गर्लफ्रेंड की जगह माँ

सुबह की धूप कमरे में छनकर आ रही थी, और मैं बिस्तर पर लेटा हुआ कॉफी का कप थामे अखबार पढ़ रहा था। आज छुट्टी का दिन था, कोई जल्दबाजी नहीं, बस आराम से वक्त गुजारने का मन था। प्रिया का घर मेरे अपार्टमेंट से ज्यादा दूर नहीं था, और मैं सोच रहा था कि दोपहर में उसके पास जाऊंगा। बाहर सड़क पर गाड़ियों की आवाजें आ रही थीं, और कहीं दूर से बच्चों के खेलने की आवाजें। मैंने घड़ी देखी, अभी नौ बजे थे, और दिन की शुरुआत हमेशा की तरह शांत लग रही थी।

मैं रोहन हूं, तेईस साल का, दिल्ली में एक आईटी कंपनी में काम करता हूं। प्रिया से मेरी मुलाकात कॉलेज में हुई थी, और अब हम दोनों दो साल से साथ हैं। वो भी मेरी उम्र की है, और उसका परिवार काफी साधारण है। उसके पापा सरकारी नौकरी में हैं, और मम्मी घर संभालती हैं। शीला आंटी, प्रिया की मम्मी, हमेशा बहुत मिलनसार रही हैं। मैं कई बार उनके घर जाता हूं, और वो मुझे बेटे जैसा मानती हैं। आज प्रिया ने मुझे फोन करके कहा था कि वो थोड़ी देर से आएगी, क्योंकि उसे कुछ काम है, लेकिन मैं घर पर ही रुक सकता हूं।

मैंने कॉफी खत्म की और तैयार होने लगा। बाहर मौसम अच्छा था, हल्की ठंडक वाली हवा चल रही थी। प्रिया के घर पहुंचा तो दरवाजा शीला आंटी ने खोला। उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा, "आओ बेटा, प्रिया तो अभी आई नहीं है। अंदर बैठो, मैं चाय बनाती हूं।" मैं अंदर आया और सोफे पर बैठ गया। घर में हमेशा की तरह साफ-सफाई थी, और दीवार पर परिवार की तस्वीरें टंगी हुई थीं। आंटी किचन में गईं, और मैं मैगजीन उलटने लगा।

थोड़ी देर बाद आंटी चाय लेकर आईं। वो करीब चालीस साल की होंगी, लेकिन उनकी मुस्कान में एक अलग ही ताजगी थी। उन्होंने कहा, "रोहन, तुम्हारा काम कैसा चल रहा है? प्रिया कहती है तुम बहुत व्यस्त रहते हो।" मैंने हंसकर जवाब दिया, "हां आंटी, लेकिन छुट्टी मिली है आज, तो आराम कर रहा हूं।" हम दोनों बातें करने लगे, घर-परिवार की, प्रिया की पढ़ाई की। आंटी की आवाज में एक गर्माहट थी, जो हमेशा मुझे सहज महसूस कराती थी।

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प्रिया का फोन आया कि वो देर से आएगी, कोई मीटिंग में फंस गई है। आंटी ने कहा, "कोई बात नहीं, तुम यहीं रुको। मैं लंच बनाती हूं।" मैंने मना करने की कोशिश की, लेकिन वो नहीं मानीं। हम दोनों किचन में गए, जहां वो सब्जी काट रही थीं। मैंने मदद करने की पेशकश की, और वो हंस पड़ीं। "तुम्हें क्या आता है बेटा? बस बैठो।" लेकिन मैंने चाकू उठा लिया और टमाटर काटने लगा। हमारी बातें जारी रहीं, और पहली बार मैंने महसूस किया कि आंटी की हंसी में कुछ अलग सा था।

किचन छोटा था, और हम दोनों पास-पास खड़े थे। आंटी की साड़ी का पल्लू कभी-कभी मेरे हाथ से छू जाता था, लेकिन मैंने ध्यान नहीं दिया। वो बताने लगीं अपनी जवानी की कहानियां, कैसे उन्होंने शादी की, और परिवार बनाया। उनकी आंखों में एक उदासी थी, शायद अंकल ज्यादा घर पर नहीं रहते थे। मैं सुनता रहा, और धीरे-धीरे बातें गहरी होने लगीं। "तुम प्रिया को बहुत खुश रखते हो, रोहन। वो तुम्हारे बारे में बहुत बातें करती है," उन्होंने कहा। मैंने शरमाते हुए जवाब दिया, "आंटी, वो भी मुझे बहुत प्यार करती है।"

लंच बन गया, और हम दोनों डाइनिंग टेबल पर बैठे। प्रिया अभी भी नहीं आई थी। खाने के दौरान आंटी ने पूछा, "तुम्हारी कोई परेशानी तो नहीं है? कभी-कभी युवा लोग इतने अकेले लगते हैं।" मैंने नजरें झुका लीं, क्योंकि सच में कभी-कभी काम का तनाव होता था। उन्होंने मेरे कंधे पर हाथ रखा, और कहा, "बताओ न बेटा, मैं सुनूंगी।" वो स्पर्श इतना साधारण था, लेकिन मेरे मन में कुछ हलचल हुई। मैंने अपनी बातें शेयर कीं, और वो ध्यान से सुनती रहीं।

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खाना खत्म होने के बाद हम लिविंग रूम में आए। आंटी ने कहा, "प्रिया को अभी एक घंटा लगेगा। तुम आराम करो।" मैं सोफे पर बैठा, और वो मेरे पास बैठ गईं। बातें फिर शुरू हुईं, लेकिन अब थोड़ी व्यक्तिगत। उन्होंने अपनी शादी की मुश्किलों के बारे में बताया, कैसे अंकल हमेशा बाहर रहते हैं। उनकी आवाज में एक दर्द था, और मैं सहानुभूति से सुन रहा था। अचानक उनकी आंखें नम हो गईं, और मैंने बिना सोचे उनका हाथ थाम लिया। "आंटी, सब ठीक हो जाएगा," मैंने कहा।

उस पल में कुछ बदल गया। आंटी ने मेरी तरफ देखा, और उनकी नजरों में एक अलग भाव था। न शर्म, न उदासी, बल्कि कुछ गहरा। मैंने हाथ छोड़ने की कोशिश की, लेकिन वो नहीं छूटा। "रोहन, तुम बहुत अच्छे हो," उन्होंने धीरे से कहा। हम दोनों चुप हो गए, और कमरे में सन्नाटा छा गया। मेरे मन में उथल-पुथल थी, प्रिया के बारे में सोच रहा था, लेकिन आंटी की निकटता कुछ और कह रही थी।

धीरे-धीरे आंटी मेरे और करीब आईं। उनका हाथ मेरे चेहरे पर आया, और उन्होंने मेरी आंखों में देखा। "कभी-कभी जिंदगी में ऐसे पल आते हैं, जो अप्रत्याशित होते हैं," उन्होंने फुसफुसाते हुए कहा। मैं स्तब्ध था, लेकिन विरोध नहीं कर सका। उनके होंठ मेरे करीब आए, और पहला चुंबन इतना कोमल था कि मैं भूल गया सब कुछ। मेरे मन में अपराधबोध था, लेकिन शरीर ने साथ दे दिया।

हम दोनों सोफे पर ही थे, और आंटी की साड़ी का पल्लू सरक गया। मैंने उन्हें अपनी बाहों में लिया, और हमारी सांसें मिलने लगीं। उनका शरीर गर्म था, और हर स्पर्श में एक नई उत्तेजना। मैंने उनकी गर्दन पर吻 किया, और वो सिहर उठीं। "रोहन, ये गलत है, लेकिन..." उन्होंने कहा, लेकिन मैंने उन्हें चुप कर दिया। हमारी भावनाएं उफान पर थीं, और प्रिया का ख्याल पीछे छूट गया।

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आंटी ने मुझे अपने कमरे में ले जाया। वहां बिस्तर पर हम दोनों लेट गए, और कपड़े धीरे-धीरे उतरने लगे। उनकी त्वचा इतनी मुलायम थी, और हर चुंबन में एक नई गहराई। मैंने उनके स्तनों को छुआ, और वो कराह उठीं। हमारा मिलन भावुक था, जिसमें दर्द और सुख दोनों थे। मेरे मन में कन्फ्लिक्ट था, लेकिन वो पल इतना मजबूत था कि मैं रुक नहीं सका।

हमारे शरीर एक हो गए, और हर गति में एक नई लय थी। आंटी की आंखें बंद थीं, और उनके चेहरे पर संतुष्टि का भाव। मैंने महसूस किया कि ये सिर्फ शारीरिक नहीं, बल्कि भावनात्मक भी था। वो लंबे समय से अकेली थीं, और मैं उस अकेलेपन को भर रहा था। हमारी सांसें तेज हो गईं, और चरमोत्कर्ष इतना तीव्र था कि सब कुछ धुंधला हो गया।

उसके बाद हम चुपचाप लेटे रहे। आंटी ने मेरे सीने पर सिर रखा, और कहा, "ये हमारा राज रहेगा, रोहन।" मैंने हां में सिर हिलाया, लेकिन मन में प्रिया का चेहरा घूम रहा था। तभी दरवाजे की घंटी बजी, और प्रिया की आवाज आई। हम दोनों जल्दी से उठे, और सब सामान्य करने की कोशिश की। लेकिन वो पल हमेशा के लिए बदल चुका था।

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प्रिया अंदर आई, और हमें देखकर मुस्कुराई। "सॉरी, लेट हो गई।" मैंने उसे गले लगाया, लेकिन मन में एक बोझ था। आंटी किचन में चली गईं, और हम दोनों बातें करने लगे। लेकिन मेरी नजरें बार-बार आंटी पर जातीं। शाम होने लगी, और मैं घर लौटने को तैयार हुआ। प्रिया ने कहा, "कल मिलते हैं।" मैंने विदा ली, लेकिन आंटी की आंखों में वो राज छिपा था।

अगले दिन मैं फिर प्रिया के घर गया। इस बार अंकल घर पर थे, लेकिन आंटी की मुस्कान वैसी ही थी। हम सब साथ बैठे, और बातें हुईं। लेकिन जब प्रिया और अंकल बाहर गए, आंटी मेरे पास आईं। "कल का पल भूलना नहीं," उन्होंने धीरे से कहा। मैंने कुछ नहीं कहा, लेकिन मन में फिर वही उत्तेजना जागी। हम दोनों फिर कमरे में थे, और इस बार मिलन और भी गहरा था।

आंटी के शरीर की हर रेखा अब परिचित लग रही थी। मैंने उन्हें पीठ से पकड़ा, और हमारी गतियां तेज हो गईं। उनकी कराहें कमरे में गूंज रही थीं, और मैंने महसूस किया कि ये नशा बनता जा रहा है। हर बार नया अनुभव, कभी कोमल, कभी उग्र। लेकिन अपराधबोध भी बढ़ रहा था। प्रिया से प्यार करता था, लेकिन आंटी की ओर खिंचाव रोक नहीं पा रहा था।

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दिन बीतते गए, और ये सिलसिला जारी रहा। कभी घर पर, कभी मौका मिलते ही। आंटी की भावनाएं गहरी होती गईं, और वो कहतीं, "तुमने मुझे फिर से जीना सिखाया।" मैं चुप रहता, लेकिन मन में संघर्ष था। एक दिन प्रिया ने पूछा, "तुम कुछ बदले-बदले लगते हो।" मैंने झूठ बोल दिया, लेकिन डर था कि कहीं राज खुल न जाए।

फिर एक शाम, जब प्रिया बाहर थी, आंटी और मैं फिर साथ थे। उनका स्पर्श अब आदत बन चुका था। हम बिस्तर पर थे, और हमारी सांसें मिल रही थीं। मैंने उन्हें कसकर पकड़ा, और हर गति में नई ऊर्जा थी। वो मेरे कान में फुसफुसाईं, "और तेज, रोहन।" हमारा मिलन चरम पर था, और