मुंहबोली बेटी की चाहत

सुबह की धूप मेरे कमरे की खिड़की से छनकर आ रही थी, और मैं अपनी पुरानी कुर्सी पर बैठा चाय की चुस्की ले रहा था। रोज की तरह आज भी घर में शांति थी, बस रसोई से आने वाली आवाजें बता रही थीं कि दिन शुरू हो चुका है। मैं राजेश हूं, पैंतालीस साल का एक साधारण आदमी, जो दिल्ली की एक छोटी सी कॉलोनी में रहता हूं।

मेरा परिवार छोटा सा है – मैं और प्रिया। प्रिया मेरी मुंहबोली बेटी है। सालों पहले मेरे दोस्त की मौत के बाद मैंने उसे अपनाया था। वो तब छोटी सी थी, लेकिन अब बाइस साल की हो चुकी है, कॉलेज जाती है और घर की जिम्मेदारियां भी संभालती है। आजकल वो अपनी पढ़ाई में व्यस्त रहती है, और मैं अपने छोटे से बिजनेस में।

चाय खत्म करके मैं उठा और बाहर बालकनी में आ गया। सामने पार्क में बच्चे खेल रहे थे, और हवा में हल्की ठंडक थी। प्रिया अभी उठी नहीं थी, शायद देर रात तक पढ़ रही होगी। मैंने सोचा कि आज छुट्टी का दिन है, तो शायद साथ में कहीं घूमने जाएं।

कुछ देर बाद प्रिया रसोई में आई, उसके बाल बिखरे हुए थे और वो नींद से भरी आंखों से मुस्कुराई। "गुड मॉर्निंग, पापा," उसने कहा और मेरे लिए नाश्ता बनाने लगी। मैंने उसे देखा, वो अब बड़ी हो गई थी, लेकिन मेरे लिए वो हमेशा वही छोटी प्रिया थी।

नाश्ते की मेज पर हम दोनों बैठे। मैंने पूछा, "आज क्या प्लान है तेरा?" वो हंसी और बोली, "कुछ खास नहीं, पापा। बस घर पर रहकर पढ़ाई करूंगी। आप?" मैंने कहा कि शाम को बाजार जाना है, कुछ सामान लाना है। वो चुपचाप खाती रही, लेकिन उसकी आंखों में कुछ था जो मैं समझ नहीं पाया।

दिन गुजरता गया। दोपहर में मैं अपने काम में लगा रहा, और प्रिया अपने कमरे में। शाम को जब मैं बाजार से लौटा, तो घर में अजीब सी शांति थी। प्रिया सोफे पर बैठी किताब पढ़ रही थी, लेकिन उसका ध्यान कहीं और था। मैंने बैग रखा और उसके पास बैठ गया।

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"क्या बात है, बेटी? कुछ परेशान लग रही है," मैंने पूछा। वो सर झुकाकर बोली, "कुछ नहीं, पापा। बस सोच रही थी।" मैंने उसका हाथ पकड़ा, वो हमेशा से मेरे करीब रही थी, लेकिन आज उसकी आंखों में एक अलग सी चमक थी।

रात का खाना हमने साथ खाया। बातें कीं, पुरानी यादें ताजा कीं। प्रिया ने बताया कि कॉलेज में उसका एक दोस्त है जो उसे पसंद करता है, लेकिन वो कन्फ्यूज है। मैंने सलाह दी कि दिल की सुनो, लेकिन सावधान रहो। वो मुस्कुराई, लेकिन उसकी मुस्कान में कुछ छिपा था।

रात गहराने लगी। मैं अपने कमरे में लेटा था, लेकिन नींद नहीं आ रही थी। प्रिया का चेहरा बार-बार आंखों के सामने आ रहा था। वो अब बच्ची नहीं थी, एक युवा लड़की थी, अपनी जिंदगी की उलझनों में फंसी। मैंने सोचा कि शायद उसे और बात करनी चाहिए।

अचानक दरवाजे पर दस्तक हुई। प्रिया अंदर आई, उसके चेहरे पर उदासी थी। "पापा, नींद नहीं आ रही। क्या मैं यहां लेट सकती हूं?" उसने पूछा। मैंने हामी भरी, वो मेरे बगल में लेट गई। हम चुपचाप लेटे रहे, लेकिन हवा में कुछ बदलाव था।

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कुछ देर बाद प्रिया ने मेरी तरफ मुड़कर कहा, "पापा, आपने हमेशा मेरा ख्याल रखा। लेकिन अब मैं बड़ी हो गई हूं, और कुछ चीजें समझती हूं।" उसकी आवाज में कंपकंपी थी। मैंने पूछा कि क्या बात है, लेकिन वो चुप रही।

फिर धीरे से उसने अपना हाथ मेरे सीने पर रखा। मेरे मन में उथल-पुथल मच गई। ये क्या हो रहा था? वो मेरी बेटी थी, मुंहबोली सही, लेकिन रिश्ता तो था। मैंने हाथ हटाने की कोशिश की, लेकिन वो बोली, "पापा, मैं जानती हूं आप क्या सोच रहे हैं। लेकिन ये मेरी चाहत है।"

मैं स्तब्ध था। प्रिया की आंखों में आंसू थे, लेकिन दृढ़ता भी। उसने बताया कि सालों से वो मुझे अलग नजरों से देखती आई है, प्यार की नजरों से। मैंने विरोध किया, कहा कि ये गलत है, लेकिन उसके शब्दों में इतना दर्द था कि मैं चुप हो गया।

रात की उस चुप्पी में हमारी बातें लंबी चलीं। प्रिया ने अपनी भावनाएं खोलीं, बताया कि कैसे वो अकेली महसूस करती है, और मैं ही उसका सहारा हूं। मेरे मन में संघर्ष था – नैतिकता और उसकी खुशी के बीच।

धीरे-धीरे उसकी निकटता बढ़ती गई। उसका स्पर्श अब सामान्य नहीं लग रहा था। मैंने खुद को रोका, लेकिन प्रिया ने कहा, "पापा, ये मेरी पहली बार है, और मैं चाहती हूं कि ये आपके साथ हो।" उसके शब्दों ने मुझे हिला दिया।

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उस रात हमारी दुनिया बदल गई। प्रिया ने खुद को मेरे हवाले कर दिया, और मैं उसके प्यार में बह गया। उसका शरीर नरम था, उसकी सांसें तेज। हमने एक-दूसरे को छुआ, जैसे सालों का बोझ उतर रहा हो।

उसकी आंखों में डर था, लेकिन विश्वास भी। मैंने उसे धीरे से सहलाया, उसके होंठों को चूमा। प्रिया की देह कांप रही थी, लेकिन वो रुकी नहीं। हमारा मिलन भावनाओं से भरा था, दर्द और सुख का मिश्रण।

जैसे-जैसे रात गहराती गई, हमारी अंतरंगता बढ़ती गई। प्रिया ने अपनी सील खुद तुड़वाई, मेरे साथ। उसका चेहरा चमक रहा था, आंसू और मुस्कान के साथ। मैंने महसूस किया कि ये सिर्फ शारीरिक नहीं, बल्कि भावनात्मक बंधन था।

सुबह होने से पहले हम थककर सो गए, एक-दूसरे की बाहों में। लेकिन मन में सवाल थे – ये रिश्ता अब कहां जाएगा? प्रिया खुश थी, और शायद यही काफी था।

अगले दिन सब सामान्य लग रहा था, लेकिन हम दोनों जानते थे कि कुछ बदल चुका है। प्रिया ने मुझे देखकर मुस्कुराया, और मैंने उसकी मुस्कान में अपना प्रतिबिंब देखा।

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शाम को हम फिर करीब आए। इस बार कोई हिचक नहीं थी। प्रिया की देह अब परिचित लग रही थी, उसके स्पर्श में नयापन था। हमने नए तरीके से एक-दूसरे को खोजा, भावनाओं की गहराई में।

उसकी सांसें मेरे कान में गूंज रही थीं, उसका शरीर मेरे साथ लय में। हर पल नया अनुभव था, जैसे हम दोनों एक हो रहे हों। प्रिया ने फुसफुसाकर कहा, "पापा, ये हमेशा ऐसा ही रहे।"

दिन बीतते गए, हमारा रिश्ता गहराता गया। कभी बातों में, कभी चुप्पी में। लेकिन हर रात हमारी चाहत हमें एक कर देती थी। प्रिया की आंखों में अब शांति थी, और मेरे मन में उसकी खुशी।

एक शाम प्रिया ने कहा, "पापा, मैं चाहती हूं कि हम और करीब आएं।" उसकी बातों में नई उत्तेजना थी। हमने उस रात नए प्रयोग किए, सेंसरी अनुभवों से भरे। उसका शरीर अब मेरे लिए एक रहस्य नहीं था, बल्कि एक किताब जिसे मैं बार-बार पढ़ता था।

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उसके स्पर्श ने मुझे उत्तेजित किया, उसकी कराहें कमरे में गूंजीं। हमारा मिलन अब सिर्फ शारीरिक नहीं रहा, बल्कि आत्मिक भी। प्रिया ने खुद को पूरी तरह समर्पित कर दिया, और मैंने उसे हर पल महसूस कराया।

लेकिन कभी-कभी मन में डर आता था – समाज क्या कहेगा? लेकिन प्रिया की मुस्कान सब भुला देती थी। हमारा प्यार अब एक रहस्य था, जो हमें बांधे हुए था।

एक रात फिर हम करीब थे। प्रिया की देह गर्म थी, उसकी आंखें बंद। मैंने उसे सहलाया, उसके हर हिस्से को छुआ। वो कांप उठी, और हमारा सुख चरम पर पहुंचा।

उस पल में सब कुछ ठहर सा गया था, जैसे समय रुक गया हो। प्रिया की सांसें धीमी हो रही थीं, और मैं उसके बालों में उंगलियां फिरा रहा था।