जीजू के पापा ने तोड़ी मेरी सील
सुबह की धूप खिड़की से छनकर कमरे में फैल रही थी, और मैं अपनी किताबों के बीच बैठी कॉलेज के असाइनमेंट पर काम कर रही थी। घर में सब कुछ वैसा ही था जैसा रोज होता है—माँ रसोई में चाय बना रही थीं, पापा अखबार पढ़ते हुए कुछ बड़बड़ा रहे थे, और दीदी का फोन आया था कि वो आज शाम को जीजू के साथ आने वाली हैं। मैं रिया हूँ, बाईस साल की, और हमारा घर दिल्ली के एक शांत इलाके में है, जहाँ हर दिन की शुरुआत ऐसी ही सादगी से होती है।
मैंने घड़ी की तरफ देखा, नौ बज चुके थे। कॉलेज जाने का समय हो रहा था, लेकिन आज छुट्टी थी तो मैंने सोचा थोड़ा और पढ़ लूँ। दीदी की शादी को दो साल हो चुके थे, और जीजू अमित भैया बहुत अच्छे इंसान हैं। वो एक सॉफ्टवेयर कंपनी में काम करते हैं, और दीदी स्कूल टीचर हैं। कभी-कभी वो लोग हमारे घर आते हैं, और घर में रौनक सी लग जाती है। आज भी वैसा ही था, लेकिन इस बार जीजू के पापा, राजेश अंकल भी आने वाले थे। अंकल रिटायर्ड हैं, और गांव से दिल्ली आ रहे थे कुछ दिनों के लिए।
मैंने अपनी डायरी में कुछ नोट्स लिखे और फिर उठकर रसोई में चली गई। माँ ने मुस्कुराकर कहा, "बेटा, चाय पी ले। दीदी आने वाली हैं न, कुछ स्पेशल बनाना पड़ेगा।" मैंने हाँ में सिर हिलाया और चाय का कप थाम लिया। पापा ने अखबार से नजरें उठाकर पूछा, "रिया, आज क्या प्लान है तेरा?" मैंने बताया कि बस घर पर ही रहूँगी, पढ़ाई करूँगी। घर का माहौल हमेशा इतना सुखद रहता है, जहाँ छोटी-छोटी बातें ही खुशी देती हैं।
दोपहर तक घर में सफाई चल रही थी। मैंने अपनी अलमारी साफ की, पुरानी किताबें निकालीं, और सोचा कि शाम को दीदी से ढेर सारी बातें करूँगी। अंकल को मैं बचपन से जानती हूँ, जब दीदी की शादी हुई थी तब वो बहुत खुश थे। वो एक साधारण आदमी हैं, गांव में खेती करते थे, अब रिटायरमेंट के बाद अकेले रहते हैं। अमित भैया उनके इकलौते बेटे हैं, तो वो अक्सर उनके साथ समय बिताने आते हैं। मैंने कभी उनके बारे में ज्यादा नहीं सोचा था, बस सम्मान की नजर से देखती थी।
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शाम को दरवाजे की घंटी बजी, और मैं दौड़कर दरवाजा खोलने गई। दीदी और अमित भैया मुस्कुराते हुए अंदर आए, और उनके पीछे राजेश अंकल थे। अंकल ने मुझे देखकर सिर पर हाथ फेरा और कहा, "कैसी हो बेटी? बड़ी हो गई हो।" मैंने मुस्कुराकर जवाब दिया, "ठीक हूँ अंकल, आप कैसे हैं?" घर में सब लोग मिले, हँसी-मजाक शुरू हो गया। माँ ने सबके लिए चाय और नाश्ता लगाया, और हम सब ड्राइंग रूम में बैठे बातें करने लगे।
रात का खाना खाने के बाद, दीदी और अमित भैया अपने कमरे में चले गए। अंकल को गेस्ट रूम दिया गया था, जो मेरे कमरे के बगल में है। मैं अपने कमरे में लेटी किताब पढ़ रही थी, लेकिन नींद नहीं आ रही थी। बाहर हल्की ठंड थी, नवंबर का महीना जो था। मैंने सोचा कि थोड़ा पानी पी लूँ, तो उठकर रसोई की तरफ गई। रास्ते में अंकल का कमरा था, और दरवाजा थोड़ा खुला था। मैंने झांककर देखा, अंकल बिस्तर पर बैठे कुछ सोच रहे थे।
मैं रसोई से पानी लेकर लौट रही थी, तभी अंकल की आवाज आई, "रिया बेटी, क्या तुम जाग रही हो?" मैं रुक गई और उनके कमरे में गई। अंकल ने कहा, "नींद नहीं आ रही है, थोड़ी बात कर लो।" मैं हिचकिचाई, लेकिन बैठ गई। हमने परिवार की बातें कीं, दीदी की शादी के बारे में, मेरी पढ़ाई के बारे में। अंकल की आँखों में एक अजीब सी उदासी थी, जैसे वो अकेलेपन से परेशान हों। मैंने पूछा, "अंकल, आप ठीक तो हैं न?" उन्होंने हल्के से मुस्कुराकर कहा, "हाँ बेटी, बस कभी-कभी पुरानी यादें सताती हैं।"
उस रात की बातचीत के बाद, अगले दिन से अंकल मेरे साथ ज्यादा समय बिताने लगे। सुबह वो मुझे कॉलेज की पढ़ाई में मदद करने की बात करते, और शाम को हम साथ में चाय पीते। दीदी और अमित भैया अपने काम में व्यस्त थे, तो घर में अक्सर मैं और अंकल अकेले रह जाते। एक दोपहर, जब सब बाहर गए थे, अंकल ने मुझे बुलाया और कहा, "रिया, तुम्हारी माँ ने बताया कि तुम्हें कुकिंग पसंद है। कुछ सिखाओ न।" मैं हँस पड़ी और रसोई में चली गई। अंकल मेरे पास खड़े होकर देखते रहे, और उनकी नजरें कभी-कभी मेरी तरफ ऐसी लगतीं जैसे कुछ कहना चाहती हों।
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धीरे-धीरे, मुझे अंकल की मौजूदगी में एक अजीब सा एहसास होने लगा। वो मेरे कंधे पर हाथ रखते, या बालों को सहलाते, और मैं असहज हो जाती। लेकिन उनकी बातों में इतनी गर्माहट थी कि मैं कुछ कह नहीं पाती। एक शाम, जब मैं अपने कमरे में थी, अंकल अंदर आए और बैठ गए। उन्होंने कहा, "रिया, तुम बहुत अच्छी लड़की हो। मैं तुम्हें देखकर सोचता हूँ कि काश मेरी भी ऐसी बेटी होती।" उनकी आँखों में कुछ था जो मुझे डराता था, लेकिन साथ ही खींचता भी। मैंने कहा, "अंकल, आप तो मेरे पापा जैसे हैं।" लेकिन मेरे दिल में एक उथल-पुथल सी थी।
उस रात, घर में सब सो चुके थे। मैं बिस्तर पर लेटी करवटें बदल रही थी, अंकल की बातें दिमाग में घूम रही थीं। तभी दरवाजे पर हल्की सी खटखट हुई। मैंने उठकर देखा, अंकल थे। उन्होंने कहा, "नींद नहीं आ रही बेटी, थोड़ा बैठूँ?" मैंने हाँ कहा, और वो अंदर आ गए। हम बातें करने लगे, लेकिन इस बार उनकी नजरें अलग थीं। उन्होंने मेरे हाथ को छुआ, और कहा, "रिया, तुम्हें पता है, मैं अकेला हूँ। तुम्हारी तरह कोई नहीं है मेरे पास।" मेरे दिल की धड़कन तेज हो गई।
अंकल ने धीरे से मेरे गाल को छुआ, और मैं सिहर गई। मैंने कहा, "अंकल, ये ठीक नहीं है।" लेकिन उनकी आँखों में एक आग थी जो मुझे रोक नहीं पाई। उन्होंने मुझे अपनी बाहों में खींच लिया, और मैं विरोध करने लगी, लेकिन कमजोर पड़ गई। उनकी साँसें मेरे चेहरे पर महसूस हो रही थीं, और मैं काँप रही थी। अंकल ने कहा, "रिया, बस एक बार, मुझे महसूस करने दो।" मैंने आँखें बंद कर लीं, और उनके होंठ मेरे होंठों से मिल गए।
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उस चुंबन में एक तूफान था। मेरी सारी हिचकिचाहट पिघलने लगी, और मैं खुद को उनके हवाले कर रही थी। अंकल ने मेरे कपड़े उतारने शुरू किए, धीरे-धीरे, जैसे कोई कीमती चीज को संभाल रहे हों। मेरी त्वचा पर उनकी उँगलियाँ फिसल रही थीं, और मैं एक नई दुनिया में खो गई थी। उन्होंने मेरे स्तनों को छुआ, और मैं सिसक उठी। वो बोले, "रिया, तुम कितनी खूबसूरत हो।" मैंने कुछ नहीं कहा, बस उनकी गर्माहट में डूबती गई।
अंकल ने मुझे बिस्तर पर लिटाया, और खुद मेरे ऊपर आ गए। उनकी आँखें मेरी आँखों में झांक रही थीं, जैसे कोई राज खोल रही हों। मैं डर रही थी, लेकिन उत्सुक भी। उन्होंने मेरी जाँघों को सहलाया, और धीरे से मेरी योनि के पास पहुँचे। मैंने कहा, "अंकल, मैंने कभी नहीं किया।" उन्होंने मुस्कुराकर कहा, "मैं संभाल लूँगा बेटी।" उनकी उँगलियाँ अंदर सरकने लगीं, और दर्द के साथ एक मीठा एहसास हुआ।
फिर वो पल आया जब अंकल ने अपना लिंग मेरे अंदर प्रवेश कराया। शुरू में दर्द असहनीय था, जैसे कुछ टूट रहा हो। मैं चीखना चाहती थी, लेकिन अंकल ने मेरे मुँह पर हाथ रख दिया। धीरे-धीरे, दर्द कम हुआ, और एक लय बनने लगी। उनकी हर धक्के में मैं खुद को खो रही थी, और मेरी सिसकियाँ कमरे में गूँज रही थीं। अंकल की साँसें तेज थीं, और वो मेरे कान में फुसफुसा रहे थे, "रिया, तुम मेरी हो।"
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उस रात के बाद, सब कुछ बदल गया। अगले दिन अंकल मेरे साथ सामान्य व्यवहार कर रहे थे, लेकिन उनकी नजरें मुझे याद दिलाती रहीं। मैं खुद से लड़ रही थी, guilt था, लेकिन एक pull भी। शाम को जब घर वाले बाहर थे, अंकल फिर मेरे कमरे में आए। इस बार मैं तैयार थी, या शायद नहीं। उन्होंने मुझे फिर बाहों में लिया, लेकिन इस बार ज्यादा जोर से। उनके चुंबन गहरे थे, और मैं जवाब दे रही थी।
हम बिस्तर पर लुढ़क गए, और अंकल ने मेरे शरीर के हर हिस्से को चूमा। मेरे निप्पल्स को मुँह में लिया, और मैं आहें भर रही थी। इस बार दर्द कम था, और सुख ज्यादा। अंकल ने मुझे ऊपर बिठाया, और मैं उनकी कमर पर सवार हो गई। हर movement में एक नया sensation था, जैसे लहरें उठ रही हों। मैं अपनी आँखें बंद करके उस पल को जी रही थी, और अंकल के हाथ मेरी कमर पर कस रहे थे।
कुछ दिनों बाद, दीदी और अमित भैया वापस चले गए, लेकिन अंकल रुक गए। वो कहते थे कि थोड़ा और समय बिताना चाहते हैं। हर रात अब हमारा मिलन होता, और हर बार कुछ नया। एक रात, अंकल ने मुझे दीवार से सटाकर लिया, उनके धक्के तेज थे, और मैं दर्द और सुख के बीच झूल रही थी। मेरी सिसकियाँ दबाने की कोशिश करती, लेकिन निकल जातीं। अंकल बोले, "रिया, तुम्हारी ये मासूमियत मुझे पागल कर देती है।"
मैं खुद को रोक नहीं पा रही थी। दिन में पढ़ाई करती, लेकिन रातें अंकल की हो जातीं। एक शाम, हम बगीचे में थे, और अंकल ने मुझे पेड़ के पीछे खींच लिया। वहाँ, खुले में, उन्होंने मुझे छुआ, और मैं काँप उठी। रात को कमरे में, वो सीन और तीव्र हो गया। अंकल ने मुझे घुटनों पर बिठाया, और अपना लिंग मेरे मुँह में डाला। शुरू में अजीब लगा, लेकिन फिर मैं उसमें खो गई।
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समय बीतता गया, और मेरी भावनाएँ उलझती गईं। guilt था कि ये गलत है, लेकिन अंकल की मोहब्बत जैसी लगती थी। एक रात, जब वो मेरे अंदर थे, मैंने रोते हुए कहा, "अंकल, ये कब तक चलेगा?" उन्होंने जवाब दिया, "जब तक तुम चाहो बेटी।" उनकी आँखों में वो ही उदासी थी, लेकिन अब mixed with desire। मैंने खुद को उनके हवाले कर दिया, और हमारी bodies एक हो गईं।
अब हर मिलन में variety थी। कभी slow और emotional, कभी fast और passionate। मैं अपनी virginity खो चुकी थी, लेकिन पाया था एक नया खुद। अंकल के स्पर्श में security थी, और मैं उसमें डूबती जा रही थी। रात गहरा रही थी, और हम फिर एक हो रहे थे, उनकी साँसें मेरी साँसों से मिल रही थीं।