बस की वो अनकही यात्रा
सुबह की धूप अभी-अभी खिड़की से झांक रही थी जब मैंने अपनी कॉफी का आखिरी घूंट लिया। घर की रसोई में मां खाना पैक कर रही थीं, और पापा अखबार पढ़ते हुए चाय पी रहे थे। हमारा छोटा सा परिवार दिल्ली के एक कोने में रहता है, जहां हर दिन की शुरुआत ऐसी ही होती है – शांत और साधारण।
आज हमें गांव जाना था, दादी की तबीयत ठीक नहीं थी। मैं राहुल, 25 साल का, एक छोटी सी कंपनी में नौकरी करता हूं, और मेरी छोटी बहन नेहा, 22 की, कॉलेज में पढ़ रही है। हम दोनों को बस से जाना था क्योंकि ट्रेन की टिकट नहीं मिली। मां ने हमें नाश्ता पैक किया और कहा कि रास्ते में सावधान रहना।
हम स्टेशन पहुंचे तो बस अभी-अभी आई थी। नेहा ने अपना बैग उठाया और मैंने अपना, हम दोनों ने सीट ली। बस में भीड़ कम थी, सुबह का समय जो था। नेहा खिड़की वाली सीट पर बैठ गई और मैं उसके बगल में। रास्ता लंबा था, कम से कम 8 घंटे का।
बस चल पड़ी तो नेहा ने अपना फोन निकाला और गाने सुनने लगी। मैंने किताब खोली, लेकिन ध्यान नहीं लग रहा था। हमारा परिवार हमेशा से करीब रहा है, नेहा और मैं बचपन से साथ खेलते आए हैं। अब बड़े हो गए हैं, लेकिन वो भाई-बहन का रिश्ता वैसा ही है – भरोसे और प्यार भरा।
रास्ते में हम बातें करने लगे। नेहा ने कॉलेज की कहानियां सुनाई, कैसे उसकी सहेलियां प्लान बना रही हैं ट्रिप का। मैंने अपनी नौकरी के बारे में बताया, बॉस की डांट और वीकेंड की छुट्टियां। हंसी-मजाक में समय कट रहा था। बाहर खेत और पेड़ दौड़ रहे थे, हवा ठंडी लग रही थी।
दोपहर हुई तो बस एक ढाबे पर रुकी। हमने खाना खाया, नेहा ने चाय मांगी। वापस बस में बैठे तो भीड़ थोड़ी बढ़ गई थी। नेहा मेरे कंधे पर सिर टिका कर सोने की कोशिश करने लगी। मैंने उसे सहारा दिया, बचपन की तरह। लेकिन अब वो बच्ची नहीं थी, उसकी सांसें मेरे कंधे पर महसूस हो रही थीं।
मैंने खुद को झिड़का, क्या सोच रहा हूं। नेहा मेरी बहन है, हमेशा से। लेकिन रास्ता लंबा था, और बस की झटके हमें बार-बार करीब ला रहे थे। नेहा की आंखें बंद थीं, लेकिन मुझे लग रहा था वो जाग रही है। मैंने उसका हाथ पकड़ा, सिर्फ सहारे के लिए।
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शाम ढलने लगी, बस की लाइट्स जल गईं। नेहा उठी और मुस्कुराई, "भैया, थक गए क्या?" मैंने हंस कर कहा, "नहीं, तू आराम कर।" हमने पैक किया खाना निकाला और साथ खाया। बातों में पुरानी यादें आईं, कैसे हम छत पर खेलते थे। लेकिन आज कुछ अलग था, एक अनकही चुप्पी।
रात हो गई, बस अंधेरे रास्तों से गुजर रही थी। नेहा ने अपना शॉल ओढ़ा और मेरी तरफ सरक आई। "ठंड लग रही है," उसने कहा। मैंने अपना जैकेट उसे दे दिया। उसकी उंगलियां मेरी उंगलियों से छू गईं, और एक पल के लिए सब रुक सा गया। मैंने सोचा, ये क्या हो रहा है?
मेरा मन उलझ रहा था। नेहा मेरी छोटी बहन है, लेकिन वो अब एक जवान लड़की है। उसकी मुस्कान, उसकी बातें, सब कुछ मुझे अजीब सा लग रहा था। मैंने खुद को समझाया कि ये सिर्फ यात्रा की थकान है। लेकिन नेहा की आंखों में कुछ था, एक सवाल सा।
बस एक टर्न पर झटका खाई, और नेहा मेरी गोद में गिर पड़ी। मैंने उसे संभाला, उसके बाल मेरे चेहरे पर लगे। "सॉरी भैया," उसने धीरे से कहा। लेकिन वो उठी नहीं, बस वैसे ही रही। मेरा दिल तेज धड़क रहा था, ये गलत है, लेकिन रोक नहीं पा रहा था।
अंधेरे में हमारी सांसें मिल रही थीं। नेहा ने अपना हाथ मेरे सीने पर रखा, जैसे डर रही हो। मैंने उसे कस कर पकड़ा। धीरे-धीरे उसकी उंगलियां मेरी शर्ट के बटन पर घूमने लगीं। मैंने कुछ नहीं कहा, बस महसूस किया। ये पल अनकहे थे, लेकिन गहरे।
बस की स्पीड कम हुई, बाहर बारिश शुरू हो गई। नेहा ने मेरे कान में फुसफुसाया, "भैया, मुझे डर लग रहा है।" मैंने कहा, "मैं हूं ना।" उसकी गर्माहट मुझे घेर रही थी। हमारी नजरें मिलीं, और एक अनजानी चाहत उभरी। ये रिश्ता अब बदल रहा था, धीरे-धीरे।
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मैंने अपना हाथ उसकी कमर पर रखा, सहारे के बहाने। नेहा ने विरोध नहीं किया, बल्कि और करीब आ गई। बस की सीटों के बीच हमारा संसार था, जहां दुनिया की नजरें नहीं पहुंचतीं। मेरा मन संघर्ष कर रहा था, लेकिन शरीर सुन नहीं रहा था।
बारिश तेज हो गई, बस रुक-रुक कर चल रही थी। नेहा ने मेरी गर्दन पर अपना चेहरा छुपाया। उसकी सांसें गर्म थीं, मेरी त्वचा पर। मैंने उसके बालों में उंगलियां फेर दीं। ये स्पर्श नया था, लेकिन इतना सही लग रहा था।
धीरे से नेहा ने अपना चेहरा ऊपर किया, उसकी आंखें चमक रही थीं। "भैया, क्या ये गलत है?" उसने पूछा। मैंने जवाब नहीं दिया, बस उसे चूम लिया। होंठ मिले, और सब कुछ बदल गया। वो चुंबन लंबा था, भावनाओं से भरा।
बस फिर चली, लेकिन हम रुके नहीं। नेहा की उंगलियां मेरी शर्ट खोलने लगीं। मैंने उसे रोका नहीं। अंधेरे में हम एक-दूसरे को छू रहे थे, धीरे-धीरे। उसकी त्वचा नरम थी, मेरे हाथ कांप रहे थे।
नेहा ने मेरे कान में कहा, "मैं तुम्हारी हूं, भैया।" वो शब्द मुझे और उत्तेजित कर गए। मैंने उसकी कमीज ऊपर की, उसके स्तनों को छुआ। वो सिहर उठी, लेकिन करीब आई। हमारी सांसें तेज थीं, बस की आवाज उन्हें दबा रही थी।
मैंने उसे अपनी गोद में बिठाया, सीट की आड़ में। नेहा ने अपनी पैंट नीचे सरकाई। मेरा हाथ उसकी जांघों पर गया, गर्म और नम। वो कराह उठी, लेकिन धीरे से। ये पल जादुई था, डर और उत्साह से भरा।
धीरे-धीरे मैंने खुद को उसके अंदर महसूस किया। नेहा की आंखें बंद थीं, उसका चेहरा लाल। बस के झटके हमारे साथ थे, हर धक्का हमें और करीब ला रहा था। मैंने उसके कानों में फुसफुसाया, "तुम कितनी खूबसूरत हो।"
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नेहा ने मेरे कंधे पर दांत गड़ा दिए, दर्द को छुपाने के लिए। हमारा मिलन धीमा था, लेकिन गहरा। हर पल में नई संवेदना थी, उसकी गर्माहट मुझे घेर रही थी। मैंने उसके स्तनों को चूमा, वो सिहरती रही।
बाहर बारिश थम गई, लेकिन हमारी दुनिया में तूफान था। नेहा की सांसें तेज हो गईं, वो मेरे नाम पुकार रही थी। मैंने गति बढ़ाई, उसके साथ। वो पल आया जब सब कुछ फूट पड़ा, हम एक हो गए।
उसके बाद हम चुपचाप बैठे रहे, एक-दूसरे को थामे। नेहा ने मेरे सीने पर सिर रखा, उसकी आंखों में आंसू थे। "ये हमारा राज है," उसने कहा। मैंने हामी भरी, लेकिन मन में उथल-पुथल थी।
बस गांव के करीब पहुंच रही थी, सुबह होने वाली थी। नेहा सो गई, लेकिन मैं जागता रहा। ये यात्रा कभी न भूलने वाली थी, हमारे रिश्ते को बदल देने वाली। क्या ये सही था? पता नहीं, लेकिन वो पल सच्चे थे।
दादी के घर पहुंचे तो सब सामान्य लग रहा था। नेहा ने मुस्कुरा कर मां से बात की, लेकिन हमारी नजरें मिलीं तो वो राज छुपा था। दिन गुजरे, लेकिन रातें अलग थीं। हम चुपके मिलते, वो स्पर्श दोहराते।
एक रात नेहा मेरे कमरे में आई, दरवाजा बंद किया। "भैया, मैं रोक नहीं पा रही," उसने कहा। मैंने उसे बाहों में लिया, फिर से वो आग जली। इस बार बिस्तर पर, धीरे-धीरे। उसके शरीर की हर रेखा मैंने महसूस की।
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नेहा ने मेरे ऊपर चढ़ कर नियंत्रण लिया, उसकी आंखें चमक रही थीं। मैंने उसके कूल्हों को पकड़ा, गति के साथ। वो कराह रही थी, मेरे नाम से। ये नया अनुभव था, उसकी ताकत मुझे हैरान कर रही थी।
हमने रात भर प्यार किया, अलग-अलग तरीकों से। कभी मैं ऊपर, कभी वो। हर बार नई भावना, नया स्पर्श। नेहा की मुस्कान में संतुष्टि थी, मेरे मन में प्यार। लेकिन सुबह होने पर डर लगता था।
गांव में रहते हुए हम सावधान रहते, लेकिन मौका मिलते ही मिल जाते। एक बार खेत में, दोपहर की धूप में। नेहा ने मुझे पेड़ के पीछे खींचा, और वहां हमने फिर से वो जादू किया। हवा में उसकी खुशबू, मेरी सांसों में।
वापसी की बस में फिर वही हुआ। इस बार हम तैयार थे, अंधेरे का इंतजार किया। नेहा ने मेरी गोद में सरक कर बैठी, और हमने यात्रा को यादगार बनाया। उसके होंठ मेरे होंठों पर, हाथ मेरे शरीर पर।
हर धक्के के साथ हमारी लय मिलती, नेहा की आंखें बंद। मैंने उसके कान में कहा, "तुम मेरी जिंदगी हो।" वो मुस्कुराई, और हम चरम पर पहुंचे, साथ। बस की सीट अब हमारा बिस्तर थी।
शहर पहुंचे तो सब सामान्य, लेकिन हम बदल चुके थे। नेहा का स्पर्श अब मेरी आदत था, उसकी मुस्कान मेरा राज। रातें अब लंबी लगतीं, उसके बिना।
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एक शाम नेहा ने कहा, "भैया, क्या हम ये जारी रख सकते हैं?" मैंने हां कहा, लेकिन मन में सवाल थे। समाज, परिवार, सब कुछ। लेकिन उस पल में सिर्फ हम थे, एक-दूसरे में खोए।
हमने फिर मिलन किया, इस बार घर की छत पर। चांदनी रात में नेहा नंगी मेरे सामने, उसकी त्वचा चमक रही थी। मैंने उसे चूमा, हर जगह। वो सिहरती रही, मेरे नाम पुकारती।
हमारा प्यार अब गहरा था, हर सीन में नई गहराई। नेहा ने मेरे शरीर को छुआ, जैसे अपना समझ कर। मैंने उसे उठाया, दीवार से सटा कर। वो चीखी, लेकिन खुशी से।
समय गुजरता गया, लेकिन वो बस की यात्रा हमेशा याद आती। नेहा अब मेरी जिंदगी का हिस्सा थी, अलग तरीके से। हम सावधान रहते, लेकिन प्यार नहीं रोकते।
एक रात हम फिर बस में थे, किसी और यात्रा पर। नेहा ने मेरी आंखों में देखा, और वो राज फिर जागा। अंधेरे में उसने अपना हाथ मेरे पर रखा, धीरे से। मैंने उसे करीब खींचा, और