बस यात्रा की अनकही चाहत

सुबह की धूप अभी-अभी खिड़की से अंदर आ रही थी, जब मैं अपनी रोज की दिनचर्या में लगा हुआ था। घर का छोटा सा किचन हमेशा की तरह व्यस्त लग रहा था, सीमा चाय बना रही थी और मैं अखबार पढ़ते हुए टेबल पर बैठा था। आज ऑफिस की छुट्टी थी, क्योंकि हमें परिवार के साथ लंबी बस यात्रा पर जाना था, हमारे गाँव में एक रिश्तेदार की शादी के लिए।

पूजा, सीमा की छोटी बहन, जो पिछले कुछ महीनों से हमारे साथ रह रही थी, अपनी पढ़ाई के लिए शहर आई हुई थी। वो कॉलेज की छात्रा थी, उन्नीस साल की, और हमेशा घर में हल्की-फुल्की हँसी-मजाक का माहौल बना देती थी। मैंने उसे कभी बहन से ज्यादा कुछ नहीं समझा था, बस एक परिवार का हिस्सा। नाश्ता करते हुए हम तीनों ने आने वाली यात्रा के बारे में बात की, कि बस कितनी देर चलेगी और रास्ते में क्या-क्या देखने को मिलेगा।

सीमा ने कहा कि वो पूजा को साथ ले जाना चाहती है, ताकि वो भी गाँव की ताजी हवा का मजा ले सके। मैंने हामी भरी, क्योंकि यात्रा लंबी थी और कंपनी अच्छी रहेगी। घर से निकलते वक्त मैंने अपना बैग पैक किया, जिसमें कुछ किताबें और पानी की बोतल थी। पूजा ने अपना छोटा सा पर्स संभाला और हम सब टैक्सी से बस स्टैंड की ओर चल पड़े।

बस स्टैंड पर भीड़ थी, लेकिन हमारी बस समय पर आई। ये एक साधारण सरकारी बस थी, जो शहर से गाँव की ओर जाती थी। हम तीनों ने टिकट लिए और अंदर घुसे। सीटें मिल गईं, मैं और पूजा एक साथ वाली सीट पर बैठे, जबकि सीमा थोड़ी आगे वाली सीट पर। बस चल पड़ी, और शहर की सड़कें पीछे छूटने लगीं।

रास्ता शुरू में शांत था। मैं खिड़की से बाहर देख रहा था, हरे-भरे खेत और दूर पहाड़ दिख रहे थे। पूजा अपने फोन में कुछ देख रही थी, कभी-कभी मुस्कुरा लेती थी। सीमा ने पीछे मुड़कर पूछा कि सब ठीक है न, और हमने हाँ में सर हिलाया। यात्रा के पहले घंटे में हमने घर की बातें कीं, जैसे पूजा की पढ़ाई कैसी चल रही है और सीमा का ऑफिस का काम।

मैंने पूजा से पूछा कि कॉलेज में क्या नया सीख रही हो, और वो उत्साह से बताने लगी। उसकी आवाज में एक मासूमियत थी, जो मुझे हमेशा अच्छी लगती थी। बस की रफ्तार बढ़ी, और बाहर का नजारा बदलने लगा। मैंने महसूस किया कि पूजा की कोहनी कभी-कभी मेरी बाजू से छू जाती थी, लेकिन ये बस यात्रा का हिस्सा था, कुछ खास नहीं।

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दोपहर होने को आई, और बस एक छोटे से ढाबे पर रुकी। हम सब नीचे उतरे, चाय पी और कुछ नाश्ता किया। सीमा थकान की वजह से बोली कि वो बस में सोएगी, और पूजा ने कहा कि वो मेरे साथ बातें करेगी। वापस बस में लौटे, तो सीमा अपनी सीट पर आराम से लेट गई, और मैं और पूजा फिर साथ बैठे।

बस दोबारा चली, और अब रास्ता थोड़ा उबड़-खाबड़ होने लगा। पूजा ने कहा कि उसे नींद नहीं आ रही, तो मैंने उसे अपनी किताब दी। लेकिन वो पढ़ने की बजाय मुझसे बात करने लगी। हमने बचपन की यादें साझा कीं, कैसे सीमा और पूजा बहनें साथ खेलती थीं। मैंने बताया कि शादी के बाद कैसे हमारा जीवन बदला।

धीरे-धीरे बातें गहरी होने लगीं। पूजा ने पूछा कि जीजू, आप कभी अकेलापन महसूस करते हो? मैं चौंका, लेकिन हँसकर बोला कि नहीं, परिवार जो है। लेकिन उसके सवाल में कुछ था, एक अनकही उत्सुकता। बस की हल्की झटकों से हमारा शरीर कभी-कभी एक-दूसरे से सट जाता था, और मैंने महसूस किया कि मेरे मन में एक अजीब सी हलचल है।

मैंने खुद को संभाला, सोचा कि ये सिर्फ यात्रा की थकान है। लेकिन पूजा की नजरें अब मुझ पर टिकी रहती थीं, और वो छोटी-छोटी बातों पर मुस्कुराती थी। बाहर शाम ढलने लगी, और बस की लाइट्स जल गईं। सीमा अभी भी सो रही थी, और हम दोनों चुपचाप बैठे थे।

फिर पूजा ने धीरे से कहा, जीजू, ये यात्रा कितनी लंबी लग रही है न? मैंने हाँ कहा, और उसने अपनी हथेली मेरी हथेली पर रख दी, जैसे सहारा ले रही हो। उस स्पर्श में कुछ था, जो मुझे असहज कर रहा था, लेकिन साथ ही एकPull महसूस हो रहा था। मैंने हाथ नहीं हटाया, बस चुप रहा।

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बस अब अंधेरे रास्ते पर थी, और यात्री कम थे। पूजा का सिर मेरे कंधे पर टिक गया, जैसे नींद आ रही हो। लेकिन उसकी सांसें तेज थीं, और मैं महसूस कर रहा था कि ये नींद नहीं है। मेरे मन में संघर्ष चल रहा था, ये गलत है, वो मेरी साली है, लेकिन शरीर की प्रतिक्रिया कुछ और कह रही थी।

मैंने धीरे से अपना हाथ उसकी कमर पर रखा, सोचा कि अगर वो हटाएगी तो रुक जाऊंगा। लेकिन वो और करीब आ गई। बस की गति स्थिर थी, और चारों ओर अंधेरा। पूजा ने मेरी ओर देखा, उसकी आँखों में एक सवाल था, और मैंने जवाब में उसका हाथ पकड़ लिया।

अब टेंशन बढ़ रही थी। हम दोनों चुप थे, लेकिन हमारे शरीर बोल रहे थे। पूजा की उंगलियाँ मेरी जांघ पर घूमने लगीं, हल्के से। मैंने महसूस किया कि मेरा दिल तेज धड़क रहा है। सीमा अभी भी सो रही थी, और बस में कोई ध्यान नहीं दे रहा था।

पूजा ने कान में फुसफुसाया, जीजू, मुझे डर लग रहा है, लेकिन अच्छा भी। मैंने कहा, शश्श, कुछ मत बोलो। मेरा हाथ अब उसकी कमर से नीचे सरक रहा था, और वो सिहर उठी। ये पल अनकहे थे, लेकिन इतने तीव्र कि रोकना मुश्किल हो रहा था।

बस एक टर्न पर मुड़ी, और हम दोनों और करीब हो गए। पूजा की साड़ी थोड़ी सरक गई, और मैंने उसकी नंगी कमर को छुआ। उसकी त्वचा गर्म थी, और मेरी उंगलियाँ वहाँ रुक गईं। वो मेरी गर्दन पर चुंबन करने लगी, धीरे-धीरे, जैसे कोई सपना हो।

मैंने खुद को रोका, सोचा कि ये गलत है, लेकिन चाहत इतनी मजबूत थी कि मैं आगे बढ़ गया। मेरा हाथ अब उसकी जांघों की ओर गया, और पूजा ने अपनी आँखें बंद कर लीं। बस की सीट के नीचे हमारा ये खेल चल रहा था, छुपकर, लेकिन भावनाओं से भरा।

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पूजा की सांसें तेज हो गईं, और उसने मेरी पैंट पर हाथ रखा। मैं सिहर उठा, और महसूस किया कि अब रुकना नामुमकिन है। बस चलती रही, और हम दोनों इस अनकहे रिश्ते में डूबते चले गए।

अब पल और गहरा होने लगा। पूजा ने अपनी साड़ी थोड़ी ऊपर की, और मैंने अपनी उंगलियाँ उसकी चूत की ओर बढ़ाईं। वो गीली थी, और उसकी सिसकी निकली। मैंने धीरे-धीरे अंदर डाला, महसूस किया उसकी गर्माहट को।

पूजा ने मेरी गर्दन पकड़ी, और कहा, जीजू, और गहरा। बस की हलचल से हमारा हर मूवमेंट синक्रोनाइज हो रहा था। मैंने अपनी उंगलियाँ तेज कीं, और वो कांपने लगी। ये सेंसेशन नया था, डर और उत्तेजना का मिश्रण।

फिर मैंने अपनी पैंट खोली, और पूजा ने मुझे छुआ। उसकी मुट्ठी में मेरा लंड था, और वो उसे सहला रही थी। बस में अंधेरा था, लेकिन हमारा पसीना और सांसें सब बता रही थीं। मैंने उसे अपनी ओर खींचा, और धीरे से अंदर प्रवेश किया।

पूजा की चूत टाइट थी, और बस की झटकों से हर थ्रस्ट गहरा लग रहा था। वो दबी आवाज में कराह रही थी, और मैं उसके होंठों पर हाथ रखे था। हमारा ये मिलन भावनात्मक था, जैसे सालों की दबी इच्छा बाहर आ रही हो।

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हर मिनट नया अनुभव ला रहा था। कभी मैं तेज होता, कभी धीमा, और पूजा की आँखें आंसुओं से भरी थीं, लेकिन खुशी से। बस एक ब्रेक पर रुकी, लेकिन हम रुके नहीं, छुपकर जारी रखा।

फिर चरम पर पहुँचे, जब मैंने उसके अंदर झड़ गया। पूजा ने मुझे कसकर पकड़ा, और हम दोनों सुस्ता गए। बस फिर चली, और हम चुपचाप बैठे रहे, लेकिन अब रिश्ता बदल चुका था।

रात गहराने लगी, और पूजा का सिर मेरे कंधे पर था। मैं सोच रहा था कि ये क्या हो गया, लेकिन पछतावा नहीं था, बस एक नई भावना। सीमा अभी भी सो रही थी, अनजान।

पूजा ने धीरे से कहा, जीजू, ये हमारा राज रहेगा। मैंने हाँ कहा, और हमारी उंगलियाँ फिर जुड़ गईं। बस अपनी मंजिल की ओर बढ़ रही थी, और हमारा सफर अब और लंबा लग रहा था।

अगले पड़ाव पर बस रुकी, और हमने पानी पिया। वापस बैठे, तो पूजा फिर करीब आई। इस बार हमने बातें कीं, लेकिन स्पर्श जारी था। मेरा हाथ उसकी ब्रेस्ट पर गया, और वो सिहर उठी।

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फिर से उत्तेजना बढ़ी, और हमने दोबारा शुरू किया। इस बार पूजा ऊपर आई, बस की सीट पर समंजकर। उसकी चूत ने मुझे घेरा, और हम हिलने लगे। भावनाएँ अब और गहरी थीं, जैसे प्यार और वासना का मेल।

हर थ्रस्ट में नई सेंसेशन, पसीने की महक, सांसों की गर्मी। पूजा की कराहें दबी थीं, लेकिन मेरे कान में गूंज रही थीं। हम चरम पर पहुँचे, और सुकून मिला।

सुबह होने को थी, और गाँव नजदीक आ रहा था। पूजा ने मुझे देखा, उसकी आँखों में संतुष्टि थी। हमने कपड़े ठीक किए, और चुप रहे। बस रुकी, और हम उतरने लगे।

सीमा जागी, और पूछा कि यात्रा कैसी रही। हमने मुस्कुराकर कहा, अच्छी। लेकिन अंदर एक तूफान था, जो शांत नहीं हो रहा था। पूजा का हाथ मेरे हाथ से छुआ, और हम आगे बढ़े।