भाई की गोद में दो बहनें

सुबह की धूप खिड़की से झांक रही थी, और मैं रसोई में चाय बना रही थी। हमारा छोटा सा घर दिल्ली के एक व्यस्त मोहल्ले में था, जहां हर रोज की शुरुआत ऐसी ही होती – नेहा अभी सो रही होती, अजय भाई जिम से लौटकर आते, और मैं सबसे पहले उठकर घर संभालती। आज भी वैसा ही था; मैंने केतली में पानी डाला और गैस जलाई, सोचते हुए कि शाम को कॉलेज की असाइनमेंट पूरी करनी है।

हम तीनों भाई-बहन एक साथ रहते थे, मां-पापा गांव में थे और हमें यहां पढ़ाई और नौकरी के लिए छोड़ गए थे। मैं रिया, सबसे बड़ी, 22 साल की, एमए कर रही थी। नेहा 20 की थी, ग्रेजुएशन में, और अजय भाई 24 के, एक प्राइवेट कंपनी में जॉब करते थे। घर छोटा था, लेकिन हमारी बॉन्डिंग मजबूत – शाम को साथ डिनर, वीकेंड पर फिल्में देखना, सब कुछ साधारण लेकिन खुशहाल।

अजय भाई दरवाजा खोलकर अंदर आए, उनके चेहरे पर पसीना था और टी-शर्ट गीली। "गुड मॉर्निंग, दीदी," उन्होंने मुस्कुराकर कहा, और मैंने चाय का कप उनकी तरफ बढ़ाया। नेहा की आवाज आई, वह बेडरूम से निकल रही थी, बाल बिखरे हुए, "भाई, आज लेट हो गई, कॉलेज जाना है।" हम तीनों टेबल पर बैठे, नेहा ने ब्रेड टोस्ट किया और हमने मिलकर नाश्ता किया।

दिन बीतते हुए शाम हो गई, मैं लिविंग रूम में किताब पढ़ रही थी। अजय भाई काम से थके लौटे, नेहा किचन में कुछ बना रही थी। "आज क्या स्पेशल है?" भाई ने पूछा, और नेहा हंसकर बोली, "बस मैगी, दीदी की फेवरिट।" हम सब सोफे पर बैठ गए, टीवी पर कोई पुरानी फिल्म चल रही थी, लेकिन ध्यान उस पर कम था, बातों पर ज्यादा।

रात गहराने लगी, नेहा ने कहा कि उसे असाइनमेंट पूरी करनी है, लेकिन अजय भाई ने मजाक में कहा, "अरे, छोड़ो, आज साथ बैठते हैं।" मैंने देखा कि भाई की नजर नेहा पर थोड़ी देर रुकी, लेकिन मैंने इसे सामान्य समझा। हम तीनों बेडरूम में शिफ्ट हो गए, जहां हमारा बड़ा बेड था – घर छोटा होने से हम कभी-कभी साथ सोते थे, बचपन की आदत।

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लाइट्स कम करके हम लेटे, नेहा मेरे बगल में और अजय भाई नेहा के दूसरी तरफ। बातें शुरू हुईं – कॉलेज की गॉसिप, भाई की ऑफिस की कहानियां। लेकिन धीरे-धीरे चुप्पी छा गई, और मैंने महसूस किया कि भाई का हाथ नेहा की कमर पर था, हल्का सा। नेहा ने कुछ नहीं कहा, बस मुस्कुराई।

मेरा दिल थोड़ा तेज धड़का, लेकिन मैं चुप रही। भाई ने धीरे से नेहा की तरफ देखा और कहा, "तुम दोनों मेरी जिंदगी हो।" नेहा ने मेरी तरफ देखा, जैसे पूछ रही हो कि क्या ठीक है। मैंने सहमति में सिर हिलाया, खुद नहीं समझ पा रही थी कि क्या हो रहा है। रात की ठंडक में हम करीब आ गए।

अजय भाई ने नेहा के कंधे पर हाथ रखा, और धीरे से उसे अपनी तरफ खींचा। नेहा का चेहरा लाल हो गया, लेकिन वह विरोध नहीं कर रही थी। मैं देख रही थी, मेरे अंदर एक अजीब सी उथल-पुथल थी – जलन नहीं, बल्कि कुछ और, जैसे उत्सुकता। भाई ने नेहा के होंठों पर अपना होंठ रख दिया, हल्का सा चुंबन।

नेहा ने आंखें बंद कर लीं, और मैंने महसूस किया कि मेरा हाथ खुद-ब-खुद भाई की तरफ बढ़ रहा है। "दीदी..." नेहा ने फुसफुसाया, और भाई ने मुझे देखा, उनकी आंखों में एक नई चमक थी। वह नेहा से अलग हुए और मेरी तरफ झुके, उनका स्पर्श मेरी त्वचा पर बिजली जैसा लगा।

हम तीनों अब एक-दूसरे के इतने करीब थे कि सांसें मिल रही थीं। भाई ने नेहा की टी-शर्ट ऊपर की, और उसकी नरम त्वचा पर हाथ फेरा। नेहा की सिसकी निकली, और मैंने भाई के सीने पर अपना सिर रख दिया, महसूस करते हुए उनकी दिल की धड़कन। यह सब इतना अप्रत्याशित था, लेकिन लग रहा था जैसे सालों से इंतजार था।

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अजय भाई ने नेहा को अपनी गोद में लिया, और मैं उनके बगल में लेटी रही, अपना हाथ नेहा की पीठ पर रखते हुए। भाई के होंठ नेहा के गले पर घूमे, और नेहा ने मेरी तरफ हाथ बढ़ाया, जैसे मुझे शामिल कर रही हो। मैंने नेहा के होंठ चूम लिए, पहली बार ऐसा कुछ महसूस करते हुए – नरम, गर्म, और भावनाओं से भरा।

भाई अब हमें दोनों को छू रहे थे, उनके हाथ हमारी कमर पर, हमारी छाती पर। नेहा की सांस तेज हो गई, और मैंने महसूस किया कि मेरा शरीर भी प्रतिक्रिया दे रहा है। हमने कपड़े उतारे, धीरे-धीरे, बिना जल्दबाजी के। नग्नता में कोई शर्म नहीं थी, सिर्फ एक गहरा जुड़ाव।

अजय भाई ने नेहा को नीचे लिटाया, और खुद उसके ऊपर आए। नेहा की आंखें बंद थीं, और मैं उनके बगल में थी, भाई के कंधे को चूमते हुए। जैसे ही भाई ने नेहा में प्रवेश किया, नेहा की एक हल्की सी चीख निकली, लेकिन फिर वह मुस्कुराई। मैं देख रही थी, मेरे अंदर एक आग जल रही थी।

भाई के धक्के धीमे थे, नेहा की कमर पकड़कर। नेहा ने मेरी तरफ देखा, और कहा, "दीदी, तुम भी..." मैंने सिर हिलाया, और भाई ने नेहा से अलग होकर मुझे अपनी तरफ खींचा। उनका स्पर्श मेरे शरीर पर बरसात जैसा लगा, गर्म और ठंडा एक साथ।

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मैंने भाई की आंखों में देखा, वहां प्यार था, वासना थी, और कुछ जो शब्दों में नहीं बयां हो सकता। भाई ने मुझे नीचे लिटाया, नेहा अब हमें देख रही थी, अपना हाथ मेरी छाती पर रखते हुए। जैसे ही भाई ने मुझमें प्रवेश किया, मैंने एक गहरी सांस ली – दर्द और सुख का मिश्रण।

नेहा ने भाई के पीछे से उन्हें गले लगाया, और हम तीनों एक लय में थे। भाई के धक्के अब तेज हो गए, मेरी सिसकियां कमरे में गूंज रही थीं। नेहा ने मेरे होंठ चूमे, जैसे हमें और जोड़ रही हो। यह अनुभव नया था, लेकिन इतना गहरा कि सब कुछ भूल गए।

भाई ने हमें बारी-बारी से प्यार किया, कभी नेहा को, कभी मुझे। नेहा की त्वचा पर उनके निशान, मेरी कमर पर उनके हाथ। हमारी सांसें मिलीं, पसीना बहा, और भावनाएं उफान पर। नेहा ने कहा, "भाई, और करीब..." और भाई ने हमें दोनों को अपनी बाहों में समेट लिया।

रात गहराती गई, हमारा मिलन अब और तीव्र हो गया। भाई ने नेहा को अपनी गोद में बैठाया, और मैं उनके सामने थी, नेहा की पीठ को सहलाते हुए। भाई के धक्के नेहा को हिला रहे थे, और नेहा की आंखें आनंद से बंद। मैंने भाई के होंठ चूमे, नेहा के शरीर को छूते हुए।

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फिर भाई ने मुझे लिया, नेहा अब हमें प्रोत्साहित कर रही थी। मेरे शरीर में एक लहर दौड़ी, जैसे सब कुछ फूटने वाला हो। नेहा ने मेरी छाती पर हाथ रखा, और भाई के धक्कों के साथ मैं चरम पर पहुंची – एक जोरदार सिसकी के साथ।

भाई अब नेहा की तरफ मुड़े, और नेहा भी उसी आनंद में खो गई। हम तीनों अब एक-दूसरे में उलझे थे, प्यार और वासना की दुनिया में। नेहा की सांसें तेज, भाई के हाथ हम पर, और मेरा दिल यह सब महसूस कर रहा था।

यह रात कभी न भूलने वाली थी, हमारी बॉन्डिंग अब नई ऊंचाई पर। भाई ने हमें दोनों को चूमा, नेहा मेरी बगल में लेटी, और भाई हमारे बीच। हमारी सांसें शांत हो रही थीं, लेकिन स्पर्श अभी भी गर्म। नेहा ने फुसफुसाया, "यह हमारा राज है," और भाई ने सहमति में सिर हिलाया।

सुबह होने को थी, लेकिन हम अभी भी एक-दूसरे के करीब थे। भाई का हाथ नेहा की कमर पर, मेरा सिर उनके सीने पर। नेहा ने आंखें खोलीं, और मुस्कुराई – एक नई शुरुआत की मुस्कान। हम फिर से करीब आए, धीरे-धीरे, जैसे रात अभी खत्म नहीं हुई।

अजय भाई ने नेहा को चूमा, और मुझे अपनी तरफ खींचा। उनका शरीर फिर से तैयार था, नेहा की आंखों में वही चमक। हम तीनों फिर से उसी लय में खो गए, स्पर्श, चुंबन, और मिलन। नेहा की सिसकियां, मेरी सांसें, भाई की गर्माहट – सब कुछ मिश्रित।

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भाई ने हमें दोनों को एक साथ लिया, जैसे हमारी आत्माएं जुड़ रही हों। नेहा मेरे ऊपर, भाई हमारे बीच। आनंद की लहरें फिर से उठीं, और हम चरम की ओर बढ़े। नेहा ने कहा, "भाई, ऐसे ही..." और भाई ने तेज किया।

मैंने महसूस किया कि यह पल अनंत है, हमारी भावनाएं अब अलग नहीं। नेहा की त्वचा पर पसीना, भाई के हाथ मेरी कमर पर, और हम सब एक साथ चरम पर पहुंचे – एक जोरदार, भावुक विस्फोट में।

शांत होकर हम लेटे, सांसें मिलीं, दिल धड़कते। नेहा ने मेरी तरफ देखा, भाई ने हमें गले लगाया। यह सब इतना सही लग रहा था, जैसे命运 ने हमें इसी के लिए बनाया हो। रात अभी बाकी थी, और हम फिर से