खेल की शुरुआत
सुबह की धूप कमरे में हल्की-हल्की चुपके से घुस रही थी, और मैं अपनी किताब के पन्ने पलटते हुए बिस्तर पर बैठी थी। आज छुट्टी का दिन था, कॉलेज बंद था, और घर में सब अपनी-अपनी दिनचर्या में व्यस्त थे। माँ रसोई में नाश्ता बना रही थीं, जबकि पापा अखबार पढ़ते हुए चाय की चुस्कियां ले रहे थे।
मैंने घड़ी की तरफ देखा, अभी नौ बजे भी नहीं हुए थे। बाहर गली में बच्चों की आवाजें आ रही थीं, शायद खेल रहे थे। मैं उठकर खिड़की के पास गई और पर्दा थोड़ा सा हटाकर बाहर झांका। हमारा मोहल्ला शांत था, पुराने घरों से भरा हुआ, जहां हर कोई एक-दूसरे को जानता था।
मेरा नाम प्रिया है, उन्नीस साल की हूं, और दिल्ली के एक छोटे से इलाके में रहती हूं। कॉलेज में आर्ट्स की पढ़ाई कर रही हूं, और ज्यादातर समय किताबों या दोस्तों के साथ बीतता है। घर में माँ, पापा और छोटा भाई है, जो स्कूल जाता है। जीवन सामान्य सा चल रहा था, कोई बड़ा उतार-चढ़ाव नहीं।
नाश्ते के लिए माँ ने आवाज दी, तो मैं नीचे गई। टेबल पर परांठे और दही रखे थे। पापा ने मुस्कुराकर कहा, "प्रिया, आज क्या प्लान है? कहीं बाहर जाना है?" मैंने हंसकर जवाब दिया, "नहीं पापा, बस घर पर ही रहूंगी। थोड़ा पढ़ाई कर लूंगी।" भाई स्कूल के लिए तैयार हो रहा था, और घर में हल्की-फुल्की बातें चल रही थीं।
नाश्ता खत्म करके मैं वापस अपने कमरे में आ गई। बाहर मौसम अच्छा था, हल्की ठंडी हवा चल रही थी। मैंने सोचा कि थोड़ी देर बालकनी में बैठकर किताब पढ़ूं। किताब उठाकर बाहर आई, तो देखा कि पड़ोस से राजेश अंकल हमारे घर की तरफ आ रहे थे। वे पापा के पुराने दोस्त थे, लेकिन ज्यादा आना-जाना नहीं था।
राजेश अंकल करीब पैंतालीस साल के थे, लंबे-चौड़े कद के, और हमेशा मुस्कुराते रहते थे। वे हमारे घर कभी-कभी आते थे, कोई काम से या बस यूं ही। आज वे हाथ में एक पैकेट लिए हुए थे। मैंने उन्हें देखा और सोचा कि शायद पापा से मिलने आए हैं।
मैं बालकनी से नीचे उतरी और दरवाजा खोला। "नमस्ते अंकल," मैंने कहा। वे मुस्कुराए और बोले, "नमस्ते बेटी, पापा घर पर हैं?" मैंने हां में सिर हिलाया और उन्हें अंदर बुलाया। पापा ने उन्हें देखकर खुश होकर स्वागत किया। "अरे राजेश, आओ बैठो। क्या हाल है?"
वे बैठे और बातें शुरू हो गईं। मैं रसोई में माँ की मदद करने चली गई। थोड़ी देर बाद पापा ने कहा कि उन्हें बाजार जाना है, कुछ सामान लाना है। माँ भी साथ जाने को तैयार हुईं, और भाई पहले ही स्कूल चला गया था। पापा ने मुझसे कहा, "प्रिया, हम थोड़ी देर में आते हैं। राजेश यहां है, अगर कुछ चाहिए तो बता देना।"
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मैंने हां कहा, लेकिन मन में थोड़ा अजीब लगा। राजेश अंकल से ज्यादा बात नहीं होती थी मेरी, वे बस अंकल थे। घर खाली हो गया, और मैं ऊपर अपने कमरे में चली गई। थोड़ी देर बाद अंकल ने आवाज दी, "प्रिया, क्या मैं ऊपर आ सकता हूं? थोड़ी बात कर लें।"
मैं हैरान हुई, लेकिन नीचे गई और बोली, "हां अंकल, आइए।" वे ऊपर आए और मेरे कमरे में बैठ गए। "क्या पढ़ रही हो?" उन्होंने किताब देखकर पूछा। मैंने बताया कि ये एक उपन्यास है। वे हंसकर बोले, "अच्छा है, पढ़ाई के साथ-साथ। मैं भी कभी पढ़ता था।"
बातें शुरू हुईं, पहले कॉलेज के बारे में, फिर घर-परिवार के। अंकल बहुत सहज थे, जैसे पुराने दोस्त। मैं भी धीरे-धीरे खुलने लगी। वे बताने लगे अपनी जवानी की कहानियां, कैसे वे खेलते थे, शरारतें करते थे। "तुम कभी खेलती हो?" उन्होंने पूछा।
मैंने कहा, "अब कहां अंकल, कॉलेज में समय नहीं मिलता।" वे बोले, "चलो, आज खेलते हैं कुछ। घर में अकेले हैं, समय कट जाएगा।" मैं हंस पड़ी, सोचा मजाक कर रहे हैं। लेकिन वे गंभीर थे। "क्या खेलें?" मैंने पूछा।
वे बोले, "चलो, छुपन-छुपाई खेलते हैं। जैसे बच्चे खेलते हैं।" मैं हैरान हुई, लेकिन लगा मजेदार होगा। घर बड़ा था, जगह थी। "ठीक है," मैंने कहा। हमने नियम बनाए, पहले मैं छुपूंगी।
मैं दौड़कर कमरे में छुप गई, अलमारी के पीछे। अंकल गिनती करने लगे। दिल थोड़ा तेज धड़क रहा था, बचपन की याद आ रही थी। वे ढूंढने आए, और जल्दी ही मुझे ढूंढ लिया। "पकड़ी!" उन्होंने कहा और हंसते हुए मेरे कंधे पर हाथ रखा।
उनका स्पर्श अजीब लगा, लेकिन मैंने अनदेखा किया। अब उनकी बारी थी छुपने की। मैंने आंखें बंद कीं और गिनती की। घर में ढूंढा, लेकिन वे नहीं मिले। आखिर में बालकनी में जाकर देखा, वे वहां खड़े थे।
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"अंकल, आप यहां?" मैंने कहा। वे मुस्कुराए और बोले, "हां, अब तुम्हारी बारी फिर। लेकिन इस बार कुछ मजेदार करते हैं। अगर पकड़ी गईं, तो penalti होगी।" मैंने पूछा, "कैसी penalti?" वे बोले, "जो जीतेगा, वो कुछ मांगेगा।"
मैं सहमत हो गई, सोचा खेल है। फिर से छुपी, इस बार रसोई में। वे आए, ढूंढा, और पकड़ लिया। उनका हाथ मेरी कमर पर पड़ा, थोड़ा सा खींचा। "पकड़ी, अब penalti," उन्होंने कहा। दिल में एक अजीब सी हलचल हुई।
"क्या मांगोगे अंकल?" मैंने हंसकर पूछा। वे बोले, "एक hug दो।" मैं हैरान हुई, लेकिन खेल था, सो मैंने hug किया। उनका शरीर गर्म था, और hug थोड़ा लंबा खिंचा। मैं पीछे हटी, लेकिन वे मुस्कुरा रहे थे।
खेल जारी रहा। अगली बार वे छुपे, मैंने ढूंढा। नहीं मिले, तो उन्होंने खुद बाहर आकर कहा, "अब मैं जीता, penalti।" इस बार उन्होंने kiss मांगी, गाल पर। मैं झिझकी, लेकिन किया। उनके होंठ मेरे गाल पर लगे, और एक अजीब सा感觉 हुआ।
धीरे-धीरे खेल बदलने लगा। penalti बड़ी होने लगीं। एक बार उन्होंने कहा, "अब बैठो मेरी गोद में।" मैंने मना किया, लेकिन वे बोले, "खेल है प्रिया, डरो मत।" मैं बैठ गई, उनका हाथ मेरी जांघ पर था। दिल तेज धड़क रहा था, मन में कन्फ्लिक्ट था।
मैं सोच रही थी कि ये क्या हो रहा है। अंकल ऐसे क्यों कर रहे हैं? लेकिन उनका तरीका इतना सहज था कि मैं रोक नहीं पाई। वे बातें करते रहे, मेरी तारीफ करते, कहते कि मैं कितनी सुंदर हूं। उनकी आंखों में कुछ था, जो मुझे असहज कर रहा था, लेकिन आकर्षित भी।
फिर एक penalti में उन्होंने मुझे किस किया, होंठों पर। मैं स्तब्ध रह गई, लेकिन उनका चुंबन गहरा था। मैंने खुद को पीछे खींचा, "अंकल, ये गलत है।" वे बोले, "खेल है बेटी, बस मजा ले रही हो न?" मैं चुप रही, मन में उथल-पुथल थी।
खेल अब और आगे बढ़ गया। वे मुझे छूने लगे, हल्के से। मेरे शरीर में एक नई सी उत्तेजना जाग रही थी। मैं जानती थी ये गलत है, लेकिन रोक नहीं पा रही थी।他们的 हाथ मेरे ब्लाउज पर गए, बटन खोलने लगे। मैंने रोका, लेकिन कमजोर थी।
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"अंकल, प्लीज," मैंने कहा, लेकिन वे नहीं रुके। उन्होंने मुझे बिस्तर पर लिटाया, और धीरे-धीरे मेरे कपड़े उतारने लगे। मेरा शरीर कांप रहा था, डर और इच्छा का मिश्रण। उनका स्पर्श नरम था, लेकिन दृढ़।
जब वे मेरे ऊपर आए, तो मैंने आंखें बंद कर लीं। उनका शरीर मेरे खिलाफ दबा, और धीरे से प्रवेश हुआ। दर्द हुआ, लेकिन साथ में एक अजीब सा सुख भी। वे हिलने लगे, धीमे-धीमे, और मैं खुद को बहने दे रही थी।
हर गति में नई संवेदना थी, जैसे लहरें उठ रही हों। मैंने अपनी बाहें उनके चारों ओर लपेट लीं, और सांसें तेज हो गईं। समय रुक सा गया था, सिर्फ हम दोनों थे।
फिर गति तेज हुई, और मैंने खुद को पूरी तरह समर्पित कर दिया। उनके होंठ मेरे गर्दन पर थे, हाथ मेरे स्तनों को सहला रहे थे। हर पल में एक नई भावना जाग रही थी, जैसे पहली बार जी रही हूं।
क्लाइमैक्स आया, और मैं कांप उठी। वे भी रुक गए, सांसें भरते हुए। हम दोनों चुप थे, सिर्फ दिल की धड़कनें सुनाई दे रही थीं।
थोड़ी देर बाद वे उठे, लेकिन मैं लेटी रही। मन में सवाल थे, लेकिन शरीर सुकून में था। वे मुस्कुराए और बोले, "अच्छा खेल था न?" मैं चुप रही।
घर में अब भी शांति थी, बाहर से आवाजें आ रही थीं। मैंने कपड़े पहने, और सोचा कि ये क्या था। लेकिन अंदर से एक नई सी आजादी महसूस हो रही थी।
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अंकल नीचे चले गए, और मैं बिस्तर पर बैठ गई। दिल अभी भी तेज धड़क रहा था, यादें ताजा थीं। क्या ये दोबारा होगा? मैं नहीं जानती, लेकिन उस पल में मैं खुद को अलग महसूस कर रही थी।
शाम होने वाली थी, पापा-माँ आने वाले थे। मैंने खुद को संभाला, और नीचे गई। अंकल जा चुके थे, लेकिन उनकी खुशबू अभी भी कमरे में थी।
रात को सोते समय वो पल बार-बार याद आए। दर्द, सुख, सब मिश्रित। मैंने सोचा कि जीवन में ऐसे खेल भी होते हैं, जो अनजाने में बदल देते हैं सबकुछ।
अगले दिन सब सामान्य था, लेकिन मेरे मन में वो रहस्य था। अंकल फिर आए, इस बार शाम को। पापा घर पर थे, लेकिन उन्होंने मुझे देखकर मुस्कुराया। मैं शर्मा गई।
रात को जब सब सो गए, तो अंकल का मैसेज आया, "कल फिर खेलें?" मैंने हां लिखा, खुद को रोक नहीं पाई। अगले दिन घर खाली था, और वे आए।
इस बार खेल सीधा शुरू हुआ, कोई छुपन-छुपाई नहीं। उन्होंने मुझे बाहों में लिया, और चुंबन शुरू किया। मैंने भी जवाब दिया, अब डर कम था। उनके हाथ मेरे शरीर पर घूम रहे थे, हर जगह छू रहे थे।
हम बिस्तर पर पहुंचे, और इस बार मैं ऊपर थी। मैंने उनकी कमीज उतारी, उनके सीने को चूमा। उनका शरीर मजबूत था, और मैं खुद को खो रही थी। प्रवेश हुआ, लेकिन इस बार मैंコントロール में थी।
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गति मैंने सेट की, धीमी से तेज। हर मूवमेंट में नई उत्तेजना, जैसे आग लगी हो। उन्होंने मेरे कूल्हों को पकड़ा, और साथ में हिलने लगे। सांसें मिल गईं, और क्लाइमैक्स एक साथ आया।
बाद में हम लेटे रहे, बातें की। उन्होंने बताया कि वे मुझे पसंद करते थे लंबे समय से। मैंने कहा कि मुझे भी अच्छा लगा, लेकिन डर लगता है। वे बोले, "ये हमारा राज रहेगा।"
ऐसे ही दिन बीतने लगे, कभी-कभी मिलते, खेलते। हर बार कुछ नया, कभी रसोई में, कभी बालकनी में। भावनाएं गहरी हो रही थीं, सिर्फ शारीरिक नहीं।
एक दिन हम बाहर घूमने गए, पार्क में। वहां हाथ पकड़कर बैठे, बातें की। रात को घर लौटे, और फिर वही। इस बार ज्यादा पैशनेट, जैसे प्यार हो।
मैंने खुद को पूरी तरह दे दिया, हर संवेदना को महसूस किया। उनके होंठ, हाथ, सब कुछ। क्लाइमैक्स के बाद मैं उनके सीने पर सिर रखकर लेटी, और सोचा कि ये कितना सुंदर है।
लेकिन मन में कन्फ्लिक्ट था, क्या ये सही है? परिवार क्या कहेगा? लेकिन उस पल में सब भूल जाती हूं।
अब हर मिलन में नई गहराई आ रही है, जैसे आत्मा जुड़ रही हो। मैं बदल गई हूं, ज्यादा कॉन्फिडेंट, ज्यादा जीवंत।
आज फिर वे आए हैं, और हम कमरे में हैं। उनका हाथ मेरे बालों में है, होंठ मेरे कान के पास। "तुम्हें प्यार करता हूं," वे फुसफुसाते हैं। मैं मुस्कुराती हूं, और खुद को उनके हवाले कर देती हूं।
हमारे शरीर मिलते हैं, गति बढ़ती है, और दुनिया गायब हो जाती है। सिर्फ हम, हमारी सांसें, हमारा प्यार।