भैया की अनचाही नजर
सुबह की धूप कमरे में धीरे-धीरे फैल रही थी, और मैं बिस्तर पर लेटी हुई चाय की प्याली थामे अखबार पढ़ रही थी। घर में सब कुछ वैसा ही था जैसा रोज होता है—माँ रसोई में नाश्ता बना रही थीं, पापा ऑफिस जाने की तैयारी कर रहे थे, और भैया अजय अपने कमरे में व्यायाम कर रहे थे। मैं रिया, कॉलेज की छुट्टियों में घर आई हुई थी, और आज का दिन भी बाकी दिनों की तरह शांत लग रहा था। बाहर से पक्षियों की चहचहाहट आ रही थी, और मैं सोच रही थी कि आज शाम को विक्रम से मिलने जाऊँगी।
हमारा घर दिल्ली के एक शांत मोहल्ले में है, जहाँ हर कोई अपनी दिनचर्या में व्यस्त रहता है। मैं 22 साल की हूँ, ग्रेजुएशन पूरा कर चुकी हूँ और अब जॉब की तलाश में हूँ। अजय भैया 28 साल के हैं, एक सॉफ्टवेयर कंपनी में काम करते हैं, और घर में सबके चहेते हैं। वो हमेशा मेरी देखभाल करते हैं, जैसे कोई बड़ा भाई करता है। विक्रम मेरा बॉयफ्रेंड है, 24 साल का, और वो पास के ही कॉलेज में पढ़ता है। हमारी मुलाकात दो साल पहले हुई थी, और तब से हमारा रिश्ता धीरे-धीरे गहरा होता गया। लेकिन घर में किसी को हमारे बारे में पता नहीं है, क्योंकि मैं नहीं चाहती कि अभी कोई बात बिगड़े।
उस दिन दोपहर में माँ-पापा बाहर गए थे, किसी रिश्तेदार के यहाँ। भैया ऑफिस चले गए थे, या कम से कम मुझे यही लगा था। मैंने विक्रम को फोन किया और कहा कि घर आ जाए, क्योंकि अकेले में कुछ समय बिताना चाहती थी। वो आया, और हम लिविंग रूम में बैठकर बातें करने लगे। विक्रम हमेशा की तरह हँस-हँसकर अपनी कॉलेज की कहानियाँ सुना रहा था, और मैं उसकी बातों में खोई हुई थी। बाहर की हवा ठंडी थी, और हमने कॉफी बनाई। सब कुछ इतना सामान्य लग रहा था कि मुझे कोई चिंता नहीं हुई।
धीरे-धीरे बातें गहरी होने लगीं। विक्रम ने मेरे हाथ थाम लिए, और मैंने महसूस किया कि उसकी आँखों में वही पुरानी चमक है। हम करीब आए, लेकिन अभी भी सब कुछ नियंत्रण में था। मैंने सोचा कि भैया शाम को ही लौटेंगे, तो समय है। लेकिन अंदर ही अंदर एक हल्की सी घबराहट थी, क्योंकि घर में पहली बार ऐसा कुछ हो रहा था। विक्रम ने मुझे गले लगाया, और मैंने खुद को उसकी बाहों में सहज महसूस किया। हमारी बातें अब पुरानी यादों पर आ गई थीं—पहली मुलाकात, वो शाम जब हम पार्क में घंटों बैठे रहे।
समय बीतता गया, और हम ऊपर मेरे कमरे में चले गए। वहाँ बिस्तर पर बैठकर हम और करीब हो गए। विक्रम की उँगलियाँ मेरे बालों में फिर रही थीं, और मैं उसकी साँसों की गर्माहट महसूस कर रही थी। लेकिन अभी भी कोई जल्दबाजी नहीं थी; हम बस एक-दूसरे की मौजूदगी का आनंद ले रहे थे। मैं सोच रही थी कि कितना अच्छा लगता है जब कोई तुम्हें इतना चाहता है। बाहर से कोई आवाज नहीं आ रही थी, घर खाली लग रहा था।
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फिर अचानक, दरवाजे पर एक हल्की सी खटखटाहट हुई। मैं चौंक गई, लेकिन विक्रम ने कहा कि शायद हवा है। मैंने उठकर दरवाजा खोला, और वहाँ अजय भैया खड़े थे। उनकी आँखें चौड़ी हो गईं, और मैंने देखा कि वो हमें देखकर स्तब्ध हैं। विक्रम और मैं बस बातें कर रहे थे, लेकिन माहौल ऐसा था कि सब कुछ गलत लग रहा था। भैया ने कुछ नहीं कहा, बस मुड़कर चले गए। मेरे दिल की धड़कन तेज हो गई, और मैंने विक्रम से कहा कि अब तुम जाओ।
उस शाम जब भैया घर लौटे, तो सब कुछ सामान्य लगाने की कोशिश कर रहे थे। डिनर के समय माँ ने पूछा कि दिन कैसा रहा, और भैया ने मुस्कुराकर जवाब दिया। लेकिन मुझे उनकी नजरों में वो असहजता दिख रही थी। मैं अंदर से काँप रही थी, सोच रही थी कि क्या वो कुछ कहेंगे। रात को जब सब सो गए, मैं अपने कमरे में लेटी हुई थी, और विक्रम का मैसेज आया कि सब ठीक हो जाएगा। लेकिन मुझे डर था कि भैया ने जो देखा, वो हमारे रिश्ते को बदल देगा।
अगले दिन सुबह भैया ने मुझे अकेले में बुलाया। हम बालकनी में खड़े थे, और उन्होंने कहा, "रिया, कल जो हुआ, वो... मैंने नहीं सोचा था। विक्रम कौन है?" उनकी आवाज में गुस्सा नहीं था, बल्कि चिंता थी। मैंने सब कुछ बता दिया—हमारी मुलाकात, हमारा रिश्ता। भैया ने सुना, और फिर कहा कि वो खुश हैं लेकिन घर में सावधानी बरतनी चाहिए। लेकिन उनकी आँखों में वो नजर थी, जो मुझे असहज कर रही थी।
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दिन बीतते गए, और घर का माहौल थोड़ा बदल सा गया। भैया अब मुझे ज्यादा ध्यान से देखते थे, जैसे कोई राज़ जानकर। विक्रम फिर आया, लेकिन इस बार हम ज्यादा सतर्क थे। एक शाम जब माँ-पापा बाहर थे, विक्रम और मैं फिर कमरे में थे। हम बातें कर रहे थे, और धीरे-धीरे करीब आने लगे। विक्रम ने मुझे किस किया, और मैंने खुद को उसमें खो दिया। लेकिन अचानक दरवाजा खुला, और भैया अंदर आ गए। इस बार हम ज्यादा करीब थे—मेरी शर्ट थोड़ी ऊपर थी, और विक्रम की बाहें मेरे चारों ओर।
भैया रुक गए, उनकी नजर हम पर टिकी हुई थी। "ये क्या हो रहा है?" उन्होंने धीमी आवाज में पूछा। मैं घबरा गई, और विक्रम ने खुद को संभाला। भैया ने दरवाजा बंद किया और कहा, "रिया, तुम्हें पता है ये गलत है। घर में ऐसा..." उनकी बात अधर में रह गई। मैं रोने लगी, सोच रही थी कि अब सब खत्म हो जाएगा। लेकिन भैया ने हमें डाँटा नहीं, बल्कि चुपचाप चले गए।
उस रात मैं सो नहीं पाई। भैया का चेहरा बार-बार आँखों के सामने आ रहा था। अगले दिन मैंने उनसे बात की। "भैया, प्लीज माँ-पापा को मत बताना," मैंने कहा। उन्होंने मुस्कुराकर कहा, "नहीं बताऊँगा, लेकिन तुम सावधान रहो।" लेकिन उनकी नजर अब अलग थी—जैसे वो मुझे नए तरीके से देख रहे हों। विक्रम ने कहा कि शायद भैया को जलन हो रही है, लेकिन मैंने मना किया।
कुछ दिन बाद, एक शाम विक्रम फिर आया। इस बार हमने दरवाजा लॉक किया। हम बिस्तर पर लेटे हुए थे, बातें कर रहे थे। विक्रम की उँगलियाँ मेरी कमर पर फिर रही थीं, और मैं उसकी गर्माहट महसूस कर रही थी। धीरे-धीरे我们的 कपड़े कम होने लगे। मैं नंगी हो गई, और विक्रम भी। हम एक-दूसरे को छू रहे थे, भावनाओं में डूबे हुए। तभी दरवाजे पर जोर की दस्तक हुई। हम चौंक गए, और मैंने जल्दी से चादर ओढ़ ली। विक्रम ने दरवाजा खोला, और वहाँ भैया थे।
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उनकी नजर हम पर पड़ी—मैं चादर में लिपटी हुई, विक्रम आधा नंगा। भैया की आँखें फैल गईं, और वो स्तब्ध खड़े रहे। "रिया... ये..." उन्होंने कहा, लेकिन शब्द नहीं निकले। मैं शर्म से मर रही थी, सोच रही थी कि अब क्या होगा। विक्रम ने उन्हें बाहर जाने को कहा, लेकिन भैया मुड़े नहीं। उनकी नजर हम दोनों पर थी, जैसे वो कुछ सोच रहे हों।
उस पल के बाद सब बदल गया। भैया ने हमें अकेला छोड़ दिया, लेकिन उनकी चुप्पी मुझे डराती थी। रात को मैं उनके कमरे में गई। "भैया, प्लीजForgive me," मैंने कहा। उन्होंने मुझे गले लगाया, और कहा, "रिया, मैं तुम्हारा भाई हूँ। लेकिन ये देखकर... मुझे अजीब लगता है।" उनकी बाहें मेरे चारों ओर थीं, और मैंने महसूस किया कि वो करीब आ रहे हैं। लेकिन मैं पीछे हटी।
अगले दिनों में भैया का व्यवहार बदलने लगा। वो मुझे ज्यादा समय देते, बातें करते। एक शाम जब विक्रम नहीं आया, भैया मेरे कमरे में आए। हम बातें करने लगे, और अचानक उन्होंने मेरे कंधे पर हाथ रखा। "रिया, तुम कितनी बड़ी हो गई हो," उन्होंने कहा। मैं असहज हुई, लेकिन कुछ नहीं कहा। विक्रम को मैंने बताया, और वो चिंतित हो गया।
फिर एक दिन, जब घर खाली था, विक्रम आया। हम फिर करीब आए, कपड़े उतारे। हमारी साँसें तेज थीं, शरीर एक-दूसरे से जुड़े हुए। मैं उसकी छुअन से पिघल रही थी, हर स्पर्श नया एहसास दे रहा था। तभी दरवाजा खुला, और भैया अंदर। इस बार वो रुके नहीं, बल्कि करीब आए। "रिया, क्या मैं शामिल हो सकता हूँ?" उन्होंने कहा। मैं स्तब्ध थी, विक्रम गुस्से में। लेकिन भैया की आँखों में वो इच्छा थी जो मैंने पहले नहीं देखी।
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उस पल सब उलझ गया। मैंने भैया को बाहर जाने को कहा, लेकिन वो नहीं माने। विक्रम ने उन्हें धक्का दिया, और झगड़ा हो गया। मैं रो रही थी, अपने नंगे शरीर को छुपाने की कोशिश कर रही थी। भैया चले गए, लेकिन उनकी नजर ने मुझे बदल दिया। अब घर में तनाव था, और मैं सोच रही थी कि ये सब कैसे खत्म होगा।
कुछ दिनों बाद, विक्रम और मैं फिर मिले। इस बार बाहर, एक होटल में। हमने फैसला किया कि घर में नहीं मिलेंगे। लेकिन भैया का चेहरा मेरे दिमाग में था। शाम को घर लौटी, तो भैया इंतजार कर रहे थे। "रिया, बात करनी है," उन्होंने कहा। हम कमरे में गए, और उन्होंने सब कुछ कबूल किया—कि कल से वो मुझे अलग नजर से देख रहे हैं। "तुम्हें नंगे देखकर... मैं खुद को रोक नहीं पाया," उन्होंने कहा। मैं震惊 हुई, लेकिन कहीं अंदर एक अजीब सी उत्तेजना थी।
उस रात मैं सो नहीं पाई। अगले दिन विक्रम आया, और हम फिर करीब हो गए। लेकिन इस बार मेरे दिमाग में भैया थे। हम नंगे थे, एक-दूसरे को छू रहे थे, सेंसेशन से भरपूर। विक्रम की उँगलियाँ मेरी त्वचा पर सरक रही थीं, और मैं आँखें बंद करके महसूस कर रही थी। तभी दरवाजा खुला, भैया अंदर। इस बार वो शामिल होने लगे। विक्रम रुक गया, लेकिन मैंने कुछ नहीं कहा। भैया ने मुझे छुआ, और एक नई भावना उभरी—मिश्रित, कन्फ्यूज्ड लेकिन तीव्र।
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हम तीनों उस पल में खो गए। भैया की छुअन अलग थी, भाई की लेकिन अब कुछ और। विक्रम ने मुझे किस किया, भैया ने मेरी कमर थामी। शरीर की गर्माहट, साँसों की तेजी, हर स्पर्श नया अनुभव दे रहा था। मैं बीच में थी, भावनाओं के तूफान में। ये गलत था, लेकिन रोक नहीं पा रही थी।
उसके बाद कई बार ऐसा हुआ। हर बार नया एहसास—कभी धीमा, कभी तीव्र। भैया की आँखें अब प्यार से भरी थीं, विक्रम की जलन मिट गई थी। हमारा रिश्ता बदल गया, लेकिन घर की दीवारों के अंदर। मैं सोचती हूँ कि ये कैसे शुरू हुआ, लेकिन अब रुकना मुश्किल है।
एक शाम हम फिर साथ थे। कपड़े उतर चुके थे, शरीर जुड़े हुए। भैया ने मुझे गले लगाया, विक्रम ने पीछे से छुआ। सेंसरी ओवरलोड—त्वचा की नरमी, साँसों की गंध, दिल की धड़कन। हर मूवमेंट में इमोशन था—प्यार, डर, उत्तेजना। मैं उस पल में जी रही थी, सब कुछ भूलकर।