माँ और चाची की गर्माहट
सुबह के नौ बजे थे, और मैं अपनी स्टडी टेबल पर बैठा कॉलेज के असाइनमेंट पर काम कर रहा था। घर में हमेशा की तरह शांति थी, बस रसोई से माँ के बर्तन धोने की आवाज़ आ रही थी। पापा की मौत के बाद से हम तीनों ही थे – मैं, माँ सरिता और चाची कविता, जो माँ की छोटी बहन थीं और हमारे साथ ही रहती थीं।
चाची का अपना घर था, लेकिन चाचा की जॉब ट्रांसफर होने के बाद उन्होंने हमारे साथ रहना शुरू कर दिया था। मैं रोज की तरह उठकर चाय पी चुका था और अब नोट्स बना रहा था। बाहर बारिश की बूंदें खिड़की पर टपक रही थीं, जो दिल्ली की इस ठंडी सुबह को और भी सुकून भरा बना रही थीं।
मैंने घड़ी देखी, दस बजने वाले थे। कॉलेज जाना था, लेकिन आज क्लास ऑनलाइन थी, तो मैं घर से ही अटेंड करने वाला था। माँ रसोई से बाहर आईं और बोलीं, "राहुल, नाश्ता तैयार है। आ जाओ, ठंडा हो जाएगा।" उनकी आवाज़ हमेशा की तरह नरम और देखभाल वाली थी।
मैं उठा और डाइनिंग टेबल पर बैठ गया। चाची भी वहाँ थीं, अखबार पढ़ रही थीं। उन्होंने मुस्कुराकर कहा, "क्या पढ़ाई हो रही है, भतीजे? कल रात देर तक जागे थे न?" मैंने हँसकर जवाब दिया, "हाँ चाची, प्रोजेक्ट है। लेकिन अब ठीक है।"
नाश्ता करते हुए हम तीनों ने घर की छोटी-मोटी बातें कीं। माँ ने बताया कि आज शाम को बाजार जाना है, कुछ सामान लाना है। चाची ने कहा कि वे साथ चलेंगी। मैंने सोचा कि शाम को मैं भी उनके साथ चला जाऊँ, क्योंकि अकेले जाने में उन्हें परेशानी होती है।
दोपहर हुई, और मैं अपनी क्लास अटेंड कर रहा था। कमरे में अकेला था, लेकिन बाहर से माँ और चाची की हँसी की आवाज़ आ रही थी। वे दोनों बहनें हमेशा साथ में समय बिताती थीं, कभी पुरानी यादें ताज़ा करतीं, कभी टीवी देखतीं। मैंने क्लास खत्म होने के बाद बाहर आकर देखा, वे सोफे पर बैठी चाय पी रही थीं।
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मैं भी उनके पास बैठ गया। माँ ने पूछा, "क्लास कैसी रही?" मैंने बताया कि अच्छी थी, लेकिन थोड़ी बोरिंग। चाची ने हँसते हुए कहा, "तुम्हारी उम्र में सब बोरिंग लगता है। हमारी उम्र में तो समय कैसे निकल जाता है पता ही नहीं चलता।" उनकी बात में एक अजीब सा सुकून था।
शाम को हम तीनों बाजार गए। दिल्ली की भीड़भाड़ वाली सड़कों पर चलते हुए माँ और चाची आगे-आगे थीं, मैं पीछे। वे दोनों खरीदारी में मग्न थीं, कभी सब्जियाँ चुनतीं, कभी फल। मैं बैग उठाने में मदद कर रहा था। घर लौटते हुए थकान महसूस हो रही थी, लेकिन परिवार के साथ यह समय अच्छा लगता था।
रात का खाना खाने के बाद मैं अपने कमरे में चला गया। लेकिन नींद नहीं आ रही थी। मैं बिस्तर पर लेटा सोच रहा था कि जीवन कितना साधारण है, लेकिन कभी-कभी इसमें कुछ कमी सी लगती है। माँ और चाची दोनों ही मेरी ज़िंदगी का अहम हिस्सा थीं, उनकी देखभाल, उनका प्यार – सब कुछ।
अगले दिन सुबह फिर वही रूटीन। लेकिन आज माँ थोड़ी उदास लग रही थीं। मैंने पूछा, "क्या हुआ माँ? सब ठीक है?" उन्होंने मुस्कुराकर कहा, "कुछ नहीं बेटा, बस पुरानी यादें आ गईं। तुम्हारे पापा की।" चाची ने उन्हें गले लगाया और कहा, "दीदी, सब ठीक हो जाएगा। हम हैं न।"
उस पल में मैंने देखा कि वे दोनों कितनी करीब थीं। मैं भी उनके पास बैठ गया और हमने साथ में बातें कीं। धीरे-धीरे बातें गहरी होने लगीं। माँ ने बताया कि पापा के जाने के बाद अकेलापन बहुत सताता है। चाची ने सहमति जताई, "हाँ दीदी, मुझे भी चाचा के बिना वैसा ही लगता है। लेकिन राहुल है न, हमारा सहारा।"
मैंने उनकी बातें सुनते हुए महसूस किया कि मेरे अंदर कुछ बदल रहा है। उनकी उदासी मुझे परेशान कर रही थी, और मैं उन्हें खुश देखना चाहता था। शाम को जब हम घर में अकेले थे, मैंने माँ से कहा, "माँ, अगर आपको कुछ चाहिए, तो बताओ। मैं हूँ न।" उन्होंने मेरी आँखों में देखा और कहा, "तुम हो, इसलिए सब ठीक है।"
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रात को मैं सो नहीं पाया। विचारों में माँ और चाची घूम रही थीं। उनकी मुस्कान, उनकी बातें – सब कुछ। अगली सुबह जब मैं उठा, तो चाची रसोई में थीं। माँ बाहर गई हुई थीं। चाची ने कहा, "राहुल, आज दीदी डॉक्टर के पास गई हैं। थोड़ी तबीयत नासाज़ है।" मैं चिंतित हो गया।
मैंने चाची से पूछा, "क्या हुआ है?" उन्होंने बताया कि बस थकान है। हम दोनों रसोई में खड़े बात कर रहे थे। चाची की आँखों में एक अलग सी चमक थी। उन्होंने मेरे कंधे पर हाथ रखा और कहा, "तुम बहुत अच्छे हो, राहुल। हम दोनों के लिए।" उस स्पर्श में कुछ था जो मुझे अजीब लगा।
शाम को माँ लौटीं। वे ठीक लग रही थीं। रात के खाने के समय हम तीनों ने साथ खाया। बातों-बातों में चाची ने कहा, "राहुल, तुम कभी अपनी गर्लफ्रेंड की बात नहीं करते। कोई है क्या?" मैंने शर्मा कर कहा, "नहीं चाची, अभी पढ़ाई पर फोकस है।" माँ ने हँसकर कहा, "अच्छा है, पहले करियर बनाओ।"
उस रात मैं फिर सोच में डूबा रहा। माँ और चाची दोनों ही इतनी खूबसूरत और देखभाल करने वाली थीं। उनकी उम्र के बावजूद, उनकी ऊर्जा मुझे आकर्षित करने लगी थी। लेकिन मैं इन विचारों को दबा रहा था, क्योंकि वे मेरी माँ और चाची थीं।
कुछ दिन बाद, एक शाम बारिश हो रही थी। घर में बिजली चली गई। हम तीनों लिविंग रूम में कैंडल जलाकर बैठे थे। माँ ने कहा, "कितना अच्छा लगता है न, ऐसे पल।" चाची ने सहमति जताई। मैं उनके बीच में बैठा था, और अचानक चाची का हाथ मेरे हाथ पर आ गया।
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मैंने कुछ नहीं कहा, लेकिन दिल तेज़ धड़कने लगा। माँ ने भी मेरे दूसरे हाथ को पकड़ा और कहा, "राहुल, तुम हमारी ज़िंदगी हो।" उस अंधेरे में, उनकी निकटता मुझे कुछ अलग महसूस करा रही थी। धीरे-धीरे बातें व्यक्तिगत होने लगीं।
चाची ने कहा, "दीदी, कभी-कभी लगता है कि जीवन में कुछ कमी है। वो गर्माहट, वो स्पर्श।" माँ ने सिर हिलाया, "हाँ, लेकिन अब क्या कर सकते हैं।" मैं चुपचाप सुन रहा था। फिर मैंने हिम्मत करके कहा, "मैं हूँ न, आप दोनों के लिए। जो चाहिए, बताओ।"
उस रात के बाद चीजें बदलने लगीं। अगले दिन माँ अकेली मेरे कमरे में आईं। उन्होंने कहा, "राहुल, कल रात की बातें... मुझे अच्छा लगा।" मैंने उनकी आँखों में देखा, और अचानक मैंने उन्हें गले लगा लिया। वो स्पर्श इतना गहरा था कि मैं खुद को रोक नहीं पाया।
माँ ने भी मुझे कसकर पकड़ लिया। उनकी साँसें मेरे कानों पर महसूस हो रही थीं। धीरे से मैंने उनके गाल पर吻 किया। वे पीछे नहीं हटीं। बल्कि उन्होंने मेरी आँखों में देखा और कहा, "राहुल, यह गलत है, लेकिन... मुझे अच्छा लग रहा है।" मैंने उन्हें चूमा, और वो पल अनंत लग रहा था।
उसके बाद हम बिस्तर पर लेट गए। मैंने उनके कपड़े धीरे-धीरे उतारे। उनकी त्वचा इतनी नरम थी, जैसे रेशम। मैंने उनके शरीर को छुआ, और वे सिहर उठीं। "राहुल, धीरे," उन्होंने कहा। मैंने उनकी गर्दन पर吻 किया, फिर नीचे की ओर। उनकी साँसें तेज़ हो गईं।
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हमारा मिलन भावनाओं से भरा था। मैंने महसूस किया कि यह सिर्फ शारीरिक नहीं, बल्कि वर्षों के अकेलेपन का अंत था। माँ की आँखों में आँसू थे, लेकिन खुशी के। हम एक-दूसरे में खो गए, हर स्पर्श में प्यार था।
अगले दिन चाची को कुछ शक हुआ। उन्होंने मुझसे अकेले में पूछा, "राहुल, कल रात क्या हुआ? दीदी आज इतनी खुश लग रही हैं।" मैंने कुछ नहीं कहा, लेकिन उन्होंने मेरी आँखों में पढ़ लिया। शाम को जब माँ बाहर गईं, चाची मेरे पास आईं।
उन्होंने कहा, "राहुल, मुझे भी वो गर्माहट चाहिए।" मैं स्तब्ध था, लेकिन उनकी आँखों में वही दर्द था। मैंने उन्हें गले लगाया, और हम कमरे में चले गए। चाची का शरीर माँ से अलग था, अधिक ऊर्जावान। मैंने उनके होंठों को चूमा, और वे उत्साह से जवाब दे रही थीं।
हमारे बीच का पल जुनूनी था। चाची ने मेरे कपड़े उतारे, और मैंने उनके। उनकी त्वचा पर मेरे हाथ फिसल रहे थे। "राहुल, और तेज़," उन्होंने कहा। हम एक-दूसरे के साथ ऐसे जुड़े जैसे कभी अलग न होंगे। हर गति में नई सनसनी थी, नई भावना।
कुछ दिनों बाद, हम तीनों एक साथ थे। शाम का समय था, और घर में शांति। माँ और चाची दोनों मेरे पास बैठी थीं। माँ ने कहा, "राहुल, अब सब ठीक है।" चाची ने मुस्कुराकर सिर हिलाया। मैंने उन्हें दोनों को गले लगाया।
उस रात हम तीनों एक कमरे में थे। पहले माँ के साथ, फिर चाची के साथ, और कभी-कभी साथ में। हर स्पर्श अलग था – माँ का कोमल, चाची का जुनूनी। हमारी साँसें मिल रही थीं, शरीर एक हो रहे थे। भावनाएँ उफान पर थीं, कन्फ्लिक्ट था लेकिन प्यार अधिक।
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मैंने माँ की पीठ पर हाथ फेरा, जबकि चाची मेरे सीने पर सिर रखे थीं। हमारा मिलन अब रूटीन नहीं, बल्कि हर बार नया अनुभव था। कभी धीमा, कभी तेज़। उनकी कराहें कमरे में गूँज रही थीं, और मैं खुद को उनमें खोया हुआ महसूस कर रहा था।
एक शाम, बारिश फिर हो रही थी। हम तीनों बिस्तर पर लेटे थे। माँ ने मेरे कान में फुसफुसाया, "राहुल, तुमने हमें जीना सिखाया।" चाची ने सहमति जताई, और हम फिर एक हो गए। हर चुम्बन में यादें थीं, हर स्पर्श में भविष्य।
समय बीतता गया, लेकिन हमारी यह गर्माहट बनी रही। कभी माँ के साथ अकेले, कभी चाची के साथ। हर बार इमोशन्स नए थे – कभी अपराधबोध, कभी पूर्णता। लेकिन हम रुक नहीं पाए।
अब रात हो चुकी है, और हम तीनों एक साथ लेटे हैं। माँ की साँसें मेरे कंधे पर, चाची का हाथ मेरे सीने पर। यह पल इतना अंतरंग है कि