जुआ की कीमत
सुबह के नौ बजे थे, और मैं अपनी छोटी सी बालकनी में खड़ी होकर चाय की चुस्की ले रही थी। बाहर सड़क पर बच्चों की हँसी गूँज रही थी, और पड़ोस की आंटी अपनी छत पर कपड़े सुखा रही थीं। अमित अभी सो रहा था, रात देर से लौटा था, शायद फिर किसी दोस्त के साथ बाहर रहा होगा। मैंने चाय का कप टेबल पर रखा और रसोई में जाकर नाश्ता बनाने लगी। रोज की तरह, दो परांठे और दही, यही हमारा ब्रेकफास्ट होता है। घर छोटा सा है, लेकिन साफ-सुथरा रखती हूँ मैं।
मैं रिया हूँ, अट्ठाईस साल की, और अमित से शादी को तीन साल हो चुके हैं। हम दिल्ली के एक छोटे से फ्लैट में रहते हैं। अमित एक छोटी कंपनी में जॉब करता है, लेकिन उसकी सैलरी से ज्यादा उसका जुआ का शौक हमें परेशान करता है। शुरुआत में तो मैं सोचती थी कि ये बस टाइम पास है, लेकिन अब ये आदत बन गई है। हर महीने के अंत में पैसे की तंगी हो जाती है, और मैं अपनी सिलाई की कमाई से घर चलाती हूँ। आज भी वैसा ही दिन था, मैंने अमित को जगाया और कहा, "उठो, ऑफिस का टाइम हो रहा है।" वो करवट बदलकर बोला, "थोड़ी देर और सोने दो, रिया।"
नाश्ता करते हुए अमित ने अखबार पढ़ा, और मैंने पूछा, "रात को कहाँ थे? फोन क्यों नहीं उठाया?" वो मुस्कुराकर बोला, "अरे, दोस्तों के साथ था। तू चिंता मत कर।" मैं जानती थी कि वो झूठ बोल रहा है, लेकिन बहस नहीं की। शादी के बाद से मैंने उसे कई बार समझाया है, लेकिन वो नहीं मानता। मेरी जिंदगी अब इसी रूटीन में सिमट गई है – सुबह उठना, घर संभालना, शाम को अमित का इंतजार। कभी-कभी लगता है कि जीवन में कुछ और भी होना चाहिए, लेकिन फिलहाल यही है।
दोपहर हुई, मैंने पड़ोस की दीदी के लिए एक ब्लाउज सिला और उसे दिया। वो बोलीं, "रिया, तुम्हारी सिलाई बहुत अच्छी है। कभी अपनी दुकान क्यों नहीं खोलती?" मैं हँसी, "दीदी, अमित की जॉब है न, बस उसी से गुजारा चलता है।" लेकिन दिल में जानती थी कि अमित के जुए की वजह से हम कभी आगे नहीं बढ़ पाएंगे। शाम को अमित घर लौटा, उसका चेहरा उदास था। मैंने पूछा, "क्या हुआ? सब ठीक है?" वो बैठ गया और बोला, "रिया, मैंने कल रात जुआ खेला था। थोड़े पैसे हार गया हूँ।"
मैं हैरान हो गई। "कितने पैसे? अमित, मैंने कितनी बार कहा है कि ये बंद करो।" वो सिर झुकाकर बोला, "पचास हजार। विक्रम और राहुल से हारा हूँ। वो आज शाम आने वाले हैं पैसे लेने।" विक्रम और राहुल उसके पुराने दोस्त थे, लेकिन मैं उन्हें ज्यादा नहीं जानती थी। वे कभी-कभी घर आते थे, लेकिन जुए की बातें करते थे। मैं गुस्से में बोली, "अब क्या करेंगे? घर का किराया भी बाकी है।" अमित ने कहा, "मैं बात कर लूँगा उनसे, थोड़ा टाइम माँग लूँगा।"
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शाम के सात बजे दरवाजे पर दस्तक हुई। मैंने दरवाजा खोला तो विक्रम और राहुल खड़े थे। विक्रम लंबा और मजबूत दिखता था, राहुल थोड़ा स्मार्ट टाइप का। वे अंदर आए और सोफे पर बैठ गए। अमित ने कहा, "यार, पैसे का इंतजाम हो जाएगा, बस दो-तीन दिन दो।" विक्रम हँसा, "अमित, तू हर बार यही कहता है। इस बार दांव बड़ा था, और तू हार गया।" राहुल ने मेरी तरफ देखा और बोला, "भाभी, चाय मिलेगी?" मैं रसोई में चली गई, लेकिन उनके बातों पर कान लगाए रही।
चाय लेकर आई तो विक्रम बोला, "अमित, अगर पैसे नहीं हैं तो कुछ और तरीका सोच। तेरी बीवी कितनी सुंदर है, शायद वो मदद कर दे।" अमित गुस्से में खड़ा हो गया, "क्या बकवास कर रहा है?" लेकिन राहुल ने कहा, "अरे, मजाक कर रहे हैं। लेकिन सच में, अगर तू पैसे नहीं दे सकता तो हम क्या करें?" मैं चुपचाप खड़ी रही, दिल में एक अजीब सी घबराहट हो रही थी। अमित ने मुझसे कहा, "रिया, तू कमरे में जा।" लेकिन विक्रम ने रोक लिया, "रुकिए भाभी, बात तो सुनिए।"
उस रात बातें बढ़ती गईं। अमित ने कबूल किया कि उसने जुए में मुझे दांव पर लगाया था, अगर हार गया तो वे मेरे साथ एक रात बिताएंगे। मैं स्तब्ध रह गई। "अमित, ये क्या कह रहे हो? मैं तुम्हारी पत्नी हूँ, कोई चीज नहीं।" वो रोने लगा, "माफ कर दे रिया, मैं नशे में था।" विक्रम और राहुल ने कहा कि या तो पैसे दो, या दांव पूरा करो। मैं रो रही थी, लेकिन घर की स्थिति देखकर सोचने लगी। हमारी जिंदगी पहले से टूट रही थी, और ये शायद एक रात की बात है।
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मैंने अमित से कहा, "तुम बाहर जाओ, मैं इनसे बात करती हूँ।" अमित बाहर चला गया, शायद शर्म से। विक्रम मेरे पास आया और बोला, "रिया, हम मजबूर नहीं करना चाहते, लेकिन अमित ने वादा किया था।" राहुल ने मेरे कंधे पर हाथ रखा, "तुम बहुत खूबसूरत हो, एक रात और सब खत्म।" मेरे मन में गुस्सा था, लेकिन कहीं न कहीं एक अजीब सी उत्सुकता भी। अमित ने मुझे कभी वो संतुष्टि नहीं दी, जो मैं चाहती थी। शायद ये मेरी जिंदगी का टर्निंग पॉइंट है।
कमरे में अंधेरा था, सिर्फ एक छोटी सी लाइट जल रही थी। विक्रम ने मुझे बाहों में लिया और मेरे होंठों पर吻 किया। उसकी साँसें गर्म थीं, और मैंने विरोध नहीं किया। राहुल पीछे से मेरे बालों में उँगलियाँ फिराने लगा। मेरे मन में अमित का चेहरा घूम रहा था, लेकिन अब मैं बह रही थी। विक्रम ने मेरी साड़ी उतारी, और मेरी त्वचा पर उसके हाथों की गर्माहट महसूस हुई। "तुम कितनी नरम हो," उसने कहा। राहुल ने मेरे स्तनों को छुआ, और एक करंट सा दौड़ा।
मैं बिस्तर पर लेट गई, और वे दोनों मेरे चारों ओर थे। विक्रम ने मेरे शरीर को चूमा, नीचे की ओर बढ़ते हुए। उसकी जीभ ने मुझे ऐसे स्पर्श किया कि मैं सिहर उठी। राहुल मेरे मुँह में अपना अंग डाला, और मैंने उसे चूसा, एक नई अनुभूति में खोकर। मेरे मन में अपराधबोध था, लेकिन सुख की लहरें उसे दबा रही थीं। विक्रम अब मेरे अंदर था, धीरे-धीरे धक्के मारते हुए। "आह, रिया," वो बोला। राहुल ने पोजीशन बदली, और अब वो मेरे पीछे था।
दोनों एक साथ मुझे संभाल रहे थे, एक आगे से, एक पीछे से। मेरी साँसें तेज हो गईं, और मैं चीख रही थी। विक्रम की गति बढ़ी, और राहुल के हाथ मेरी कमर पर कस गए। ये अनुभव नया था, दर्द और सुख का मिश्रण। मैंने सोचा, अमित कभी ऐसा नहीं कर सका। वे बदल-बदल कर मुझे ले रहे थे, हर बार एक नई भावना। राहुल ने मुझे उल्टा किया और मेरे कूल्हों पर थपकी दी, "तुम अद्भुत हो।"
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रात गहराती गई, और हम तीनों पसीने से तर थे। विक्रम ने मुझे अपनी गोद में लिया और ऊपर से प्रवेश किया, जबकि राहुल मेरे स्तनों को चूस रहा था। मेरी आँखें बंद थीं, और मैं सिर्फ सेंसेशन्स महसूस कर रही थी – उनकी ताकत, उनकी गर्मी, मेरी अपनी उत्तेजना। एक पल में सब कुछ फूट पड़ा, और मैं चरम पर पहुँच गई। वे भी थक चुके थे, लेकिन जारी रखे।
सुबह होने को थी, अमित बाहर इंतजार कर रहा था। मैंने कपड़े पहने और सोचा, ये रात मेरी जिंदगी बदल देगी। विक्रम और राहुल ने कहा, "अब कर्जा माफ, लेकिन अमित को जुआ बंद करने कहना।" वे चले गए, और मैं बिस्तर पर बैठी रही, अपनी भावनाओं से जूझते हुए। अमित अंदर आया, लेकिन मैंने उससे नजरें नहीं मिलाईं।
दिन बीतते गए, लेकिन वो रात मेरे मन में बसी रही। अमित ने जुआ छोड़ दिया, शायद शर्म से। लेकिन मैं बदल गई थी, अब मैं जानती थी कि जीवन में और भी रंग हैं। कभी-कभी रात को अकेले में सोचती हूँ, क्या वो फिर आएंगे? मेरे शरीर में वो स्पर्श अभी भी महसूस होता है, और मैं मुस्कुरा उठती हूँ।
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एक शाम विक्रम का फोन आया, "रिया, मिलना है?" मैंने हिचकिचाते हुए हाँ कहा। अमित घर पर नहीं था, और मैं तैयार हो गई। वे दोनों फिर आए, लेकिन इस बार बिना दांव के। हमने बातें की, और धीरे-धीरे वही स्थिति बनी। विक्रम ने मुझे दीवार से सटाया और चुंबन किया, राहुल ने मेरी गर्दन पर किस किया।
इस बार मैं ज्यादा खुली थी, अपनी इच्छाओं को मान रही थी। हम बेडरूम में गए, और उन्होंने मुझे पूरी तरह नंगा किया। विक्रम मेरे पैरों के बीच था, जीभ से खेलते हुए। राहुल मेरे होंठों को चूस रहा था। मैं कराह रही थी, "और जोर से।" वे हँसे और मेरी मांग पूरी की। राहुल अब मेरे अंदर था, तेज गति से, जबकि विक्रम मेरे मुँह में।
हमने पोजीशन बदली, मैं ऊपर थी विक्रम के, उछलते हुए। राहुल पीछे से आया, और फिर वही दोहरी अनुभूति। मेरी चीखें कमरे में गूँज रही थीं, सुख की लहरें लगातार आ रही थीं। वे थकते नहीं थे, हर बार नया तरीका। एक बार राहुल ने मुझे उठाया और खड़े-खड़े लिया, विक्रम नीचे से सहारा दे रहा था।
रात भर चला ये सिलसिला, भावनाओं का तूफान। सुबह वे चले गए, और मैं संतुष्ट महसूस कर रही थी। अमित को शक नहीं हुआ, लेकिन मैं जानती थी कि ये अब मेरी जिंदगी का हिस्सा है। कभी-कभी अपराधबोध होता है, लेकिन वो सुख उसे भुला देता है।
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कुछ महीने बाद, अमित को पता चला। वो गुस्से में था, लेकिन मैंने कहा, "तुम्हारी गलती से शुरू हुआ, अब मैं रोक नहीं सकती।" हम अलग हो गए, लेकिन विक्रम और राहुल मेरे साथ रहे। अब मैं उनकी हूं, और वो मेरे। हर मुलाकात में नई ऊँचाइयाँ छूते हैं हम।
आज रात फिर वे आ रहे हैं। मैं तैयार हूँ, दिल धड़क रहा है। दरवाजा खुलता है, और वे अंदर आते हैं। विक्रम मुझे बाहों में भर लेता है, राहुल दरवाजा बंद करता है। हम बेडरूम की ओर बढ़ते हैं, और मैं जानती हूँ कि ये रात फिर यादगार होगी।