बस की यात्रा में छिपी चाहतें

सुबह की धुंधली रोशनी में मैं उठा, जैसे हर रोज़ की तरह। कॉफी का मग हाथ में लेकर बालकनी में खड़ा हो गया, बाहर की सड़क पर धीरे-धीरे ट्रैफिक बढ़ रहा था। आज का दिन खास था, क्योंकि हम पूरे परिवार के साथ गांव जा रहे थे, नेहा की दादी की तबीयत ठीक नहीं थी, और हमें बस से ही जाना था। मैंने घड़ी देखी, अभी सात बज रहे थे, और बस नौ बजे की थी।

घर में सब तैयारियां चल रही थीं। नेहा रसोई में नाश्ता पैक कर रही थी, जबकि प्रिया, उसकी छोटी बहन, सामान की लिस्ट चेक कर रही थी। प्रिया कॉलेज में पढ़ती थी, उन्नीस साल की थी, और हमेशा की तरह चुलबुली और मददगार। मैंने अपना बैग उठाया और नेहा से कहा, "चलो, समय हो रहा है, ऑटो बुला लूं।" वो मुस्कुराई और बोली, "हां, प्रिया को भी तैयार कर लो।"

हम तीनों घर से निकले, ऑटो में बैठकर बस स्टैंड पहुंचे। स्टैंड पर भीड़ थी, लेकिन हमारी बस समय पर आई। नेहा ने टिकट चेक किए, और हम अंदर चढ़ गए। बस आधी भरी थी, हमने पीछे की सीटें लीं, जहां थोड़ी जगह थी। प्रिया खिड़की वाली सीट पर बैठ गई, नेहा उसके बगल में, और मैं नेहा के पास। बस चल पड़ी, शहर की सड़कों से गुजरते हुए।

यात्रा शुरू होते ही नेहा ने अपना किताब निकाला और पढ़ने लगी। वो हमेशा सफर में किताबों में खो जाती थी। प्रिया अपने फोन पर गाने सुन रही थी, इयरफोन लगाए। मैं बाहर का नजारा देख रहा था, खेतों और गांवों से गुजरते हुए। पिछले कुछ महीनों से प्रिया हमारे साथ ज्यादा समय बिता रही थी, क्योंकि उसके कॉलेज की छुट्टियां थीं। वो नेहा से बहुत करीब थी, और मुझसे भी अब सहज हो गई थी।

बस की रफ्तार बढ़ी, और हवा तेज आने लगी। नेहा ने कहा, "अजय, थोड़ा पानी पिला दो।" मैंने बैग से बोतल निकाली और उसे दी। प्रिया ने इयरफोन निकाला और मुस्कुराकर बोली, "जीजू, आपका फोन चार्जर है क्या? मेरा फोन डिस्चार्ज हो रहा है।" मैंने अपना चार्जर उसे दिया, और वो झुककर प्लग लगाने लगी। उस पल में हमारी नजरें मिलीं, लेकिन मैंने कुछ नहीं कहा।

समय बीतता गया, और बस अब हाईवे पर थी। नेहा थक गई थी, उसने सिर मेरे कंधे पर रखा और सो गई। प्रिया अब फोन पर कुछ पढ़ रही थी, लेकिन बीच-बीच में मेरी तरफ देखती। मैंने पूछा, "क्या पढ़ रही हो?" वो हल्के से हंसी और बोली, "एक कहानी, जीजू। आप पढ़ते हो क्या?" मैंने मुस्कुराकर कहा, "कभी-कभी। कैसी कहानी?" वो बोली, "रोमांटिक वाली।"

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बातों का सिलसिला शुरू हो गया। हमने परिवार की पुरानी यादों पर चर्चा की, नेहा की शादी के दिनों की। प्रिया ने कहा, "जीजू, आप नेहा दी को बहुत खुश रखते हो। मुझे भी ऐसा ही कोई मिले।" मैंने हंसकर कहा, "तुम्हें जरूर मिलेगा, प्रिया। तुम इतनी अच्छी हो।" वो शरमाकर खिड़की की तरफ देखने लगी। बस की झटकों से नेहा की नींद नहीं टूटी, वो गहरी सो रही थी।

दोपहर हो चुकी थी, बस एक ढाबे पर रुकी। हम उतरे, चाय पी और कुछ खाया। नेहा ने कहा, "मुझे थोड़ा आराम चाहिए, बस में वापस चलते हैं।" प्रिया ने मुझसे कहा, "जीजू, आप बाहर घूम आओ, मैं दी के साथ रहूंगी।" लेकिन मैंने कहा, "नहीं, साथ चलते हैं।" बस फिर चली, अब शाम होने वाली थी।

अंधेरा छाने लगा, बस की लाइटें जल गईं। नेहा अब भी सो रही थी, शायद थकान ज्यादा थी। प्रिया ने अपना शॉल ओढ़ लिया, और मेरी तरफ देखकर बोली, "जीजू, ठंड लग रही है।" मैंने अपना जैकेट उसे दे दिया। वो बोली, "थैंक यू। आप हमेशा इतने केयरिंग क्यों हो?" मैंने कहा, "क्योंकि तुम परिवार हो।"

बातें अब गहरी होने लगीं। प्रिया ने अपनी जिंदगी के बारे में बताया, कॉलेज की दोस्तियां, सपने। मैं सुनता रहा, बीच में अपनी राय देता। अचानक बस ने एक जोर का झटका लिया, और प्रिया मेरी तरफ गिर पड़ी। मैंने उसे संभाला, हमारी आंखें मिलीं, और एक पल के लिए सब रुक सा गया। वो धीरे से बोली, "सॉरी, जीजू।"

मैंने कहा, "कोई बात नहीं।" लेकिन उस स्पर्श में कुछ अलग था। नेहा अभी भी सो रही थी, बस की आवाजें सब दबा रही थीं। प्रिया ने अपना हाथ मेरे हाथ पर रखा, और चुपचाप देखती रही। मैंने कुछ नहीं कहा, बस उसकी आंखों में देखता रहा। धीरे-धीरे हमारी उंगलियां आपस में जुड़ गईं, और एक अजीब सी गर्माहट महसूस हुई।

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बस अब अंधेरे रास्ते पर थी, बाहर कुछ नहीं दिख रहा था। प्रिया ने अपना सिर मेरे कंधे पर रख दिया, जैसे नेहा रखती थी। मैंने विरोध नहीं किया, दिल में एक उथल-पुथल थी। क्या ये सही था? लेकिन वो पल इतना स्वाभाविक लग रहा था। वो धीरे से बोली, "जीजू, मुझे अच्छा लगता है आपके साथ बात करना।"

मैंने जवाब दिया, "मुझे भी, प्रिया।" हमारी बातें अब फुसफुसाहट में बदल गईं। उसने अपनी जिंदगी की कुछ परेशानियां बताईं, और मैंने उसे सलाह दी। लेकिन हर शब्द के साथ हम करीब आते जा रहे थे। बस की सीटों के बीच का गैप अब कम लग रहा था। नेहा की सांसें नियमित थीं, वो गहरी नींद में थी।

प्रिया ने अपना हाथ मेरी जांघ पर रखा, हल्के से। मैं चौंक गया, लेकिन हटाया नहीं। वो बोली, "जीजू, क्या आपको कभी लगा है कि जिंदगी में कुछ कमी है?" मैंने सोचा, नेहा से शादी के बाद सब ठीक था, लेकिन प्रिया की मौजूदगी ने कुछ हिला दिया था। मैंने कहा, "कभी-कभी।"

उसका हाथ अब ऊपर सरक रहा था, और मैंने अपना हाथ उसके कंधे पर रख दिया। हमारी सांसें तेज हो गईं। बस की झटकों ने हमें और करीब ला दिया। प्रिया ने मेरे कान के पास फुसफुसाया, "जीजू, मुझे डर लग रहा है, लेकिन ये अच्छा लग रहा है।" मैंने उसे गले लगा लिया, धीरे से।

नेहा अभी भी सो रही थी, बस में दूसरे यात्री भी अपनी दुनिया में थे। हमारी दुनिया अब छोटी सी हो गई थी। मैंने प्रिया के गाल पर हाथ फेरा, और वो मेरी तरफ मुड़ी। हमारा पहला चुंबन हुआ, हल्का सा, डरते हुए। लेकिन वो पल हमें रोक नहीं सका।

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प्रिया की आंखों में एक चमक थी, और उसने अपना शॉल फैला लिया, हमें थोड़ा छिपाने के लिए। मैंने उसके होंठों को फिर चूमा, इस बार गहराई से। उसकी सांसें मेरे चेहरे पर महसूस हो रही थीं। बस की रफ्तार हमें और उकसा रही थी।

मैंने अपना हाथ उसके कमर पर रखा, और धीरे से ऊपर सरकाया। प्रिया ने कोई विरोध नहीं किया, बल्कि अपनी आंखें बंद कर लीं। उसकी त्वचा गर्म थी, और मैं महसूस कर रहा था उसकी दिल की धड़कन। हम दोनों जानते थे ये गलत था, लेकिन उस पल में सब सही लग रहा था।

बस एक टर्न ले रही थी, और हमने अपना संतुलन बनाए रखा। प्रिया ने मेरी शर्ट के बटन खोले, हल्के से, और अपना हाथ अंदर डाला। मैंने उसके ब्लाउज के नीचे हाथ डाला, उसकी छाती को छुआ। वो सिहर उठी, लेकिन चुप रही।

हमारी हरकतें अब तेज हो गईं। मैंने उसके स्कर्ट को ऊपर किया, और उसने अपनी टांगें थोड़ी फैलाईं। बस की सीट पर ये मुश्किल था, लेकिन इच्छा ने सब आसान कर दिया। प्रिया ने मेरी पैंट की जिप खोली, और अपना हाथ अंदर डाला।

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मैंने उसके कान में कहा, "प्रिया, क्या तुम्हें यकीन है?" वो बोली, "हां, जीजू। बस यही पल चाहिए।" मैंने धीरे से उसकी पैंटी को साइड किया, और अपनी उंगलियां उसकी गर्माहट में डालीं। वो कांप उठी, लेकिन मुस्कुराई।

बस की स्पीड अब स्थिर थी, और हमने अपना काम जारी रखा। मैंने खुद को उसके करीब लाया, और धीरे से प्रवेश किया। प्रिया ने अपनी आंखें बंद कीं, और एक हल्की सी सिसकी निकली। लेकिन बस की आवाज ने सब दबा दिया।

हमारी गतिविधियां अब लय में थीं, बस के झटकों के साथ। हर धक्के में एक नई सनसनी थी। प्रिया की सांसें तेज थीं, और वो मेरे कंधे पर अपना मुंह दबाए हुई थी। मैं महसूस कर रहा था उसकी गहराई, उसकी नमी।

समय जैसे रुक गया था। हम दोनों एक-दूसरे में खोए हुए थे, इमोशन्स की लहरों में। प्रिया ने फुसफुसाया, "जीजू, ये कभी मत भूलना।" मैंने कहा, "नहीं भूलूंगा।" हमारा क्लाइमैक्स आया, साथ में, एक तीव्र अनुभव।

बाद में हम चुपचाप बैठे रहे, हाथ पकड़े हुए। नेहा अभी भी सो रही थी, अनजान। प्रिया ने मेरी तरफ देखा, आंखों में एक मिश्रित भावना। बस अब गांव के करीब पहुंच रही थी, लेकिन हमारा सफर अभी खत्म नहीं हुआ था।

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रात गहरा गई, और बस रुकी। नेहा जागी, और हम उतरने लगे। प्रिया ने मुझे एक आखिरी नजर दी, जिसमें वादा था। घर पहुंचकर सब सो गए, लेकिन मेरे मन में वो पल घूमते रहे।

अगले दिन गांव में सब सामान्य था, लेकिन प्रिया और मेरे बीच एक गुप्त समझ थी। शाम को हम फिर बस से वापस आ रहे थे, इस बार नेहा आगे की सीट पर थी। प्रिया मेरे बगल में बैठी, और हमारी आंखें मिलीं।

बस चली, और अंधेरा हुआ। प्रिया ने अपना हाथ मेरे पर रखा, और मैंने उसे कसकर पकड़ा। इस बार हम ज्यादा साहसी थे, लेकिन अभी भी सावधान। हमने फिर वही जादू दोहराया, लेकिन इस बार ज्यादा भावनात्मक गहराई के साथ।

हर स्पर्श में प्यार था, हर चुंबन में चाहत। प्रिया की आंखों में आंसू थे, खुशी के। मैंने उसे गले लगाया, और हम एक हो गए। बस की यात्रा अब हमारी कहानी का हिस्सा बन चुकी थी।