बस की यात्रा में छुपी चाहत

सुबह की पहली किरणें अभी-अभी निकली थीं, जब मैं अपने गांव के छोटे से घर से बाहर निकला। रोज की तरह, दिन की शुरुआत चाय की प्याली से हुई थी, और मां ने नाश्ता पैक करके थमा दिया था। आज शहर जाना था, कुछ काम के सिलसिले में, और बस स्टैंड तक का रास्ता पैदल तय करना था।

मैं राहुल हूं, पच्चीस साल का, गांव में ही रहता हूं और कभी-कभी शहर जाकर छोटे-मोटे काम निपटाता हूं। घर में भाई-भाभी और मां हैं, पिता कुछ साल पहले गुजर चुके हैं। भाई खेतीबाड़ी संभालता है, और भाभी प्रिया घर का कामकाज देखती हैं।

बस स्टैंड पहुंचा तो देखा कि प्रिया भाभी भी वहां खड़ी थीं। वे भी शहर जा रही थीं, डॉक्टर से मिलने के लिए। मैंने उन्हें देखकर मुस्कुराया और कहा, "भाभी, आप भी आज? चलिए, साथ में चलते हैं।" वे हल्के से हंसीं और बोलीं, "हां राहुल, अच्छा हुआ तुम मिल गए, अकेले जाने में डर लगता है।"

बस आई, और हम दोनों चढ़ गए। सीटें कम थीं, लेकिन किसी तरह दो सीटें साथ में मिल गईं। बस चल पड़ी, और गांव की कच्ची सड़कें धीरे-धीरे शहर की ओर मुड़ने लगीं। बाहर खेतों में किसान काम कर रहे थे, और हवा में सुबह की ठंडक थी।

प्रिया भाभी ने अपनी साड़ी संभाली और बैग को गोद में रख लिया। वे अट्ठाईस साल की हैं, शादी को चार साल हो चुके हैं, लेकिन अभी बच्चा नहीं हुआ। भाई अक्सर बाहर रहते हैं, तो घर में उनकी जिम्मेदारी ज्यादा है। मैंने उनसे पूछा, "भाभी, डॉक्टर के पास क्यों जा रही हो? सब ठीक तो है?"

वे थोड़ा झिझकीं, फिर बोलीं, "हां, बस रूटीन चेकअप है। तुम बताओ, शहर में क्या काम है?" मैंने बताया कि नौकरी के लिए इंटरव्यू है, छोटी सी कंपनी में। बातें करते-करते समय बीतने लगा, और बस की रफ्तार बढ़ गई।

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रास्ते में बस रुकी एक-दो जगह, यात्री चढ़े-उतरे। प्रिया भाभी ने अपनी पानी की बोतल निकाली और मुझे भी ऑफर किया। उनकी उंगलियां मेरे हाथ से छुईं, लेकिन उस वक्त मैंने कुछ नहीं सोचा। बस फिर चली, और अब सड़क ज्यादा व्यस्त हो गई थी।

मैंने खिड़की से बाहर देखा, पेड़ तेजी से पीछे भाग रहे थे। भाभी ने कहा, "राहुल, तुम्हें याद है बचपन में हम सब साथ घूमने जाते थे? अब सब कितना बदल गया है।" मैंने हामी भरी, और पुरानी यादों में खो गया। वे मेरी भाभी हैं, लेकिन कभी-कभी दोस्त जैसी लगती हैं।

बस में भीड़ बढ़ने लगी, और एक मोड़ पर बस ने झटका लिया। भाभी का हाथ मेरे कंधे पर आ गया, संतुलन बनाने के लिए। वे शर्मा गईं और बोलीं, "सॉरी, बस की वजह से।" मैंने कहा, "कोई बात नहीं भाभी, आराम से बैठो।"

समय बीतता गया, और दोपहर होने को आई। बस अब हाईवे पर थी, और गर्मी बढ़ रही थी। मैंने अपना बैग खोला और नाश्ता निकाला, जो मां ने पैक किया था। भाभी को ऑफर किया, और हम दोनों ने साथ खाया। उनकी मुस्कान में कुछ अलग सा लग रहा था आज।

खाने के बाद भाभी ने कहा, "राहुल, थोड़ा सो लो, यात्रा लंबी है।" लेकिन मुझे नींद नहीं आ रही थी। मैं उनकी ओर देखता रहा, उनकी साड़ी की पल्लू हवा में हल्के से उड़ रही थी। वे आंखें बंद करके बैठी थीं, लेकिन मुझे लगा जैसे वे भी जाग रही हों।

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बस में अब कम लोग थे, ज्यादातर सो रहे थे। एक और झटके में भाभी का सिर मेरे कंधे पर आ टिका। मैंने उन्हें जगाया नहीं, बस चुपचाप बैठा रहा। उनका स्पर्श अजीब सा लग रहा था, लेकिन मैंने खुद को संभाला।

कुछ देर बाद वे जागीं और शर्माते हुए बोलीं, "ओह, सॉरी राहुल, नींद आ गई थी।" मैंने मुस्कुराकर कहा, "कोई बात नहीं भाभी, आप आराम करो।" लेकिन अब मेरे मन में कुछ उथल-पुथल होने लगी थी। वे इतनी करीब थीं, और बस की गति सब कुछ भुला रही थी।

रास्ते में बस एक ढाबे पर रुकी, चाय के लिए। हम उतरे, और चाय पी। भाभी ने कहा, "राहुल, तुम बहुत अच्छे हो, हमेशा मदद करते हो।" मैंने जवाब दिया, "भाभी, आप परिवार हो, ये तो मेरा फर्ज है।" लेकिन उनकी आंखों में कुछ था जो मुझे बेचैन कर रहा था।

बस फिर चली, और अब शाम होने लगी थी। अंधेरा छाने लगा, और बस की लाइट्स जल गईं। भाभी ने अपनी शॉल निकाली और ओढ़ ली। मैंने पूछा, "ठंड लग रही है?" वे बोलीं, "हां, थोड़ी।" मैंने अपनी जैकेट उन्हें दे दी।

जैकेट लेते वक्त उनकी उंगलियां मेरे हाथ पर रुकीं, और हमारी नजरें मिलीं। कुछ सेकंड के लिए सब रुक सा गया। भाभी ने नजरें झुका लीं, लेकिन मैं महसूस कर रहा था कि कुछ बदल रहा है। बस की सीट पर हम और करीब आ गए थे।

रात गहराने लगी, और बस अब सुनसान रोड पर थी। ज्यादातर यात्री सो चुके थे। भाभी ने धीरे से कहा, "राहुल, मुझे डर लग रहा है, इतनी अंधेरी रात में।" मैंने उनका हाथ पकड़ लिया और बोला, "डरो मत भाभी, मैं हूं ना।"

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उनका हाथ मेरे हाथ में था, गर्म और नरम। मैंने उसे सहलाया, और वे चुप रहीं। धीरे-धीरे मेरी उंगलियां उनकी हथेली पर घूमने लगीं। भाभी की सांसें तेज हो गईं, लेकिन उन्होंने कुछ नहीं कहा। बस की हल्की रोशनी में उनका चेहरा लाल लग रहा था।

मैंने अपना हाथ उनकी कमर पर रखा, हल्के से। वे सिहर उठीं, लेकिन पीछे नहीं हटीं। "राहुल, ये क्या कर रहे हो?" उन्होंने फुसफुसाकर पूछा। मैंने कहा, "भाभी, पता नहीं, लेकिन ये सही लग रहा है।" वे चुप रहीं, और मैंने उन्हें और करीब खींच लिया।

बस चल रही थी, और बाहर अंधेरा था। मैंने उनके गाल पर हाथ फेरा, और वे मेरी ओर मुड़ीं। हमारी होंठ मिले, पहली बार, हल्के से। वो चुंबन इतना मीठा था कि सब कुछ भूल गया। भाभी ने आंखें बंद कर लीं, और मैंने उन्हें गले लगा लिया।

धीरे-धीरे मेरे हाथ उनकी साड़ी के नीचे सरकने लगे। उनकी त्वचा गर्म थी, और मैं महसूस कर रहा था उनकी उत्तेजना। "राहुल, कोई देख लेगा," उन्होंने कहा, लेकिन उनकी आवाज में विरोध नहीं था। मैंने कहा, "सब सो रहे हैं भाभी, चिंता मत करो।"

मैंने उनकी साड़ी की सिलवटें संभालीं, और अपना हाथ उनकी जांघ पर रखा। वे सिहर उठीं, और मुझे कसकर पकड़ लिया। बस की गति हमें और उकसा रही थी, हर झटके में हम और करीब आ रहे थे। मैंने उनके ब्लाउज के बटन खोले, धीरे से, और उनकी छाती को छुआ।

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उनकी सांसें भारी हो गईं, और उन्होंने मेरे कान में फुसफुसाया, "राहुल, ये गलत है, लेकिन रुकना नहीं चाहती।" मैंने उन्हें चूमा, गहराई से, और मेरे हाथ अब उनकी कमर पर थे। बस में हल्की सी ठंड थी, लेकिन हमारी गर्मी सब कुछ भुला रही थी।

धीरे-धीरे मैंने अपनी पैंट खोली, और भाभी ने मुझे छुआ। उनकी उंगलियां जादू कर रही थीं, और मैं खुद को रोक नहीं पा रहा था। हम सीट पर ही एक हो गए, बस की गति के साथ। हर मूवमेंट में एक नई सनसनी थी, जैसे लहरें उठ रही हों।

भाभी की आंखों में आंसू थे, लेकिन खुशी के। "राहुल, ये कभी नहीं भूलूंगी," उन्होंने कहा। मैंने उन्हें कसकर पकड़ा, और हमारा मिलन गहरा होता गया। बस के झटकों ने हमें और उत्तेजित किया, हर पल नया लग रहा था।

समय रुक सा गया था, और हम दोनों खोए हुए थे उस पल में। उनकी त्वचा की खुशबू, उनकी सांसों की गर्मी, सब कुछ परफेक्ट था। मैंने उनके कान में कहा, "भाभी, आप मेरी हो।" वे मुस्कुराईं, और हम और गहराई में उतर गए।

बस अब शहर के करीब पहुंच रही थी, लेकिन हमारा सफर अभी खत्म नहीं हुआ था। मैंने उनके शरीर को सहलाया, हर हिस्से को महसूस किया। भाभी ने मुझे काटा हल्के से, और वो दर्द मीठा था। हमारी बॉडीज एक रिदम में थीं, बस की तरह।

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अंत में, जब सब कुछ शांत हुआ, हम दोनों हांफ रहे थे। भाभी ने अपनी साड़ी संभाली, और मुझे देखा। उनकी आंखों में प्यार था, और शायद थोड़ा डर भी। मैंने उनका हाथ पकड़ा, और चुपचाप बैठे रहे।

शहर की लाइट्स दिखने लगीं, लेकिन हमारा वो पल हमेशा के लिए हमारा था। भाभी ने धीरे से कहा, "राहुल, ये राज रहेगा।" मैंने हामी भरी, और उन्हें गले लगा लिया।

बस रुकने वाली थी, लेकिन मेरे मन में वो यात्रा बार-बार घूम रही थी। हम उतरने लगे, हाथ में हाथ डाले, और बाहर की हवा ने हमें छुआ।

रात गहरी थी, और हम दोनों चुप थे, लेकिन हमारी आंखें सब कह रही थीं। मैंने भाभी को देखा, और वो मुस्कुराईं। वो पल अभी भी जीवित था हमारे बीच।