल भैया, घर की चाबी भूल गई, मम्मी-पापा बाहर गए हैं। क्या मैं यहां रुक सकती हूं?" मैंने तौलिया दिया और चाय बनाई। हम बैठकर बातें करने लगे, बारिश की आवाज बाहर गूंज रही थी।
बातों-बातों में नेहा ने अपनी जिंदगी के बारे में बताया। कॉलेज के दोस्त, पढ़ाई का प्रेशर, और घर की छोटी-छोटी बातें। मैंने भी अपनी कहानी शेयर की, कैसे शहर में अकेले रहना कभी-कभी भारी लगता है। उसकी आंखों में एक गहराई थी, जो मुझे छू गई।
बारिश थमने के बाद वह जाने लगी, लेकिन दरवाजे पर रुककर बोली, "थैंक यू, राहुल भैया। आपसे बात करके अच्छा लगता है।" मैंने मुस्कुराकर कहा, "कभी भी आना, नेहा।" उस रात मैं सोचता रहा, उसकी मुस्कान कितनी मासूम थी।
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कुछ दिन बाद नेहा फिर आई, इस बार एक प्रोजेक्ट पर डिस्कस करने। हम लिविंग रूम में बैठे थे। वह मेरे करीब बैठी, और कंप्यूटर स्क्रीन देखते हुए उसका हाथ मेरे कंधे पर टिका। मैंने महसूस किया कि मेरा दिल तेज धड़क रहा था।
उसने पूछा, "राहुल भैया, आप कभी अकेला महसूस नहीं करते?" मैंने कहा, "करता हूं, लेकिन काम में व्यस्त रहता हूं।" वह चुप हो गई, और फिर बोली, "मैं भी कभी-कभी वैसा महसूस करती हूं, घर में सब हैं फिर भी।"
उस पल में हमारी नजरें मिलीं, और कुछ सेकंड के लिए समय रुक सा गया। मैंने अपना हाथ उसके हाथ पर रखा, बस सहानुभूति में। लेकिन वह नहीं हटी, बल्कि उसकी उंगलियां मेरी उंगलियों में फंस गईं।
मेरा मन उलझ गया। नेहा पड़ोसी की बेटी थी, मैं उससे दस साल बड़ा था। लेकिन उसकी आंखों में जो भाव थे, वे मुझे खींच रहे थे। मैंने खुद को रोका, और विषय बदल दिया। लेकिन उस दिन से कुछ बदल गया।
अगली बार जब नेहा आई, तो शाम का समय था। घर में अंधेरा होने लगा था। हम बातें कर रहे थे, और अचानक उसने कहा, "राहुल भैया, क्या आप मुझे पसंद करते हैं?" मैं स्तब्ध रह गया। "क्या मतलब?" मैंने पूछा।
वह शर्मा गई, लेकिन बोली, "मैं आपसे बहुत अट्रैक्टेड हूं। आप इतने केयरिंग हैं।" मेरा मन लड़खड़ा गया। मैं जानता था यह गलत था, लेकिन उसकी मासूमियत और ईमानदारी ने मुझे पिघला दिया।
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मैंने कहा, "नेहा, तुम छोटी हो, यह सही नहीं।" लेकिन वह करीब आई, और बोली, "मैं 19 की हूं, राहुल। और मुझे पता है क्या चाहती हूं।" उसकी सांसें मेरे चेहरे पर महसूस हो रही थीं।
मैंने खुद को रोकने की कोशिश की, लेकिन उसने मेरे होंठों पर अपने होंठ रख दिए। वह पहला चुंबन था, नरम और अनिश्चित। मेरा प्रतिरोध टूट गया, और मैंने उसे अपनी बाहों में भर लिया।
हम सोफे पर बैठ गए, और चुंबन गहरा होता गया। मेरे हाथ उसके बालों में थे, और उसकी सांसें तेज। मैंने महसूस किया कि यह उसका पहला अनुभव था, उसकी कंपकंपी बता रही थी।
उसने फुसफुसाकर कहा, "राहुल, मैं डर रही हूं, लेकिन तुम्हारे साथ सब ठीक लगता है।" मैंने उसे आश्वासन दिया, "मैं तुम्हें कभी दुख नहीं दूंगा, नेहा।" हम धीरे-धीरे कपड़े उतारने लगे, हर स्पर्श में सावधानी थी।
उसकी त्वचा नरम थी, जैसे रेशम। मैंने उसके गले पर吻 किया, और वह सिहर उठी। हम बेडरूम में चले गए, जहां रोशनी हल्की थी। मैंने उसे बिस्तर पर लिटाया, और उसके शरीर को सहलाया।
नेहा की आंखें बंद थीं, लेकिन उसकी मुस्कान बता रही थी कि वह तैयार थी। मैंने धीरे से प्रवेश किया, और वह दर्द से कराह उठी। "रुक जाओ," उसने कहा, लेकिन फिर बोली, "नहीं, जारी रखो।" वह पल दर्द और सुख का मिश्रण था।
हमारी गति बढ़ी, और नेहा की सिसकियां कमरे में गूंजने लगीं। मैंने महसूस किया कि यह उसकी पहली बार थी, उसकी सील टूट रही थी। लेकिन उसकी आंखों में विश्वास था, जो मुझे और जोश दे रहा था।
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हमारे शरीर एक हो गए, पसीने से लथपथ। नेहा ने मेरे कानों में फुसफुसाया, "राहुल, यह अद्भुत है। मैं तुम्हें प्यार करती हूं।" मैंने जवाब दिया, "मैं भी, नेहा।" वह चरम पर पहुंची, और उसकी चीख दबी हुई थी।
उसके बाद हम लेटे रहे, एक-दूसरे को गले लगाए। नेहा की सांसें सामान्य हो रही थीं, और मैं उसके बाल सहला रहा था। लेकिन मन में एक डर था, क्या यह सही था? पड़ोसी की बेटी, और हमारा यह रिश्ता।
अगले दिन नेहा फिर आई, लेकिन इस बार उसकी आंखों में शरारत थी। "राहुल, कल रात के बारे में सोच रही थी," उसने कहा। मैंने उसे चुप कराया, लेकिन वह हंस पड़ी। हम फिर करीब आए, इस बार बिना हिचक के।
मैंने उसे नए तरीके से छुआ, उसके स्तनों को चूमा, और वह आनंद से कराह उठी। हमारी हर मुलाकात अब गुप्त मिलन बन गई। नेहा की मासूमियत अब एक जुनून में बदल रही थी।
एक रात हम बालकनी में थे, चांदनी रात थी। नेहा ने कहा, "राहुल, क्या हम हमेशा ऐसे रह सकते हैं?" मैंने जवाब नहीं दिया, बस उसे吻 किया। लेकिन अंदर से मैं जानता था, यह रिश्ता जटिल था।
फिर भी, हमारी चाहत बढ़ती गई। हर बार नया अनुभव, कभी धीमा और भावुक, कभी तेज और जंगली। नेहा अब खुल गई थी, अपनी इच्छाएं व्यक्त करने लगी।
एक दोपहर जब घर खाली था, नेहा आई और सीधे बेडरूम में ले गई। "आज मैं ऊपर रहूंगी," उसने कहा। मैं हंस पड़ा, और हमने नए पोजिशन ट्राई किए। उसकी ऊर्जा मुझे हैरान कर रही थी।
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हमारे बीच का बंधन गहरा होता गया, लेकिन बाहर की दुनिया से डर था। शर्मा अंकल को शक हो जाए तो? लेकिन नेहा बेफिक्र थी, "प्यार में सब जायज है," वह कहती।
रातें अब उसके साथ गुजरने लगीं। हम बातें करते, हंसते, और फिर प्यार करते। नेहा की त्वचा की खुशबू, उसकी मुस्कान, सब मेरी आदत बन गई।
एक शाम हम लेटे हुए थे, नेहा मेरे सीने पर सिर रखे। उसने कहा, "राहुल, मुझे लगता है मैं तुम्हारे बिना नहीं रह सकती।" मैंने उसे कसकर पकड़ लिया, और हम फिर एक हो गए। उसकी सांसें, मेरी धड़कन, सब मिलकर एक संगीत बना रहे थे।
समय बीतता गया, लेकिन हमारा रिश्ता छुपा रहा। नेहा अब ज्यादा बोल्ड हो गई थी, कभी-कभी दिन में ही चोरी-छुपे मिलती। हमारी हर मुलाकात में नई भावनाएं जुड़तीं, कभी ईर्ष्या, कभी गहरा प्यार।
एक रात बारिश फिर हो रही थी, जैसे पहली बार। नेहा भीगी हुई आई, और हमने वही पुराना जादू दोहराया। लेकिन इस बार उसकी आंखों में आंसू थे, "राहुल, पापा को शक हो रहा है।" मैंने उसे दिलासा दिया, लेकिन मन में तूफान था।
फिर भी, हम रुक नहीं सके। हमारी चाहत अब लत बन चुकी थी। नेहा के स्पर्श में वह जादू था जो मुझे जीवित रखता था। हम बिस्तर पर लेटे, उसके शरीर को मैंने फिर से खोजा, हर इंच को चूमा।
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वह चरम पर पहुंची, और मैं उसके साथ। हमारी सिसकियां बारिश की आवाज में घुल गईं। नेहा ने फुसफुसाया, "राहुल, जो भी हो, मैं तुम्हारी हूं।" मैंने उसे गले लगाया, और हम सो गए, बाहर की दुनिया को भूलकर।
सुबह नेहा चली गई, लेकिन उसकी खुशबू कमरे में बसी रही। मैं सोचता रहा, यह रिश्ता कहां ले जाएगा। लेकिन अभी, उस पल में, सब सही लग रहा था।
शाम को नेहा का मैसेज आया, "आ रही हूं।" मैं इंतजार करने लगा, दिल तेज धड़कते हुए। दरवाजा खुला, और वह अंदर आई, आंखों में वही चाहत। हम फिर करीब आए, बातों से शुरू करके प्यार तक।
इस बार नेहा ने पहल की, मुझे दीवार से सटाकर吻 किया। उसकी उंगलियां मेरे शरीर पर घूमीं, और मैं पिघल गया। हम फर्श पर ही लेट गए, जुनून में खोए।
उसकी कराहें, मेरी सांसें, सब एक हो गया। नेहा अब अनुभवी लग रही थी, अपनी इच्छाएं साफ व्यक्त करती। हम चरम तक पहुंचे, और फिर शांत लेटे रहे।
नेहा ने कहा, "राहुल, यह कभी खत्म न हो।" मैंने सहमति में सिर हिलाया, लेकिन जानता था चुनौतियां हैं। लेकिन उसकी बाहों में, सब भूल जाता हूं।