जुए की कीमत

सुबह की धूप अभी-अभी खिड़की से झांक रही थी, जब मैंने आंखें खोलीं। घड़ी में सात बज रहे थे, और बाहर से बाजार की हल्की-हल्की आवाजें आ रही थीं। मैं बिस्तर से उठी, बालों को एक जूड़े में बांधा, और किचन की ओर चली गई, जहां रोज की तरह चाय का पानी चढ़ाया।

हमारा छोटा-सा घर दिल्ली की एक पुरानी कॉलोनी में था, जहां हर दिन एक जैसा लगता था। राजेश अभी सो रहा था, रात देर से लौटा था, शायद फिर किसी दोस्त के साथ बाहर रहा होगा। मैंने चाय की प्याली बनाई और बालकनी में खड़ी होकर सड़क पर नजर दौड़ाई, जहां बच्चे स्कूल जा रहे थे और दुकानें खुल रही थीं।

मैं सरिता हूं, तीस साल की, और राजेश से शादी को पांच साल हो चुके हैं। हमारी जिंदगी कभी बहुत साधारण थी, लेकिन अब राजेश की जुए की लत ने सब कुछ बदल दिया है। वह एक छोटी सी कंपनी में क्लर्क है, लेकिन शाम होते ही कार्ड्स और सट्टे की दुनिया में खो जाता है।

मैंने कई बार उसे समझाया, लेकिन वह हमेशा कहता, "बस एक बार जीत जाऊं, सब ठीक हो जाएगा।" मैं घर संभालती हूं, थोड़ी सिलाई का काम करती हूं, और शाम को पड़ोस की महिलाओं से बातें करके समय काटती हूं। आज भी मैंने नाश्ता बनाया, राजेश को जगाया, और हम साथ बैठकर खाने लगे।

राजेश ने चाय की चुस्की ली और बोला, "सरिता, आज शाम को विक्रम और अजय आएंगे। थोड़ा अच्छा सा कुछ बनाना।" मैंने पूछा, "कौन विक्रम और अजय? твои जुए वाले दोस्त?" वह हंसकर टाल गया, "हां, वही, बस मिलने आ रहे हैं।" मुझे अजीब लगा, क्योंकि वह कभी घर पर ऐसे लोगों को नहीं बुलाता था।

दिन भर मैं घर के कामों में लगी रही, कपड़े धोए, खाना बनाया, और थोड़ी देर आराम किया। राजेश ऑफिस चला गया था, लेकिन उसकी आंखों में एक अजीब सी चिंता थी। शाम को जब वह लौटा, तो उसके साथ दो आदमी थे – विक्रम, लंबा-चौड़ा, और अजय, थोड़ा दुबला लेकिन तेज नजरों वाला।

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मैंने उन्हें चाय दी और कमरे में बैठाया। राजेश असहज लग रहा था, बार-बार घड़ी देख रहा था। विक्रम ने कहा, "राजेश भाई, कर्ज का क्या? तीन महीने हो गए।" अजय ने हंसकर जोड़ा, "हमने तो तुम्हें मौका दिया था, लेकिन अब समय खत्म।" मैं किचन से सुन रही थी, दिल धड़कने लगा।

राजेश ने धीमी आवाज में कहा, "देखो, पैसे का इंतजाम हो जाएगा, बस थोड़ा समय दो।" लेकिन विक्रम ने सख्ती से कहा, "नहीं, अब कुछ ठोस चाहिए।" मैं अंदर आई, पूछा, "क्या हो रहा है?" राजेश ने मेरी ओर देखा, उसकी आंखों में शर्म थी।

उसने बताया कि जुए में वह पचास हजार हार चुका है, और ये दोनों उसके कर्जदार हैं। विक्रम ने मुस्कुराकर कहा, "भाभी, राजेश ने हमें तुम्हारे बारे में बहुत बताया है। शायद तुम मदद कर सको।" मैं स्तब्ध रह गई, समझ नहीं पाई कि क्या कह रहे हैं।

राजेश ने सिर झुका लिया, बोला, "सरिता, बस एक रात की बात है। ये दोनों... अगर तुम... तो कर्ज माफ हो जाएगा।" मेरे पैरों तले जमीन खिसक गई। मैंने गुस्से से कहा, "तुम पागल हो गए हो? मैं तुम्हारी बीवी हूं, कोई चीज नहीं!" लेकिन अंदर से डर लग रहा था।

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विक्रम ने उठकर मेरे पास आया, बोला, "देखो भाभी, हम जबरदस्ती नहीं करेंगे, लेकिन राजेश की हालत तुम जानती हो। अगर पुलिस में गए, तो सब बर्बाद।" अजय ने सहमति में सिर हिलाया। मैं रोने लगी, राजेश ने मुझे गले लगाया, लेकिन उसकी बेबसी साफ दिख रही थी।

मैंने सोचा, क्या करूं? घर टूट जाएगा, राजेश जेल जाएगा। मैंने आंसू पोछे और कहा, "ठीक है, लेकिन सिर्फ आज। इसके बाद कभी मत आना।" राजेश ने राहत की सांस ली, लेकिन उसकी आंखों में अपराधबोध था। विक्रम और अजय मुस्कुराए।

रात हो चुकी थी, घर में सन्नाटा था। मैं बेडरूम में गई, दिल तेज धड़क रहा था। राजेश बाहर रहा, शायद शर्म से। विक्रम और अजय अंदर आए, दरवाजा बंद किया। विक्रम ने धीरे से मेरे कंधे पर हाथ रखा, बोला, "डरो मत, हम अच्छे से करेंगे।"

मैंने आंखें बंद कर लीं, सोचा कि यह बस एक बुरा सपना है। अजय ने मेरी साड़ी का पल्लू खींचा, और मैंने विरोध नहीं किया। विक्रम ने मुझे बिस्तर पर लिटाया, उसके होंठ मेरे गले पर थे। एक अजीब सी गर्माहट महसूस हुई, लेकिन मन में गुस्सा और दर्द था।

अजय ने मेरे ब्लाउज के बटन खोले, उसकी उंगलियां मेरी त्वचा पर फिसल रही थीं। मैंने सोचा, राजेश के लिए कर रही हूं, लेकिन शरीर अपनी प्रतिक्रिया दे रहा था। विक्रम ने मेरी साड़ी उतारी, और अब मैं सिर्फ पेटीकोट में थी। उसने मुझे चूमा, गहराई से, और मैंने अनजाने में जवाब दिया।

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अजय ने मेरे स्तनों को सहलाया, नरमी से, और एक कराह निकल गई। विक्रम नीचे सरका, उसकी जीभ मेरी जांघों पर थी। मैं कांप रही थी, डर और उत्तेजना का मिश्रण। अजय ने अपना शर्ट उतारा, उसका शरीर मजबूत था। उसने मुझे अपनी ओर खींचा, और मैंने उसके सीने पर हाथ रखा।

विक्रम ने मेरे पेटीकोट को ऊपर किया, और उसकी उंगलियां मेरी योनि पर पहुंची। एक झुरझुरी सी दौड़ी, मैंने आंखें बंद रखीं। अजय ने मेरे होंठ चूमे, उसकी जीभ मेरे मुंह में थी। अब दोनों मुझे छू रहे थे, एक साथ, और मैं विरोध नहीं कर पा रही थी।

विक्रम ने अपने पैंट उतारे, उसका लिंग सख्त था। उसने मुझे फैलाया और धीरे से प्रवेश किया। दर्द हुआ, लेकिन साथ में एक अजीब सुख। अजय ने अपना लिंग मेरे मुंह के पास लाया, और मैंने उसे चूसा, अनिच्छा से लेकिन बहाव में। विक्रम की गति बढ़ी, हर धक्के में मैं हिल रही थी।

अजय ने अब जगह ली, विक्रम ने मुझे घुमाया। अजय पीछे से आया, उसका प्रवेश गहरा था। विक्रम मेरे स्तनों को चूस रहा था। मैं कराह रही थी, अब दर्द कम हो चुका था, सिर्फ सनसनी बची थी। दोनों की लय एक हो गई, जैसे कोई रिदम।

मैंने महसूस किया कि मेरा शरीर betray कर रहा है, उत्तेजना चरम पर थी। विक्रम ने तेज किया, और एक साथ हम तीनों झड़ गए। सांसें तेज थीं, पसीना बह रहा था। अजय ने मुझे गले लगाया, बोला, "तुम अद्भुत हो।" लेकिन मन में राजेश का चेहरा था।

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वे दोनों उठे, कपड़े पहने, और चले गए। मैं बिस्तर पर लेटी रही, शरीर थका लेकिन मन उलझा। राजेश अंदर आया, बोला, "माफ कर दो सरिता।" मैंने कुछ नहीं कहा, बस उसकी ओर देखा।

अगली सुबह सब सामान्य लग रहा था, लेकिन अंदर कुछ बदल चुका था। राजेश ने वादा किया कि जुआ छोड़ देगा। लेकिन रात की यादें बार-बार आतीं, एक मिश्रित भावना के साथ। शाम को फिर विक्रम का फोन आया, लेकिन मैंने राजेश को मना किया।

फिर भी, कभी-कभी अकेले में मैं उन पलों को याद करती, और एक अजीब सी चाहत जागती। राजेश के साथ अब सब ठीक था, लेकिन वह रात हमारी जिंदगी का हिस्सा बन चुकी थी। मैंने खुद से कहा, यह बस एक कीमत थी, जुए की कीमत।

एक शाम राजेश फिर देर से लौटा, और मैंने देखा उसकी आंखों में वही चिंता। "क्या हुआ?" मैंने पूछा। उसने बताया, "फिर हार गया, लेकिन थोड़ा सा।" गुस्सा आया, लेकिन साथ में डर। विक्रम और अजय का नाम फिर आया।

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इस बार मैं तैयार थी, शायद। वे आए, और कमरा फिर वही हो गया। विक्रम ने मुझे बाहों में लिया, उसकी सांसें गर्म थीं। अजय ने पीछे से गले लगाया, और मैंने विरोध नहीं किया। अब यह सिर्फ कर्ज नहीं था, कुछ और था।

विक्रम ने मुझे किस किया, गहराई से, और मैंने जवाब दिया। अजय ने मेरे कपड़े उतारे, उसकी उंगलियां मेरी पीठ पर नाच रही थीं। मैं बिस्तर पर लेटी, और विक्रम ने मेरी योनि को चाटा, जीभ से खेलते हुए। सुख की लहर दौड़ी।

अजय ने अपना लिंग मेरे मुंह में डाला, और मैंने उसे चूसा, अब उत्साह से। विक्रम ने प्रवेश किया, तेज गति से, और मैं कराह उठी। वे जगह बदली, अजय अब अंदर था, विक्रम मेरे स्तनों पर। हर धक्का नया लग रहा था, भावनाएं उफान पर।

मैंने महसूस किया कि मैं अब नियंत्रण में थी, अपनी इच्छा से। चरमोत्कर्ष आया, जोरदार, और हम सब थककर लेट गए। उनकी सांसें मेरी त्वचा पर थीं, और मैंने आंखें बंद रखीं, उस पल को जीते हुए।