मामी की मदद से सील तोड़ी
उस सुबह गांव की हवा में एक ताजगी थी, जो शहर की भागदौड़ से बिल्कुल अलग लगती थी। मैं रोहन, अपनी मामी के घर पर छुट्टियां बिताने आया था, और रोज की तरह सूरज उगने से पहले उठकर आंगन में चहलकदमी कर रहा था। मामी पहले ही चाय की केतली चढ़ा चुकी थीं, और दूर से मुर्गियों की आवाजें आ रही थीं, जैसे हर दिन की शुरुआत हो।
मैं कॉलेज का छात्र हूं, उन्नीस साल का, और शहर में पढ़ाई के बीच ये गांव का ठहराव मुझे सुकून देता था। मामी शालिनी, मेरी मां की बहन, अकेली रहती थीं क्योंकि मामाजी कुछ साल पहले गुजर चुके थे। उनका घर पुराना था, लेकिन साफ-सुथरा, और आसपास के खेतों से हरियाली झांकती रहती थी।
उस दिन मामी ने मुझे बुलाया, "रोहन बेटा, आज खेत पर चलना है। थोड़ी सब्जियां तोड़ लाएंगे।" मैंने हामी भरी और उनके साथ निकल पड़ा। रास्ते में मामी बातें करती रहीं, गांव की खबरें, पड़ोसियों की कहानियां, सब कुछ इतना सामान्य कि मुझे लगा जैसे ये छुट्टियां कभी खत्म न हों।
खेत पर पहुंचकर हमने काम शुरू किया। मामी झुकी हुईं बैंगन तोड़ रही थीं, और मैं पास ही टमाटर की बेलों पर ध्यान दे रहा था। तभी दूर से एक लड़की की आवाज आई, "मामी जी, पानी की बाल्टी रख दूं?" मैंने मुड़कर देखा, वो थी नेहा, मामी की पड़ोसन की बेटी, जो अक्सर मदद के लिए आती थी।
नेहा गांव की ही थी, उम्र मेरी जितनी ही, शायद अठारह या उन्नीस की। उसकी साड़ी साधारण थी, बाल खुले, और चेहरा सूरज की रोशनी में चमक रहा था। मामी ने मुस्कुराकर कहा, "हां बेटी, रख दे। रोहन, ये नेहा है, हमारे पड़ोस की। अच्छी लड़की है, पढ़ाई भी करती है।"
मैंने नेहा को नमस्ते किया, और वो शरमाकर मुस्कुराई। उस दिन हम तीनों ने साथ मिलकर काम किया, हंसी-मजाक में समय बीता। नेहा की बातें सुनकर लगा कि वो शहर की जिंदगी के बारे में उत्सुक थी, और मैंने उसे अपनी कॉलेज की कहानियां सुनाईं। मामी बीच-बीच में हंसती रहीं, जैसे सब कुछ बहुत सामान्य हो।
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शाम को घर लौटते हुए मामी ने मुझसे कहा, "रोहन, नेहा अच्छी लड़की है न? गांव में लड़कियां इतनी आजाद नहीं होतीं, लेकिन वो अलग है।" मैंने सहमति में सिर हिलाया, लेकिन मन में कुछ खास नहीं था। रात का खाना खाकर मैं अपने कमरे में लेट गया, बाहर की ठंडी हवा खिड़की से आ रही थी।
अगले कुछ दिन ऐसे ही बीते। नेहा रोज आती, कभी पानी भरने, कभी सब्जियां देने। मामी उसे घर में बुलातीं, और हम तीनों चाय पीते हुए बातें करते। नेहा की आंखों में एक चमक थी, जैसे वो मुझसे कुछ पूछना चाहती हो, लेकिन शब्दों में नहीं कह पाती। मैं भी धीरे-धीरे उसे नोटिस करने लगा, उसकी हंसी, उसकी चाल।
एक दोपहर मामी ने मुझे अलग से बुलाया। "बेटा, नेहा तुम्हें पसंद है न? वो मुझसे कह रही थी कि तुम्हारी बातें अच्छी लगती हैं। गांव में लड़के-लड़कियां ऐसे नहीं मिलते, लेकिन मैं सोचती हूं कि अगर दोनों राजी हों तो..." उनकी बात अधर में लटक गई, और मैं स्तब्ध रह गया। मामी की आंखों में एक ममता थी, लेकिन साथ ही कुछ समझदारी भी।
मैंने हिचकिचाते हुए कहा, "मामी, लेकिन ये सही है? नेहा तो..." मामी ने मेरे कंधे पर हाथ रखा, "बेटा, जिंदगी में कुछ पल ऐसे होते हैं जो खुद आते हैं। नेहा कुंवारी है, शर्मीली, लेकिन तुम्हें देखकर उसकी आंखें चमकती हैं। मैं मदद करूंगी, बस तुम दोनों खुश रहो।"
उस रात मैं सो नहीं सका। मन में नेहा की छवि घूमती रही, उसकी मुस्कान, उसकी बातें। क्या ये सही था? गांव की नैतिकता, परिवार की बातें, सब उलझन पैदा कर रही थीं। लेकिन मामी की बातों ने एक नई सोच दी, जैसे वो मेरी मदद करना चाहती थीं।
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अगले दिन नेहा फिर आई। मामी ने हमें अकेला छोड़ दिया, बोलीं कि वो बाजार जा रही हैं। नेहा और मैं आंगन में बैठे, चुप्पी छाई हुई थी। मैंने धीरे से उसका हाथ पकड़ा, "नेहा, तुम्हें मैं पसंद हूं?" वो शरमा गई, लेकिन सिर हिलाया। उसकी आंखों में डर था, लेकिन साथ ही उत्साह भी।
हम बातें करने लगे, धीरे-धीरे करीब आए। नेहा ने बताया कि गांव में वो कभी किसी लड़के से इतनी खुलकर नहीं बोली। मैंने उसे गले लगाया, और वो मेरे सीने से लग गई। मामी के घर की वो दोपहर शांत थी, लेकिन हमारे दिलों में तूफान था।
शाम को मामी लौटीं, और हमें देखकर मुस्कुराईं। रात में उन्होंने नेहा को घर पर ही रुकने को कहा, बोलीं कि उसकी मां से बात कर ली है। नेहा का चेहरा लाल हो गया, लेकिन वो रुक गई। रात गहराने लगी, और मामी ने हमें अपने कमरे में भेज दिया, "बेटा, अब तुम दोनों बात करो। मैं बाहर सो जाऊंगी।"
कमरे में नेहा और मैं अकेले थे। मैंने दरवाजा बंद किया, और वो बिस्तर पर बैठ गई। उसकी सांसें तेज थीं, मेरी भी। मैं उसके पास बैठा, और धीरे से उसके बालों में हाथ फेरा। "नेहा, डरना मत," मैंने कहा। वो मुस्कुराई, लेकिन उसकी आंखों में आंसू थे, शायद घबराहट के।
मैंने उसे चूमा, पहली बार। उसके होंठ नरम थे, जैसे फूल की पंखुड़ियां। नेहा ने आंखें बंद कर लीं, और मैंने उसे अपनी बाहों में लिया। हमारी सांसें मिलीं, और धीरे-धीरे कपड़े उतरने लगे। नेहा की देह देसी थी, सादी, लेकिन आकर्षक। उसकी त्वचा पर गांव की मेहनत की छाप थी, लेकिन वो कोमल लग रही थी।
मैंने उसके शरीर को सहलाया, हर स्पर्श में प्यार डाला। नेहा सिहर उठी, "रोहन, ये पहली बार है मेरे लिए।" मैंने उसे आश्वस्त किया, "मैं धीरे करूंगा।" मामी बाहर थीं, लेकिन उनकी मौजूदगी जैसे हमें सुरक्षा दे रही थी। नेहा की सील टूटने का पल आया, दर्द हुआ, लेकिन साथ में एक नई भावना भी।
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उस रात हमने एक-दूसरे को जाना, हर स्पर्श में भावनाएं उमड़ीं। नेहा की आहें कमरे में गूंजीं, लेकिन वो खुशी की थीं। मैंने उसे हर तरह से छुआ, कभी नरमी से, कभी जोश से। वो मेरे साथ बहती गई, जैसे नदी का पानी।
सुबह होने से पहले नेहा मेरे सीने पर सिर रखकर सो गई। मैं उसके बाल सहला रहा था, मन में संतोष था, लेकिन साथ ही एक नई जिम्मेदारी भी। मामी ने सुबह हमें चाय दी, उनकी आंखों में समझ थी, कोई सवाल नहीं।
अगले दिन नेहा फिर आई, लेकिन अब हमारी नजरें अलग थीं। मामी ने हमें फिर अकेला छोड़ा, और हम कमरे में गए। इस बार नेहा ज्यादा खुली थी, उसने मुझे चूमा, अपनी इच्छाएं बताईं। हमने फिर प्यार किया, लेकिन इस बार ज्यादा गहराई से, हर पल में नई सेंसेशन।
नेहा की देह अब परिचित लगती थी, लेकिन हर बार कुछ नया मिलता। मैंने उसके स्तनों को चूमा, उसकी कमर को सहलाया, और वो मेरे शरीर पर हाथ फेरती रही। दर्द की जगह अब आनंद था, और हम दोनों एक-दूसरे में खोए रहे।
कुछ दिनों बाद मामी ने कहा, "बेटा, नेहा अब तुम्हारी है। लेकिन ध्यान रखना, ये रिश्ता छुपा रखो।" हमने वादा किया, और वो पल जारी रहे। नेहा की सील तोड़ने के बाद हमारी दुनिया बदल गई, हर मिलन में भावनाएं गहराती गईं।
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एक शाम हम खेत पर थे, अकेले। नेहा ने मुझे पेड़ के नीचे खींचा, और हमने वहां प्यार किया। हवा की सरसराहट, पक्षियों की आवाजें, सब हमारे साथ थे। नेहा की आंखें चमक रही थीं, "रोहन, तुमने मुझे जिंदा कर दिया।"
मैंने उसे कसकर पकड़ा, हमारे शरीर मिले, और वो पल अनंत लगे। नेहा की सांसें मेरी सांसों में घुलीं, हर धक्के में एक नई ऊर्जा। वो चीखी नहीं, लेकिन उसकी आहें告诉我 कि वो खुश थी।
रातें अब हमारी थीं। मामी की मदद से हम मिलते, कभी घर में, कभी बाहर। नेहा ने मुझे नई चीजें सिखाईं, गांव की सरलता में छुपी इच्छाएं। मैं उसके हर अंग को पूजता, और वो मेरे।
एक रात बारिश हो रही थी। हम कमरे में थे, बाहर पानी की आवाज। नेहा नंगी मेरे पास लेटी थी, उसकी त्वचा गीली। मैंने उसे चूमा, नीचे उतरा, और वो सिहर उठी। उस रात का मिलन अलग था, जैसे बारिश हमें धो रही हो।
नेहा की आंखों में अब प्यार था, डर नहीं। हमने घंटों बात की, शरीर से ज्यादा दिल से जुड़े। मामी बाहर सो रही थीं, लेकिन उनकी छाया हमें मजबूत बनाती थी।
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समय बीतता गया, लेकिन वो पल हमेशा ताजा रहे। नेहा की देह अब मेरी थी, हर स्पर्श में कहानी। हम मिलते, खोते, और फिर मिलते।
एक दोपहर नेहा मेरे कमरे में आई, मामी बाजार गई थीं। वो मुस्कुराई, "रोहन, आज कुछ नया करें?" मैंने हंसकर उसे बाहों में लिया, और हम बिस्तर पर लुढ़क गए। उसकी साड़ी उतरी, मेरे कपड़े गए, और हम एक हुए।
नेहा ऊपर थी, उसकी कमर हिल रही थी। मैंने उसके कूल्हों को पकड़ा, और वो तेज हुई। आहें, पसीना, सब मिला। वो झुकी, मुझे चूमा, और हमारा क्लाइमेक्स साथ आया।
उसके बाद वो मेरे सीने पर लेटी रही, सांसें सामान्य हो रही थीं। हम चुप थे, लेकिन दिल बोल रहे थे। बाहर सूरज ढल रहा था, और हमारा पल अभी जारी था।