ट्रेन की वो अनकही चाहत
सुबह की धूप अभी-अभी मेरे कमरे में झांक रही थी, जब मैंने अपनी अलार्म घड़ी बंद की। रोज की तरह, मैं रिया शर्मा, दिल्ली हाई कोर्ट में प्रैक्टिस करने वाली एक वकील, अपना दिन शुरू करने के लिए उठी। आज का दिन थोड़ा अलग था क्योंकि मुझे एक केस के सिलसिले में लखनऊ जाना था। मैंने जल्दी से कॉफी बनाई, अपने पति अजय को गुड मॉर्निंग मैसेज किया जो काम के सिलसिले में मुंबई में थे, और फिर अपना सूटकेस पैक किया। बाहर की हल्की ठंडी हवा मुझे तरोताजा कर रही थी, जैसे हर सुबह करती है।
स्टेशन पर पहुंचकर मैंने अपनी ट्रेन की टिकट चेक की। एसी कोच में सीट मिली थी, जो अच्छा था क्योंकि सफर लंबा था। प्लेटफॉर्म पर लोग इधर-उधर भागते हुए नजर आ रहे थे, चाय की दुकान से उठती भाप और कुलियों की आवाजें सब कुछ सामान्य लग रहा था। मैंने अपनी सीट पर बैठकर अपना लैपटॉप खोला और केस की फाइल्स पढ़ने लगी। काम में डूब जाना मेरी आदत थी, खासकर जब घर से दूर होती हूं।
ट्रेन चल पड़ी और धीरे-धीरे शहर की हलचल पीछे छूट गई। मैं तीस साल की हूं, शादी को पांच साल हो चुके हैं, लेकिन अजय की व्यस्तता के कारण हमारा जीवन रूटीन में बंधा हुआ सा लगता है। मेरे माता-पिता लखनऊ में रहते हैं, और इस सफर का एक मकसद उनसे मिलना भी था। मैंने खिड़की से बाहर देखा, जहां खेत और गांव गुजर रहे थे, और सोचा कि जीवन कितना तेज भागता है।
कुछ देर बाद, मेरी बगल वाली सीट पर एक आदमी आकर बैठा। उसने हल्के से मुस्कुराकर पूछा, "क्या ये सीट खाली है?" मैंने हां में सिर हिलाया और अपनी फाइल्स में फिर से ध्यान लगाया। वो शायद मेरी उम्र का था, साफ-सुथरा सूट पहने हुए, और लग रहा था कि कोई प्रोफेशनल है। मैंने ज्यादा ध्यान नहीं दिया, क्योंकि काम महत्वपूर्ण था।
ट्रेन की रफ्तार बढ़ी और बाहर का नजारा बदलने लगा। मैंने अपनी कॉफी का थर्मस निकाला और एक घूंट लिया। वो आदमी, जिसका नाम बाद में पता चला अक्षय था, अपनी किताब पढ़ रहा था। कभी-कभी हमारी नजरें मिलतीं, लेकिन मैं जल्दी से अपनी फाइल्स पर लौट आती। दोपहर का समय हो रहा था, और ट्रेन में हल्की-हल्की नींद आने लगी थी।
खाने के समय जब वेंडर आया, तो मैंने कुछ सैंडविच ऑर्डर किए। अक्षय ने भी वही लिया और हंसकर कहा, "ट्रेन का खाना हमेशा एक एडवेंचर होता है, है न?" मैंने मुस्कुराकर जवाब दिया, "हां, लेकिन भूख लगी हो तो सब चलता है।" हमारी बातचीत शुरू हुई, छोटी-छोटी चीजों पर। वो दिल्ली में ही काम करता था, एक आईटी फर्म में, और लखनऊ अपने परिवार से मिलने जा रहा था।
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बातें करते-करते समय बीतने लगा। मैंने उसे बताया कि मैं वकील हूं, और आज का केस कितना चुनौतीपूर्ण था। अक्षय ने ध्यान से सुना, और उसकी आंखों में एक तरह की रुचि नजर आई। मैंने महसूस किया कि वो बात करने में कितना सहज था, जैसे पुराने दोस्त हों। बाहर शाम ढल रही थी, और ट्रेन की लाइट्स जल गईं।
रात होने लगी थी, और कोच में सन्नाटा छा गया। ज्यादातर यात्री सो चुके थे। मैंने अपनी सीट पर कंबल ओढ़ा और लेट गई, लेकिन नींद नहीं आ रही थी। अक्षय भी जाग रहा था, और कभी-कभी हम फुसफुसाकर बात करते। उसने पूछा, "कभी ट्रेन में इतना लंबा सफर किया है अकेले?" मैंने कहा, "हां, लेकिन आज कुछ अलग लग रहा है।" मेरे मन में एक अजीब सी बेचैनी थी, जैसे कुछ होने वाला हो।
ट्रेन की झूलती हुई गति में हमारी बातें गहराने लगीं। अक्षय ने अपनी जिंदगी के बारे में बताया, कैसे उसकी शादी टूट चुकी थी और अब वो अकेला महसूस करता है। मैंने भी अपने रिश्ते की सच्चाई शेयर की, कि अजय हमेशा व्यस्त रहते हैं और हमारा जीवन रूटीन बन गया है। उसकी आवाज में एक गर्माहट थी, जो मुझे छू रही थी।
रात गहराती गई, और कोच की लाइट्स धीमी हो गईं। हमारी सीट्स पास-पास थीं, और बात करते-करते हमारी उंगलियां छू गईं। मैंने झटके से हाथ पीछे खींचा, लेकिन मन में एक तरंग दौड़ गई। अक्षय ने धीरे से कहा, "रिया, तुम्हारी आंखों में कुछ है जो मुझे खींच रहा है।" मैं चुप रही, लेकिन मेरे दिल की धड़कन तेज हो गई।
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मैंने खुद को संभाला और कहा, "ये सही नहीं है, अक्षय। हम दोनों शादीशुदा हैं।" लेकिन मेरी आवाज में विश्वास की कमी थी। वो करीब आया, और उसकी सांसें मेरे चेहरे पर महसूस हुईं। ट्रेन की गति जैसे हमारी भावनाओं को और तेज कर रही थी। मैंने विरोध किया, लेकिन मन में एक चाहत जाग रही थी, जो लंबे समय से दबी हुई थी।
उसकी उंगलियां मेरे हाथ पर रुकीं, और मैंने उन्हें नहीं हटाया। हमारी नजरें मिलीं, और उस पल में सब कुछ बदल गया। अक्षय ने धीरे से मेरे कंधे पर हाथ रखा, और मैंने आंखें बंद कर लीं। ट्रेन की अंधेरी रात में, हमारा संसार सिर्फ हम दोनों का हो गया।
उसकी स्पर्श ने मुझे एक नई दुनिया में ले जाना शुरू किया। मैंने महसूस किया कि मेरे शरीर में एक आग सुलग रही थी, जो सालों से शांत थी। अक्षय ने मेरे कान में फुसफुसाया, "रिया, क्या तुम भी यही महसूस कर रही हो?" मैंने हां में सिर हिलाया, और उसने मुझे अपनी ओर खींच लिया। हमारी होंठ मिले, और वो चुंबन इतना गहरा था कि समय रुक सा गया।
ट्रेन की कंपन के साथ हमारा शरीर एक लय में बहने लगा। मैंने उसके शर्ट के बटन खोले, और उसकी छाती पर हाथ फेरा। वो गर्म था, मजबूत, और उसकी हर हरकत में एक स्नेह था। मैंने खुद को उसके हवाले कर दिया, और वो धीरे-धीरे मेरे ब्लाउज को खोलने लगा। मेरी सांसें तेज हो गईं, और मन में एक संघर्ष था, लेकिन चाहत जीत रही थी।
हमारी सीट पर कंबल के नीचे, हम एक-दूसरे में खो गए। अक्षय की उंगलियां मेरे शरीर पर नाच रही थीं, हर स्पर्श एक नई संवेदना पैदा कर रहा था। मैंने उसके कंधे पर सिर रखा और फुसफुसाया, "धीरे, कोई देख न ले।" लेकिन ट्रेन की रात हमारी थी, और हमारी भावनाएं उफान पर थीं।
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उसने मुझे अपनी गोद में उठाया, और हमारी बॉडीज एक हो गईं। वो पल इतना तीव्र था कि मैं अपनी सारी चिंताएं भूल गई। हर धक्के के साथ एक नई खुशी मिल रही थी, जैसे सालों की प्यास बुझ रही हो। अक्षय की आंखों में मेरे लिए एक गहरा लगाव था, और मैंने खुद को पूरी तरह खोल दिया।
समय बीतता गया, और हमारी सांसें मिलकर एक हो गईं। ट्रेन की गति जैसे हमारी रिदम से मैच कर रही थी। मैंने महसूस किया कि ये सिर्फ शारीरिक नहीं था, बल्कि भावनात्मक भी। अक्षय ने मेरे माथे पर चुंबन किया और कहा, "रिया, ये पल हमेशा याद रहेगा।"
रात और गहरा गई, और हम थककर एक-दूसरे की बाहों में लेटे रहे। बाहर अंधेरा था, लेकिन मेरे मन में एक नई रोशनी थी। मैंने सोचा कि जीवन में कभी-कभी ऐसे मोड़ आते हैं जो सब बदल देते हैं। अक्षय की सांसें मेरे कानों में गूंज रही थीं, और मैंने आंखें बंद कर लीं।
सुबह होने से पहले, ट्रेन एक स्टेशन पर रुकी। हमने एक-दूसरे को देखा, और बिना शब्दों के अलविदा कहा। लेकिन वो पल, वो चाहत, हमेशा मेरे साथ रहेगी। मैंने अपनी सीट संभाली और बाहर देखा, जहां नई सुबह शुरू हो रही थी।
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लखनऊ पहुंचकर मैंने अपना काम निपटाया, लेकिन मन कहीं और था। शाम को जब मैं घर लौटी, अजय का मैसेज आया, लेकिन मेरी सोच अक्षय के पास थी। जीवन की ये अनकही चाहतें कितनी अजीब होती हैं।
कुछ दिन बाद, मुझे अक्षय का कॉल आया। हमने बात की, और वो पुराने पल फिर जिंदा हो गए। मैंने फैसला किया कि ये रिश्ता जारी रखूंगी, क्योंकि इसमें एक सच्चाई थी जो मेरे जीवन में缺 रही थी।
फिर एक बार हम मिले, इस बार होटल में। वो रात और भी गहरी थी, हमारी भावनाएं और मजबूत। अक्षय ने मुझे बाहों में भरा, और हम फिर से एक हो गए। हर स्पर्श में नई गहराई थी, हर चुंबन में नया अर्थ।
मैंने महसूस किया कि ये सिर्फ बेताबी नहीं थी, बल्कि एक गहरा कनेक्शन। ट्रेन की वो रात हमारे जीवन का टर्निंग पॉइंट बन गई थी। अब हमारी मुलाकातें जारी हैं, और हर बार कुछ नया अनुभव मिलता है।
आज रात, जब मैं अकेली लेटी हूं, वो यादें फिर से जागती हैं। अक्षय की स्पर्श, उसकी गर्माहट, सब कुछ इतना जीवंत लगता है। मैं जानती हूं कि ये गलत है, लेकिन मन नहीं मानता।
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हमारी अगली मुलाकात में, हमने और समय बिताया। बातों से शुरू होकर, हम फिर से उस दुनिया में खो गए। उसकी उंगलियां मेरे बालों में, मेरी सांसें उसकी छाती पर। हर पल एक नई कहानी बुन रहा था।
ट्रेन की वो बेताबी अब हमारी जिंदगी का हिस्सा बन गई है। मैं रिया, एक वकील, लेकिन अब एक औरत जो अपनी चाहतों को जी रही है। अक्षय के साथ हर पल में नई खुशी मिलती है, और मैं खुद को रोक नहीं पाती।
रात गहराती है, और मैं उसकी याद में खो जाती हूं। उसकी बाहें, उसका स्पर्श, सब कुछ इतना करीब लगता है। जीवन की ये अनकही चाहतें हमें कहां ले जाती हैं, पता नहीं।
लेकिन अभी, इस पल में, मैं बस उसकी बाहों में होना चाहती हूं, ट्रेन की तरह बहते हुए, बिना रुके।