सर्द रात की गर्माहट

उस शाम दिल्ली की सर्द हवा घर के हर कोने में घुस आई थी। मैं प्रिया, अपनी छोटी सी स्टडी टेबल पर बैठी हुई थी, किताबें फैलाए हुए। बाहर से बाजार की आवाजें धीमी हो रही थीं, और माँ रसोई में रात के खाने की तैयारी कर रही थीं। रोज की तरह, मैं कॉलेज की असाइनमेंट पूरा करने की कोशिश कर रही थी, लेकिन ठंड इतनी थी कि उंगलियां अकड़ रही थीं।

हमारा घर पुरानी दिल्ली की एक गली में था, जहां सर्दियां हमेशा कड़क होती हैं। पापा शाम को दुकान से लौटते थे, और राहुल भैया अपने ऑफिस से। मैं 22 साल की थी, एमए की पढ़ाई कर रही थी, और भैया 25 के, एक सॉफ्टवेयर कंपनी में काम करते थे। परिवार छोटा सा था, बस हम चार लोग, लेकिन घर में हमेशा एक गर्मजोशी रहती थी, जो बाहर की ठंड को थोड़ा सहने लायक बनाती थी।

मैंने घड़ी देखी, शाम के सात बज रहे थे। माँ की आवाज आई, "प्रिया, जरा चाय बना ले बेटा, ठंड बहुत है आज।" मैं उठी और रसोई में चली गई। चाय बनाते हुए मैं सोच रही थी कि कल का लेक्चर कैसा होगा। बाहर दरवाजे की घंटी बजी, और भैया अंदर आए, उनके चेहरे पर थकान थी लेकिन मुस्कान वैसी ही। "कैसी हो दीदी?" उन्होंने पूछा, अपना बैग रखते हुए।

हम दोनों में हमेशा से अच्छी बॉन्डिंग थी। बचपन से साथ खेलते, पढ़ते, और अब बड़े होकर भी वही दोस्ती। भैया ने कोट उतारा और सोफे पर बैठ गए। मैंने चाय का कप उनके सामने रखा। "ऑफिस कैसा रहा?" मैंने पूछा, खुद भी एक कप लेकर बैठते हुए। उन्होंने बताया कि प्रोजेक्ट की डेडलाइन नजदीक है, तनाव है लेकिन मैनेज हो जाएगा।

रात का खाना हम सबने साथ खाया। पापा ने दुकान की बातें बताईं, माँ ने पड़ोस की गॉसिप। मैं और भैया चुपचाप सुनते रहे, बीच-बीच में हंसते। खाने के बाद मैं अपने कमरे में चली गई, असाइनमेंट पूरा करने। लेकिन ठंड बढ़ती जा रही थी। मैंने दो स्वेटर पहन लिए, फिर भी कंपकंपी नहीं रुक रही थी। बाहर से हवा की सनसनाहट सुनाई दे रही थी।

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रात के दस बज चुके थे जब भैया मेरे कमरे में आए। "अभी तक जाग रही हो? सो जाओ ना," उन्होंने कहा, दरवाजे पर खड़े होकर। मैंने मुस्कुराकर कहा, "बस थोड़ा बाकी है, भैया। तुम सो जाओ।" लेकिन वो अंदर आए और मेरी टेबल के पास खड़े हो गए। "देखो, कितनी ठंड है। हीटर चला लो।" उन्होंने सलाह दी।

हमारे घर में हीटर था, लेकिन बिजली की बचत के चक्कर में कम इस्तेमाल होता था। मैंने हंसकर कहा, "नहीं, ठीक है।" लेकिन भैया ने जोर दिया और खुद ही हीटर ऑन कर दिया। कमरे में थोड़ी गर्माहट फैलने लगी। वो मेरे बगल में कुर्सी पर बैठ गए, मेरी असाइनमेंट देखने लगे। "ये टॉपिक इंटरेस्टिंग है," उन्होंने कहा।

हम बातें करने लगे। कॉलेज की, ऑफिस की, पुरानी यादों की। ठंड अभी भी थी, लेकिन भैया की मौजूदगी से कम लग रही थी। मैंने नोटिस किया कि वो थोड़ा करीब बैठे थे, शायद ठंड की वजह से। मेरे मन में कोई अजीब ख्याल नहीं आया, बस आराम महसूस हो रहा था। रात गहराती जा रही थी।

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मैंने असाइनमेंट खत्म किया और बिस्तर पर लेट गई। भैया अभी भी कमरे में थे, फोन स्क्रॉल कर रहे थे। "भैया, अब सो जाओ ना अपने कमरे में," मैंने कहा। लेकिन उन्होंने कहा, "ठंड बहुत है, प्रिया। अगर मैं यहां सो जाऊं तो? बचपन में तो साथ सोते थे।" मैं हंस पड़ी, याद आया वो दिन जब हम डर के मारे एक ही रजाई में दुबक जाते थे।

"ठीक है," मैंने कहा, और हम दोनों एक ही बिस्तर पर लेट गए। रजाई मोटी थी, लेकिन ठंड अभी भी सताती थी। भैया मेरे पास सरक आए, उनका हाथ मेरे कंधे पर रखा। "अब ठीक है?" उन्होंने पूछा। मैंने हां में सिर हिलाया। लेकिन दिल की धड़कन थोड़ी तेज हो गई थी, शायद ठंड की वजह से।

रात के सन्नाटे में हम चुप थे। भैया की सांसें मेरे कानों में गूंज रही थीं। मैंने महसूस किया कि उनका शरीर गर्म था, मेरी ठंडी त्वचा को छू रहा था। एक अजीब सी उत्तेजना महसूस हुई, लेकिन मैंने उसे दबा दिया। "प्रिया, तुम्हें ठंड लग रही है?" भैया ने धीरे से पूछा। मैंने कहा, "हां, थोड़ी।"

उन्होंने मुझे अपनी बाहों में खींच लिया, जैसे बचपन में गले लगाते थे। लेकिन अब ये अलग लग रहा था। उनका स्पर्श गर्म था, और मेरे शरीर में एक लहर सी दौड़ गई। मैं चुप रही, सोच रही थी कि ये गलत है या नहीं। लेकिन ठंड इतनी थी कि मैं हिल नहीं पाई। भैया के हाथ मेरी कमर पर सरक गए।

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मैंने उनकी आंखों में देखा, वहां एक अलग सी चमक थी। "भैया..." मैंने धीरे से कहा, लेकिन वो चुप करा दिए। उनके होंठ मेरे कानों के पास आए, "शशश, बस गर्माहट दे रहा हूं।" उनकी सांसें गर्म थीं, और मैं पिघलने लगी। मन में संघर्ष था, लेकिन शरीर साथ दे रहा था।

धीरे-धीरे उनके हाथ मेरे स्वेटर के नीचे घुसे। मेरी त्वचा ठंडी थी, लेकिन उनका स्पर्श आग जैसा। मैंने विरोध नहीं किया, शायद इसलिए कि ये रिश्ता इतना करीबी था। भैया ने मुझे चूमा, पहले गाल पर, फिर होंठों पर। वो चुंबन गहरा था, भावनाओं से भरा। मैंने भी जवाब दिया, अपनी बाहें उनके गले में डाल दीं।

रजाई के नीचे हमारा शरीर एक हो रहा था। भैया ने मेरे कपड़े उतारे, धीरे-धीरे, हर स्पर्श में प्यार था। मेरी सांसें तेज हो गईं, ठंड अब कहीं नहीं थी। उनका शरीर मेरे ऊपर था, गर्म और मजबूत। मैंने महसूस किया वो उत्तेजना जो कभी नहीं सोची थी।

हमारी आंखें मिलीं, और उस पल में सब कुछ सही लग रहा था। भैया ने प्रवेश किया, धीरे से, दर्द और सुख का मिश्रण। मैंने कराह उठी, लेकिन वो रुके नहीं। हमारा मिलन गहरा था, हर धक्के में एक नई भावना। ठंड की रात अब गर्म हो चुकी थी।

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उस रात हमने कई बार एक-दूसरे को छुआ, हर बार नया अनुभव। सुबह होने से पहले, हम थककर सो गए, बाहों में बाहें डाले। मन में सवाल थे, लेकिन वो गर्माहट सब भुला रही थी।

अगली शाम फिर वही सर्दी थी। मैं कमरे में अकेली थी, लेकिन भैया आए। इस बार बिना कहे हम पास आए। उनका स्पर्श अब जाना-पहचाना था, लेकिन उतना ही रोमांचक। हमने बातें कीं, फिर चुप हो गए। रजाई के नीचे फिर वही खेल।

मैं सोचती थी कि ये गलत है, लेकिन भैया की आंखों में वो प्यार देखकर चुप हो जाती। हर रात ठंड का बहाना, और हमारा मिलन। कभी धीरे, कभी तेज, हर बार नई गहराई।

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एक रात ठंड बहुत थी। भैया ने मुझे पीछे से पकड़ा, उनके हाथ मेरे स्तनों पर। मैं पिघल गई, उनकी गर्मी में। हमारा मिलन लंबा चला, सुख की चरम सीमा तक।

समय बीतता गया, लेकिन वो रातें जारी रहीं। ठंड कम हुई, लेकिन हमारी गर्माहट नहीं। मैं जानती थी ये रिश्ता बदल चुका है, लेकिन वापस नहीं जाना चाहती थी।

फिर एक रात, जब ठंड अपनी चरम पर थी, भैया ने कहा, "प्रिया, मैं तुम्हें कभी नहीं छोड़ूंगा।" मैंने उन्हें चूमा, और हम फिर एक हो गए। वो पल अनंत लग रहा था, भावनाओं की बाढ़ में।