बस की यात्रा में छिपी चाहत

सुबह की धुंधली रोशनी में मैं घर से निकला था। आज का दिन वैसा ही था जैसा रोज का होता है—ऑफिस की हड़बड़ी, नाश्ता करते हुए नेहा से दो-चार बातें, और फिर बस स्टैंड की ओर। नेहा की छोटी बहन प्रिया भी हमारे साथ थी, क्योंकि वह कुछ दिनों के लिए हमारे घर आई हुई थी। हम तीनों को शहर से बाहर एक फैमिली फंक्शन में जाना था, इसलिए बस से यात्रा तय की थी।

बस स्टैंड पर पहुंचते ही भीड़ नजर आई। मैंने टिकट लिए और हम तीनों बस में चढ़ गए। नेहा आगे की सीट पर बैठ गई, क्योंकि उसे खिड़की वाली जगह पसंद है। प्रिया मेरे बगल में बैठी, और मैंने अपना बैग ऊपर की रैक पर रख दिया। बस चल पड़ी, और शहर की सड़कें पीछे छूटने लगीं।

मैं रोहन हूं, तीस साल का, एक सॉफ्टवेयर कंपनी में काम करता हूं। नेहा से मेरी शादी को तीन साल हो चुके हैं, और हमारा जीवन काफी संतुलित है। प्रिया उन्नीस साल की है, कॉलेज में पढ़ती है, और नेहा से काफी मिलती-जुलती है—वही हंसमुख स्वभाव, वही मुस्कान। वह हमारे घर आती रहती है, और हम सब अच्छे से घुलमिल जाते हैं।

बस की यात्रा लंबी थी, कम से कम चार घंटे की। नेहा ने अपना फोन निकाला और गाने सुनने लगी, जबकि प्रिया ने किताब खोल ली। मैं खिड़की से बाहर देख रहा था, सोच रहा था कि फंक्शन में क्या-क्या होगा। प्रिया ने अचानक किताब बंद की और मुझसे पूछा, "जीजू, आपको ये यात्राएं पसंद हैं?"

मैंने मुस्कुराकर कहा, "हां, प्रिया, कभी-कभी अच्छा लगता है। शहर की भागदौड़ से दूर।" वह हंसी और बोली, "मुझे तो बस में सफर करना बहुत मजेदार लगता है। नेहा दीदी हमेशा सो जाती हैं।" नेहा ने पीछे मुड़कर कहा, "अरे, मैं सो नहीं रही, बस आराम कर रही हूं।"

जैसे-जैसे बस आगे बढ़ी, सड़कें संकरी होने लगीं। बाहर खेत और पेड़ नजर आ रहे थे। प्रिया ने अपना सिर सीट पर टिका लिया और आंखें बंद कर लीं। मैंने उसे देखा, उसका चेहरा शांत था, जैसे कोई चिंता नहीं। नेहा अब सच में सो गई थी, उसकी सांसें नियमित हो चुकी थीं।

मैंने अपना ध्यान बाहर की ओर लगाया, लेकिन मन में कुछ उथल-पुथल थी। प्रिया हमारे घर में रहते हुए काफी करीब आ गई थी। वह नेहा से अपनी पढ़ाई की बातें शेयर करती, और कभी-कभी मुझसे भी सलाह लेती। लेकिन आज बस में उसके इतने पास बैठना कुछ अलग सा लग रहा था।

बस एक झटके से रुकी, शायद कोई चेकपोस्ट था। प्रिया की आंखें खुलीं और वह मेरी ओर मुड़ी। "जीजू, कितना समय लगेगा?" उसने पूछा। मैंने कहा, "शायद आधा घंटा और। थक गई क्या?" वह मुस्कुराई और बोली, "नहीं, बस ऐसे ही।"

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फिर से बस चली, और अब शाम होने लगी थी। रोशनी कम हो रही थी, और बस के अंदर का माहौल शांत था। प्रिया ने अपना हाथ मेरे हाथ के पास रख दिया, शायद अनजाने में। मैंने उसे महसूस किया, लेकिन कुछ नहीं कहा। मन में एक अजीब सी हलचल थी, जैसे कोई पुरानी याद जाग रही हो।

नेहा अभी भी सो रही थी। प्रिया ने धीरे से कहा, "जीजू, आपको नेहा दीदी से मिलकर कैसा लगा था पहली बार?" मैं चौंका, लेकिन जवाब दिया, "बहुत अच्छा, प्रिया। वह मेरी जिंदगी बदल दी।" वह हंसी और बोली, "आप दोनों बहुत अच्छे लगते हो साथ में।"

बातें करते-करते समय बीत रहा था। प्रिया की आंखों में कुछ था, जैसे कोई अनकही बात। मैंने सोचा कि शायद वह अपनी जिंदगी के बारे में सोच रही है। बस अब हाईवे पर थी, और स्पीड तेज हो गई थी। बाहर अंधेरा छा रहा था।

अचानक प्रिया ने अपना सिर मेरे कंधे पर टिका दिया। "जीजू, थोड़ा आराम कर लूं?" उसने पूछा। मैंने हामी भरी, लेकिन दिल की धड़कन तेज हो गई। नेहा अब भी सो रही थी, और बस में बाकी यात्री अपने-अपने में व्यस्त थे।

उसका सिर मेरे कंधे पर था, और उसकी सांसें मेरी गर्दन को छू रही थीं। मैंने खुद को संभाला, सोचा कि यह सामान्य है। लेकिन मन में एक संघर्ष था—वह मेरी साली है, नेहा की बहन। फिर भी, उसकी निकटता कुछ जगा रही थी।

बस एक टर्न पर मुड़ी, और प्रिया का हाथ मेरी जांघ पर गिर गया। वह हिली नहीं, शायद सो गई थी। मैंने उसे हटाने की कोशिश नहीं की, बस महसूस किया। दिल में एक अपराधबोध था, लेकिन साथ ही एक आकर्षण भी।

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समय बीतता गया, और अब बस में रोशनी कम थी। प्रिया की आंखें खुलीं, और वह मेरी ओर देखी। "जीजू, सॉरी," उसने धीरे से कहा। मैंने कहा, "कोई बात नहीं।" लेकिन उसकी नजरें कुछ कह रही थीं, जैसे कोई राज।

नेहा अब जाग गई थी। "कितना समय और?" उसने पूछा। मैंने कहा, "बस पहुंचने वाला है।" प्रिया सीधी होकर बैठ गई, लेकिन उसकी उंगलियां मेरी उंगलियों को छू रही थीं। मैंने कुछ नहीं कहा, बस महसूस किया।

फंक्शन खत्म होने के बाद हम वापस बस से लौट रहे थे। इस बार रात थी, और बस लगभग खाली थी। नेहा थक गई थी, तो वह पीछे की सीट पर लेट गई। प्रिया फिर मेरे बगल में बैठी। "जीजू, आज मजा आया," उसने कहा।

मैंने हां में सिर हिलाया। बस चल पड़ी, और अंधेरे में सड़कें धुंधली लग रही थीं। प्रिया ने अपना हाथ मेरे हाथ पर रख दिया। "जीजू, आप बहुत अच्छे हो," उसने धीरे से कहा। मैं चौंका, लेकिन कुछ बोला नहीं।

उसकी उंगलियां मेरी उंगलियों से खेल रही थीं। मन में तूफान था—यह गलत है, लेकिन रोक नहीं पा रहा था। नेहा पीछे सो रही थी, और बस की गति स्थिर थी। प्रिया मेरे करीब सरकी, उसका शरीर मेरे शरीर को छू रहा था।

मैंने उसकी ओर देखा, उसकी आंखों में इच्छा थी। "प्रिया, यह..." मैंने कहना चाहा, लेकिन वह चुप करा दी। उसने अपना चेहरा मेरे चेहरे के पास लाया, और धीरे से मेरे होंठों को छुआ। दिल की धड़कन तेज थी, जैसे कोई बांध टूट रहा हो।

बस की हल्की कंपन में हमारा चुंबन गहरा होता गया। उसकी सांसें गर्म थीं, और मैं खुद को खो रहा था। नेहा पीछे थी, लेकिन खतरा उत्तेजना बढ़ा रहा था। प्रिया ने अपना हाथ मेरी कमीज के अंदर डाला, मेरी छाती को सहलाया।

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मैंने उसे रोका नहीं। उसकी उंगलियां नीचे सरकीं, और मैंने महसूस किया उसकी गर्माहट। बस चल रही थी, और बाहर अंधेरा था। हम दोनों की सांसें मिल रही थीं, जैसे कोई पुराना सपना सच हो रहा हो।

प्रिया ने अपनी स्कर्ट ऊपर की, और मैंने अपना हाथ उसकी जांघों पर रखा। वह कांप रही थी, लेकिन आंखें बंद करके मुस्कुरा रही थी। मैंने धीरे से उसकी पैंटी को छुआ, और वह सिहर उठी। "जीजू," उसने फुसफुसाया।

बस की गति में हमारा मिलन शुरू हुआ। मैंने खुद को उसके अंदर महसूस किया, धीरे-धीरे। उसकी दीवारें गर्म थीं, और हर धक्के के साथ एक नई लहर उठती। प्रिया ने मेरे कंधे पर सिर रखा, और दबे स्वर में सिसकियां लीं।

उसकी चूत की नमी मेरी उंगलियों पर थी, और मैंने गहराई तक छुआ। वह कसकर पकड़ ली, जैसे डर रही हो लेकिन चाह रही हो। बस एक झटके से मुड़ी, और हम दोनों का संतुलन बिगड़ा, लेकिन उत्तेजना और बढ़ गई।

मैंने अपना लंड बाहर निकाला, और वह उसे सहलाने लगी। उसकी मुट्ठी में वह सख्त हो गया। फिर धीरे से वह मेरे ऊपर सरकी, और बस की सीट पर हम एक हो गए। उसकी चूत ने मुझे घेर लिया, गर्म और गीली।

हर धक्के के साथ बस की कंपन मिल रही थी, जैसे सब कुछ सिंक्रोनाइज्ड हो। प्रिया की सांसें तेज थीं, और मैंने उसके स्तनों को दबाया। वह कराह उठी, लेकिन आवाज दबा ली। नेहा अभी भी सो रही थी, अनजान।

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उसकी चूत की दीवारें कस रही थीं, और मैं गहराई तक जा रहा था। एक नई भावना थी—डर, अपराध, लेकिन साथ ही पूर्णता। प्रिया ने मेरे कान में फुसफुसाया, "जीजू, और तेज।" मैंने गति बढ़ाई, और बस की रोशनी में उसका चेहरा चमक रहा था।

क्लाइमेक्स नजदीक था। उसकी चूत ने मुझे कस लिया, और मैंने खुद को उसके अंदर छोड़ दिया। हम दोनों कांप रहे थे, सांसें मिली हुईं। बस अभी भी चल रही थी, जैसे कुछ हुआ ही न हो।

प्रिया ने अपना सिर मेरी छाती पर रखा, और हम चुप रहे। दिल में एक शांति थी, लेकिन साथ ही एक सवाल। नेहा जागी नहीं, और बस अपनी मंजिल की ओर बढ़ रही थी।

उस रात के बाद, प्रिया की नजरें बदल गईं। अगले दिन घर लौटकर, नेहा किचन में व्यस्त थी। प्रिया ने मुझसे कहा, "जीजू, कल की यात्रा याद रहेगी।" मैंने मुस्कुराया, लेकिन मन में संघर्ष था।

शाम को हम तीनों बैठे थे। प्रिया मेरे पास आई, और नेहा के बाहर जाते ही उसने मुझे छुआ। "जीजू, क्या हम फिर?" उसने पूछा। मैंने हामी भरी, और हम कमरे में चले गए।

इस बार घर में, लेकिन वही उत्तेजना। प्रिया ने अपने कपड़े उतारे, और मैंने उसकी चूत को फिर से छुआ। वह गीली थी, तैयार। मैंने उसे बिस्तर पर लिटाया, और धीरे से प्रवेश किया।

उसकी सिसकियां कमरे में गूंजीं, और मैंने गति बढ़ाई। हर धक्के में एक नई गहराई थी, जैसे हमारा रिश्ता बदल रहा हो। प्रिया ने मुझे कसकर पकड़ा, और क्लाइमेक्स में हम एक हो गए।

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लेकिन बस की याद अभी भी ताजा थी। अगली यात्रा में फिर वही हुआ। बस चल रही थी, नेहा सो रही थी, और प्रिया मेरे साथ। उसकी चूत की चुदाई अब एक आदत सी बन गई थी, हर बार नई भावना के साथ।

एक बार बस रुकी, और हम बाहर निकले। लेकिन वापसी में फिर वही। प्रिया की आंखों में वही चाहत, और मैं खुद को रोक नहीं पाया। बस की सीट पर, अंधेरे में, हमारा मिलन जारी रहा।

उसकी चूत गर्म थी, और मैं गहराई तक गया। सेंसेशन अलग था—बस की कंपन, बाहर की हवा, सब मिलकर एक अनोखा अनुभव दे रहे थे। प्रिया ने मेरे होंठ चूमे, और हम दोनों खो गए।

अब हर यात्रा में यही होता। नेहा अनजान, और हमारा राज सुरक्षित। प्रिया की चूत की मिठास मुझे खींचती, और मैं हर बार समर्पित होता।

एक रात, बस में फिर। प्रिया ने अपनी टांगें फैलाईं, और मैंने प्रवेश किया। उसकी दीवारें कस रही थीं, और क्लाइमेक्स में हमारी सांसें मिलीं।