भैया की गर्म सांसें
सुबह का समय था, घर में हल्की-हल्की ठंडक फैली हुई थी। मैं रसोई में खड़ी होकर चाय बना रही थी, जैसे हर रोज की आदत थी। बाहर से पक्षियों की चहचहाहट आ रही थी, और पापा अखबार पढ़ते हुए सोफे पर बैठे थे। मम्मी मंदिर जाने की तैयारी कर रही थीं, और भैया अमित अभी-अभी नहाकर कमरे से निकले थे। हमारा छोटा सा घर दिल्ली के एक पुराने मोहल्ले में था, जहां हर दिन एक जैसा लगता था—स्कूल, कॉलेज, घर का काम और शाम की चहल-पहल।
मैं रिया हूं, बाईस साल की, कॉलेज में आखिरी साल की पढ़ाई कर रही हूं। अमित भैया पच्चीस के हैं, एक प्राइवेट कंपनी में जॉब करते हैं। हम दोनों सगे भाई-बहन हैं, बचपन से साथ बड़े हुए। मम्मी-पापा दोनों काम करते हैं, तो घर की जिम्मेदारी हम पर ही रहती है। आज भी वही रूटीन था—चाय बनाकर सबको देना, फिर खुद तैयार होना। अमित भैया ने आकर कहा, "रिया, चाय जल्दी दे ना, ऑफिस के लिए लेट हो रहा हूं।" मैंने मुस्कुराकर कप थमा दिया, और वो जल्दी-जल्दी पीने लगे।
दिन बीतते हुए शाम हो गई। कॉलेज से लौटकर मैं थक गई थी, असाइनमेंट का ढेर था। घर पहुंची तो मम्मी ने बताया कि वो और पापा किसी रिश्तेदार के यहां जा रहे हैं, रात को लौटेंगे। अमित भैया भी घर पर थे, उनका ऑफिस छुट्टी का दिन था। मैंने सोचा, अच्छा है, आज आराम से पढ़ाई कर लूंगी। रसोई में जाकर मैंने डिनर की तैयारी शुरू की—सब्जी काटना, चावल चढ़ाना। अमित भैया टीवी देख रहे थे, बीच-बीच में मेरी मदद करने आ जाते। "रिया, क्या बना रही हो?" उन्होंने पूछा, और मैंने बताया, "साधारण दाल-चावल।" वो हंसकर बोले, "ठीक है, मैं मदद कर दूं?"
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रात का खाना हमने साथ खाया। मम्मी-पापा के न होने से घर थोड़ा खाली-खाली लग रहा था, लेकिन अमित भैया के साथ बातें करके अच्छा लग रहा था। हम बचपन की यादें ताजा कर रहे थे—कैसे स्कूल में साथ जाते थे, कैसे झगड़ते थे। खाने के बाद मैं बर्तन धोने लगी, और अमित भैया सोफे पर बैठे फोन देख रहे थे। अचानक बिजली चली गई, घर में अंधेरा छा गया। मैं डर गई, "भैया, कैंडल कहां है?" उन्होंने कहा, "रुक, मैं लाता हूं।" वो उठे और मेरे पास आए, उनके हाथ ने मेरा कंधा छुआ, जो बस एक पल के लिए था, लेकिन मुझे अजीब सा लगा।
कैंडल जलाकर हम वापस बैठे। अंधेरे में सिर्फ वो रोशनी थी, और हमारी बातें जारी रहीं। अमित भैया ने बताया कि उनकी जॉब में कितना स्ट्रेस है, और मैंने अपनी कॉलेज की परेशानियां शेयर कीं। धीरे-धीरे बातें पर्सनल हो गईं—मैंने कहा कि मुझे कभी-कभी अकेलापन लगता है, दोस्तों के बीच भी। उन्होंने कहा, "रिया, मैं हूं ना, तू कभी अकेली नहीं है।" उनकी आंखों में कुछ अलग सा था, जैसे वो मुझे देख रहे हों, लेकिन मैंने ज्यादा ध्यान नहीं दिया। बिजली आई तो हम अपने-अपने कमरे में चले गए।
रात को नींद नहीं आ रही थी। मैं बिस्तर पर लेटी सोच रही थी कि अमित भैया कितने केयरिंग हैं। बचपन से वो मेरे लिए सब कुछ करते आए हैं—स्कूल में प्रोटेक्ट करना, गिफ्ट्स लाना। लेकिन आज का वो छूना, वो बातें, कुछ तो अलग था। मैं उठी और पानी पीने रसोई गई। वहां अमित भैया पहले से खड़े थे, शायद उन्हें भी नींद नहीं आ रही थी। "भैया, आप भी जाग रहे हो?" मैंने पूछा। उन्होंने मुस्कुराकर कहा, "हां, सोच रहा था तेरे बारे में।" मेरे दिल की धड़कन तेज हो गई, लेकिन मैंने खुद को संभाला।
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हम बात करने लगे, रसोई के प्लेटफॉर्म पर बैठकर। अमित भैया ने कहा कि वो मुझे बहुत मिस करते हैं जब मैं कॉलेज जाती हूं। मैंने हंसकर कहा, "भैया, मैं तो घर पर ही हूं।" लेकिन उनकी नजरें मेरी आंखों में टिकी हुई थीं, और धीरे से उन्होंने मेरा हाथ पकड़ लिया। "रिया, तू जानती है, मैं तेरे लिए क्या फील करता हूं?" उनकी आवाज में कंपन था। मैं स्तब्ध थी, लेकिन हाथ नहीं छुड़ाया। वो करीब आए, और मैंने महसूस किया कि मेरे अंदर भी कुछ उथल-पुथल हो रही है।
उस पल में सब कुछ बदल गया। अमित भैया ने मुझे अपनी बाहों में लिया, और मैंने विरोध नहीं किया। उनकी सांसें मेरे चेहरे पर महसूस हो रही थीं, गर्म और तेज। "रिया, मैं तुझे बहुत प्यार करता हूं, वो वाला प्यार," उन्होंने फुसफुसाकर कहा। मेरे मन में कन्फ्लिक्ट था—वो मेरा भाई है, लेकिन ये फीलिंग्स इतनी स्ट्रॉन्ग थीं। मैंने अपनी आंखें बंद कर लीं, और他们的 होंठ मेरे होंठों से मिल गए। वो चुंबन इतना गहरा था कि मैं खुद को भूल गई।
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हमारे कमरे में जाकर हम बिस्तर पर लेट गए। अमित भैया ने धीरे-धीरे मेरे कपड़े उतारे, उनकी उंगलियां मेरी त्वचा पर फिसल रही थीं। मैं कांप रही थी, लेकिन उत्सुक भी। "भैया, ये गलत है," मैंने कहा, लेकिन मेरी आवाज कमजोर थी। उन्होंने कहा, "रिया, ये प्यार है, और प्यार कभी गलत नहीं होता।" उनकी छुअन से मेरे शरीर में आग सी लग गई। वो मेरे स्तनों को सहला रहे थे, निप्पल्स को चूम रहे थे, और मैं सिसकियां भर रही थी।
मैं कुंवारी थी, कभी किसी ने मुझे ऐसे नहीं छुआ था। अमित भैया ने मुझे तैयार किया, अपनी जीभ से मेरे गुप्तांग को चाटा, जो इतना सुखद था कि मैं चीख पड़ी। "भैया, धीरे," मैंने कहा। उन्होंने अपना लिंग मेरे अंदर डालने से पहले मुझे चूमा, और फिर धीरे से प्रवेश किया। दर्द हुआ, लेकिन वो रुके, मुझे सहलाते रहे। धीरे-धीरे दर्द सुख में बदल गया, और हम एक लय में हिलने लगे।
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उस रात हमने कई बार प्यार किया। हर बार कुछ नया था—कभी वो ऊपर, कभी मैं। मेरी भावनाएं उफान पर थीं, प्यार, डर, उत्साह सब मिलकर। अमित भैया की आंखों में देखकर लगता था कि वो भी यही महसूस कर रहे हैं। सुबह होने से पहले हम थककर लेटे थे, उनकी बाहों में मैं सुरक्षित महसूस कर रही थी।
अगले दिन सब नॉर्मल लग रहा था, लेकिन हमारे बीच एक सीक्रेट था। शाम को जब मम्मी-पापा घर थे, हम नजरें चुरा रहे थे। रात को फिर वही हुआ—अमित भैया मेरे कमरे में आए, और हमने फिर से वो पल जीए। इस बार ज्यादा पैशनेट, ज्यादा गहरा। मैंने महसूस किया कि मेरी कुंवारी बुर अब उनकी थी, और वो मेरी हर इच्छा पूरी कर रहे थे।
समय बीतता गया,我们的 रिश्ता छुपा रहा। कभी-कभी गिल्ट आता, लेकिन प्यार की ताकत ज्यादा थी। एक रात हम बाहर घूमने गए, और कार में ही हमने इंटिमेट होना शुरू किया। अमित भैया ने मुझे सीट पर लिटाया, और उनकी जीभ मेरे शरीर पर घूमी। मैं कराह रही थी, "भैया, और..." वो तेज हो गए, और हमारा क्लाइमेक्स साथ आया।
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हमारी कहानी में अब कोई बैरियर नहीं था। हर सीन में नई भावना—कभी रोमांस, कभी वासना। मैं खुद को पूरी तरह समर्पित कर चुकी थी। अमित भैया की हर छुअन मुझे नई जिंदगी देती।
फिर एक शाम, जब हम अकेले थे, अमित भैया ने मुझे दीवार से सटाकर चूमा। उनकी उंगलियां मेरे अंदर थीं, और मैं