पापा से मिटाई प्यास
सुबह की धूप कमरे में छनकर आ रही थी, और मैं अपनी स्टडी टेबल पर बैठी हुई किताबों में डूबी हुई थी। कॉलेज का नया सेमेस्टर शुरू हुए अभी कुछ ही दिन हुए थे, और मैं रोज की तरह सुबह जल्दी उठकर पढ़ाई में लग जाती थी। घर में सब कुछ शांत था, माँ बाजार गई हुई थीं, और पापा अपने कमरे में तैयार हो रहे थे ऑफिस के लिए। मैंने चाय की केतली स्टोव पर चढ़ाई और वापस अपनी किताब में खो गई।
मेरा नाम रिया है, और मैं 22 साल की हूँ। हमारे घर में सिर्फ तीन लोग हैं – मैं, माँ और पापा। पापा का नाम अजय है, वो एक प्राइवेट कंपनी में मैनेजर हैं। उनकी उम्र 45 के आसपास है, लेकिन वो हमेशा फिट रहते हैं। जिम जाना उनकी दिनचर्या का हिस्सा है। माँ एक स्कूल टीचर हैं, और वो घर के कामों में भी बहुत व्यस्त रहती हैं। मैं बी.कॉम की पढ़ाई कर रही हूँ, और घर से कॉलेज ज्यादा दूर नहीं है, इसलिए मैं रोज बस से जाती हूँ।
उस दिन पापा कमरे से निकले और किचन की तरफ आए। "रिया, चाय बन गई क्या?" उन्होंने पूछा, उनकी आवाज हमेशा की तरह गर्म और स्नेह भरी थी। मैंने किताब बंद की और उठकर किचन में गई। "हाँ पापा, अभी डालती हूँ।" मैंने दो कप में चाय डाली और एक उन्हें दे दिया। वो डाइनिंग टेबल पर बैठ गए, और मैं उनके सामने वाली कुर्सी पर। हम दोनों ने चुपचाप चाय पी, बीच-बीच में पापा अखबार पढ़ते रहे।
माँ के जाने के बाद घर में एक अजीब सा शांति का माहौल होता है। पापा और मैं ज्यादा बातें नहीं करते, लेकिन उनकी मौजूदगी मुझे हमेशा सुरक्षित महसूस कराती है। बचपन से ही पापा मेरे लिए हीरो रहे हैं। जब मैं छोटी थी, वो मुझे स्कूल छोड़ने जाते थे, और शाम को खेलने ले जाते थे। अब बड़ी हो गई हूँ, लेकिन वो स्नेह कम नहीं हुआ। कभी-कभी मैं सोचती हूँ कि माँ के व्यस्त रहने से घर में थोड़ी उदासी सी छा जाती है।
चाय पीने के बाद पापा ने कहा, "रिया, आज शाम को जल्दी आऊँगा। कुछ खरीदारी करनी है। तू भी चलना?" मैंने हामी भरी, "ठीक है पापा, मैं कॉलेज से लौटकर तैयार रहूँगी।" वो मुस्कुराए और ऑफिस चले गए। मैंने भी अपना बैग उठाया और कॉलेज के लिए निकल पड़ी। दिन सामान्य गुजरा, लेक्चर्स, दोस्तों से बातें, और शाम को घर लौटी। माँ अभी नहीं आई थीं, शायद स्कूल में मीटिंग होगी।
इसे भी पढ़ें: पापा के दोस्त की छुअन
शाम को पापा समय से घर आ गए। हम दोनों मार्केट गए, कुछ घरेलू सामान खरीदा। रास्ते में पापा ने मेरे कॉलेज की पढ़ाई के बारे में पूछा, और मैंने उन्हें अपनी असाइनमेंट्स के बारे में बताया। उनकी बातें सुनकर हमेशा अच्छा लगता है, वो कभी जज नहीं करते, बस सलाह देते हैं। घर लौटकर मैंने डिनर बनाना शुरू किया, पापा ने मदद की। माँ देर से आईं, और हम सबने साथ खाना खाया।
रात को सोने से पहले मैं अपने कमरे में थी, किताब पढ़ रही थी। पापा का कमरा मेरे बगल में है, और कभी-कभी मैं सुनती हूँ वो टीवी देखते हैं। उस रात मुझे नींद नहीं आ रही थी। मैं उठी और पानी पीने किचन गई। वापस आते हुए पापा के कमरे से रोशनी आ रही थी। दरवाजा थोड़ा खुला था, मैंने झाँका। पापा बिस्तर पर बैठे फोन देख रहे थे, शायद कोई मेल चेक कर रहे थे।
मैं अंदर गई, "पापा, नींद नहीं आ रही?" उन्होंने फोन रखा और मुस्कुराए, "नहीं बेटी, बस थोड़ा काम बाकी था। तू क्यों जाग रही है?" मैं उनके बगल में बैठ गई, "बस ऐसे ही। आजकल कॉलेज में बहुत प्रेशर है।" पापा ने मेरे कंधे पर हाथ रखा, "चिंता मत कर, सब ठीक हो जाएगा।" उनकी छुअन से एक अजीब सा सुकून मिला, लेकिन साथ ही कुछ अनकहा सा भी।
उस रात हम देर तक बातें करते रहे। पापा ने अपने बचपन की कहानियाँ सुनाईं, और मैंने अपनी दोस्तों की बातें। धीरे-धीरे मुझे महसूस हुआ कि पापा की नजरें कभी-कभी मेरी तरफ अलग ढंग से रुकती हैं। शायद मैं ज्यादा सोच रही हूँ, लेकिन घर में माँ की व्यस्तता से हम दोनों ज्यादा समय साथ बिताने लगे थे। अगले कुछ दिनों में यह सिलसिला बढ़ा। सुबह चाय साथ पीना, शाम को मार्केट जाना, और रात को बातें।
इसे भी पढ़ें: पापा की छाया में खोई दीदी
एक शाम माँ को स्कूल ट्रिप पर जाना पड़ा, वो दो दिन के लिए बाहर गईं। घर में सिर्फ मैं और पापा थे। मैंने डिनर बनाया, और हमने साथ खाया। खाने के बाद पापा ने कहा, "रिया, आज कोई मूवी देखें?" मैंने हाँ कहा, और हम लिविंग रूम में बैठ गए। मूवी रोमांटिक थी, और बीच में कुछ सीन ऐसे आए जिनमें हीरो-हीरोइन करीब आते हैं। मैंने महसूस किया पापा की साँसें थोड़ी तेज हो गईं।
मूवी खत्म होने के बाद मैं उठी, लेकिन पापा ने मेरा हाथ पकड़ा, "रिया, बैठ ना थोड़ी देर।" उनकी आँखों में कुछ था, एक उदासी या चाहत। मैं बैठ गई, और हम चुपचाप बैठे रहे। फिर पापा ने कहा, "तेरी माँ हमेशा व्यस्त रहती हैं, घर में अकेलापन लगता है।" मैंने उनका हाथ थामा, "पापा, मैं हूँ ना।" उस पल में हमारी नजरें मिलीं, और कुछ अनकहा सा बहने लगा।
धीरे-धीरे पापा ने मुझे अपनी बाहों में खींचा। मैं विरोध नहीं कर पाई, क्योंकि कहीं गहराई में मुझे भी यह चाहत थी। उनकी छुअन गर्म थी, और मैं उनकी छाती से लगी हुई थी। "रिया, तू मेरी जान है," उन्होंने धीरे से कहा। मैंने अपनी आँखें बंद कीं, और हम दोनों के बीच की दूरी मिट गई। उस रात हमने बातें कीं, लेकिन अगली सुबह सब कुछ बदल गया।
सुबह मैं उठी, पापा पहले ही उठ चुके थे। उन्होंने नाश्ता बनाया था। हमने साथ खाया, लेकिन हवा में एक टेंशन थी। दिन भर कॉलेज में मैं उसी बारे में सोचती रही। क्या यह गलत है? लेकिन पापा के साथ जो सुकून मिलता है, वो कहीं और नहीं। शाम को घर लौटी, माँ अभी नहीं आई थीं। पापा घर पर थे, और उन्होंने मुझे देखकर मुस्कुराया।
इसे भी पढ़ें: जीजू के पापा ने तोड़ी मेरी सील
रात हुई, और हम फिर लिविंग रूम में थे। इस बार कोई मूवी नहीं, बस बातें। पापा ने मेरे बालों में हाथ फेरा, "रिया, तू कितनी सुंदर है।" मेरे दिल की धड़कन तेज हो गई। मैंने कुछ नहीं कहा, बस उनकी तरफ देखा। फिर उन्होंने मुझे चूमा, पहले माथे पर, फिर गाल पर। मैं काँप रही थी, लेकिन रोक नहीं पाई।
उनके होंठ मेरे होंठों पर आए, और मैंने आँखें बंद कर लीं। वह चुंबन गहरा था, भावनाओं से भरा। पापा की बाहें मेरे चारों ओर थीं, और मैं खुद को समर्पित कर रही थी। हम दोनों उठे और पापा के कमरे में गए। वहाँ बिस्तर पर, पापा ने मेरे कपड़े उतारे, धीरे-धीरे, प्यार से। मेरी त्वचा पर उनकी उँगलियाँ फिर रही थीं, और हर स्पर्श में एक नई सनसनी थी।
मैंने अपनी आँखें खोलीं और पापा को देखा। उनकी आँखों में चाहत थी, लेकिन साथ ही डर भी। "रिया, क्या यह ठीक है?" उन्होंने पूछा। मैंने हाँ में सिर हिलाया, "पापा, मुझे आपकी जरूरत है।" फिर हम एक हो गए। पापा का शरीर मेरे ऊपर था, उनकी गर्मी मुझे घेर रही थी। हर गति में एक लय थी, जो मेरी प्यास को मिटा रही थी।
उस रात हमने कई बार एक-दूसरे को छुआ, हर बार नई भावना के साथ। कभी धीरे, कभी तेज। मेरी चूत गर्म थी, और पापा ने उसे अपनी जीभ से सहलाया, फिर अपने लंड से भरा। सनसनी अवर्णनीय थी, दर्द और सुख का मिश्रण। मैं कराह रही थी, "पापा, और..." और वो मुझे संतुष्ट कर रहे थे।
इसे भी पढ़ें: बुआ की अनकही प्यास
सुबह हुई, और हम एक-दूसरे की बाहों में थे। माँ के आने से पहले हमने सब सामान्य किया, लेकिन अब हमारे बीच एक रहस्य था। अगले दिन माँ लौटीं, लेकिन हमारी नजरें मिलती रहीं। शाम को जब माँ सो गईं, पापा मेरे कमरे में आए। फिर वही, लेकिन इस बार ज्यादा पैशन से। पापा ने मुझे दीवार से लगाकर चूमा, मेरी गर्दन पर काटा, और फिर बिस्तर पर ले गए।
मेरी चूत फिर गर्म हो गई, और पापा ने उसे अपनी उँगलियों से छेड़ा। मैं गीली हो रही थी, और उन्होंने अपना लंड अंदर डाला। इस बार मैं ऊपर थी, अपनी गति से। हर थ्रस्ट में एक नई ऊँचाई। पापा के हाथ मेरे स्तनों पर थे, उन्हें मसल रहे थे। मैं चरम पर पहुँची, और वो भी।
यह सिलसिला चलता रहा, छिप-छिपकर। हर बार नया अनुभव, कभी किचन में, कभी बाथरूम में। पापा की प्यास और मेरी, दोनों मिट रही थीं। लेकिन साथ ही एक कन्फ्लिक्ट था, समाज क्या कहेगा? लेकिन उस पल में, पापा की बाहों में, सब भूल जाता था।
एक रात हम फिर साथ थे, पापा मेरे अंदर थे, धीरे-धीरे हिल रहे थे। मैं उनकी आँखों में देख रही थी, प्यार से भरी। "पापा, मैं तुम्हारी हूँ," मैंने कहा। वो मुस्कुराए, और हमारी गति तेज हुई। चरम के करीब, मैंने महसूस किया यह प्यास कभी न मिटने वाली है, लेकिन हर बार मिटती है।
इसे भी पढ़ें: पापा के दोस्त के साथ सुहागरात
उस रात हम थककर सो गए, लेकिन सुबह फिर वही चाहत। पापा ने मुझे जगाया, अपनी जीभ से मेरी चूत को चाटकर। सनसनी से मैं जागी, और फिर हम एक हो गए। हर बार वैरायटी, कभी ओरल, कभी एनल की कोशिश, लेकिन हमेशा इमोशनल।
समय बीतता गया, और हमारा रिश्ता गहरा होता गया। माँ को शक नहीं हुआ, लेकिन हम सावधान रहते। हर इंटरैक्शन में अब वह टेंशन थी, जो हमें करीब लाती। पापा की हर छुअन में प्यार था, और मेरी हर कराह में संतुष्टि।
फिर एक शाम, जब माँ बाहर थीं, हम फिर बिस्तर पर थे। पापा ने मुझे उल्टा किया, पीछे से प्रवेश किया। मेरी चूत फिर गर्म थी, और उनका लंड उसे भर रहा था। मैं चिल्ला रही थी सुख से, और वो मेरे कान में फुसफुसा रहे थे, "रिया, मेरी रानी।" चरम पर पहुँचकर हम रुके, लेकिन